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Thursday, 26 March, 2026
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धुरंधर 2 नोटबंदी का समर्थन करने के लिए एक बड़ा बहाना देती है, जिसकी कल्पना BJP ने भी नहीं की थी

'धुरंधर 2' एक दुस्साहसी 'रेटकॉन' है. राष्ट्र इसकी कीमत चुका रहा है.

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‘धुरंधर: द रिवेंज’ के शुरुआती सीन में ही एक तरह का ‘रिविजनिज़्म’ (इतिहास को अपने हिसाब से बदलने की सोच) दिखाई देता है, जो पूरी फ़िल्म में मौजूद है.

इंटेलिजेंस ब्यूरो के चीफ़ अजय सान्याल, जिनका किरदार आर. माधवन ने निभाया है, एक टूटे हुए इंसान जसकीरत सिंह रंगी को अपनी टीम में शामिल करने की कोशिश करते हैं. जसकीरत मौत की सज़ा पाया हुआ एक कैदी है, जिसे खास तौर पर चुना गया है और चुपके से जेल से बाहर निकाल लिया गया है. जसकीरत तो बस एक गुमनाम मौत चाहता है, लेकिन सान्याल उसकी इस सोच का जवाब एक जोश भरे सिख प्रार्थना से देते हैं. सान्याल उसे प्रेरित करते हुए कहते हैं, “सूरा सो पहचानिए, जो लड़े दीन के हेत / पुरजा पुरजा कट मरे, कबहुं न छाड़े खेत.” इन पंक्तियों का सीधा सा मतलब यह है कि सच्चा आध्यात्मिक योद्धा वह है जो दबे-कुचले लोगों के अधिकारों के लिए लड़ता है और युद्ध के मैदान को कभी नहीं छोड़ता, भले ही उसका शरीर टुकड़ों-टुकड़ों में कट जाए.

यह हिम्मत जगाने वाला एक खूबसूरत और असरदार नारा है, जिसका इस्तेमाल कई टीवी शो और फ़िल्मों में किया गया है, लेकिन शायद इसका सबसे बेहतरीन इस्तेमाल नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली फ़िल्म ‘तमस’ (1988) में हुआ था. गोविंद निहलानी की यह दिल दहला देने वाली फ़िल्म भी पाकिस्तान की पृष्ठभूमि पर बनी है, लेकिन इसकी कहानी भारत के बंटवारे के समय की है. वैचारिक तौर पर यह फ़िल्म ‘धुरंधर’ से बिल्कुल अलग छोर पर खड़ी है. जहां ‘तमस’ में लोग अपनी जान देने से ठीक पहले एक साथ मिलकर “जो लड़े दीन के हेत” का जाप करते हैं, वहीं ‘धुरंधर’ में इस नारे का इस्तेमाल उस खूनी तांडव को सही ठहराने के लिए किया जाता है, जिसे फ़िल्म में अंजाम दिया जाने वाला है.

और बस इसी तरह, एक प्रार्थना—जो असल में मुश्किल वक्त में हिम्मत न हारने और डटे रहने का संदेश देती है—अपने मूल संदर्भ और अर्थ से काटकर प्रोपेगैंडा (प्रचार) के हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर ली जाती है.

‘धुरंधर’ अपनी साउंडट्रैक के साथ भी यही खेल दोहराती है. फ़िल्म में 80 और 90 के दशक के कई ज़बरदस्त गानों की एक लंबी-चौड़ी प्लेलिस्ट को बिना किसी संदर्भ के बैकग्राउंड म्यूज़िक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है. इन गानों को तेज़ रफ़्तार वाली गाड़ियों की चेज़, जानलेवा मिशन और इंसानी शरीर के अंगों को निकालने के नए-नए, और भी ज़्यादा घिनौने तरीकों वाले सीन में बजाया गया है. लेकिन फ़िल्म यह सब सबसे ज़्यादा लापरवाही से भारत के आर्थिक इतिहास के सबसे दर्दनाक दौर में से एक—नोटबंदी—को सही ठहराने के लिए करती है.

‘धुरंधर: द रिवेंज’ में, साल 2016 की नोटबंदी को एक नया नाम—’ऑपरेशन ग्रीन लीफ़’—दिया गया है. फ़िल्म की कहानी के अनुसार, पाकिस्तानी इंटेलिजेंस और अंडरवर्ल्ड के गुर्गों ने—जिनमें दाऊद इब्राहिम का एक काल्पनिक रूप भी शामिल है—60,000 करोड़ रुपये के नकली नोट भारत में भेजे हैं, खास तौर पर उत्तर प्रदेश के चुनाव खरीदने के लिए. 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री का टीवी पर दिया गया भाषण, जैसा का तैसा उठाकर फ़िल्म में डाल दिया गया है. फ़िल्म का दावा है कि यह ‘मास्टरस्ट्रोक’ असल में एक गुप्त सैन्य हमले का सिर्फ़ एक सार्वजनिक चेहरा था.

यह एक बेहद साहसी ‘Ritcon’ (कहानी में किया गया बदलाव) है. लेकिन यह तभी काम करता है, जब आपको यह याद न हो कि असल में हुआ क्या था.

असाधारण हेरफेर

धुरंधर 2 को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि नोटबंदी के बाद क्या हुआ. तथ्य तो उन परेशान करने वाले उदारवादियों—और डॉक्यूमेंट्रीज़ के लिए होते हैं. आम भारतीयों की थोड़ी-बहुत तकलीफ़ एक छोटी सी क़ीमत है, जब उनके आस-पास, उनके ऊपर, और उनकी जानकारी के बिना ही एक युद्ध लड़ा जा रहा हो: राष्ट्र अपनी ही रक्षा में एक ‘कोलैटरल’ (गौण क्षति) बन जाता है. धुरंधर 2 पूछता है: इससे बड़ा सम्मान और क्या हो सकता है?

यह असाधारण हेरफेर तब जादू की तरह काम करता है, जब आप कंधार विमान अपहरण या 26/11 के हमलों को दिखाते हैं. ये दोनों घटनाएं लोगों की यादों में गहरे तक बस चुकी हैं, लेकिन ज़्यादातर भारतीयों का इन विनाशकारी घटनाओं से कोई निजी जुड़ाव नहीं है. नोटबंदी के मामले में ऐसा नहीं है.

लाखों भारतीयों की तरह, मैंने भी वह भाषण उस ऑनलाइन मैगज़ीन के दफ़्तर में देखा था, जिसका मैं संपादन किया करती थी. (आज भी, जब भी प्रधानमंत्री के रात 8 बजे के संबोधन की घोषणा होती है, तो मेरे दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं.) कुछ ही मिनटों में, हमारा दफ़्तर खाली हो गया—मैनेजमेंट से लेकर दफ़्तर के सहायकों तक, हर कोई नज़दीकी ATM की ओर दौड़ पड़ा. बांद्रा से होते हुए घर लौटते समय—जो मुंबई के सबसे महंगे इलाक़ों में से एक है और एक ऐसा इलाक़ा है, जहां कभी शांति नहीं रहती—ATM की लाइन में खड़े हर चेहरे पर घबराहट और शक साफ़ झलक रहा था. अगर बांद्रा का यह हाल था, तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि बाकी जगहों पर क्या हो रहा होगा.

लेकिन आपको ज़्यादा देर तक अंदाज़ा लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ी. उसके बाद के दिनों में ऐसी कहानियां और तस्वीरें सामने आईं, जिन्हें भुला पाना नामुमकिन है. बैंक में बेबसी से रोता हुआ एक बुज़ुर्ग. अपने मालिकों द्वारा पुराने नोटों के रूप में पेशगी देकर ठगे गए दिहाड़ी मज़दूर. वे किसान, जो रबी की फ़सल के लिए बीज नहीं खरीद पाए. वह अकेली मां, जिसने समय पर न बदलवा पाने के कारण अपने नोट जला दिए. वह अंधा भिखारी, जिसने 20 सालों में 65,000 रुपये बचाए थे, जो अब बेकार हो चुके थे.

‘सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी’ ने अनुमान लगाया कि सिर्फ़ शुरुआती 50 दिनों में ही अर्थव्यवस्था को 1.28 लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ. लेकिन क्या यह आंकड़ा इंसानी तकलीफ़ों के उस विशाल पैमाने को बयां कर सकता है?

हर साल, 8 नवंबर बिना किसी शोर-शराबे के आता है और चला जाता है. एक ऐसी सरकार की तरफ़ से—जो हैरानी की बात है—कोविड के दौरान भारत के मुश्किल सफ़र को भी अपनी उपलब्धियों में गिनती है, कोई सालगिरह का भाषण नहीं है, न ही किसी ‘मास्टरस्ट्रोक’ का कोई पहले से तय जश्न. तीन साल पहले, कांग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने एक टीवी बहस के दौरान यही बात कही थी: “अगर BJP इसे सचमुच एक जीत और एक मास्टरस्ट्रोक मानती, तो सत्ता में रहने की अपनी सालगिरह मनाते समय वे नोटबंदी का ज़िक्र ज़रूर करते. लेकिन नोटबंदी का ज़िक्र एक बार भी नहीं हुआ, ठीक वैसे ही जैसे ‘अच्छे दिन’ का ज़िक्र नहीं होता.”

इसकी एक वजह यह भी है कि आंकड़ों को देखते हुए चुप रहना ही एकमात्र गरिमापूर्ण विकल्प बचता है. RBI की अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा गया था कि नोटबंदी के बाद 99.3 फ़ीसदी करेंसी बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गई. काला धन जमा करने वाले—चाहे वे कोई भी रहे हों—बच निकले. मुझे लगता है कि अब उन सभी का गोवा में भी एक ठिकाना होगा, और वे रियल एस्टेट में भी अपना पैसा लगा रहे होंगे.

नकदी से भरे जूट के बोरे

भारतीय कल्पना में एक ऐसी तस्वीर इतनी गहराई से बैठ गई है कि यह भ्रष्टाचार का ही पर्याय बन गई है: काले धन से भरे जूट के बोरे, जो बिस्तर के नीचे या गद्दे के अंदर ठूंसकर रखे होते हैं. बॉलीवुड से मिली मज़बूती के कारण, यह तस्वीर छापों की कवरेज में, राजनीतिक भाषणों में और भ्रष्टाचार-विरोधी अभियानों में अक्सर दिखाई देती है. यह इतनी ज़बरदस्त और इतनी आसानी से समझ में आने वाली तस्वीर है कि नोटबंदी के पक्ष में आम सहमति इसी के आधार पर बनी थी. 8 नवंबर को अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने पूछा था: “कौन सा ईमानदार नागरिक सरकारी अधिकारियों के बिस्तरों के नीचे करोड़ों रुपये के नोट छिपाकर रखने की खबरों से दुखी नहीं होगा? या जूट के बोरों में नकदी मिलने की खबरों से परेशान नहीं होगा?”

समस्या यह है कि यह तस्वीर अधूरी है. भारत में काला धन मुख्य रूप से नकदी के रूप में नहीं रखा जाता है. यह ज़मीन-जायदाद, दूसरे घरों, सोने, विदेशों में बनी ‘शेल कंपनियों’ (कागज़ी कंपनियों) और राजनीतिक वित्तपोषण के उन साधनों में छिपा होता है, जो नोटबंदी के बाद और भी ज़्यादा फलते-फूलते हैं.

अरुण कुमार, जिनकी 2018 में आई किताब ‘Demonetization and the Black Economy’ (नोटबंदी और काला धन अर्थव्यवस्था) इस नीति का एक गहन और बारीकी से किया गया विश्लेषण है, बताते हैं कि असंगठित क्षेत्र—जिसका भारतीय GDP में 45 प्रतिशत का योगदान है, जिसमें हमारी ज़्यादातर आबादी को रोज़गार मिला हुआ है, और जो लगभग पूरी तरह से नकदी पर ही चलता है—पूरी तरह से ढहने की कगार पर पहुंंच गया था.

फिर भी, यह एक ऐसी तस्वीर है जो लोगों के ज़हन से आसानी से नहीं मिटती, और इसकी एक ठोस वजह भी है. मार्च 2025 में—नोटबंदी के आठ साल बाद, जिसका मकसद काले धन के जमाखोरों की कमर तोड़ना था—दिल्ली में हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के घर पर लगी आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों ने कथित तौर पर घर के बाहरी हिस्से (आउटहाउस) में नकदी से भरे जूट के बोरे देखे. जस्टिस वर्मा ने बाद में उन बोरों को “स्टेशनरी और कोर्ट के कागज़ात” बताया, और साथ ही यह भी कहा कि यह उनके खिलाफ रची गई एक साज़िश थी.

एक तरह का धोखा

फिल्म ‘धुरंधर 2’ की कहानी इस खास दावे पर आधारित है कि पाकिस्तानी जाली नोटों ने भारत की वित्तीय व्यवस्था को पूरी तरह से अपनी चपेट में ले लिया था. यह जानना ज़रूरी है कि 2016 में कुल चलन में मौजूद करंसी में जाली नोटों का हिस्सा महज़ 0.025 प्रतिशत के आस-पास ही था. फिल्म में दिखाई गई पूरी काल्पनिक आपातकालीन स्थिति असल में एक ऐसी रकम के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिसे गणित की भाषा में ‘राउंडिंग एरर’ (नगण्य त्रुटि) ही माना जा सकता है. अगर यह फिल्म थोड़ी और समझदारी से बनाई गई होती, तो शायद यह बात ही फिल्म का सबसे बड़ा मज़ाक (पंचलाइन) बन जाती. नकली करेंसी के साथ-साथ, नोटबंदी के बदलते लक्ष्यों में टेरर फाइनेंसिंग (आतंकवाद के लिए पैसे जुटाना) का खतरा भी शामिल था, जिसका ज़िक्र इस फ़िल्म में किया गया है. इस पर हम बस इतना ही कह सकते हैं कि उसके बाद से भारत पर हुए हमले रिकॉर्ड में दर्ज हैं—चाहे वे अमरनाथ (2017) में हुए हों, या पुलवामा (2019) में, या पहलगाम (2025) में, या दिल्ली (2025) में.

इस नीति से जो चीज़ कुछ हद तक असरदार ढंग से सामने आई, वह थी काले धन के लिए नए रास्ते. अरुण कुमार ने विस्तार से बताया है कि कैसे अमीरों ने गरीबों को ‘मनी म्यूल्स’ (पैसे ढोने वाले) के तौर पर इस्तेमाल किया, और इस मकसद से खोले गए जन धन खातों के ज़रिए पुराने नोटों का लेन-देन किया. शेल कंपनियों और हवाला नेटवर्क ने पैसों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया और उन्हें वैध बनाया.

अगर इसमें कोई इंसाफ़ है, तो वह बहुत छोटा सा है: इस सीक्वल ने उन्हीं दर्शकों को खुद से दूर कर दिया है, जिन्हें पहली फ़िल्म ने इतनी सावधानी से अपनी तरफ़ खींचा था. पहले हिस्से ने अपने किरदारों और कहानी को लियारी के माहौल में गहराई से पिरोकर, बड़ी होशियारी से दर्शकों को अपने साथ जोड़ लिया था. इसका बेहद शानदार एक्शन और बारीकी से गढ़ा गया माहौल इसे एक ऐसी मनोरंजक फ़िल्म बनाता था, जिससे उदारवादी दर्शक भी खुद को प्रभावित होने से रोक नहीं पाए थे. लेकिन इस सीक्वल ने तो दर्शकों के पैरों तले से ज़मीन ही खींच ली है.

उदारवादी और दक्षिणपंथी—दोनों तरह के दर्शकों को मिलकर अब एक ही बात समझ आई है: जिस दुनिया में वे इतने मन से डूबे हुए थे, वह असल में शुरू से ही सरकारी नीतियों का प्रचार करने का बस एक ज़रिया भर थी. इसीलिए अब आपको हर कोई यही कहते हुए मिलेगा कि फ़िल्म में एक्टिंग ज़बरदस्त है, म्यूज़िक बहुत बढ़िया है, और एक्शन सीन तो साँसें थाम देने वाले हैं. क्योंकि, एक ऐसी फ़िल्म के बारे में आप बस यही कह सकते हैं, जिसने दर्शकों को धोखा देकर अपना असली रंग दिखाया हो.

कम से कम, इसकी यह ढिठाई तो आंखें खोलने वाली है. नौ सालों तक, नोटबंदी के मुद्दे पर सरकार की चुप्पी ही उसकी सबसे बड़ी समझदारी थी. ‘धुरंधर 2’ ने उस चुप्पी को एक ही झटके में तोड़ दिया है, और पूरे देश को ठीक-ठीक यह याद दिला दिया है कि उनके साथ क्या किया गया था. एक बार फिर, यह पूरा देश अपनी ही ‘बचाव-मुहिम’ में एक ‘कोलेटरल डैमेज’ (अप्रत्यक्ष नुकसान) बनकर रह गया है.

करनजीत कौर पत्रकार हैं. वे TWO Design में पार्टनर हैं. उनका एक्स हैंडल @Kaju_Katri है. व्यक्त विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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