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Wednesday, 25 March, 2026
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कौन हैं मोहम्मद बाघेर ज़ोलघद्र—IRGC के पूर्व ‘डार्क हॉर्स’ और अब ईरान की सुरक्षा कमान संभालने वाले

ईरान की क्रांति और उसके युद्धों के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक, ज़ोलघाद्र की नियुक्ति उन्हें देश के सबसे रणनीतिक निकाय के केंद्र में ला खड़ा करती है.

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नई दिल्ली: ईरान ने ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद बाघेर ज़ोलघद्र को ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का नया सचिव नियुक्त किया है. इस नियुक्ति की घोषणा मंगलवार को सरकारी मीडिया ने की और बाद में राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन के डिप्टी ऑफ कम्युनिकेशंस मेहदी तबतबाई ने इसकी पुष्टि की.

ज़ोलघद्र ने अली लारिजानी की जगह ली है, जिनकी पिछले हफ्ते अमेरिका-इज़राइल के सैन्य हमले में मौत हो गई थी, और उन्हें लारिजानी जितना ही सिस्टम के अंदर का व्यक्ति माना जाता है.

उनका करियर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC से जुड़ा रहा है. ईरान-इराक युद्ध (1980-88) के दौरान वह एक वरिष्ठ कमांडर थे, जिन्होंने गार्ड की ऑपरेशनल रणनीति बनाने में मदद की. बाद में उन्होंने रमज़ान गैरीसन की सह-स्थापना की, जो एक यूनिट थी. इसकी गतिविधियों, जैसे प्रॉक्सी फोर्सेस को ट्रेन करना और ईरान की सीमाओं के बाहर ऑपरेशन करना, ने IRGC के विदेशी विंग कुद्स फोर्स के विकास में योगदान दिया.

ईरान-इराक युद्ध खत्म होने के बाद, ज़ोलघद्र ने IRGC के सबसे ऊंचे स्तरों पर 16 साल तक काम किया. वह आठ साल तक जॉइंट स्टाफ के प्रमुख रहे, जो कमांड की तीसरी सबसे बड़ी पोजीशन होती है, और बाद में आठ साल तक डिप्टी कमांडर-इन-चीफ रहे, जो दूसरी सबसे बड़ी पोजीशन होती है.

उनकी नियुक्ति को नए सुरक्षा प्रमुख के रूप में सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने मंजूरी दी, और इससे ईरान की क्रांति और उसके युद्धों के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक को देश की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संस्था के केंद्र में जगह मिल गई.

2021 में, जब उन्हें एक्सपीडिएंसी काउंसिल का प्रमुख बनाया गया था, तब कहा गया था कि उनके पास “क्रांतिकारी व्यक्तित्व” और “महत्वपूर्ण प्रशासनिक अनुभव” है.

इससे पहले, ईरानी मीडिया ने रिपोर्ट किया था कि पूर्व रक्षा मंत्री होसैन देहघान को लारिजानी की मौत के बाद सुरक्षा प्रमुख नियुक्त किया गया है. हालांकि, आखिर में मंगलवार को ज़ोलघद्र की नियुक्ति की पुष्टि हुई.

IRGC से लेकर गृह मंत्रालय और न्यायपालिका तक

1954 में शिराज़ के पास फासा में जन्मे ज़ोलघद्र ने पहलवी राजशाही के आखिरी वर्षों में होश संभाला. उन्होंने तेहरान यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की, लेकिन उनकी पीढ़ी के कई लोगों की तरह उनकी पढ़ाई ईरानी क्रांति के कारण प्रभावित हुई.

1979 से पहले, वह मंसूरून समूह से जुड़े थे, जो कई इस्लामिक उग्रवादी नेटवर्क में से एक था, जिन्हें बाद में नई व्यवस्था के ढांचे में शामिल कर लिया गया. इस क्रांति ने उनके रास्ते को बदला नहीं, बल्कि उसे औपचारिक रूप दिया.

ईरान-इराक युद्ध के बाद, ज़ोलघद्र IRGC में लगातार ऊपर बढ़ते गए और उस समय सैन्य फैसलों के सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंचे, जब गार्ड अपनी सुरक्षा भूमिका के साथ-साथ राजनीतिक प्रभाव भी मजबूत कर रहा था.

वह इस्लामिक रिवोल्यूशन मोजाहेदीन ऑर्गनाइजेशन यानी IRMO का भी हिस्सा थे, जो 1979 की क्रांति के बाद सात इस्लामिक समूहों के गठबंधन के रूप में बना था, जो शाह के खिलाफ थे. इस समूह ने मोजाहेदीन-ए-खलक यानी MEK का कड़ा विरोध किया था, जो पहले एक बड़ा वामपंथी-इस्लामिक आंदोलन था और बाद में देश छोड़कर चला गया.

IRMO के कई सदस्य आगे चलकर IRGC की मुख्य नेतृत्व टीम का हिस्सा बने. 1981 में जब MEK ने सशस्त्र विद्रोह शुरू किया, तब IRMO ने उसे दबाने में अहम भूमिका निभाई.

1985 तक, यह संगठन वाम और दक्षिणपंथी गुटों में बंट गया. ज़ोलघद्र और मोहसिन रज़ाई IRGC के साथ जुड़े रहे और ईरान की सुरक्षा व्यवस्था में अपना प्रभाव मजबूत करते गए. ज़ोलघद्र के आगे बढ़ने में रज़ाई और याह्या रहीम सफवी जैसे नेताओं से करीबी रिश्तों ने मदद की, जो बाद में कॉर्प्स के कमांडर बने.

बाद में, IRGC के कई वरिष्ठ अधिकारियों की तरह, उन्होंने सैन्य और नागरिक संस्थाओं के बीच काम किया. उन्होंने महमूद अहमदीनेजाद के कार्यकाल में गृह मंत्रालय में वरिष्ठ पदों पर काम किया, जहां उन्होंने सुरक्षा और कानून व्यवस्था देखी, और बाद में न्यायपालिका में भी पद संभाले.

2007 में, उन्हें सशस्त्र बलों के जनरल स्टाफ का डिप्टी चीफ बनाया गया, जहां वह बसीज से जुड़े मामलों को देखते थे, जो एक स्वयंसेवी मिलिशिया है और अक्सर घरेलू अशांति के समय तैनात की जाती है.

ईरान का ‘डार्क हॉर्स’

ज़ोलघद्र का नाम अक्सर विवादों के साथ इस्लामिक रिपब्लिक के कुछ अंधेरे दौर से जुड़ा रहा है.

उन पर आरोप है कि 1990 के दशक में असंतुष्ट लोगों की “चेन मर्डर्स” का नेतृत्व उन्होंने किया था, और 1999 में छात्र विरोध प्रदर्शनों को दबाने में भी उनकी भूमिका रही थी. वह उन वरिष्ठ कमांडरों के समूह में भी शामिल थे जिन्होंने मोहम्मद खातमी के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान सुधारवादी विचारों को खुलकर चुनौती दी, और राजनीतिक उदारीकरण के खिलाफ सख्त रुख अपनाया.

कहा जाता है कि ज़ोलघद्र और रज़ाई ने 1978 में एक अमेरिकी इंजीनियर और एक ऑयल कंपनी मैनेजर की हत्या की थी.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, ज़ोलघद्र ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों में शामिल होने के कारण संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में थे. बाद में 18 अक्टूबर 2023 को उनका नाम इस सूची से हटा दिया गया.

उनकी पत्नी सदीघेह बेगम हेजाज़ी ने भी ईरान की सांस्कृतिक व्यवस्था में एक वरिष्ठ पद संभाला है, और उनके दामाद काज़ेम ग़रीबाबादी ने वियना में इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी में ईरान का प्रतिनिधित्व किया है. उनके परिवार का प्रभाव भी उसी सिस्टम की तरह है, जो आपस में जुड़ा हुआ, संस्थागत और काफी हद तक अस्पष्ट है.

अपने हाल के पद पर, वह एक्सपीडिएंसी काउंसिल के सचिव के रूप में काम कर रहे थे, जो एक सलाहकार संस्था है और जिसका काम ईरान की शासन व्यवस्था के भीतर विवादों को सुलझाना है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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