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Saturday, 28 March, 2026
होमफीचरAAP से कांग्रेस तक पुरानी दिल्ली सुधारने के सिर्फ वादे—अब BJP चाहती है NDMC जैसी ताकत

AAP से कांग्रेस तक पुरानी दिल्ली सुधारने के सिर्फ वादे—अब BJP चाहती है NDMC जैसी ताकत

कांग्रेस, AAP और अब बीजेपी ने चारदीवारी वाले शहर को फिर से बेहतर बनाने का वादा किया. रीडेवलपमेंट एजेंसी एसआरडीसी के तहत, यह दिल्ली का सबसे पुराना राजनीतिक वादा है और सबसे लंबे समय से अधूरा काम भी.

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नई दिल्ली: दिल्ली के 400 साल पुराने दीवारों से घिरे शहर शाहजहानाबाद के सुधार (मेकओवर) का इंतज़ार बहुत लंबा हो गया है. हालत यह है कि इसे लागू करने वाली एजेंसी का दफ्तर भी थका हुआ सा लगता है. पुरानी दिल्ली को फिर से बेहतर बनाना शहर का बहुत पुराना राजनीतिक वादा है, लेकिन अब तक यह पूरा नहीं हो पाया है. यह उस सरकारी व्यवस्था (नौकरशाही) की कहानी भी है, जो दिल्ली की राजनीति के साथ सही तालमेल नहीं बना पाई.

सिविल लाइंस में विकास भवन के अंदर बने शाहजहानाबाद रीडेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एसआरडीसी) का दफ्तर इस कहानी को दिखाता है—एक ऐसी कहानी जिसे समझने के लिए फाइल या रिपोर्ट देखने की ज़रूरत नहीं है. प्रवेश द्वार पर एक फीका पड़ा नीला बोर्ड ढीला लटका है, जिस पर लिखा है: विरासत एक वरदान है, इसे संभालकर रखें. वहां खाली कुर्सियां और बंद केबिन भी दिखाई देते हैं. बड़े अधिकारी कम ही मौजूद रहते हैं, क्योंकि उनके पास दूसरी जगहों की भी जिम्मेदारियां होती हैं. दीवारों पर पुरानी दिल्ली की फ्रेम की हुई तस्वीरें लगी हैं, जो याद दिलाती हैं कि इस संस्था को असल में क्या बचाना था.

एसआरडीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “एसआरडीसी के लिए तय किए गए लक्ष्य शाहजहानाबाद के विकास के लिए बहुत ज़रूरी हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि विकास का काम ठीक से शुरू ही नहीं हो पाया. शुरू से ही इस संस्था को स्टाफ की कमी, विरासत के जानकारों की कमी और सबसे जरूरी सीमित अधिकार जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है.”

2008 में पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के समय एसआरडीसी बनाया गया था. इसका मकसद दिल्ली के ऐतिहासिक इलाके को सुधारना और नया रूप देना था. इसे एक खास संस्था (एसपीवी) के रूप में बनाया गया था. मुख्यमंत्री को इसका चेयरपर्सन बनाया गया और इसे पीडब्ल्यूडी, एमसीडी और पर्यटन विभाग जैसी अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी, ताकि इस भीड़भाड़ और जर्जर इलाके को एक विश्व स्तर का विरासत स्थल बनाया जा सके.

पहले ही बहुत समय बर्बाद हो चुका है. अब सरकार को विकास से जुड़े सभी कामों के लिए किसी एक ही संस्था को अधिकार देने होंगे, जैसे NDMC के पास हैं

—प्रवीण खंडेलवाल, चांदनी चौक सांसद

हर कुछ साल में नई सरकार नए वादे करती है. शीला दीक्षित से लेकर अरविंद केजरीवाल और मौजूदा मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता तक, शाहजहानाबाद को यूरोप के पुराने शहरों की तरह सुंदर बनाने की बात कही गई है. कई योजनाएं बनाई गईं: सिर्फ पैदल चलने वालों के लिए इलाके, साइकिल लेन, एक जैसी इमारतें, जमीन के नीचे वायरिंग, यहां तक कि ट्राम वापस लाने का प्लान. लेकिन योजना बहुत बड़ी थी, इसलिए यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया.

लाल किले के पास शाहजहानाबाद की भीड़भाड़ वाली गलियां. एसआरडीसी अब तक यूरोप जैसा मेकओवर नहीं दे पाया | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
लाल किले के पास शाहजहानाबाद की भीड़भाड़ वाली गलियां. एसआरडीसी अब तक यूरोप जैसा मेकओवर नहीं दे पाया | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

संस्था के पुराने और मौजूदा अधिकारियों का कहना है कि समस्या सिर्फ योजना की नहीं, बल्कि अधिकार की भी थी. एसआरडीसी को कभी पूरे अधिकार नहीं मिले. अधिकारी बदलते रहे और उनके पास दूसरे विभागों की जिम्मेदारियां भी थीं, इसलिए वे इस प्रोजेक्ट पर पूरा ध्यान नहीं दे पाए. उदाहरण के लिए आईएएस अधिकारी रवि धवन, जो 2023 से एसआरडीसी के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं, दिल्ली जल बोर्ड में सदस्य (प्रशासन) और बिजली मंत्रालय में डायरेक्टर भी हैं, इसलिए वे काफी व्यस्त रहते हैं.

चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने कहा, “समय के साथ एसआरडीसी एक संस्था कम और एक विचार ज्यादा बनकर रह गया, जो अलग-अलग अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच फंस गया.”

खंडेलवाल 2024 से इसमें बड़े बदलाव की मांग कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, “यह एक ऐसी संस्था बन गई है जिस पर किसी ने पूरी जिम्मेदारी नहीं ली.”

अब रेखा गुप्ता की सरकार ने नई शुरुआत का प्रस्ताव दिया है: नया नाम (अभी तय नहीं) और प्रशासन में बदलाव, ताकि एसआरडीसी को NDMC जैसी मजबूत और अधिकार वाली संस्था बनाया जा सके.

फरवरी में जब रेखा गुप्ता ने एसआरडीसी की चेयरपर्सन की जिम्मेदारी संभाली, तो उन्होंने कहा, “शाहजहानाबाद सिर्फ एक इलाका नहीं, बल्कि दिल्ली की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है.”

बड़े सपने और अधूरे प्लान

आइडिया बनाना आसान होता है, असली चुनौती उन्हें लागू करना होती है. एसआरडीसी की मीटिंग में कई प्लान बनाए गए, लेकिन ज़मीन पर बहुत कम लागू हुए.

सबसे बड़ी योजना पुराने शहर में ट्राम सेवा वापस लाने की थी, जिसे 1963 में बंद कर दिया गया था.

2014 में उपराज्यपाल नजीब जंग ने चांदनी चौक रीडेवलपमेंट प्लान के तहत ट्राम शुरू करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. पीडब्ल्यूडी को इसे लागू करने और डीएमआरसी को तकनीकी मदद देने की जिम्मेदारी दी गई थी. अप्रैल 2015 में डीएमआरसी ने 247 पन्नों की रिपोर्ट दी, जिसमें इस प्रोजेक्ट को सामाजिक जरूरत बताया गया और भीड़ कम करने का एक संभव तरीका कहा गया.

रिपोर्ट में कहा गया कि चांदनी चौक में ट्रैफिक कम करने के कई प्रयास पहले फेल हो चुके हैं, इसलिए प्रदूषण रहित और सस्ता परिवहन ज़रूरी है. इस प्रोजेक्ट की लागत 782 करोड़ रुपये बताई गई थी. उस समय खबरों में छपा था, “चांदनी चौक में ट्राम वापस आएगी.”

आज़ादी से पहले चांदनी चौक में ट्राम चलती थी; इसे वापस लाने का प्लान एक दशक से ज्यादा समय से रुका हुआ है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
आज़ादी से पहले चांदनी चौक में ट्राम चलती थी; इसे वापस लाने का प्लान एक दशक से ज्यादा समय से रुका हुआ है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

लेकिन पटरियां बिछाने और ऊपर तार लगाने का खर्च बहुत ज्यादा था और काम मुश्किल था, इसलिए प्रोजेक्ट रुक गया. बाद में बिना पटरी वाली ट्राम का आइडिया भी आया, लेकिन 2019 में इसे भी मंजूरी नहीं मिली.

उस समय एक अधिकारी ने कहा, “यह इलाका बहुत ज्यादा भीड़भाड़ वाला है, इसलिए यहां ट्राम चलाना मुश्किल है. सुरक्षा भी बड़ी चिंता है.”

फिर भी ट्राम का आइडिया अभी खत्म नहीं हुआ है. पिछले जून में चांदनी चौक के व्यापारियों ने पीडब्ल्यूडी मंत्री परवेश वर्मा को पत्र लिखकर ट्राम शुरू करने की मांग की थी.

शहर ट्राम का इंतज़ार कर रहा है, लेकिन ट्रैफिक व्यवस्था की हालत खराब है. एसआरडीसी की लाल किले से फतेहपुरी मस्जिद तक के इलाके को बिना मोटर वाहन वाला ज़ोन बनाने की योजना ज्यादा कागजों में ही है. सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक वाहनों पर रोक है, लेकिन लोग अक्सर नियम तोड़ देते हैं.

एसआरडीसी के पास इस इलाके के लिए साफ योजना नहीं है, इसलिए इतने साल बाद भी सफलता नहीं मिली. यह विरासत पुरानी दिल्ली के लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने में मदद नहीं कर रही है. सिर्फ ऊपर से सजावट करने से शहर नहीं बदलेगा

—स्वप्ना लिडल, इतिहासकार

2024 में दिल्ली गृह विभाग ने इस इलाके में 75 होमगार्ड तैनात किए. यह कदम तब उठाया गया जब उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने दौरा कर ट्रैफिक व्यवस्था खराब पाई. लेकिन जमीन पर इसका ज्यादा असर नहीं हुआ.

16 जनवरी 2025 को लिखे पत्र में एसआरडीसी के मैनेजिंग डायरेक्टर रवि धवन ने चांदनी चौक के रेगुलेटेड ज़ोन में खराब व्यवस्था के लिए दिल्ली ट्रैफिक पुलिस को कड़ी फटकार लगाई.

पत्र में लिखा था, “होमगार्ड होने के बावजूद मोटर वाहन अंदर आ रहे हैं. बूम बैरियर खुले छोड़ दिए जाते हैं या बिना निगरानी के रहते हैं.”

पांच साल पहले हुए सुधार के बाद भी यह इलाका फिर से पुरानी अव्यवस्था में लौट गया है. पैदल चलने के रास्ते फिर से रेहड़ी-पटरी और कूड़े से भर गए हैं, और लोगों को ई-रिक्शा और मोटरसाइकिल से बचकर चलना पड़ रहा है.

चांदनी चौक के सुधार वाले इलाके में ट्रैफिक रोकने और सिर्फ पैदल चलने के लिए बनाए गए रास्ते | ग्राफिक: सोहम सेन/दिप्रिंट
चांदनी चौक के सुधार वाले इलाके में ट्रैफिक रोकने और सिर्फ पैदल चलने के लिए बनाए गए रास्ते | ग्राफिक: सोहम सेन/दिप्रिंट

अधर में लटकी एजेंसी

एसआरडीसी का एक और बड़ा प्रोजेक्ट 300 साल पुरानी जामा मस्जिद को सुधारना था.

इस काम की शुरुआत सबसे पहले 2004 में शीला दीक्षित सरकार के समय हुई थी, यानी इस कॉर्पोरेशन के बनने से भी कई साल पहले. इसकी शुरुआत स्मारक की खराब हालत को लेकर दायर एक याचिका से हुई थी, जिसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने 23 एकड़ के पूरे इलाके के पूरी तरह से पुनर्विकास (रीडेवलपमेंट) का आदेश दिया. 2009 में, जामा मस्जिद मास्टर प्लान को दिल्ली अर्बन आर्ट कमीशन (DUAC) ने आधिकारिक मंजूरी दे दी. फिर काम रुक गया—2014 में दिल्ली हाई कोर्ट में एक नया केस दायर किया गया, जिसमें सुधार के काम की बहुत ज्यादा ज़रूरत बताई गई.

एसआरडीसी बोर्ड को पुनर्विकास के काम को आगे बढ़ाने में 2019 तक का समय लग गया. इस प्रोजेक्ट में मीना बाज़ार को फिर से सक्रिय करना, बुनियादी सुविधाओं (इंफ्रास्ट्रक्चर) को सुधारना और जामा मस्जिद के आसपास लगभग 12.7 हेक्टेयर के इलाके और लगभग 3 किलोमीटर की बाहरी सड़कों को पर्यटकों के लिए बेहतर सार्वजनिक जगह बनाना शामिल था. इसकी अनुमानित लागत 168 करोड़ रुपये थी.

शाहजहानाबाद का ज़ोनल प्लान, जिसमें दीवारों से घिरे शहर और उसके मुख्य इलाकों को दिखाया गया है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
शाहजहानाबाद का ज़ोनल प्लान, जिसमें दीवारों से घिरे शहर और उसके मुख्य इलाकों को दिखाया गया है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

2023 में, एसआरडीसी ने एक नए सलाहकार आर्किटेक्ट को नियुक्त करने की मंजूरी दी, ताकि ऐसा प्लान बनाया जा सके जिसमें चांदनी चौक प्रोजेक्ट के समय आई कमियों से बचा जा सके. असली नियुक्ति अभी बाकी है और यह प्रोजेक्ट अभी भी रुका हुआ है.

पिछले नवंबर में, सीएम गुप्ता की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में माना गया कि एसआरडीसी पिछले तीन सालों से ज्यादातर ‘निष्क्रिय’ रही है. एजेंसी के अधिकारी इसके लिए अधिकार और पैसे (फंड) की कमी को जिम्मेदार मानते हैं.

सिविल लाइंस में विकास भवन की दूसरी मंजिल के एक हिस्से से काम करने वाली इस संस्था में चेयरमैन से लेकर हेरिटेज कंसल्टेंट तक कुल 33 स्वीकृत पद हैं, जिनके अलावा कुछ कॉन्ट्रैक्ट पर कर्मचारी भी हैं. यह एक गैर-लाभ वाली कंपनी के रूप में काम करती है, जो दिल्ली सरकार से मिलने वाले ग्रांट पर निर्भर है. एसआरडीसी के जिस अधिकारी का जिक्र पहले किया गया था, उन्होंने बताया कि इस बजट का बड़ा हिस्सा वेतन और कर्मचारियों के भत्तों पर खर्च हो जाता है.

विकास भवन में स्थित एसआरडीसी के दफ्तर की एक बिना तारीख वाली तस्वीर, जिसे अब बंद हो चुके इसके फेसबुक पेज पर शेयर किया गया था
विकास भवन में स्थित एसआरडीसी के दफ्तर की एक बिना तारीख वाली तस्वीर, जिसे अब बंद हो चुके इसके फेसबुक पेज पर शेयर किया गया था

एसआरडीसी के एक और वरिष्ठ अधिकारी ने अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल बनाने में आने वाली मुश्किलों का ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, “हर बार हमें बुनियादी कामों के लिए भी विभागों से अनुरोध करना पड़ता है. इन एजेंसियों की वजह से अक्सर काम में देरी होती है.”

पिछले साल, जब एसआरडीसी ने दिल्ली ट्रैफिक पुलिस को पुनर्विकास वाले इलाके में ट्रैफिक जाम की समस्या सुलझाने के लिए चिट्ठी लिखी, तो वह अनुरोध इसलिए अटक गया क्योंकि कॉर्पोरेशन के पास खुद कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है. चांदनी चौक ट्राम सिस्टम के लिए एसआरडीसी को तकनीकी मदद के लिए पीडब्ल्यूडी और डीएमआरसी पर निर्भर रहना पड़ा. जामा मस्जिद पुनर्विकास प्रोजेक्ट में भी कुछ ऐसा ही है, जहां पीडब्ल्यूडी मुख्य एजेंसी है, लेकिन दिल्ली जल बोर्ड और एमसीडी भी इसमें शामिल हैं.

इतिहासकार और ‘चांदनी चौक – द मुगल सिटी ऑफ ओल्ड दिल्ली’ की लेखिका स्वप्ना लिडल ने कहा, “निजी कंपनियों से लेकर सरकारी एजेंसियों तक, कई अलग-अलग मालिकों के कामों को एसआरडीसी न तो ठीक से नियंत्रित (रेगुलेट) कर पा रहा है और न ही उन्हें सही दिशा दे पा रहा है. कॉर्पोरेशन को सबसे पहले अपना मकसद साफ करना होगा.”

उन्हें उन समस्याओं को सुलझाना होगा जिनसे शहर परेशान है—अतिक्रमण, ऊपर लटकते तार और वाहनों के ट्रैफिक तक. सिर्फ कागजों पर समाधान से शहर का असली रूप बचाना संभव नहीं होगा

—सोहेल हाशमी, हेरिटेज एक्सपर्ट

पुरानी दिल्ली में एसआरडीसी के काम की धीमी गति ने उसे दिल्ली के दूसरे हिस्से में काम करने से नहीं रोका. उसका एक बड़ा प्रोजेक्ट महरौली में 12वीं सदी की ‘कुतुब की बावली’ को सुधारना था, लेकिन वह प्रोजेक्ट भी आगे नहीं बढ़ पाया.

एसआरडीसी की आधिकारिक वेबसाइट इन बड़े आइडियाज का एक तरह से रिकॉर्ड बनकर रह गई है. होम पेज पर ‘न्यूज और अपडेट’ सेक्शन में लिखा है “कोई कंटेंट उपलब्ध नहीं है” और 2022 के बाद से इमेज गैलरी में भी कोई नया अपडेट नहीं आया है. ‘चल रहे प्रोजेक्ट्स’ टैब में कई योजनाओं की लिस्ट तो है, लेकिन उनकी मौजूदा स्थिति की जानकारी नहीं है. ‘एसआरडीसी की सफलता की कहानियां’ टैब में 15 साल से भी ज्यादा पुरानी सिर्फ एक एंट्री है: 5वां ‘मेरी दिल्ली उत्सव 2010’.

उनका फेसबुक पेज भी 2015 के बाद से अपडेट नहीं हुआ है. वहां मौजूद 149 पोस्ट पुराने समय का रिकॉर्ड हैं. सबसे आखिरी पोस्ट एक अखबार का आर्टिकल है जिसकी हेडलाइन है “दिल्ली सरकार ने पुरानी दिल्ली में ट्राम चलाने को मंजूरी दी”.

एक कमेंट में किसी ने काम पूरा होने की समय सीमा पूछी थी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

2014 की एक और पोस्ट में कहा गया था कि “निजी क्षेत्र को पुरानी दिल्ली की हवेलियों को हेरिटेज होटल में बदलने की अनुमति दी जा सकती है” और निगम को इसमें “बहुत ज्यादा संभावना” दिखती थी, लेकिन यह भी नहीं हो पाया. कई दूसरी पोस्ट में हेरिटेज वॉक की घोषणा की गई, लेकिन पेज के 742 फॉलोअर्स की तरफ से बहुत कम या कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.

लिडल ने कहा, “एसआरडीसी के पास इस क्षेत्र के लिए कोई बड़ा और स्पष्ट विज़न नहीं है और इसी वजह से इतने साल बाद भी वे सफल नहीं हो पाए. यह विरासत पुरानी दिल्ली के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में मदद नहीं कर रही है. केवल ऊपर से सुंदर बनाने से शहर में कोई बदलाव नहीं आएगा.”

दशकों से ठहराव

आज पुरानी दिल्ली में एक ही बड़ा बदलाव दिखता है, जिसकी लोग तारीफ करते हैं—चांदनी चौक में बना बड़ा, कई मंज़िला ओमैक्स मॉल. इसका एसआरडीसी से हालांकि, कोई लेना-देना नहीं है. यह एमसीडी के साथ पीपीपी प्रोजेक्ट के रूप में बना है और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के लिए मशहूर जगह बन गया है.

लेकिन विरासत के जानकार और इतिहासकार कहते हैं कि सरकार ने पुरानी दिल्ली को सुधारने के लिए जो काम किए, वे बहुत सीमित और कई बार नुकसान पहुंचाने वाले रहे हैं.

विरासत विशेषज्ञ सोहेल हाशमी ने कहा, “समस्या यह है कि सरकार पुरानी दिल्ली को सिर्फ चांदनी चौक तक ही समझती है. शाहजहानाबाद इससे कहीं ज्यादा बड़ा इलाका है.”

उन्होंने बताया कि यह ऐतिहासिक शहर बहुत बड़े क्षेत्र में फैला है—उत्तर में कश्मीरी गेट, दक्षिण में दिल्ली गेट, पूर्व में रिंग रोड और पश्चिम में अजमेरी गेट तक.

चांदनी चौक की भीड़ के बीच ओमैक्स मॉल का बड़ा बाहरी हिस्सा दिखता है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
चांदनी चौक की भीड़ के बीच ओमैक्स मॉल का बड़ा बाहरी हिस्सा दिखता है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

हाशमी ने हाल में किए गए सौंदर्यीकरण के काम, जैसे मॉल या चांदनी चौक में रखे कंक्रीट के गमले को शहर की असली विरासत से अलग बताया. उनका कहना है कि ये काम शहर की असली समस्याओं को नज़रअंदाज़ करते हैं.

उन्होंने कहा, “शहर की असली समस्याओं को ठीक करना होगा, जैसे अतिक्रमण, सिर के ऊपर से गुजरते तार और ज्यादा ट्रैफिक. सिर्फ सरकारी तरीका अपनाने से शहर का असली रूप नहीं बच पाएगा.”

हाशमी ने मोरक्को और उज़्बेकिस्तान के पुराने शहरों का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार को उन विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिए, जिन्होंने पहले से शाहजहानाबाद पर काम किया है.

2016 की कैग रिपोर्ट में बताया गया था कि शाहजहानाबाद पुनरुद्धार योजना में काम बहुत धीमा था. रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 10 साल बाद भी एसआरडीसी ने 4.36 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद बहुत कम काम किया था और यह अभी भी “शुरुआती चरण” में था. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यहां कर्मचारियों की 60% कमी थी. 9 महत्वपूर्ण पद जैसे विरासत सलाहकार और योजना सलाहकार—शुरू से खाली थे और कोई विशेषज्ञ नियुक्त नहीं किया गया था. रिपोर्ट में कहा गया कि एसआरडीसी 2008 में बनने के बाद भी शाहजहानाबाद के विकास की कोई ठोस योजना नहीं बना पाया.

एसआरडीसी के एक अधिकारी ने बताया कि यह रिपोर्ट अरविंद केजरीवाल के समय पेश हुई थी. इसके बाद कैबिनेट में चर्चा हुई और चांदनी चौक प्रोजेक्ट में तेजी लाई गई.

नई सरकारें, एसआरडीसी को फिर से शुरू करने की कोशिश

एसआरडीसी पुरानी दिल्ली को सुधारने की दूसरी कोशिश थी. पहली योजना 2004 में बनी थी, लेकिन शुरू ही नहीं हो पाई.

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा, जो शीला दीक्षित के राजनीतिक सचिव रह चुके हैं, उन्होंने कहा कि शीला दीक्षित दिल्ली को आधुनिक शहर बनाना चाहती थीं, लेकिन साथ ही विरासत को भी बचाना चाहती थीं.

शुरुआत धीमी रही क्योंकि 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स की वजह से इस प्रोजेक्ट पर ध्यान कम रहा. गेम्स के बाद कुछ काम शुरू हुआ, जैसे हेरिटेज वॉक, फोटो प्रदर्शनी और सेमिनार.

एसआरडीसी के एक पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर ने कहा, “शुरुआत में हमारा लक्ष्य लोगों को जागरूक करना था. वॉक और चर्चाओं के जरिए हम चाहते थे कि लोग अपनी विरासत को समझें.”

2011 में SRDC के एक इवेंट में कांग्रेस लीडर शीला दीक्षित. एजेंसी 2008 में उनकी सरकार के तहत बनी थी | स्पेशल अरेंजमेंट
2011 में SRDC के एक इवेंट में कांग्रेस लीडर शीला दीक्षित. एजेंसी 2008 में उनकी सरकार के तहत बनी थी | स्पेशल अरेंजमेंट

इतिहासकार नविना जाफा ने बताया कि शुरुआत में काफी उत्साह था. शीला दीक्षित का विजन साफ था और काम करने की आज़ादी भी थी, लेकिन यह उत्साह ज्यादा समय तक नहीं रहा.जाफा के कई प्रस्ताव, जैसे खारी बावली का इतिहास, पुरानी दिल्ली की दवाइयों की परंपरा और तवायफों की कहानियां आज भी पूरे नहीं हुए.

उन्होंने कहा, “शीला जी का साफ विज़न था. काम करने की आज़ादी थी, और लोग इस काम की परवाह करते थे.”

लेकिन यह ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पाया. जाफा ने खारी बावली मसाला बाज़ार के इतिहास, पुरानी दिल्ली की दवाइयों की परंपरा, और शाहजहानाबाद की तवायफों की कहानियां इकट्ठा करने के लिए तीन प्रस्ताव दिए थे. ये तीनों अभी भी एसआरडीसी के पास लंबित हैं.

कुछ समय ऐसे भी थे जब हौसला मिला. जाफा ने याद किया कि एसआरडीसी के पूर्व चेयरमैन और दिल्ली के मुख्य सचिव पीके त्रिपाठी ने 2011 में चांदनी चौक को नया रूप देने के लिए कई आइडिया देकर टीम को आगे बढ़ाया था. लेकिन ऐसे अच्छे दौर ज्यादा समय तक नहीं चले.

उन्होंने आगे कहा, “एसआरडीसी ने बनने के बाद से कई नेताओं का नेतृत्व देखा है. सभी नेता विरासत और संस्कृति को लेकर एक जैसे संवेदनशील नहीं थे.”

2012-13 तक चिंता सबसे ऊपर तक पहुंच गई थी. दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, शीला दीक्षित ने खुद एसआरडीसी की चेयरपर्सन बनकर इसकी जिम्मेदारी संभाली. उन्होंने जो देखा, उससे वह खुश नहीं थीं. इसमें यह भी शामिल था कि संस्था 50 स्मारकों की देखभाल नहीं कर पाई और उन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को वापस देना पड़ा.

शुरुआती सालों में लोगों को जागरूक करना मकसद था. वॉक और चर्चा के जरिए हम चाहते थे कि दिल्ली अपनी विरासत को फिर से पहचाने.

—एसआरडीसी के एक पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर

दो साल बाद, आम आदमी पार्टी ने भी ऐसा ही कहा. 2015 में सरकार बनाने के बाद AAP ने एसआरडीसी को फिर से शुरू किया—आज बीजेपी भी ऐसा ही कर रही है. उस समय के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने कहा था कि पार्टी के अधिकारी शाहजहानाबाद का “दिन-रात” दौरा करेंगे ताकि इलाके की समस्याओं को समझ सकें.

उस समय चांदनी चौक की AAP विधायक अलका लांबा, जिन्हें उसी साल एसआरडीसी बोर्ड में डायरेक्टर बनाया गया था, उन्होंने कहा, “शाहजहानाबाद रीडेवलपमेंट कॉर्पोरेशन पिछले आठ साल में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा है. बहुत पैसा खर्च हुआ, लेकिन उसका इस्तेमाल दिखाई नहीं देता.”

उनका सुझाव भी आज की बातों जैसा ही था, जिसमें एसआरडीसी को ज्यादा अधिकार देने की बात कही जा रही है—“हम एसआरडीसी को चारदीवारी वाले शहर के लिए एक खास कॉर्पोरेशन बनाकर उसे ज्यादा ताकत देने की योजना बना रहे हैं. यह बिल्कुल वैसे ही काम करेगा जैसे NDMC और कैंटोनमेंट बोर्ड काम करते हैं.”

2015 में एसआरडीसी की एक हेरिटेज वॉक. इस तरह की गतिविधियां अब काफी समय से बंद हो चुकी हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
2015 में एसआरडीसी की एक हेरिटेज वॉक. इस तरह की गतिविधियां अब काफी समय से बंद हो चुकी हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

खराब हालत के बीच कुछ अच्छे काम

पुरानी दिल्ली को “फिर से ज़िंदा करने” की बात कई सालों से राजनीति का हिस्सा रही है. कई दशकों से चुनावी घोषणापत्र और जनसभाओं में यह वादा किया जाता रहा है. इस इलाके के लगभग हर सांसद और विधायक 17वीं सदी की इस राजधानी को फिर से नई पहचान देने का वादा करते हैं.

1990 के दशक के आखिर में यह योजना केंद्र सरकार तक पहुंची. चांदनी चौक से तीन बार सांसद रहे और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में राज्य मंत्री रहे विजय गोयल ने इस दिशा में काम किया. 2001 में उन्होंने “चौदहवीं का चांद” नाम का दो दिन का कार्यक्रम आयोजित किया. इस दौरान सैकड़ों घरों, दुकानों और सांस्कृतिक महत्व वाली इमारतों की मरम्मत की गई और उन्हें रोशनी से सजाया गया. उन्होंने अपने MPLAD फंड से 75 लाख रुपये खर्च करके लाहौरी गेट की एक हवेली में पुरानी दिल्ली के इतिहास पर एक संग्रहालय भी बनवाया.

फरवरी 2003 में लाहौरी गेट पर हेरिटेज म्यूजियम के उद्घाटन पर भाजपा नेता विजय गोयल. इसे बनाने के लिए उन्होंने अपने MPLAD फंड से 75 लाख रुपये खर्च किए | फोटो: Facebook/@Vijay Goel
फरवरी 2003 में लाहौरी गेट पर हेरिटेज म्यूजियम के उद्घाटन पर भाजपा नेता विजय गोयल. इसे बनाने के लिए उन्होंने अपने MPLAD फंड से 75 लाख रुपये खर्च किए | फोटो: Facebook/@Vijay Goel

करीब दो दशक पहले, गोयल ने “चारदीवारी शहर विकास बोर्ड” बनाने की मांग की थी. यह उनका पसंदीदा प्रोजेक्ट था और सांसद न रहने के बाद भी वह इस पर काम करते रहे.

गोयल का एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट 19वीं सदी की धरमपुरा हवेली की मरम्मत था. यह निजी प्रयास था. 6 साल तक काम चलने के बाद 2016 में इसे एक बुटीक होटल बना दिया गया. बाद में यूनेस्को ने इसे सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पुरस्कार दिया और इसे दूसरी जगहों की मरम्मत के लिए प्रेरणा बताया.

इससे पहले सबसे बड़ा काम बल्लीमारान में गालिब की हवेली की मरम्मत का था. दिल्ली सरकार ने 2000 में इसे ठीक करके स्मारक और संग्रहालय बना दिया. इससे पहले इसका इस्तेमाल कोयले के गोदाम और व्यापारिक जगह के रूप में हो रहा था. 2023 में जी20 के दौरान भी इसकी थोड़ी मरम्मत की गई.

हवेली धरमपुरा ने 2016 में खुलने के बाद से 80 से ज्यादा देशों के लोगों की मेजबानी की है | दिप्रिंट
हवेली धरमपुरा ने 2016 में खुलने के बाद से 80 से ज्यादा देशों के लोगों की मेजबानी की है | दिप्रिंट

फिर भी, मरम्मत की गई हवेलियां, चाहे सरकारी हों या निजी खराब हालत के बड़े समुद्र में छोटे टापू जैसी हैं. 11 मार्च को गोयल ने फेसबुक पर पोस्ट कर कहा कि पुरानी दिल्ली को बचाने की ज़रूरत है.

पोस्ट में कहा गया, “यह अनमोल विरासत भीड़ और अव्यवस्था के बोझ से दब रही है. जरूरी है कि पुरानी दिल्ली को हेरिटेज ज़ोन घोषित किया जाए और एक खास अथॉरिटी बनाई जाए, ताकि शाहजहानाबाद की पुरानी शान वापस लाई जा सके.”

थोड़े समय की सफलता

2018 में अरविंद केजरीवाल सरकार के समय चांदनी चौक रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट को नई गति मिली. दिवंगत आर्किटेक्ट प्रदीप सचदेवा को लाल किले से फतेहपुरी मस्जिद तक 1.3 किमी लंबे हिस्से को नया रूप देने का काम दिया गया. योजना में बिना मोटर वाहनों वाला क्षेत्र, लाल पत्थर के खंभे, चौड़े फुटपाथ और जमीन के नीचे केबल डालना शामिल था.

2021 में जब इस हिस्से का उद्घाटन हुआ, तो इसे पूरे इलाके को बड़ा टूरिस्ट हब बनाने की दिशा में अहम कदम बताया गया.

केजरीवाल ने इसे “बहुत सुंदर” बताया और चांदनी चौक को शहर का सबसे महत्वपूर्ण टूरिस्ट स्थान कहा, लेकिन जल्दी ही समस्याएं दिखने लगीं. सड़क किनारे दुकानदारों ने पैदल रास्तों पर कब्जा कर लिया, पत्थर टूटने लगे और नए ट्रैफिक नियमों का खुलेआम उल्लंघन होने लगा. भाजपा नेताओं ने प्रोजेक्ट में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए.

चांदनी चौक में नो-ट्रैफिक नियम का दिन के किसी भी समय कई लोग पालन नहीं करते | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
चांदनी चौक में नो-ट्रैफिक नियम का दिन के किसी भी समय कई लोग पालन नहीं करते | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
चांदनी चौक में कूड़ेदान भर जाने से कूड़ा फुटपाथ पर फैल जाता है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
चांदनी चौक में कूड़ेदान भर जाने से कूड़ा फुटपाथ पर फैल जाता है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

दिल्ली चुनाव जीतने के कुछ महीनों बाद पीडब्ल्यूडी की जांच रिपोर्ट में कहा गया कि चांदनी चौक प्रोजेक्ट की लागत 65.6 करोड़ रुपये से बढ़कर 145.72 करोड़ रुपये हो गई. अगस्त 2025 की रिपोर्ट में कहा गया कि 70 करोड़ रुपये मूल योजना से बाहर की चीज़ों पर खर्च हुए.

इसके बाद दिल्ली भाजपा प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर ने एसआरडीसी को खत्म करने की मांग की. उन्होंने कहा कि ‘डेपुटेशन’ पर आए अधिकारी मनमाने तरीके से काम कर रहे थे.

कपूर ने कहा, “इन अधिकारियों ने चांदनी चौक को सिर्फ मुगल काल का शहर माना और इसकी व्यापारिक पहचान को नहीं समझा. असली स्थिति को नजरअंदाज करके उन्होंने बार-बार चांदनी चौक को सिर्फ टूरिस्ट सेंटर बनाने की योजना बनाई और कई बार मुख्यमंत्रियों को अव्यवहारिक योजनाओं को मंजूरी देने के लिए राजी किया.”

AAP ने जवाब दिया कि ये आरोप राजनीतिक बदले की भावना से लगाए गए हैं.

AAP के बयान में कहा गया, “अधिकारियों की नियुक्ति भाजपा के उपराज्यपाल कर रहे थे. पुराने मामलों की जांच शुरू करना उनकी अक्षमता दिखाता है.”

इस बीच, एसआरडीसी की स्थिति फिर से वहीं पहुंचती दिख रही है जहां से शुरुआत हुई थी.


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क्या अब सच में अधिकार मिलेगा?

अलग-अलग सरकारों ने लगभग एक जैसी बात कही है कि एसआरडीसी को सिर्फ कागज़ों पर चलने वाली संस्था से एक असली काम करने वाली एजेंसी बनाने के लिए क्या करना होगा.

2021 में AAP के पीडब्ल्यूडी मंत्री सत्येंद्र जैन की अध्यक्षता में हुई एक मीटिंग में एसआरडीसी बोर्ड ने एक प्रस्ताव पास किया. इसमें कहा गया कि इस संस्था को चारदीवारी वाले शहर के लिए Special Area Local Planning and Development Authority (SALPDA) बनाया जाए.

इसका मकसद एक कानून बनाना था, जिससे इसे New Delhi Municipal Council (NDMC) जैसी कानूनी ताकत मिल सके—NDMC एक केंद्र के तहत चलने वाली संस्था है, जो लुटियंस इलाके का काम संभालती है.

दिल्ली के अलग-अलग अधिकार क्षेत्रों के जटिल सिस्टम में NDMC के पास सबसे ज्यादा स्वतंत्र अधिकार हैं. यह अपने इलाके में बिजली से लेकर सफाई तक हर चीज संभालती है. अगर एसआरडीसी को भी ऐसे ही अधिकार मिल जाएं, तो यह शाहजहानाबाद के लिए एक अलग और मजबूत संस्था बन सकती है और एमसीडी और पीडब्ल्यूडी से बार-बार अनुमति लेने की जरूरत खत्म हो सकती है.

हालांकि, SALPDA का प्रस्ताव ड्राफ्ट से आगे नहीं बढ़ पाया, लेकिन अब लगता है कि यह नए रूप में फिर सामने आया है.

एसआरडीसी बोर्ड मीटिंग में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, जहां संस्था का नाम बदलने और बड़े बदलाव का फैसला लिया गया | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
एसआरडीसी बोर्ड मीटिंग में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, जहां संस्था का नाम बदलने और बड़े बदलाव का फैसला लिया गया | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

13 मार्च को एसआरडीसी की 38वीं बोर्ड मीटिंग हुई. इस मीटिंग में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने संस्था के काम, उस पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और आगे की दिशा की समीक्षा की. इस दौरान फिर वही बात सामने आई.

शहरी विकास विभाग के एक अधिकारी ने, जो मीटिंग में मौजूद थे, कहा, “शाहजहानाबाद के लिए NDMC जैसी संस्था बनाने पर चर्चा हुई.”

मुख्यमंत्री कार्यालय के बयान में कहा गया कि अब समय आ गया है कि संस्था का “पूरी तरह से पुनर्गठन और पुनर्जीवन” किया जाए, ताकि पुरानी दिल्ली के “असली पुनर्विकास” को तेज किया जा सके. बाद में मुख्यमंत्री गुप्ता ने एक्स पर पोस्ट करके कहा कि इन बदलावों से एसआरडीसी ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ काम कर सकेगा.

चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल जैसे लोग, जो बड़े बदलाव के पक्ष में हैं, इन संकेतों को सकारात्मक मानते हैं. सितंबर 2024 में उन्होंने उपराज्यपाल को पत्र लिखकर कहा था कि एसआरडीसी को “पुरानी दिल्ली के रखरखाव की पूरी जिम्मेदारी दी जाए” जिसमें विकास, सफाई और ट्रैफिक सब शामिल हो. नवंबर 2025 की एसआरडीसी मीटिंग में उन्होंने इसका नाम बदलकर ‘इंद्रप्रस्थ रीडेवलपमेंट कॉर्पोरेशन’ या ‘चांदनी चौक रीडेवलपमेंट कॉर्पोरेशन’ रखने का सुझाव भी दिया था, ताकि नई शुरुआत का संकेत मिले.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “पहली बार कोई सरकार इस कॉर्पोरेशन को लेकर इतनी गंभीर दिख रही है. रेखा जी खुद इसमें रुचि ले रही हैं, जिससे पुरानी दिल्ली के विकास की उम्मीद बढ़ी है. पहले ही बहुत समय बर्बाद हो चुका है. अब सरकार को सभी विकास कामों के लिए एक ही संस्था को अधिकार देना चाहिए, जैसे NDMC के पास हैं.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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