नयी दिल्ली, 28 मार्च (भाषा) बढ़ते साइबर हमलों के बीच अब खतरा सिर्फ आंकड़ों की चोरी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सीधे लोगों की जान के लिए भी जोखिम बन गया है। एक वरिष्ठ साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ ने यह बात कही।
डेलॉयट के दक्षिण एशिया में भागीदार और साइबर मामलों के प्रमुख गौरव शुक्ला ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी और संचालन प्रणालियों के आपस में जुड़ने से हमलों का दायरा बढ़ गया है। इससे विमानन, परिवहन और सार्वजनिक सेवाओं जैसे क्षेत्र ज्यादा खतरे में आ गए हैं।
उन्होंने कहा, ‘पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल बदलाव तेजी से हुआ है, जिससे हमले की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। जितनी ज्यादा प्रणालियां जुड़ती हैं, उतने ही अधिक मौके हमलावरों को मिलते हैं।’
शुक्ला ने उदाहरण देते हुए कहा, ‘अगर आप राजमार्ग पर 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आधुनिक प्रौद्योगिकी से लैस कार चला रहे हों और अचानक उसका स्टीयरिंग आपके नियंत्रण में न रहे, तो आप अपने बैंक खाते की नहीं, बल्कि अपनी जान की चिंता करेंगे।’
उन्होंने कहा कि इससे साफ है कि अब साइबर सुरक्षा केवल डेटा की सुरक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सीधे मानव जीवन की सुरक्षा से जुड़ गई है।
शुक्ला ने बताया कि अगर किसी चिकित्सा उपकरण में साइबर हमला कर मरीज के बारे में जानकारी बदल दिए जाएं, तो यह जानलेवा हो सकता है। वहीं, बिजली उत्पादन या आपूर्ति व्यवस्था पर हमला होने से पूरे देश में अंधेरा छा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया की करीब आठ अरब आबादी के बीच 30 अरब से ज्यादा सेंसर वाले उपकरण मौजूद हैं, यानी हर व्यक्ति के आसपास औसतन तीन से अधिक ऐसे उपकरण होते हैं।
भारत की डिजिटल प्रगति पर उन्होंने कहा कि देश की डिजिटल सार्वजनिक व्यवस्था, जिसे आम तौर पर ‘इंडिया स्टैक’ कहा जाता है, अब दुनिया के लिए एक उदाहरण बन चुकी है। डेलॉयट करीब 24 देशों को ऐसी ही व्यवस्था बनाने में सलाह दे रहा है।
हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि जैसे-जैसे यह व्यवस्था पहचान और भुगतान से आगे बढ़कर शिक्षा और स्वास्थ्य तक पहुंचेगी, वैसे-वैसे नए खतरे भी पैदा होंगे।
जनवरी में भारत के लगभग 80 प्रतिशत डिजिटल भुगतान इसी व्यवस्था के माध्यम से हुए, इसलिए इसकी सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि अगर हमलावर कृत्रिम मेधा (एआई) का उपयोग करते हैं, तो हमले और तेज और बड़े स्तर पर हो सकते हैं। इसलिए लगातार जांच और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है।
शुक्ला ने कहा कि पारंपरिक युद्ध सीमित समय के होते हैं, लेकिन साइबर युद्ध लगातार चलते रहते हैं। इससे निपटने के लिए कंपनियों, शिक्षण संस्थानों और सरकार के बीच लगातार सहयोग जरूरी है।
उन्होंने सुझाव दिया कि स्कूल स्तर पर ही साइबर सुरक्षा और डिजिटल नैतिकता की पढ़ाई शुरू की जानी चाहिए।
भाषा योगेश रमण
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