उपभोक्ता संप्रभुता के अंतर्गत, चार वांछित तत्व प्रणाली के सुचारू संचालन के लिए अभिन्न अंग हैं. पहला, उपभोक्ताओं का समर्थन प्राप्त करने के लिए उद्यमी लागत कम करने और गुणवत्ता सुधारने का प्रयास करते हैं. उपभोक्ताओं की स्वीकृति और ऐसे प्रयासों की सराहना के साथ, संसाधनों के स्थानांतरण और तकनीकी प्रगति के माध्यम से, उच्च लागत और निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों को लगातार कम लागत और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा. और इससे उत्पादन में निरंतर वृद्धि होगी, और परिणामस्वरूप रोजगार, आय और जीवन स्तर में भी सुधार होगा.
दूसरा, उस आर्थिक व्यवस्था में जहां सभी का ध्यान उपभोक्ता की मांगों को पूरा करने पर केंद्रित होता है जो कि अत्यंत कठोर और मांगपूर्ण होती हैं — रोजगार का तीव्र विस्तार अंतर्निहित होता है. मौजूदा या बढ़ती मजदूरी दरों पर रोजगार का विस्तार निवेश का परिणाम नहीं है, जैसा कि भारतीय अनुभव से पता चला है. न ही यह वर्तमान में उपयोग में लाई जा रही उत्पादन तकनीक को कम करने का परिणाम है. यह केवल कुल उत्पादन के विस्तार का परिणाम होता है. चूंकि उपभोक्ता संप्रभुता राष्ट्रीय उत्पादन की तीव्र वृद्धि को प्रोत्साहित करती है, इसलिए यह समान तीव्रता से बेरोज़गारी को समाप्त कर सकती है.
इस अंतर्निहित रोजगार विस्तार की प्रवृत्ति को स्पष्ट करने के लिए: जापान में कम मजदूरी, भूमि पर जनसंख्या का भारी दबाव (291 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर) है. इस जनसंख्या दबाव के परिणामस्वरूप देश में औसत भूमि जोत केवल 1.01 हेक्टेयर है – पूंजी की कमी और उच्च लागत ने किसानों को कृषि में श्रम-प्रधान खेती के तरीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया. जापान का कृषि उत्पादन विश्व औसत से कहीं अधिक है. 1974 में जापान का प्रति हेक्टेयर धान उत्पादन 5.84 टन था, जबकि विश्व औसत 2.36 टन था. जापान में प्रति 1,000 हेक्टेयर खेती योग्य भूमि पर 2,031 श्रमिक कार्यरत हैं. इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका में पूंजी अपेक्षाकृत कम दुर्लभ है, औसत भूमि जोत 157.6 हेक्टेयर है, और जनसंख्या घनत्व मात्र 22 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है. इसलिए वहाँ पूँजी-प्रधान कृषि पद्धतियां अपनाई गईं, जहाँ प्रति 1,000 हेक्टेयर केवल 17 श्रमिक कार्यरत हैं.
ये भिन्न कृषि प्रणालियाँ किसी योजना आयोग के निर्देश पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र किसानों द्वारा मुक्त अर्थव्यवस्थाओं में अपनाई गईं, जहां आर्थिक दिशा मुख्यतः उपभोक्ताओं द्वारा निर्धारित होती है. इसके विपरीत, रूसी गोस्पलान ने कम मजदूरी के बावजूद, पूंजी-प्रधान खेती की अमेरिकी पद्धति की नकल की. जिसके परिणाम कुछ खास संतोषजनक नहीं रहे.
तीसरा, पूर्ण उपभोक्ता संप्रभुता के अंतर्गत उत्पादन, वितरण, आयात या निर्यात में एकाधिकार के लिए न तो आवश्यकता होती है और न ही स्थान. सभी व्यक्तियों की आय—मजदूरी, ब्याज, किराया और लाभ—राष्ट्रीय उत्पादन में उनके योगदान के अनुरूप होती है. ऐसी स्थिति में कोई आकस्मिक लाभ (windfall) संभव नहीं होता. इसलिए कोई भी व्यक्ति किसी अन्य की आय का अनुचित हरण नहीं कर सकता, अर्थात सामाजिक अन्याय की कोई संभावना नहीं रहती. इसके विपरीत, समाजवादी आर्थिक प्रणालियों में, जहां एकाधिकार, विशेषाधिकार और सब्सिडी प्रचुर मात्रा में होते हैं, सामाजिक अन्याय अपरिहार्य होता है. इससे कुछ विशेष व्यक्तियों और समूहों को बिना परिश्रम के तथा अनुचित आय प्राप्त होती है, जो समाज के शेष भाग की कीमत पर होती है.
चौथा, उपभोक्ता संप्रभुता के तहत आर्थिक विकास की प्रगति के साथ आय असमानता कम होने लगती है. ऐसा न केवल सामाजिक अन्याय की अनुपस्थिति के कारण होता है, बल्कि एक ओर ब्याज, किराया और लाभ (आर्थिक अभिजात वर्ग की आय) में स्वाभाविक गिरावट और दूसरी ओर मजदूरी और वेतन में स्वाभाविक वृद्धि के परिणामस्वरूप भी होता है. एक मुक्त अर्थव्यवस्था की प्रगति के साथ, राष्ट्रीय उत्पाद में मजदूरी और वेतन का अनुपात बढ़ने लगता है और ब्याज, किराया और लाभ का अनुपात घटने लगता है.
जापान में 1960 में मजदूरी और वेतन GDP का 41.3% थे, जो 1974 में बढ़कर 50.8% हो गए. पश्चिम जर्मनी में यह अनुपात 46.9% से बढ़कर 54.7% हो गया. इसके विपरीत, समाजवादी भारत में यह अनुपात एक सीमित दायरे में ही रहा और 1974-75 में 28.2% था, जो 1960-61 के 29.9% से भी कम था.
स्वतंत्र समाजों में आम जनता की बढ़ती समृद्धि का प्रमाण यह है कि आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा आम उपभोग की वस्तुओं के उत्पादन की ओर निर्देशित है और डिपार्टमेंटल स्टोर, सेफवे, शॉपिंग सेंटर और इन उत्पादों की आपूर्ति करने वाली अनगिनत खुदरा दुकानों की भरमार है. यदि ये उत्पाद उस समय उपलब्ध होते, तो 18वीं शताब्दी के रईसों और अभिजात वर्ग के लिए ईर्ष्या का विषय होते. इन स्थानों पर आने वाले खरीदार धनवान नहीं बल्कि खेतिहर और कारखाने के मजदूर और वेतनभोगी लोग हैं. साम्यवादी देशों को छोड़कर, कारें अब विलासिता का साधन नहीं रह गई हैं, जो केवल समाज के उच्च वर्ग के लिए ही सुलभ हों.
साम्यवादी समाज में मुक्त अर्थव्यवस्था के ये कोई भी आर्थिक घटक लागू नहीं होते. वहां राज्य ही उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं का निर्धारण करता है, वस्तुओं और सेवाओं का वितरण करता है, और संसाधनों का विभिन्न उपयोगों में आवंटन करता है. व्यक्तियों को मौलिक आर्थिक अधिकार प्राप्त नहीं होते. और अग्रिम बाजार (forward markets) अस्तित्व में नहीं होते.
यह लेख सेंटर फ़ॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इस लेख को ‘फोरम ऑफ फ्री एंटरप्राइज़’ से लिया गया है, जिसका प्रकाशन अगस्त 1977 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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