रांची, 28 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश बी. वी. नागरत्ना ने शनिवार को कहा कि अदालतों को पर्यावरणीय न्याय में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, क्योंकि उनके पास पारिस्थितिक संरक्षण, जनता के प्रति जवाबदेही और प्रभावित समुदायों के अधिकार शासन के समक्ष रखने की क्षमता है।
वह रांची स्थित राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय (एनयूएसआरएल) में ‘पर्यावरणीय न्याय एवं जलवायु परिवर्तन: न्यायालय किस प्रकार मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं’ विषय पर आयोजित ‘न्यायमूर्ति एस. बी. सिन्हा स्मृति व्याख्यान’ को संबोधित कर रही थीं।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘पर्यावरण सिर्फ वर्तमान में जीवित लोगों की संपत्ति नहीं है, बल्कि यह अतीत से विरासत में मिली एक धरोहर है, जिसे भविष्य के लिए संरक्षित रखाना चाहिए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान और संसाधनों की कमी सभी व्यक्तियों को समान रूप से प्रभावित नहीं करते; इनका प्रभाव गरीबों, हाशिए पर रहने वाले लोगों और अक्सर उन लोगों पर पड़ता है जो नुकसान के लिए सबसे कम जिम्मेदार होते हैं। इस लिहाज से पर्यावरण न्यायनिर्णय में समानता, निष्पक्षता और न्याय को ध्यान में रखना अनिवार्य है।’’
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने कहा कि हाल के दशकों में विभिन्न न्यायक्षेत्रों की अदालतें पर्यावरणीय न्याय की अवधारणा को ठोस अर्थ देने में मुख्य भूमिका निभा रही हैं।
इस मौके पर झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनाक और एनयूएसआरएल के कुलपति अशोक आर. पाटिल भी मौजूद रहे।
भाषा यासिर सुरेश
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