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Thursday, 9 April, 2026
होमफीचरदिल्ली के उद्योग का दम घुट रहा है: प्रदूषण जांच और नाला-सड़क-पानी की चुनौती

दिल्ली के उद्योग का दम घुट रहा है: प्रदूषण जांच और नाला-सड़क-पानी की चुनौती

पिछले 30 सालों से, दिल्ली अपने औद्योगिक इलाकों में प्रदूषण के खिलाफ सख्ती बरत रही है, उन्हें वहां से हटा रही है, और फिर बिना किसी बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर के उन्हें बेसहारा छोड़ दे रही है. ‘हम अनाथों जैसे हैं.’

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नई दिल्ली: तरनजीत सिंह संधू के दिल्ली के उपराज्यपाल पद पर शपथ लेने के एक हफ़्ते बाद, सत्ता के गलियारों में एक जानी-पहचानी दस्तक फिर सुनाई दी. यह “स्वागत और बधाई” देने के लिए एक मुलाकात का अनुरोध था, लेकिन इसके पीछे दिल्ली के उद्योगों को फिर से ज़िंदा करने की एक लंबे समय से नज़रअंदाज़ की जा रही और लगातार बढ़ती हताशा भरी कोशिश छिपी थी.

जब भी कोई नया मुख्यमंत्री या उपराज्यपाल पदभार संभालता है, तो यह सिलसिला हर बार दोहराया जाता है. उद्योगपति अपनी शिकायतें इस उम्मीद में पेश करते हैं कि सत्ता बदलने पर उनकी बात सुनी जाएगी. इस बार, यह अपील नारायणा इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन (NIA) की ओर से आई, जो शहर के सबसे पुराने औद्योगिक केंद्रों में से एक का प्रतिनिधित्व करता है.

संधू को 18 मार्च को लिखे पत्र में कहा गया है, “हम आपका ध्यान नारायणा औद्योगिक क्षेत्र में बुनियादी ढांचे की मौजूदा स्थिति की ओर भी विनम्रतापूर्वक दिलाना चाहेंगे. इस क्षेत्र के सुधार और औद्योगिक गतिविधियों के सुचारू रूप से चलने के लिए इस पर तत्काल ध्यान देने और हस्तक्षेप की आवश्यकता है.”

दिल्ली का औद्योगिक क्षेत्र लगभग 4 लाख लोगों को रोज़गार देता है और शहर की अर्थव्यवस्था में 50,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का योगदान देता है, लेकिन इसकी सबसे ज़रूरी मांगें तकनीक को बढ़ाने या वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जुड़ी नहीं हैं. यह चाहता है कि बुनियादी ज़रूरतों जैसे कि नाला, सड़क, पानी पर ध्यान दिया जाए.

दिल्ली-एनसीआर के औद्योगिक क्षेत्र जगह और बुनियादी ढांचे की भारी कमी के बीच काम कर रहे हैं, जिससे साझा पर्यावरणीय सुविधाओं को लागू करना मुश्किल हो जाता है… औद्योगिक क्षेत्रों के अंदर टूटी-फूटी, धूल भरी सड़कों जैसी रोज़मर्रा की असलियत प्रदूषण के स्तर को काफ़ी बढ़ा देती हैं.

-शोभित श्रीवास्तव, प्रोग्राम मैनेजर, औद्योगिक प्रदूषण, CSE

ये चिंताएं दिल्ली के औद्योगिक समूहों में हर जगह फैली हुई हैं—ओखला की कपड़ों और प्रिंटिंग यूनिट्स से लेकर नारायणा के भारी-भरकम औद्योगिक रसोई और होटल उपकरणों के केंद्रों तक और पूर्वी दिल्ली में छाए पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC) केबल और इस्पात उद्योगों तक.

नारायणा इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश सचदेवा ने कहा, “एक दशक से भी ज़्यादा समय से, हम उन्हीं चिंताओं, उन्हीं परेशानियों को ढो रहे हैं.” उनके चेहरे पर साफ-साफ थकान झलक रही थी. उन्होंने कहा, “एमसीडी हर साल इन क्षेत्रों से संपत्ति कर वसूलती है, लेकिन रखरखाव पर कुछ भी खर्च नहीं करती. हम विक्रेताओं के लिए अलग ज़ोन और उद्योगों के लिए बिजली की कम दरें तय करने की मांग कर रहे हैं.”

उन्होंने आगे कहा कि औद्योगिक क्षेत्रों में अतिक्रमण इतना ज़्यादा बढ़ गया है कि माल ढोने वाले वाहन गलियों से मुश्किल से ही गुज़र पाते हैं. 1990 के दशक में, फैक्ट्रियों पर ‘प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों’ का ठप्पा लग गया था और उन्हें खास इंडस्ट्रियल ज़ोन में शिफ़्ट कर दिया गया था, जो अक्सर शहर के बाहरी इलाकों में होते थे. इन ज़ोन को आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के तौर पर सोचा गया था, लेकिन आज वे थके-हारे से दिखते हैं, सड़कों पर गड्ढे ही गड्ढे हैं, नालियां कचरे से अटी पड़ी हैं और बिजली की सप्लाई भी ठीक नहीं है.

यह सेक्टर एक मुश्किल हालात में फंसा हुआ है. फैक्ट्रियां बिना सही इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रदूषण से जुड़े नियमों का पालन करने के लिए जूझ रही हैं. शहर की अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा कम हो गया है और रोज़गार के आंकड़े भी घट गए हैं. 2025-26 के दिल्ली आर्थिक सर्वेक्षण में भी इसकी वजह बड़े पैमाने पर रोज़गार देने वाली कंपनियों का “प्रदूषण से जुड़े सख़्त नियमों” के कारण दूसरी जगहों पर चले जाना बताया गया है.

रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने इंडस्ट्रियल इलाकों को बेहतर बनाने और प्रदूषण से निपटने का वादा किया है, लेकिन ऐसे ही वादे शीला दीक्षित और अरविंद केजरीवाल के कार्यकाल में भी सुने गए थे. पिछले 15 सालों में, दो इंडस्ट्रियल नीतियां बनाई गई हैं और अनगिनत चर्चाएं हुई हैं. फिर भी, शहर की इंडस्ट्रियल रीढ़ की हड्डी सबसे बुनियादी सुधारों का इंतिज़ार कर रही है.

कई उद्योगपतियों के लिए, यह विरोधाभास बहुत ही परेशान करने वाला है. उनसे आधुनिक बनने और साफ-सफाई रखने के लिए कहा जाता है, और फिर उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है.

दिल्ली राज्य औद्योगिक और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास निगम (DSIIDC) 24 इंडस्ट्रियल इलाकों के रखरखाव के लिए ज़िम्मेदार है. लेकिन इसका अधिकार क्षेत्र अक्सर MCD या DDA के साथ बंटा होता है | फ़ोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

‘कोई असरदार कार्रवाई नहीं…’

दिल्ली के उद्योगों में बड़े सपने तो हैं, लेकिन वे रोज़मर्रा की मुश्किलों से दबे हुए हैं. यह तनाव नारायणा इंडस्ट्रियल एरिया में साफ दिखता है.

एनआईए के मुताबिक, यहां करीब 1,200 छोटे और मंझोले कारखाने हैं — जिनमें लाइट इंजीनियरिंग वर्कशॉप, कपड़ों की यूनिट, इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने वाले, पैकेजिंग का सामान बनाने वाले वगैरह शामिल हैं और इनमें करीब 50,000 मज़दूरों को सीधे और परोक्ष रूप से रोज़गार मिला हुआ है. कुछ कारखानों के बाहर बड़े-बड़े बोर्ड लगे हैं जो उनकी मौजूदगी का ऐलान करते हैं, तो कुछ के बाहर सिर्फ़ छोटे, धुंधले साइनबोर्ड लगे हैं.

इन सबमें एक बात जो आम है, वह यह कि ये सभी बंद नालियों, बिना उठाए गए कूड़े-कचरे, गड्ढों वाली सड़कों और ऊपर लटकते तारों के जाल से घिरे हुए हैं.

ट्रकों की वजह से होने वाली भीड़ एक बड़ी शिकायत है जिसे नारायणा इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन ने अपने X अकाउंट पर बार-बार उठाया है | फ़ोटो: X/@NIA_delhi

अपनी वेबसाइट पर, NIA ने ‘विभागों को लिखे पत्र’ के लिए एक पूरा सेक्शन बनाया है. सिर्फ मार्च महीने में ही, इसने अधिकारियों को नौ अलग-अलग पत्र लिखे — जिनमें मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल से लेकर दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) और दिल्ली राज्य औद्योगिक और बुनियादी ढांचा विकास निगम (DSIIDC) तक शामिल हैं. हर पत्र में खराब होती नागरिक सुविधाओं को ठीक करने के लिए मदद मांगी गई थी: जैसे पानी की नालियों की सफाई, कूड़ा हटाना और अतिक्रमण के ख़िलाफ कार्रवाई करना.

30 मार्च को एमसीडी के डिप्टी कमिश्नर को लिखे एक पत्र में, एसोसिएशन ने नारायणा फ़ेज़ I में दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के एक खाली प्लॉट की ओर ध्यान दिलाया. यह प्लॉट कूड़े और सूखे कचरे को फेंकने की एक अनाधिकृत जगह बन गया था, और वह भी ठीक एक प्रिंटिंग और पेपर पैकेजिंग यूनिट के बगल में, जहां ज्वलनशील पदार्थ रखे हुए थे. पत्र में कहा गया कि स्थिति “लगातार चिंताजनक” होती जा रही थी और इससे आस-पास की यूनिटों में आग लगने का खतरा पैदा हो गया था. पत्र में यह भी जोड़ा गया कि कुछ छोटी-मोटी आग की घटनाएं पहले ही हो चुकी थीं.

पत्र में आगे कहा गया, “संबंधित एजेंसियों को कई बार अपनी बात बताई गई है और अनुरोध किए गए हैं लेकिन अब तक कोई असरदार कार्रवाई नहीं की गई है.”

नारायणा इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन का एक पत्र, जिसमें आग लगने का खतरा पैदा करने वाले कचरे को हटाने की मांग की गई है.

एक दुष्चक्र

कुछ लोगों के अनुसार, शहर की औद्योगिक समस्याएं 1990 में मंजूर हुए मास्टर प्लान से शुरू हुई थीं. ज़मीन को औद्योगिक इस्तेमाल के लिए अलग रखा गया था, लेकिन उसका ज़्यादातर हिस्सा कभी विकसित ही नहीं हुआ. नतीजतन, रिहायशी और मिश्रित-इस्तेमाल वाले इलाकों में बिना किसी सहायक इंफ्रास्ट्रक्चर के ही उद्योग खड़े हो गए.

1990 के दशक में एक बड़ा मोड़ आया, जब एमसी मेहता बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की एक श्रृंखला ने प्रदूषण फैलाने वाली और नियमों का पालन न करने वाली इकाइयों को रिहायशी इलाकों से बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया. अकेले 1996 में ही, 1,300 से ज़्यादा उद्योगों को बंद करने या दूसरी जगह ले जाने का आदेश दिया गया. लेकिन यह बदलाव बिल्कुल भी आसान नहीं था. प्लॉट तो आवंटित कर दिए गए, लेकिन कई यूनिट्स वहां नहीं गईं क्योंकि नए औद्योगिक इलाकों में बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी थी. कुछ अन्य इकाइयां तो सालों की देरी के बाद वहां गईं.

 प्लानर गीता दीवान वर्मा ने 2002 में लिखा था, “दिल्ली के मास्टर प्लान ने काफी हद तक सही अनुमान लगाया था कि 2001 तक लगभग 100,000 औद्योगिक इकाइयां होंगी और उनके लिए 2000 हेक्टेयर से भी ज़्यादा नियोजित औद्योगिक जगह का प्रावधान किया था. दिल्ली की ज़्यादातर औद्योगिक इकाइयां अवैध और समस्याग्रस्त तरीकों से इसलिए काम कर रही हैं क्योंकि इस जगह का लगभग कोई भी हिस्सा विकसित ही नहीं किया गया है.”

दिल्ली के सबसे पुराने मैन्युफैक्चरिंग हब में से एक, फ्रेंड्स कॉलोनी इंडस्ट्रियल एरिया प्लास्टिक, इंजीनियरिंग सामान और इलेक्ट्रिक केबल बनाने वाली छोटी यूनिट्स के लिए मशहूर है | फ़ोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

योजना बनाने में हुई इस नाकामी ने एक दुष्चक्र पैदा कर दिया है. कई औद्योगिक इलाकों में कभी भी उचित जल निकासी, पक्की सड़कें या अपशिष्ट उपचार प्रणाली (effluent treatment systems) नहीं दी गईं. इनके बिना, कारखानों को प्रदूषण के मानदंडों को पूरा करने में काफी मुश्किल होती है और इसी वजह से वे अधिकारियों की सख़्त कार्रवाई का आसान निशाना बन जाते हैं.

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) में औद्योगिक प्रदूषण के प्रोग्राम मैनेजर, शोभित श्रीवास्तव ने कहा, “दिल्ली एनसीआर के औद्योगिक इलाके जगह और इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी के बीच काम कर रहे हैं, जिससे साझा पर्यावरणीय सुविधाओं को अपनाना मुश्किल हो जाता है.”

यह ठहराव दिल्ली आर्थिक सर्वे 2025-26 में भी साफ तौर पर बताया गया है. रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में मैन्युफैक्चरिंग उत्पादन तो पिछले कुछ सालों में बढ़ा है लेकिन शहर की अर्थव्यवस्था में इसका हिस्सा कम हुआ है. पक्के आंकड़ों में, मैन्युफैक्चरिंग से होने वाला ग्रॉस स्टेट वैल्यू एडेड (GSVA) 2024-25 में 45,930 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 50,144 करोड़ रुपये हो गया. हालांकि, GSVA में इसका योगदान 2011-12 में 6.24 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 4.19 प्रतिशत रह गया.

आज की दिल्ली में, इंडस्ट्री सिर्फ़ बाज़ार की ताकतों से ही नहीं लड़ रही है. वह अपने आस-पास के माहौल से भी लड़ रही है. यूनिट्स नोएडा और गुरुग्राम में शिफ्ट हो रही हैं. वहां बिजली सस्ती है, मज़दूरी कम है और सिस्टम बेहतर काम करते हैं.

-राकेश सचदेवा, प्रेसिडेंट, नारायणा इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन

जहां काम कर रही फ़ैक्टरियों की संख्या 2011 में 8,219 से बढ़कर 2024 में 8,869 हो गई, वहीं रोज़गार में कमी आई है. 5वीं और 6वीं आर्थिक जनगणना के बीच, फ़ैक्टरियों, दुकानों और दूसरी यूनिट्स समेत सभी तरह के संस्थानों में कुल रोज़गार 35,56,387 से घटकर 30,19,781 रह गया.

सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है, “इसकी मुख्य वजह यह है कि बड़े पैमाने पर रोज़गार देने वाले संस्थान, प्रदूषण से जुड़े सख़्त नियमों समेत कई कारणों से दिल्ली से हटकर आस-पास के इलाकों/राज्यों में शिफ़्ट हो गए हैं.”

पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया के गेट पर फेंका गया कूड़ा | फ़ोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

दिल्ली की इंडस्ट्रीज़ शहर के कुल प्रदूषण में लगभग 10 प्रतिशत का योगदान देती हैं. 2023 में, अधिकारियों ने पूरे दिल्ली-एनसीआर में कोयले के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी, जिससे इंडस्ट्रीज़ को प्रदूषण-रहित विकल्पों की ओर बढ़ना पड़ा लेकिन यह बदलाव एक जैसा नहीं रहा है.

श्रीवास्तव ने कहा, “निगरानी ही असली चुनौती है. गैर-कानूनी और प्रदूषण फैलाने वाली यूनिट्स कुछ इलाकों में अभी भी चल रही हैं और नियमों को लागू करने में रह गई कमियों का फायदा उठा रही हैं. साथ ही, इंडस्ट्रियल इलाकों के अंदर टूटी-फूटी और धूल भरी सड़कों जैसी रोज़मर्रा की दिक्कतें भी प्रदूषण के स्तर को काफी बढ़ाती हैं.”

अब, रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार का कहना है कि वह इंडस्ट्रियल इलाकों को प्राथमिकता दे रही है. 2026-27 के बजट में, पहली बार इंफ़्रास्ट्रक्चर में सुधार के लिए 160 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है, जिसमें उन इलाकों को भी शामिल किया गया है जो तय नियमों के मुताबिक नहीं हैं.

पिछले नवंबर में DSIIDC के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक समीक्षा बैठक के बाद उद्योग मंत्री मंज़िंदर सिंह सिरसा ने कहा था, “दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्रों का पुनर्विकास इस तरह से तैयार किया जा रहा है कि इससे न केवल बुनियादी ढांचे में सुधार हो, बल्कि स्मार्ट और विज्ञान-आधारित उपायों के ज़रिए धूल प्रदूषण में भी भारी कमी आए.”

लंबी गिरावट

राकेश सचदेवा के लिए, यह गिरावट निजी है. दूसरी पीढ़ी के उद्योगपति के तौर पर, उन्होंने देखा है कि कैसे नारायणा एक उभरते हुए हब से बदलकर एक अस्त-व्यस्त और बदहाल जगह बन गया. उनके परिवार का बिज़नेस, ‘रिलीफ किचन सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड’, उस क्लस्टर का हिस्सा है जो कभी दिल्ली की मैन्युफैक्चरिंग ताकत का प्रतीक था.

साल 1969 में, जब यहां प्रोडक्शन शुरू हुआ था, तब इस इलाके की योजना डीडीए ने बहुत सोच-समझकर बनाई थी.

उन्होंने याद करते हुए बताया, “लगभग 1990 तक, इंफ्रास्ट्रक्चर कोई समस्या नहीं थी. फिर उदारीकरण आया और इंडस्ट्री का विस्तार हुआ. और भी कई यूनिट्स खुलीं, और उनके साथ-साथ, और भी ज़्यादा मज़दूर आए.

सचदेवा ने कहा, “काम का बोझ बढ़ा लेकिन सिस्टम उसके साथ तालमेल नहीं बिठा पाया.”

नारायणा इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन के प्रेसिडेंट राकेश सचदेवा अपने बेटे युगंक सचदेवा के साथ अपने गुरुग्राम ऑफिस में | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

शीला दीक्षित सरकार द्वारा जारी ‘दिल्ली के लिए औद्योगिक नीति 2010-2021’ के अनुसार, राज्य की आय में सेकेंडरी सेक्टर — मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और उससे जुड़ी इंडस्ट्रीज़ — का हिस्सा 1982 में 25 प्रतिशत से बढ़कर 1999-2000 में लगभग 80 प्रतिशत हो गया.

दस्तावेज़ में बताया गया, “हालांकि, 2000 के बाद, यह ट्रेंड उलट गया; सेकेंडरी सेक्टर का हिस्सा घटकर 20% रह गया और टर्शियरी सेक्टर ने उसकी जगह ले ली, जिसका हिस्सा 80% हो गया.”

यह दशक दिल्ली में एक साफ-सुथरी राजधानी बनने की बढ़ती नागरिक आकांक्षा के साथ भी मेल खाता था. जिन चीज़ों को लोग ‘गंदी फैक्ट्रियां’ मानते थे, उनकी मौजूदगी इस मध्यम-वर्गीय सोच के साथ मेल नहीं खाती थी. यह सोच सरकारी सेक्टर के कर्मचारियों की पुरानी पीढ़ी और गुरुग्राम तथा नोएडा में साफ-सुथरी सर्विस-सेक्टर IT नौकरियों में काम करने वाली युवा पीढ़ी में गहरी जड़ें जमाए हुए थी. औद्योगिक इलाकों को धीरे-धीरे एक कलंक की तरह देखा जाने लगा और आखिरकार उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

औद्योगिक इलाकों पर इंडस्ट्री डिपार्टमेंट का कोई कंट्रोल नहीं है. दिल्ली में हमारे पास विस्तार की कोई गुंजाइश नहीं है. हम बस किसी तरह गुज़ारा कर रहे हैं.

– अनिल गुप्ता, चेयरमैन, फ्रेंड्स कॉलोनी इंडस्ट्रियल एरिया एसोसिएशन

दिल्ली के एक उद्योगपति और झिलमिल तथा फ्रेंड्स कॉलोनी इंडस्ट्रियल एरिया एसोसिएशन के चेयरमैन अनिल गुप्ता ने कहा, “दिल्ली अब आर्थिक हब नहीं रहा. 2000 के बाद, सर्विस सेक्टर के विस्तार के साथ शहर में तेज़ी से बदलाव आया है. जैसे-जैसे शहर बढ़ा, उद्योगों के विस्तार की कोई गुंजाइश नहीं बची, जिसके चलते वे गुरुग्राम के मानेसर जैसे आस-पास के इलाकों में चले गए.”

तब से ये दरारें और गहरी ही हुई हैं. बिजली की कमी और लॉजिस्टिक्स में रुकावटों जैसी पुरानी सिरदर्दों के साथ अब बढ़ती कंप्लायंस लागत और इस क्षेत्र में बिजली की सबसे ज़्यादा दरों की समस्या भी जुड़ गई है. दिल्ली के औद्योगिक आधार बनाने वाले एमएसएमई के लिए, यह एक निर्णायक मोड़ बन गया है.

सचदेवा ने कहा, “दिल्ली अब उद्योगों के लिए अनुकूल नहीं रही. यूनिटें नोएडा और गुरुग्राम में जा रही हैं. वहां बिजली सस्ती है, मज़दूरी कम है और सिस्टम बेहतर काम करते हैं.”

मुख्यमंत्री गुप्ता को लिखे एक और पत्र में, सचदेवा ने बिजली की दरों को तर्कसंगत बनाने की गुहार लगाई.

पत्र में लिखा है, “बिजली की मौजूदा दरें काफी ज़्यादा हैं, जिससे उद्योगों, खासकर एमएसएमई पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है. उद्योगों की व्यवहार्यता और प्रतिस्पर्धात्मकता को बेहतर बनाने के लिए दरों को तर्कसंगत बनाना ज़रूरी है.”

सचदेवा के लिए, इन तमाम मुश्किलों के बावजूद नारायणा का टिके रहना, उसकी ज़बरदस्त जुझारूपन का संकेत है.

उन्होंने कहा, “आज की दिल्ली में, उद्योग सिर्फ बाज़ार की ताकतों से ही नहीं लड़ रहा है. वह अपने आस-पास के माहौल से भी लड़ रहा है.”

फ्रेंड्स कॉलोनी इंडस्ट्रियल एरिया की शताब्दी मनाने वाले बोर्ड के चारों ओर कूड़ा फैला है | फ़ोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

फ्रेंड्स कॉलोनी इंडस्ट्रियल एरिया की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसने पिछले साल अपनी शताब्दी पूरी की. कूड़े से भरी एक संकरी गली में, पिछले दिसंबर में हुए समारोह का एक औपचारिक बोर्ड अभी भी लगा हुआ है: शताब्दी वर्ष: 100 साल, एक सदी का संकल्प. सीएम गुप्ता इस कार्यक्रम में शामिल हुईं और उन्होंने प्रक्रियागत बाधाओं को दूर करने का वादा किया.

उन्होंने कार्यक्रम में कहा, “उद्योगों को एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर के चक्कर लगाने में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए. हमारा प्रयास मंज़ूरियों को तेज़, पारदर्शी और अनुमानित बनाना है.”

अनिल गुप्ता उतने आशावादी नहीं थे. फ्रेंड्स कॉलोनी इंडस्ट्रियल एरिया तो बुनियादी चीज़ों के लिए ही संघर्ष कर रहा है.

उन्होंने कहा, “औद्योगिक क्षेत्रों पर उद्योग विभाग का कोई नियंत्रण नहीं है. दिल्ली में हमारे पास विस्तार की कोई गुंजाइश नहीं है. हम तो बस किसी तरह गुज़ारा कर रहे हैं.”

अधिकार क्षेत्र की उलझन

दिल्ली के औद्योगिक इलाकों का प्रशासन कई एजेंसियों के हाथ में है — DDA, DSIIDC, DPCC, MCD और उद्योग विभाग. इससे उद्योगपतियों के लिए और भी मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं.

2010 में, शीला दीक्षित सरकार ने इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की. एक नया कानून, DIDOM (दिल्ली औद्योगिक विकास, संचालन और रखरखाव) अधिनियम बनाया गया, ताकि औद्योगिक इलाकों का प्रबंधन DSIIDC को सौंपा जा सके. साथ ही, एक औद्योगिक नीति भी तैयार की गई — जो 28 सालों में पहली ऐसी नीति थी.

दिल्ली के पूर्व उद्योग मंत्री हारून यूसुफ ने कहा, “पूरे शहर से उद्योगपति अपनी चिंताओं को लेकर हमारे पास आए थे — बुनियादी ढांचे की कमी से लेकर किसी ठोस नीति के अभाव तक. उद्योग जगत तो पूरी तरह से ढहने की कगार पर पहुंच गया था.” उन्होंने आगे कहा, “हमने कई दशकों के बाद एक औद्योगिक नीति लागू की और उद्योगों के एकीकृत प्रबंधन के लिए एक विशेष अधिनियम भी बनाया.”

DSIIDC के राजस्व में भारी कमी है. नीतिगत स्तर पर, सभी औद्योगिक इलाकों के संचालन के लिए किसी एक ही एजेंसी को अधिकृत करने की आवश्यकता है.

– DSIIDC अधिकारी

यूसुफ ने बताया कि नरेला और बवाना जैसे औद्योगिक इलाकों की हालत “बेहद दयनीय” थी, और हमने उन हालात को सुधारने के लिए हर संभव प्रयास किए.

उन्होंने आगे कहा, “अपने कार्यकाल के दौरान हमने उद्योगों के लिए बहुत काम किया, लेकिन हमारी उत्तराधिकारी सरकारें — AAP और BJP — हमारे उस काम को आगे बढ़ाने में असमर्थ रही हैं.”

इस अधिनियम के लागू होने के बाद, 24 औद्योगिक इलाकों के रखरखाव और उनके आधुनिकीकरण की जिम्मेदारी DSIIDC को सौंप दी गई. लेकिन इनमें से केवल 12 इलाकों में ही ‘पट्टे (लीज़) के प्रशासन’ का काम इस एजेंसी के पास आया. राजस्व वसूलने और जुर्माना लगाने का अधिकार अभी भी DDA या MCD के पास ही बना रहा.

इससे एक असंतुलित व्यवस्था खड़ी हो गई. इन 12 औद्योगिक इलाकों में, DSIIDC सेवाओं के रखरखाव के लिए तो जिम्मेदार है, लेकिन उसे किसी भी प्रकार का राजस्व प्राप्त करने का अधिकार नहीं है.

पटपड़गंज, दिल्ली स्थित ‘उद्योग सदन’ में उद्योग सचिव और आयुक्त का कार्यालय | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

DSIIDC के एक अधिकारी, जो कई औद्योगिक इलाकों में संचालन का काम देखते हैं, ने कहा, “DSIIDC के राजस्व में भारी कमी है. नीतिगत स्तर पर, सभी औद्योगिक इलाकों के संचालन के लिए किसी एक ही एजेंसी को अधिकृत करने की आवश्यकता है.”

अधिकारी ने आगे बताया कि औद्योगिक इलाकों के प्रतिनिधि अक्सर अतिक्रमण और पानी की आपूर्ति जैसी समस्याओं को लेकर एजेंसी से संपर्क करते हैं, जबकि ये मुद्दे असल में DSIIDC के अधिकार क्षेत्र में आते ही नहीं हैं. 15 साल से भी पहले, 2010 की औद्योगिक नीति में “संगठनों की बहुलता की समस्या” का ज़िक्र किया गया था और इसके समाधान के तौर पर संस्थागत दोहराव को कम करने और सिंगल-विंडो क्लीयरेंस जैसे उपायों का सुझाव दिया गया था, लेकिन इनमें से ज़्यादातर बातें कागज़ों तक ही सिमटी रहीं. 2025 में जारी की गई ताज़ा नीति में भी “कई एजेंसियों से मंज़ूरी लेने” को एक समस्या के तौर पर बताया गया है, और इसके लिए भी वैसे ही सुधारात्मक उपायों का प्रस्ताव रखा गया है.

पटपड़गंज औद्योगिक क्षेत्र की योजना 1990 के दशक की शुरुआत में बनाई गई थी. अब दिल्ली सरकार बपरोला, रानीखेड़ा और कंझावला में तीन नए ग्रीनफ़ील्ड औद्योगिक क्षेत्र बनाने की योजना बना रही है | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

पिछले साल अक्टूबर में, दिल्ली हाई कोर्ट ने औद्योगिक क्षेत्रों की बदहाली को लेकर मुख्य सचिव और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को तलब किया था.

बेंच ने कहा, “एक के बाद एक रिपोर्टें, एक के बाद एक कमेटियां — सब कागज़ों तक ही सीमित हैं. ज़रा सोचिए, 27 औद्योगिक क्षेत्र बिना सीवेज लाइनों के चल रहे हैं. कोर्ट, जिसके पास इतनी ताकत है, वह भी खुद को बेबस महसूस कर रहा है. यह साफ नहीं है कि इन 27 क्षेत्रों के पुनर्विकास की ज़िम्मेदारी किस एजेंसी की है.”

उद्योग नगर के एक उद्योगपति अशोक गुप्ता ने बताया कि कई एजेंसियों के पास उनके कामकाज की निगरानी करने का अधिकार तो है, लेकिन उनमें से कोई भी इस क्षेत्र के रखरखाव की ज़िम्मेदारी नहीं लेता. इस क्षेत्र में स्टील, मशीनरी, रसायन, रबर उत्पाद और अन्य सामान बनाने वाली लगभग 600 इकाइयां मौजूद हैं.

उन्होंने कहा, “हमें छोटे पैमाने का उद्योग चलाने पर शर्मिंदगी महसूस कराई जाती है. अपनी बात रखने के लिए कोई सही माध्यम नहीं है. कई अधिकारियों के पास हमारी निगरानी करने का अधिकार है.”

गुप्ता ने आगे बताया कि एमसीडी बिना किसी चूक के प्रॉपर्टी टैक्स तो वसूलती है, लेकिन इस क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर एक पैसा भी खर्च नहीं करती. हर मॉनसून में यहां जलभराव की समस्या आम बात है, और काम जारी रखने के लिए इकाइयों को पानी निकालने के लिए पंपिंग सेट का सहारा लेना पड़ता है.

उन्होंने कहा, “हम जिस बदहाल स्थिति में काम कर रहे हैं, यह उसका एक उदाहरण है. नई पीढ़ी के लोग हमारे साथ जुड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं.”

एक तरफ़ जहां पुराने औद्योगिक समूह इस बिखरी हुई व्यवस्था से जूझ रहे हैं, वहीं दिल्ली सरकार का कहना है कि भविष्य के लिए एक अलग मॉडल की योजना बनाई गई है.

बपरोला, रानीखेड़ा और कंझावला में तीन नए ग्रीनफ़ील्ड औद्योगिक केंद्र बनाने की योजना चल रही है. ये सभी स्थान दिल्ली-हरियाणा सीमा के नज़दीक स्थित हैं. DSIIDC के अधिकारी ने कहा, “ये तीन नए इंडस्ट्रियल हब पारंपरिक क्लस्टर्स से अलग होंगे, और इनका फोकस IT, AI और बायोटेक्नोलॉजी पर होगा. इन इलाकों को प्रदूषण-मुक्त और सस्टेनेबल हब के तौर पर डिज़ाइन किया गया है.”

दिल्ली की नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी (2025-2035) में इन प्रोजेक्ट्स के लिए मिक्स्ड लैंड यूज़ और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल की परिकल्पना की गई है. इसमें यह भी बताया गया है कि ये प्रोजेक्ट्स खास तौर पर इसलिए ज़रूरी हैं, क्योंकि “मौजूदा इंडस्ट्रियल इलाकों का इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत खराब हालत में है.”

पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया में एमसीडी का एक नोटिस, जिसमें कमर्शियल यूनिट्स से कन्वर्ज़न और पार्किंग चार्ज देने को कहा गया है. इंडस्ट्रियलिस्ट्स का कहना है कि टैक्स और जुर्माना इतनी नियमितता से वसूला जाता है, जितनी सर्विस डिलीवरी में देखने को नहीं मिलती | फ़ोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

बड़े मंच का अभाव

इस सिस्टम की अनदेखी का एक कारण है प्रतिनिधित्व की कमी. कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) जैसी बड़ी-बड़ी बिज़नेस संस्थाओं की मौजूदगी दिल्ली की औद्योगिक इलाकों में बहुत कम है. CII के दायरे में सिर्फ कुछ बड़े क्लस्टर ही आते हैं, जैसे ओखला और नारायणा.

जनवरी में, CII दिल्ली ने नारायणा इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन में एक सीईओ इंडस्ट्री रोडशो आयोजित किया, जिसमें 35 से ज़्यादा एसोसिएशन सदस्यों ने चर्चाओं में हिस्सा लिया. लेकिन बाकी ज़्यादातर लोगों के लिए, ऐसा कोई बड़ा मंच मौजूद नहीं है. अलग-अलग एसोसिएशन चिट्ठियां लिखते हैं और शिकायतें दर्ज कराते हैं लेकिन वे ऐसा अकेले-अकेले करते हैं और उन्हें जवाब में अक्सर चुप्पी ही मिलती है.

22 जनवरी 2026 को नारायणा इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन में CII दिल्ली का CEO इंडस्ट्री रोडशो | फोटो: इंस्टाग्राम

सामूहिक आवाज़ के तौर पर सबसे नज़दीकी संस्था है टएपेक्स चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री’, जिसकी स्थापना 2006 में हुई थी. यह दिल्ली भर में 65 से ज़्यादा औद्योगिक क्षेत्र एसोसिएशनों और हज़ारों MSME का प्रतिनिधित्व करती है. इसके संस्थापक सदस्यों में से एक, सचदेवा ने बताया कि जब एसोसिएशन सरकारी एजेंसियों के खिलाफ़ कोर्ट जाने का फैसला करते हैं, तो यह संस्था उनकी कानूनी रणनीति में तालमेल बिठाती है. उदाहरण के लिए, एक मामले में दक्षिण दिल्ली नगर निगम के साथ संपत्ति कर के आकलन और औद्योगिक इकाइयों पर लगाए गए कन्वर्ज़न शुल्क को लेकर विवाद था.

नवंबर में, इस संस्था ने MSME मंत्री जीतन राम मांझी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर MSME के बकाएदारों की शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया को बेहतर बनाने के सुझाव दिए. इन सुझावों में एक प्रस्ताव यह भी था कि 90 दिनों से ज़्यादा समय से लंबित मामलों को देखने के लिए राज्य-स्तरीय समीक्षा समिति बनाई जाए.

लेकिन अक्सर ऐसा लगता है जैसे कोई खाली जगह में चिल्ला रहा हो.

सचदेवा ने कहा, “हम सरकार के लिए कोई वोट बैंक नहीं हैं. इसीलिए वे हमारी मांगों को टाल रहे हैं.”

प्रदूषण पर सख्ती

एक तरफ, दिल्ली में इंडस्ट्रीज़ इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से जूझ रही हैं. दूसरी तरफ, प्रदूषण को लेकर सरकार की सख्त नीतियां उनकी कमर तोड़ रही हैं.

मार्च के दूसरे हफ्ते में, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) की एक टीम बिना किसी सूचना के उत्तर-पश्चिम दिल्ली के हैदरपुर रीडेवलपमेंट एरिया में पहुंची. उन्हें वहां कई जींस रंगने और धोने वाली यूनिट्स मिलीं, जो बिना मंज़ूरी के और पर्यावरण के नियमों का उल्लंघन करते हुए चल रही थीं. 93 यूनिट्स को बंद करने के नोटिस जारी किए गए.

DPCC टीम के एक सदस्य ने कहा, “हमने जांच अभियान तेज़ कर दिए हैं, और कई इंडस्ट्रियल इलाकों में हमारी टीम को ऐसी गैर-कानूनी यूनिट्स मिली हैं, जिनसे हवा और पानी में प्रदूषण फैल रहा है.”

Over the past three days, the regular white froth on the Yamuna’s surface in Delhi has been replaced by a pale pink froth | Source: X, @Earthworri1
मार्च में ओखला बैराज और कालिंदी कुंज घाट के पास यमुना पर गुलाबी झाग दिखाई दिया. आरोप है कि यह झाग पास की टेक्सटाइल और रंगाई यूनिट्स से निकलने वाले पानी की वजह से बना था | फोटो: X/@@Earthworri1

यह सख्ती पिछले साल दिसंबर में शुरू हुई थी, जब DPCC ने 411 ऐसी इंडस्ट्रियल यूनिट्स को बंद करने का आदेश दिया था, जो बिना ज़रूरी मंज़ूरी के चल रही थीं.

उद्योग मंत्री सिरसा ने मार्च में घोषणा की, “जो यूनिट्स प्रदूषण के नियमों का उल्लंघन करती पाई जाएंगी, या बिना इजाज़त के चल रही होंगी, उनके खिलाफ बिना किसी और नोटिस के सख्त और तुरंत कार्रवाई की जाएगी.”

लेकिन ज़्यादातर यूनिट्स असल में बंद नहीं हुई हैं. उन पर जुर्माना लगाया जाता है, और वे चलती रहती हैं. फैक्ट्री मालिकों का कहना है कि वे छोटे उद्यम हैं, जिन पर कई एजेंसियों के नियमों का पालन करने का इतना ज़्यादा बोझ है कि उनके पास हर नियम को पूरा करने के लिए न तो समय बचा है और न ही पैसा.

हालांकि, नियमों का उल्लंघन करने का कोई बहाना नहीं हो सकता, ऐसा अनिल गुप्ता का कहना है. अनिल गुप्ता फ्रेंड्स कॉलोनी इंडस्ट्रियल एरिया के चेयरमैन होने के साथ-साथ दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) के सदस्य भी हैं.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.

“सालों से, हम प्रदूषण भरे माहौल में काम कर रहे हैं. हम जो काम करते हैं, उसे बिना प्रदूषण फैलाए करना मुमकिन ही नहीं है.”

-फ्रेंड्स कॉलोनी में एक फैक्ट्री सुपरवाइज़र

 

फिर भी, फ्रेंड्स कॉलोनी इंडस्ट्रियल एरिया में भी यह साफ दिखाई देता है कि कई बुनियादी मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है. यहां की कई फैक्ट्रियां PVC केबल बनाती हैं, जिसके निर्माण की प्रक्रिया में भारी मात्रा में रसायनों का इस्तेमाल होता है. इस प्रक्रिया से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए यहां लगभग कोई सुविधा मौजूद नहीं है.

इस इलाके में मौजूद 808 यूनिट्स में से, सिर्फ 11 में ही काम करने वाले एफ़्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट्स (ETPs) हैं. इंडस्ट्री डिपार्टमेंट के अधिकारियों ने बताया कि दिल्ली के 28 मंज़ूरशुदा इंडस्ट्रियल इलाकों में से, सिर्फ 17 ही कॉमन एफ़्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट्स (CETPs) से जुड़े हुए हैं.

फ्रेंड्स कॉलोनी में एक फैक्ट्री सुपरवाइज़र ने माना, “सालों से, हम एक प्रदूषण भरे माहौल में काम कर रहे हैं. हम जो काम करते हैं, उसे बिना प्रदूषण फैलाए करना मुमकिन नहीं है.”

यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली ने इंडस्ट्रियल प्रदूषण पर सख़्ती दिखाने की कोशिश की है, लेकिन नतीजे कुछ खास नहीं रहे.

1996 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद शुरू की गई रीलोकेशन स्कीम को लागू होने में लगभग एक दशक लग गया; शीला दीक्षित सरकार ने 1999 में और समय मांगने के लिए दोबारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. यह स्कीम आधिकारिक तौर पर 2016 में बंद हो गई, जिसमें 27,000 से ज़्यादा प्लॉट अलॉट किए गए थे. लेकिन 2023 में, तत्कालीन उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने हैरानी जताई कि 26 साल बाद भी, यह स्कीम “लगभग पूरी तरह से काम नहीं कर रही” थी. बवाना और भोरगढ़ जैसे इलाकों में सीवर लाइनें और ट्रांसपोर्ट की सुविधाएं नदारद थीं.

प्रदूषण से जुड़े सभी तरह के सख़्त आदेशों को लागू करना मुश्किल होता है. CAQM ने जनवरी 2023 में पूरे दिल्ली-NCR में इंडस्ट्रीज़ के लिए कोयले और दूसरे गैर-मंज़ूरशुदा ईंधनों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी, लेकिन इसका पालन करवाना एक अलग ही बात है.

20 जनवरी से 4 फरवरी 2026 के बीच, सिर्फ़ एक पखवाड़े में ही, CAQM की फ़्लाइंग स्क्वॉड ने NCR में 229 इंडस्ट्रियल उल्लंघनों का पता लगाया. इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह दिल्ली-NCR से कोयले पर आधारित सभी इंडस्ट्रीज़ को बाहर शिफ़्ट करने के लिए एक योजना तैयार करे, और संबंधित राज्यों से इस पर जवाब मांगा है.

राजधानियां जहां सूरत बदलीं

दिल्ली अकेली ऐसी राजधानी नहीं है जिसे औद्योगिक विकास बनाम प्रदूषण की दुविधा से जूझना पड़ा हो. दूसरी राजधानियों ने भी ऐसी ही समस्याओं का सामना किया है और उनसे निपटा भी है.

लंदन में हवा की गुणवत्ता का संकट 1952 में अपने सबसे बुरे दौर पर पहुंच गया था, जब ‘ग्रेट स्मॉग’ की वजह से हज़ारों लोगों की जान चली गई थी और ब्रिटेन को 1956 में ‘क्लीन एयर एक्ट’ (स्वच्छ हवा क़ानून) पास करना पड़ा था. शहर ने प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों पर अपनी पकड़ लगातार मज़बूत की है, जिसमें 2008 में शुरू किया गया ‘लो एमिशन ज़ोन‘ भी शामिल है.

2013 में बीजिंग का स्मॉग इतना बुरा था कि वहां के निवासियों ने इसे “एयरपोकैलिप्स” (हवा का प्रलय) कहना शुरू कर दिया था, लेकिन उसके बाद से, कोयले की जगह गैस के इस्तेमाल की लगातार जारी नीति और बेहद कम प्रदूषण फैलाने वाले मानकों की वजह से वहां काफी फर्क पड़ा है. फर्क इतना ज़्यादा था कि कुछ महीने पहले एक चीनी राजनयिक ने भारत के साथ “नीले आसमान” का अपना राज़ साझा करने की पेशकश भी की थी.

Pollution, CAQM
दिल्ली का प्रदूषण संकट | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट

श्रीवास्तव ने कहा, “दूसरे देशों में, नीतियों को लागू करने का काम बहुत मज़बूती से किया जाता है, जबकि भारत में इस मामले में कमी देखने को मिलती है.”

लंदन और बीजिंग, दोनों ही जगहों पर लोगों का एकजुट दबाव भी काम आया और भले ही चीन में विरोध-प्रदर्शनों को अक्सर दबा दिया जाता था, फिर भी वहां राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद थी.

जहां तक दिल्ली के औद्योगिक इलाकों में या उनके आस-पास रहने वाले लोगों की बात है, तो प्रदूषण उनके लिए बस एक ऐसी चीज़ बन गया है जिसे वे अब बर्दाश्त करने के आदी हो चुके हैं. उनके पास साफ हवा के लिए अभियान चलाने वाली कोई RWA (रेजिडेंट्स वेलफ़ेयर एसोसिएशन) नहीं है, और न ही उन्हें सरकार से कोई बहुत ज़्यादा उम्मीदें हैं.

29 साल के राकेश कुमार कहते हैं, “प्रदूषण अब हमारी ज़िंदगी का एक हिस्सा बन गया है.” राकेश का बचपन फ़्रेंड्स कॉलोनी इंडस्ट्रियल एरिया के पास ही बीता है और वे अभी भी वहीं रहते हैं. वे आगे कहते हैं, “मेरे घर से बस कुछ ही मीटर की दूरी पर, प्रदूषण फैलाने वाली कई इकाइयां चल रही हैं. वे सरकारी एजेंसियों के किसी भी डर के बिना बेखौफ होकर अपना काम कर रही हैं.”

उद्योगों को फिर से ज़िंदा करने की लड़ाई

दिल्ली के उद्योगों को बचाने की लड़ाई सिर्फ सरकारी दफ़्तरों में ही नहीं, बल्कि अदालतों में भी लड़ी जा रही है. 75 साल के मन मोहन मेहरा एक दशक से भी ज़्यादा समय से इस लड़ाई में लगे हुए हैं.

पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया में रहने वाले एक उद्योगपति, उन्होंने 2010 में अपनी गारमेंट यूनिट बंद कर दी और उस जगह को एक कार शोरूम को किराए पर दे दिया. जब एमसीडी ने ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव के लिए कन्वर्ज़न चार्ज की मांग की, तो मेहरा ने पैसे देने से मना कर दिया.

2012 में, उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में एक केस दायर किया, जिसमें उन्होंने यह दलील दी कि कई कार शोरूम — किआ, महिंद्रा, एमजी— इंडस्ट्रियल एरिया के प्लॉट से चल रहे थे, जहां लगभग 600 यूनिट हैं. एपेक्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री भी इस मामले में एक पक्ष है.

‘हम एक अनाथ बच्चे की तरह हैं. हमारे रोने को रोकने वाला कोई नहीं है,’ पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी मन मोहन मेहरा ने कहा | फ़ोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

एमसीडी के अधिकारियों ने मेहरा को, जो पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी हैं, बार-बार चिट्ठियां लिखी हैं और उन्हें कन्वर्ज़न चार्ज जमा करने का निर्देश दिया है. पटपड़गंज में उद्योग सदन की दीवार पर एक नोटिस भी चिपकाया गया है: “जो कोई भी पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया में कमर्शियल गतिविधियां चला रहा है, वह कन्वर्ज़न/पार्किंग चार्ज देने के लिए ज़िम्मेदार है.”

लेकिन मेहरा का पीछे हटने का कोई इरादा नहीं है.

उन्होंने एसोसिएशन के दफ़्तर में, जहां उनकी मेज़ पर कोर्ट के आदेशों और सरकारी नोटिसों का ढेर लगा था, मज़बूती से कहा, “यह मामला अभी भी कोर्ट में चल रहा है और हम ये चार्ज नहीं देने वाले हैं.”

पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी मन मोहन मेहरा, सरकारी एजेंसियों द्वारा भेजे गए नोटिसों के साथ | फ़ोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

उन्होंने कहा कि एमसीडी हर साल इंडस्ट्रियल एरिया से प्रॉपर्टी टैक्स के तौर पर करोड़ों रुपये इकट्ठा करती है, जबकि बदले में बहुत कम सुविधाएं देती है. 1990 में बना पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया, आज भी पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है.

मेहरा ने कहा, “हम हर जगह भटक रहे हैं और सिर्फ तकलीफ ही उठा रहे हैं. हमने मंत्रियों और अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन किसी ने भी हमारी समस्या का समाधान नहीं किया.”  उन्होंने याद दिलाया कि दिल्ली के मुख्य सचिव के साथ एक बैठक के बाद, पाइपलाइन बिछाने के लिए DSIIDC के ज़रिए दिल्ली जल बोर्ड को 17 करोड़ रुपये जारी किए गए थे. इसे 2018 में लगाया गया था, लेकिन यह काम नहीं करता. आठ साल बाद भी, उद्योग अभी भी बोतलबंद पानी पर निर्भर हैं.

मेहरा ने कहा, “हम एक अनाथ बच्चे की तरह हैं. हमारे रोने को रोकने वाला कोई नहीं है. हमें एक दयनीय हालत में जीने के लिए छोड़ दिया गया है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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