कोझिकोड-त्रिशूर-कोच्चि: जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए.के. एंटनी के बेटे अनिल एंटनी 2023 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हुए, तो पार्टी ने उनकी पृष्ठभूमि का उपयोग करके केरल के चुनावी रूप से अहम ईसाई समुदाय को आकर्षित करने की बड़ी योजना बनाई थी. तीन महीने बाद उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया गया. उम्मीद थी कि अनिल बीजेपी की मौजूदगी मजबूत करेंगे और ईसाइयों के बीच भरोसा बढ़ाएंगे, जो बीजेपी को हिंदुत्व राजनीति के नज़रिए से देखते रहे हैं.
लेकिन फिर अनिल और बीजेपी को वास्तविकता का सामना करना पड़ा: कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए अनिल 2024 के लोकसभा चुनाव में पथानामथिट्टा सीट पर यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के एंटो एंटनी और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के थॉमस इसाक के बाद तीसरे स्थान पर रहे. दक्षिण केरल की इस संसदीय सीट पर ईसाई समुदाय की अच्छी संख्या है.
करीब दो साल बाद बीजेपी फिर से ईसाइयों को आकर्षित करने में सक्रिय है—इस बार 9 अप्रैल को केरल में होने वाले चुनाव के लिए. अपने चुनावी घोषणा पत्र में पार्टी ने ईसाई समुदाय को “माइक्रो-माइनॉरिटी स्टेटस” और “सरकारी योजनाओं, स्कॉलरशिप और सामुदायिक विकास के लाभों में बराबर पहुंच” देने का वादा किया है.
बीजेपी के घोषणा पत्र में लिखा है, “संस्थागत पहचान से माइक्रो माइनॉरिटी समुदायों को केरल के विकास एजेंडा में शामिल होने में मदद मिलेगी और उन्हें सामाजिक और राजनीतिक हाशिये पर जाने से बचाया जा सकेगा.”
फिर भी माहौल पूरी तरह अनुकूल नहीं दिख रहा है. फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) संशोधन बिल, 2026 लागू होने से खासकर ईसाइयों में चिंता बढ़ी है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे विदेश से मिलने वाले दान पर और रोक लग सकती है.
रविवार की प्रार्थना के बाद बीजेपी शासित ओडिशा में एक पादरी पर हमला, ईसाइयों पर हमलों की घटनाएं और कई उत्तरी राज्यों में धर्म परिवर्तन विरोधी कानून लाने से भरोसे की कमी और बढ़ गई है.
बीजेपी के एक सांसद ने माना कि FCRA बिल का समय “ज्यादा ठीक नहीं” था. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि राज्य इकाई ने केंद्र सरकार से इस समय कानून पास न करने का आग्रह किया था, क्योंकि इससे धार्मिक अल्पसंख्यकों में चिंता बढ़ी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने ईसाई समुदाय का समर्थन हासिल करने की कोशिश तेज की है, क्योंकि यह समुदाय दक्षिण के कई सीटों पर चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है. मोदी ने पिछले नवंबर नई दिल्ली में सीरो-मलाबार चर्च के प्रमुख मेजर आर्चबिशप मार राफेल थाट्टिल और अन्य वरिष्ठ चर्च नेताओं से मुलाकात भी की थी.
Had a wonderful interaction with the head of the Syro-Malabar Church, Major Archbishop His Beatitude Most Rev. Mar Raphael Thattil, His Grace Archbishop Dr. Kuriakose Bharanikulangara and others. pic.twitter.com/Lw6xC0OLKC
— Narendra Modi (@narendramodi) November 4, 2025
जहां तक अनिल की बात है, बीजेपी की गतिविधियों में उनकी भूमिका कभी-कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस और कार्यक्रमों में भाग लेने तक सीमित रही है. हालांकि पिछले कुछ हफ्तों में उन्होंने कई बीजेपी अभियानों में हिस्सा लिया है. पहले बताए गए बीजेपी सांसद ने कहा, “उम्मीद थी कि वह जमीनी स्तर पर काम करेंगे और वोट बैंक तक पहुंच बनाएंगे. लेकिन वह ज्यादा समय दिल्ली में और अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में बिताते हैं.”
आउटरीच और संदेह
केरल में ईसाई मतदाता अपने राजनीतिक विकल्पों को लेकर पूरी तरह तय नहीं रहते, इसलिए जो भी पार्टियां उनके वोट चाहती हैं, उनके लिए उम्मीद बनी रहती है. पिछले हफ्ते ईसाई समुदाय ने गुड फ्राइडे और ईस्टर संडे मनाया, इसलिए राजनीतिक गतिविधियां थोड़ी धीमी रहीं. लेंट के दौरान, जो करीब 45 दिन का समय होता है, ईसाई लोग आत्मचिंतन में समय बिताते हैं.
46 साल की मंजू शमीन, जो एक स्वतंत्र मैनपावर भर्ती सलाहकार हैं और एक एविएशन अकादमी भी चलाती हैं, बंदरगाह शहर कालीकट में गुड फ्राइडे की प्रार्थना से अभी लौटी थीं.
उन्होंने कहा, “हम बीजेपी को लेकर थोड़े सशंकित हैं, लेकिन साथ ही यह जानने के इच्छुक भी हैं कि वे क्या कर सकते हैं और क्या वे कुछ बदलाव लाने वाले हैं.”
उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि ईसाई मतदाता समय-समय पर लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) दोनों का समर्थन करते रहे हैं, जिससे दोनों गठबंधनों पर उनका दबाव बना रहता है.
उन्होंने कहा कि दोनों पार्टियों ने इस समुदाय को हल्के में लिया है. लेकिन बीजेपी के साथ कुछ पुरानी बातें भी जुड़ी हैं. “हमें लगता है कि बीजेपी के आने से विकास के कुछ वादे हो सकते हैं, लेकिन साथ ही, एक अल्पसंख्यक समुदाय होने के कारण, उनके विचारों को लेकर हमारे मन में शंका भी है.”
इसी तरह, कालीकट के मदर ऑफ गॉड कैथेड्रल से बाहर निकल रहे छात्र टी.जे. जैकब ने कहा कि युवा लोग विचारधारा के आधार पर वोट देने के बजाय उन वादों पर ध्यान देते हैं जो उनके भविष्य को सुरक्षित करें.

2011 की जनगणना के अनुसार, केरल की आबादी में ईसाई समुदाय की हिस्सेदारी 18.38 प्रतिशत है. वहीं 54.73 प्रतिशत हिंदू और 26.56 प्रतिशत मुस्लिम हैं. केरल के मध्य क्षेत्र और सेंट्रल त्रावणकोर में ईसाइयों की अच्छी संख्या है, खासकर कोट्टायम, इडुक्की, पथानमथिट्टा, एर्नाकुलम और त्रिशूर जिलों में.
ईसाई समुदाय के अंदर भी कई अलग-अलग समूह हैं, जिनमें सीरियन क्रिश्चियन, लैटिन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट चर्च शामिल हैं.
परंपरागत रूप से केरल में यह समुदाय ज्यादातर यूडीएफ का समर्थन करता रहा है, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में कुछ बदलाव देखने को मिला, जब समुदाय के एक हिस्से ने बीजेपी का समर्थन किया. इससे त्रिशूर सीट पर बीजेपी उम्मीदवार सुरेश गोपी की ऐतिहासिक जीत में मदद मिली.
यह बीजेपी की कई सालों से लगातार की जा रही कोशिशों का भी नतीजा था, क्योंकि सिर्फ हिंदू वोट के भरोसे पार्टी दक्षिणी राज्य में मजबूत पकड़ नहीं बना पा रही थी. एक तरीका यह था कि ईसाई समुदाय के नेताओं को जगह दी जाए.
2017 में बीजेपी ने अल्फोंस कन्ननथनम को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में राज्य मंत्री (एमओएस) और पर्यटन मंत्रालय में स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री बनाया था. वे ओ. राजगोपाल के बाद केरल से बीजेपी के दूसरे केंद्रीय मंत्री थे.
पूर्व आईएएस अधिकारी कन्ननथनम 2006 में एलडीएफ समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में कोट्टायम जिले की कंजीरापल्ली सीट से विधायक चुने गए थे. उन्होंने 2011 में बीजेपी जॉइन की. बाद में वे राजस्थान से राज्यसभा सदस्य बने. उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव एर्नाकुलम से लड़ा, लेकिन तीसरे स्थान पर रहे.
चल रहे चुनाव अभियान में कन्ननथनम को पार्टी के पाला उम्मीदवार शोन जॉर्ज के लिए प्रचार करते देखा गया.
अनिल एंटनी की तरह, टॉम वडक्कन भी 2019 लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे और फिलहाल पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं. उनका ज्यादातर काम दिल्ली में ही रहता है.
इसके बाद के वर्षों में बीजेपी ने अपने राज्य नेतृत्व में और चेहरों को शामिल किया. हाल के उदाहरणों में 2024 में जॉर्ज कुरियन को केंद्रीय मंत्री बनाना और तीन ईसाइयों—शोन जॉर्ज, अनूप एंटनी जोसेफ और जिजी जोसेफ—को पार्टी के राज्य पदाधिकारी बनाना शामिल है. 2023 में बीजेपी ने ‘स्नेहा यात्रा’ जैसे बड़े संपर्क अभियान भी चलाए, जिसमें पार्टी नेताओं ने घर-घर जाकर और चर्च नेताओं से मिलकर संपर्क किया. इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वरिष्ठ बिशप से मुलाकात की.
इस बार कांग्रेस ने 20 से ज्यादा ईसाई उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें सिरो-मलाबार समूह के उम्मीदवार भी शामिल हैं. त्रिशूर में यूडीएफ ने 48 साल पुरानी परंपरा तोड़ते हुए प्रमुख नायर समुदाय की जगह ईसाई उम्मीदवार राजन जे. पल्लन को टिकट दिया. पूर्व मेयर रहे पल्लन से वोट बैंक मजबूत होने की उम्मीद है. वहीं बीजेपी ने यहां पूर्व कांग्रेसी नेता पद्मजा वेणुगोपाल पर दांव लगाया है.
त्रिशूर के एक स्थानीय व्यापारी शिंजू ने कहा कि हर पार्टी घर-घर जाकर ईसाई मतदाताओं को मनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने कहा, “बाकी पार्टियों की तरह वे भी घर आए और चुनाव में मौका देने को कहा. अभी हम तय नहीं कर पाए हैं कि किसे समर्थन दें.”
केरल में प्रचार कर रहे कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट को बताया कि ईसाई मतदाता अभी “असमंजस” में हैं और ईस्टर के बाद पार्टी फिर से संपर्क अभियान तेज़ करेगी.
बीजेपी भी पीछे नहीं है. उसने सात ईसाई उम्मीदवार उतारे हैं—पूंजार से पी.सी. जॉर्ज, पाला से उनके बेटे शोन जॉर्ज, तिरुवल्ला से अनूप एंटनी जोसेफ, मनकड़ा से लिजॉय पॉल, ओल्लूर से बिजॉय थॉमस, अलप्पुझा से एम.जे. जॉब और कंजीरापल्ली से केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन.
Anil Antony's interface at a round table discussion on the
New Middle power Consensus
navigating US-China bi-polarity
organised by India's world mag
and Stiftung mercator @BJP4India pic.twitter.com/7zVtEG196V— Tom Vadakkan (Modi ka Parivar) (@TomVadakkan2) March 5, 2026
राज्य इकाई में भी करीब आठ ईसाई पदाधिकारी हैं. पार्टी का कहना है कि अगर वह सत्ता में आती है तो केरल के विकास में ईसाई समुदाय को भी शामिल करेगी.
कोट्टायम के सेंट थॉमस मलनकारा कैथोलिक चर्च के विकार फादर अब्राहम इरिंबिनिकल ने दिप्रिंट से कहा, “केरल में अभी तक यूडीएफ और एलडीएफ ही मुख्य विकल्प रहे हैं. अब एनडीए तीसरे मोर्चे के रूप में तेजी से कोशिश कर रहा है. लेकिन यह इस बार कितना सफल होगा, यह कहना मुश्किल है. फिर भी केरल की राजनीति में तीसरे मोर्चे की अहमियत बढ़ती दिख रही है.”
‘बीजेपी तीसरे नंबर पर रहेगी’
दूसरी जगहों पर बीजेपी हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश कर रही है, जो ईसाइयों के मुकाबले ज्यादा बंटे हुए हैं.
मुनंबम में, जहां हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में बीजेपी ने एक वार्ड जीता था, वहां अब स्थानीय लोगों के बीच पार्टी का समर्थन कम हुआ है. यह तटीय गांव पिछले साल चर्चा में आया था, जब बीजेपी ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को सही ठहराने के लिए इसे अपने अभियान का हिस्सा बनाया था.
प्रदर्शन के संयोजक बेनी जोसेफ ने कहा कि शुरुआत में कुछ लोगों ने बीजेपी का समर्थन किया था, लेकिन उसके बाद पार्टी को ज्यादा समर्थन नहीं मिला. उन्होंने कहा, “यहां पार्टी तीसरे नंबर पर रहेगी. हमने राष्ट्रीय स्तर पर हमारे मुद्दे को उठाने के लिए उन्हें एक वार्ड सदस्य देने का वादा किया था, लेकिन उसके बाद उन्होंने कुछ नहीं किया. केरल में धर्मनिरपेक्षता बनी रहनी चाहिए. बीजेपी इसे ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही है, और हम इसे समझते हैं.”
उन्होंने कहा कि पार्टी अभी भी लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है.
सितंबर 2024 में गांव के करीब 600 परिवारों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया था, जब वक्फ बोर्ड ने जमीन पर दावा किया था. मछुआरा समुदाय से जुड़े इन निवासियों, जिनमें लैटिन कैथोलिक, सीरियन कैथोलिक और हिंदू शामिल हैं, को 2022 में राजस्व अधिकार नहीं दिए गए थे.
स्थानीय विरोध को राष्ट्रीय स्तर पर तब ध्यान मिला जब त्रिशूर के सांसद सुरेश गोपी और केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू सहित कई नेता गांव पहुंचे. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में इस मुद्दे का जिक्र किया था, जब सरकार ने वक्फ कानून में संशोधन पेश किया था. हालांकि, संशोधन से समस्या का समाधान नहीं हुआ और लोगों का विरोध जारी रहा.
आखिरकार 30 नवंबर पिछले साल यह विरोध खत्म हुआ, जब केरल हाई कोर्ट ने अंतरिम आदेश देकर निवासियों के राजस्व अधिकार बहाल कर दिए. हालांकि, एक अलग समूह, जिसे बीजेपी से जुड़ा माना जाता है, स्थायी समाधान की मांग को लेकर स्थानीय चर्च के बाहर अभी भी प्रदर्शन कर रहा है.
पिछले साल बीजेपी शासित छत्तीसगढ़ में दो कैथोलिक ननों की गिरफ्तारी के बाद तनाव बढ़ गया था. उस समय बीजेपी ने ईसाई परिवारों के बीच घर-घर जाकर अभियान चलाया, ताकि कांग्रेस द्वारा फैलाए गए “गलतफहमियों” का जवाब दिया जा सके.
लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी को झटका लगा, जहां वह ज्यादा प्रभाव नहीं बना पाई. हालांकि, ईसाई मतदाता एकजुट नहीं हैं, फिर भी उन्होंने केरल के स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ का समर्थन कर एलडीएफ को भी जवाब दिया.
‘ईसाइयों को सभी पार्टियों का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित करें’
चुनाव से ठीक पहले एलडीएफ सरकार ने जस्टिस (सेवानिवृत्त) जे.बी. कोशी की तीन साल पुरानी रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया, जिसमें ईसाई समुदाय की चिंताओं को दूर करने के लिए कई सुझाव दिए गए थे. यह रिपोर्ट मई 2023 में दी गई थी, लेकिन एलडीएफ कैबिनेट ने इसे फरवरी 2026 में मंजूरी दी. इस कदम को चुनावी रणनीति माना गया.
रिपोर्ट में तीन मुख्य चिंताओं का जिक्र किया गया था—घटती आबादी, युवाओं का केरल से बाहर जाना, और सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था में ईसाइयों का शामिल न होना.
बीजेपी इन मुद्दों में बदलाव का वादा कर रही है. ईसाई समुदाय के सदस्यों और नेताओं ने द प्रिंट को बताया कि वे विकास से जुड़े बीजेपी के प्रयासों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन पार्टी की विचारधारा को लेकर चिंता है.
केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल की विजिलेंस कमीशन के सचिव फादर माइकल पुलिकल ने द प्रिंट से कहा, “बीजेपी और एनडीए में कई ईसाई उम्मीदवार हैं. हम अपने लोगों को सभी पार्टियों में उम्मीदवार बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं ताकि वे चर्च और समाज के लिए काम कर सकें. साथ ही हम उत्तर भारत में हिंदू कट्टरवाद या राजनीतिक इस्लाम के चरमपंथ जैसे मुद्दों से भी परिचित हैं… हमें इन सब बातों की जानकारी है.”
समुदाय के नेताओं का कहना है कि वे ईसाइयों को यह नहीं बताते कि चुनाव में किसे वोट देना है. बीजेपी अगर यहां अपना वोट बढ़ाती है तो वह केरल के लिए क्या करेगी, इसे लेकर जिज्ञासा जरूर है, लेकिन फिलहाल चिंता ज्यादा नजर आती है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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