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Thursday, 2 April, 2026
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सरकार ने महिला आरक्षण लागू करने का संकेत दिया, विपक्ष ने पूछा—राज्य चुनाव से पहले क्यों?

इस कानून में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित हैं. तीन साल पहले कानून पास हुआ था, लेकिन परिसीमन लंबित होने के कारण लागू नहीं हुआ.

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नई दिल्ली: सरकार मौजूदा बजट सत्र के दौरान 2023 के महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए एक बिल ला सकती है. इस कदम पर विपक्ष ने तुरंत सवाल उठाया और पूछा कि चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव से पहले ही यह फैसला क्यों लिया जा रहा है.

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 का कानून है, जिसमें लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं. यह कानून तीन साल पहले पास हुआ था, लेकिन परिसीमन की प्रक्रिया लंबित होने के कारण इसे लागू नहीं किया गया. माना जा रहा है कि सरकार इस कानून में संशोधन ला सकती है ताकि इसे परिसीमन से अलग करके लागू किया जा सके, जबकि परिसीमन अगले वित्त वर्ष (2027-2028) में होने की संभावना है.

गुरुवार को सरकार ने राज्यसभा में संकेत दिया कि वह महिला आरक्षण कानून को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेगी. इस पर विपक्षी दलों ने सवाल उठाया कि जब इस महीने असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं, तो अभी यह कदम क्यों उठाया जा रहा है.

राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि यह बिल बजट सत्र की शुरुआत में या पिछले तीन साल में कभी भी लाया जा सकता था. उन्होंने कहा, “हम सभी इसका समर्थन करेंगे, लेकिन चुनाव के समय इसे लाकर इसे चुनावी मुद्दा न बनाएं.”

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि सरकार अपना वादा पूरा कर रही है.

उन्होंने कहा, “यह हमारा कर्तव्य और प्रतिबद्धता है, जो भारत की संसद ने इस देश की महिलाओं को दिया है.” उन्होंने यह भी कहा कि इस कदम का किसी खास राज्य के चुनाव से कोई संबंध नहीं है.

रिजिजू ने कहा कि इस मुद्दे पर सरकार पहले ही 80 प्रतिशत राजनीतिक दलों से चर्चा कर चुकी है और कानून लागू करने की समय-सीमा से जुड़ी कुछ बाधाएं भी हैं. उन्होंने कहा, “महिला आरक्षण पर राजनीति नहीं होनी चाहिए.”

यह मुद्दा गुरुवार को उस समय उठा जब रिजिजू ने राज्यसभा को बताया कि सरकार अगले दो से तीन हफ्ते में “कुछ बिल और कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे” लाने की योजना बना रही है. उन्होंने कहा कि इन विषयों की जानकारी पहले ही विपक्ष के सदस्यों को दी जा चुकी है.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने, जो दो बार यह स्पष्टता मांग चुके थे कि सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होगा या बाद की तारीख तक, इस समय-निर्धारण को राजनीतिक बताया. खरगे ने रिजिजू को पत्र लिखकर मांग की थी कि इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक 29 अप्रैल को मतदान खत्म होने के बाद ही की जाए.

जयराम रमेश ने कहा, “सरकार का एक ही मकसद है कि आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए बिल पास कर राजनीतिक फायदा लिया जाए और अगले दो से तीन सप्ताह में इसे पास कराया जाए.”

सदन के नेता जे.पी. नड्डा ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि सरकार को विधायी काम का समय तय करने का अधिकार है.

उन्होंने कहा, “आप सोचते हैं कि हम इस बिल का श्रेय लेंगे. आपने 30 साल तक जो बिल पास नहीं किया, उसे प्रधानमंत्री ने 2 दिन में पास करा दिया. हमने उसी दिन इसका श्रेय ले लिया था. यह श्रेय लेने का सवाल नहीं है, यह महिलाओं की पहचान का सवाल है.”

उन्होंने आगे कहा, “विकसित भारत की पहचान यह होगी कि आने वाले समय में इस सदन (लोकसभा) में 33 प्रतिशत महिलाएं बैठेंगी, यही इसका प्रभाव होगा.”

केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी विपक्ष से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा.

उन्होंने कहा, “मैं विपक्ष के नेता और अन्य वरिष्ठ नेताओं से स्पष्ट करना चाहता हूं कि क्या वे महिला आरक्षण का विरोध कर रहे हैं? इस पर साफ बात होनी चाहिए.”

कई विपक्षी सांसदों ने सरकार के तर्कों का विरोध किया.

आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा कि सरकार की दिखाई जा रही जल्दबाजी उसके पूरे सत्र के दौरान निष्क्रिय रहने से मेल नहीं खाती. उन्होंने कहा, “आप चुनाव देखकर इस मुद्दे को राजनीतिक बनाना चाहते हैं. आप महिलाओं को आरक्षण या उनके अधिकार देना नहीं चाहते, बल्कि इस मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं और दोष हम पर डाल रहे हैं.”

राष्ट्रीय जनता दल के मनोज कुमार झा ने कहा कि विपक्ष महिला आरक्षण का समर्थन करता है, लेकिन उनकी पार्टी और डीएमके एससी, एसटी और ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

एनसीपी (शरदचंद्र पवार) की सांसद डॉ. फौजिया खान ने आरोप लगाया कि उन्हें सरकार की बैठक के लिए बुलाया गया था, लेकिन उन्हें केंद्रीय मंत्री रिजिजू के घर के बाहर इंतजार करना पड़ा. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या राज्यसभा और विधान परिषदों में भी आरक्षण दिया जाएगा.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सितंबर 2023 में बिल पास होने के समय की बात याद दिलाई, जब तत्कालीन विपक्ष के नेता ने 2024 लोकसभा चुनाव से इस कानून को लागू करने की मांग की थी. उस समय सरकार ने कहा था कि पहले जनगणना और परिसीमन जरूरी है.

उन्होंने कहा, “30 महीने तक सरकार सोती रही. अचानक अब उन्हें लग रहा है कि जनगणना और परिसीमन की जरूरत नहीं है, क्योंकि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव की चुनौती है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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