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Saturday, 11 April, 2026
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2 NGO बनाम पेमा खांडू — अरुणाचल प्रदेश के CM और उनके परिजनों पर सार्वजनिक ठेकों से जुड़ा केस क्या है

सुप्रीम कोर्ट ने CBI को एक प्रारंभिक जांच करने का निर्देश दिया है—PIL के गुण-दोषों के आधार पर नहीं, बल्कि यह निर्धारित करने के लिए कि क्या इस मामले में विस्तृत जांच की आवश्यकता है.

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नई दिल्ली: इस हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश सरकार, जिसका नेतृत्व मुख्यमंत्री पेमा खांडू कर रहे हैं, पर लगे आरोपों में CBI जांच के आदेश दिए. आरोप है कि सरकार ने करीब 1,270 करोड़ रुपये के सार्वजनिक ठेके उनके अपने परिवार को दिए. हालांकि यह भी कहा गया कि लगभग सभी ठेके खुले टेंडर से दिए गए थे. कोर्ट ने कहा कि यह जांच जरूरी है ताकि इस “मिलीभगत वाले काम” की पूरी सच्चाई सामने आ सके.

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने CBI को निर्देश दिया कि वह दो हफ्तों के भीतर प्रारंभिक जांच दर्ज करे. यह जांच इस बात पर होगी कि क्या सार्वजनिक ठेके मुख्यमंत्री खांडू के रिश्तेदारों और परिवार की कंपनियों को गलत तरीके से दिए गए.

जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन.वी. अंजारिया की बेंच ने यह आदेश एक जनहित याचिका (PIL) पर दिया. यह याचिका ‘सेव मोन रीजन फेडरेशन’ और ‘वॉलंटरी अरुणाचल सेना’ नाम के NGO ने दायर की थी. इसमें आरोप लगाया गया था कि राज्य के लगभग सभी सरकारी ठेके मुख्यमंत्री के करीबी परिवार के लोगों को दिए जा रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

कोर्ट ने साफ किया कि उसका यह आदेश आरोपों को सही या गलत ठहराने का फैसला नहीं है. CBI को यह तय करना है कि इस मामले में पूरी जांच जरूरी है या नहीं.

CBI को 16 हफ्तों के भीतर अपनी स्थिति रिपोर्ट कोर्ट में देनी होगी. यह प्रारंभिक जांच जनवरी 2015 से दिसंबर 2025 तक के सभी सरकारी ठेकों को कवर करेगी और PIL में बताए गए सभी मामलों को देखेगी.

बीजेपी नेता पेमा खांडू जुलाई 2016 में मुख्यमंत्री बने थे और तब से पद पर हैं. कोर्ट ने यह भी कहा कि CBI जरूरत पड़ने पर जांच का दायरा बढ़ा सकती है और सिर्फ याचिका तक सीमित नहीं रहेगी.

फैसले में कहा गया कि CBI सभी फाइलें, खरीद प्रक्रिया और टेंडर देने के कारणों की जांच करेगी.

कोर्ट ने अरुणाचल सरकार और उसके सभी विभागों को CBI के साथ सहयोग करने का आदेश दिया. राज्य को चार हफ्तों के भीतर पिछले 10 साल के सभी ठेकों से जुड़े कागज और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड CBI को देने होंगे. मुख्य सचिव एक नोडल अधिकारी नियुक्त करेंगे जो CBI की मदद करेगा और रिकॉर्ड उपलब्ध कराएगा.

मुख्य सचिव को एक हफ्ते के भीतर सभी विभागों को निर्देश देने को भी कहा गया है कि वे किसी भी संबंधित दस्तावेज को नष्ट, बदल या छुपाएं नहीं.

‘स्पष्ट भ्रष्टाचार के मामले’

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश में “स्पष्ट भ्रष्टाचार” के मामलों की CBI जांच होनी चाहिए, जहां करोड़ों रुपये के सरकारी ठेके मुख्यमंत्री, उनकी मां और उनके भाई की कंपनियों को दिए गए.

उन्होंने कहा कि इन हलफनामों में पहली नजर में गंभीर आरोप सामने आते हैं कि कैसे सार्वजनिक धन परिवार की कंपनियों को दिया गया.

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ज्यादातर ठेके उन्हीं कंपनियों को दिए गए जो सीधे मुख्यमंत्री से जुड़ी हैं. खासकर पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट, रूरल वर्क्स डिपार्टमेंट, वाटर रिसोर्सेस, हाइड्रो पावर, पावर और अर्बन डेवलपमेंट विभाग के ठेके. इनमें से कई विभाग लंबे समय तक खुद मुख्यमंत्री के पास भी रहे.

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि टेंडर के जरिए 121 ठेके दिए गए जिनकी कुल कीमत 1,245.04 करोड़ रुपये थी. जबकि वर्क ऑर्डर के जरिए 322 ठेके दिए गए जिनकी कीमत 25.72 करोड़ रुपये थी.

उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार का यह तर्क कि ऐसे ठेकों का प्रतिशत बहुत कम है, सही नहीं है. क्योंकि यह “कम प्रतिशत” भी 1,270 करोड़ रुपये से ज्यादा का है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि राज्य ने अपने हलफनामे में सिर्फ चार कंपनियों का डेटा दिया है, जबकि उन्होंने लगभग 15 कंपनियों के सबूत दिए हैं.

उन्होंने कहा कि सिर्फ CBI जांच ही यह पता लगा सकती है कि असल में कितने ठेके इन लोगों और उनके रिश्तेदारों को दिए गए.

उन्होंने यह भी कहा कि राज्य का नया हलफनामा पूरे अरुणाचल प्रदेश के लिए है, लेकिन 17 सितंबर 2025 का पुराना हलफनामा सिर्फ तवांग जिले पर केंद्रित था, जो इन तीनों का गृह जिला है, और ज्यादातर ठेके वहीं दिए गए.

याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कई टेंडरों में जिन कंपनियों को ठेका मिला, उनके खिलाफ बोली लगाने वाली कंपनियां भी इन्हीं लोगों से जुड़ी थीं. इससे टेंडर प्रक्रिया पर सवाल उठता है और इसमें पक्षपात और भ्रष्टाचार की संभावना दिखती है.

उन्होंने कहा कि इससे साफ लगता है कि यह सैकड़ों टेंडर एक “मिलीभगत” का मामला हैं, जहां ठेका देने वाले और लेने वाले दोनों ही वही लोग या उनके रिश्तेदार हैं. इसमें सरकारी अधिकारियों की भी मिलीभगत दिखती है.

‘खुले टेंडर से दिए गए ठेके’

इधर 18 मार्च को अरुणाचल प्रदेश सरकार ने, अपने डिप्टी सेक्रेटरी के जरिए कहा कि तवांग जिले में अलग-अलग सरकारी विभागों ने एक विस्तृत जांच की. इसमें उन सभी ठेकों की सूची बनाई गई जो इन तीनों लोगों या उनसे जुड़े लोगों और कंपनियों को दिए गए.

राज्य ने कहा, “हम फिर से कहते हैं कि इस याचिका में लगाए गए आरोप सिर्फ अरुणाचल प्रदेश के एक ही जिले—तवांग—से जुड़े हैं.”

राज्य ने साफ किया कि “पिछले 10 साल में इन तीनों लोगों (रिस्पॉन्डेंट 4-6) को सीधे कोई सरकारी ठेका नहीं दिया गया.” आगे यह भी कहा गया कि करीब 95 प्रतिशत ठेके उन कंपनियों या लोगों को दिए गए जो इनसे जुड़े हैं, और यह सब “खुले टेंडर” की प्रक्रिया से हुआ.

राज्य ने कहा, “लगभग सभी ठेके खुले टेंडर के जरिए दिए गए, जिसमें तकनीकी और वित्तीय बोली मंगाई गई और उनका मूल्यांकन किया गया. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि किसी को चुनकर फायदा पहुंचाया गया या इन लोगों या उनसे जुड़े लोगों को विशेष लाभ दिया गया.”

राज्य ने यह भी कहा कि अतिरिक्त हलफनामे में जिन ठेकों का जिक्र है, वे ज्यादातर सिर्फ तीन मुख्य परियोजनाओं के अलग-अलग चरणों से जुड़े हैं. ये हैं—ल्हौ नाला से मुकतो सर्कल मुख्यालय तक लिंक रोड का निर्माण, तवांग जिले के श्यारो में “वुडन ड्रीम हाउस” नाम का वुड बार्न बनाना, और जांग में वाटरफॉल व्यू पर इको-टूरिज्म लॉज का विकास.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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