(प्रदीप्त तापदार)
कोलकाता, 24 मार्च (भाषा) पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनावों से पहले अल्पसंख्यक वोट बैंक के बदलते समीकरण, छोटे मुस्लिम संगठन, उत्तर बंगाल में कांग्रेस की सक्रियता तथा जनता की कई शिकायतें राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए अपनी सत्ता बचाये रखने में कठिन चुनौती बन सकते हैं।
लगभग 15 साल तक अल्पसंख्यक मतदाता तृणमूल की चुनावी ताकत का मुख्य आधार रहे हैं। अब लगभग 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक मतदाताओं को लुभाने की होड़ लगी हुई है, जो राज्य की 294 विधानसभा सीटों में से 114 से अधिक सीट के नतीजों को प्रभावित करते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के नेता नौशाद सिद्दीकी, तृणमूल के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर की पार्टी एजेयूपी का एआईएमआईएम के साथ गठबंधन और मुर्शिदाबाद व मालदा में कांग्रेस की फिर से सक्रियता ने बंगाल के अल्पसंख्यक चुनावी समीकरण में नई अनिश्चितता पैदा की है।
विशेषज्ञों ने कहा कि यह घटनाक्रम 2026 के विधानसभा चुनावों में काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, “पहले अल्पसंख्यक मतदाता लगभग सहज रूप से तृणमूल के पीछे खड़े रहते थे, मुख्य रूप से भाजपा के कारण। लेकिन नए दलों और स्थानीय शिकायतों के उभरने से छोटे स्तर पर हलचल पैदा हुई है, जो कड़े मुकाबले वाले चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है।”
उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण बंगाल के अन्य मुस्लिम बहुल जिलों में यह हलचल सबसे स्पष्ट है, जहां छोटे संगठन राजनीतिक प्रतिनिधित्व, अस्मिता और स्थानीय विकास के मुद्दों के इर्द-गिर्द समर्थन जुटाना शुरू कर चुके हैं।
साल 2021 के विधानसभा चुनावों में भंगर सीट जीतने वाला इंडियन सेक्युलर फ्रंट युवा मुस्लिम मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश कर रहा है जो मुख्यधारा की पार्टियों से निराश हैं। इसके इकलौते विधायक सिद्दीकी ने बार-बार तृणमूल और भाजपा पर अल्पसंख्यकों का चुनावी उपयोग करने का आरोप लगाया है।
उन्होंने कहा, “अल्पसंख्यकों को चुनाव के दौरान इस्तेमाल होने वाली ‘दूध देने वाली गाय’ की तरह माना जाता है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि तीन बार की तृणमूल सरकार ने वास्तविक विकास नहीं किया।
इसके अलावा तृणमूल नेतृत्व पर लगातार हमले के कारण पार्टी से निलंबित हुए मुर्शिदाबाद के कद्दावर नेता हुमायूं कबीर ने आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) की स्थापना की और अब एआईएमआईएम के साथ गठबंधन कर मुस्लिम मतदाताओं के लिए वैकल्पिक राजनीतिक मंच तैयार किया है।
कबीर का मानना है कि मुर्शिदाबाद में नई बाबरी मस्जिद के निर्माण का भावनात्मक मुद्दा और मुस्लिमों में बढ़ती राजनीतिक चेतना 2026 के विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सकती है।
उन्होंने कहा कि राज्य की अगली सरकार में स्वतंत्रता के बाद पहली बार मुस्लिम मुख्यमंत्री या मुस्लिम उपमुख्यमंत्री हो सकता है।
उन्होंने कहा, “बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए यदि 100 मुस्लिम वोटर मतदान करें, तो 80 वोट एजेयूपी के उम्मीदवारों को मिलेंगे।”
उन्होंने यह दावा भी किया कि उनकी पार्टी 182 सीट पर चुनाव लड़ेगी और खंडित जनादेश की सूरत में ‘किंगमेकर’ बन सकती है।
तृणमूल के पूर्व नेता ने यह भी कहा कि बंगाल में 30 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद मुसलमानों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला। उन्होंने कहा, “हमारी पार्टी में 100 से अधिक उम्मीदवार मुस्लिम होंगे। यह दिखाता है कि मुसलमानों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के प्रति कौन गंभीर है।”
कांग्रेस मालदा और मुर्शिदाबाद में अपने पारंपरिक गढ़ में फिर से सक्रिय होने का प्रयास कर रही है, जिन जिलों में तृणमूल के उभरने से पहले वह अल्पसंख्यक राजनीति में हावी थी।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में पार्टी का बेहतर प्रदर्शन यह दिखाता है कि अल्पसंख्यक मतदाता अपनी राजनीतिक पसंद पर फिर विचार कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, “2024 के लोकसभा चुनावों में वाम दलों के साथ चुनाव लड़ने पर मुर्शिदाबाद और मालदा में विपक्ष का मत प्रतिशत बढ़ा। हम 2023 में सागरदिगी उपचुनाव में तृणमूल को हरा भी चुके हैं।”
भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी बार-बार दावा कर चुके हैं कि इस बार अल्पसंख्यक वोट “बंट जाएगा।”
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मुसलमानों ने तृणमूल सरकार पर अपना भरोसा खो दिया है।
यह राजनीतिक हलचल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वजह से भी हुई है, क्योंकि इससे अल्पसंख्यक बहुल जिलों पर प्रभाव पड़ने की आशंका है। जिलास्तरीय आंकड़े बताते हैं कि मुर्शिदाबाद में 11 लाख से अधिक, मालदा में 8.28 लाख, उत्तर 24 परगना में 5.91 लाख और दक्षिण 24 परगना में 5.22 लाख मतदाता न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। ये जिले लगभग 100 विधानसभा सीटों का प्रतिनिधित्व करते हैं और ऐतिहासिक रूप से टीएमसी की चुनावी सफलता का आधार रहे हैं।
कोलकाता में एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, “एक तर्क यह है कि मतदाताओं के नाम हटने से तृणमूल को नुकसान हो सकता है, क्योंकि ये उसके गढ़ हैं। लेकिन दूसरी संभावना यह भी है कि जब मतदाता महसूस करते हैं कि उनकी नागरिकता पर सवाल उठ रहा है, तो वे अपनी सुरक्षा करने वाली पार्टी के पीछे और मजबूत होकर खड़े हो सकते हैं।”
संशोधित वक्फ़ कानून, ओबीसी आरक्षण के विवाद, मदरसा भर्ती और अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को लेकर विभिन्न विवाद चुनाव से पहले बार-बार चर्चा में रहे हैं।
ऑल बंगाल माइनॉरिटी यूथ फेडरेशन के महासचिव मोहम्मद कामरुज्जमां ने कहा, “जिन सीटों पर भाजपा अपेक्षाकृत कमजोर है, कुछ मतदाता छोटे मुस्लिम दलों, कांग्रेस या वाम की ओर जा सकते हैं। इससे विरोधी वोट बंट सकते हैं और तृणमूल के पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को कुछ क्षेत्रों में नुकसान पहुंच सकता है।”
हालांकि, सत्तारूढ़ पार्टी का विश्वास है कि अंततः अल्पसंख्यक मतदाता उसके साथ खड़े रहेंगे। राज्य के मंत्री फिरहाद हाकिम ने कहा, “अल्पसंख्यक जानते हैं कि केवल तृणमूल ने लगातार उनके हितों की रक्षा की है। आईएसएफ या एजेयूपी जैसी पार्टियां अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की मदद कर रही हैं। पिछले 15 वर्षों की तरह, अल्पसंख्यक तृणमूल के साथ खड़े रहेंगे।”
भाषा जोहेब माधव
माधव
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