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Sunday, 29 March, 2026
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अदालत ने नाबालिग लड़की के पिता का पता लगाने के लिए डीएनए परीक्षण का आदेश दिया, गुजारा भत्ता आदेश रद्द किया

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प्रयागराज, 27 मार्च (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक नाबालिग लड़की के जैविक पिता का पता लगाने के लिए डीएनए परीक्षण कराने का निर्देश दिया और उस पारिवारिक अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है जिसके तहत उसे गुजारा भत्ता दिया गया था।

न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने 17 मार्च को यह आदेश पारित किया, जिसमें उन्होंने सोनभद्र की पारिवारिक अदालत के मार्च 2025 के फैसले के खिलाफ जवाहर लाल जायसवाल द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार किया।

एक नाबालिग लड़की को गुजारा भत्ता देने के परिवार अदालत के आदेश को दरकिनार करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि विशेष तथ्यों और परिस्थितियों से जुड़े मामलों में पिता और बेटी दोनों को जैविक सत्यता जानने का अधिकार है।

अदालत ने कहा कि यदि जैविक पिता का पता नहीं चलता तो इससे दोनों जीवनभर निरंतर परेशान रहेंगे और समाज में उचित ढंग से जीवन जीने में समर्थ नहीं होंगे।

परिवार अदालत ने नाबालिग लड़की का आवेदन स्वीकार करते हुए उसके पिता को आवेदन की तारीख से 3,000 रुपये प्रति माह और निर्णय की तारीख से 6,000 रुपये प्रति माह का गुजारा भत्ता उसके विवाह होने तक देने का निर्देश दिया था और डीएनए जांच की पिता की मांग खारिज कर दी थी।

सुनवाई के दौरान पिता ने दलील दी कि लड़की की मां से उसका विवाह जून 1994 में हुआ था, लेकिन वह फरवरी 2000 में बिना किसी कारण उसका घर छोड़कर चली गई थी। जायसवाल का आरोप है कि बाद में उसकी पत्नी एक अन्य व्यक्ति के साथ रहने लगी। उसने दलील दी कि 2011 में जन्मी लड़की उसकी नहीं है क्योंकि 2000 के बाद से दंपति के बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं रहा।

याचिकाकर्ता ने यह दलील भी दी कि चूंकि यह एक बहुत गंभीर मुद्दा है कि उस नाबालिग लड़की का जैविक पिता कौन है इसलिए दोनों पक्षों की डीएनए जांच बहुत महत्वपूर्ण है।

वहीं, दूसरी ओर नाबालिग लड़की के वकील और राज्य सरकार के वकील ने मौजूदा याचिका का यह कहते हुए विरोध किया कि निचली अदालत द्वारा पारित निर्णय में कोई अवैधता नहीं है।

उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के रिकॉर्ड पर गौर करने के बाद कहा कि गुजारा भत्ते के आवेदन में दावा किया गया है कि मां अपने ससुराल में 2010 में चार महीने रही और एक जनवरी 2011 को उसने एक बच्ची को जन्म दिया जबकि मेडिकल रिकॉर्ड एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं।

न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि जन्म प्रमाण पत्र संकेत देता है कि बच्ची का जन्म 20 नवंबर 2009 को हुआ। इसके अलावा, एक अन्य मेडिकल प्रमाण पत्र ने खुलासा किया कि मां ने दूसरे बच्चे को जुलाई 2017 में जन्म दिया और अपने कथित साथी को उसका पिता बताया।

अदालत द्वारा सवाल किए जाने पर नाबालिग बच्ची के वकील ने स्वीकार किया कि उसकी मां ने वास्तव में 2011 के बाद उसके पिता को छोड़ दिया था और अपने कथित साथी के साथ रह रही थी जो 2017 में जन्मे दूसरे बच्चे का पिता है।

हालांकि वकील ने यह भी कहा कि पहला बच्चे का पिता याचिकाकर्ता है।

याचिकाकर्ता के दावों में प्रथम दृष्टया सत्यता पाते हुए न्यायालय ने यह माना कि सत्य का निर्धारण करने और विवाद को सुलझाने के लिए डीएनए परीक्षण आवश्यक है।

भाषा सं राजेंद्र

गोला

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यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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