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Thursday, 26 March, 2026
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छत्तीसगढ़ : भर्ती परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए विधेयक पारित, सख्त सजा का प्रावधान

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रायपुर, 20 मार्च (भाषा) छत्तीसगढ़ विधानसभा ने भर्ती और व्यावसायिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम के लिए ‘छत्तीसगढ़ (लोक भर्ती एवं व्यावसायिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक-2026’ को शुक्रवार को सर्वसम्मति से पारित कर दिया।

सदन में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने विधेयक पेश किया, जिस पर चर्चा के बाद इसे मंजूरी दी गई। चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि पिछली सरकार के समय भर्ती प्रक्रियाओं में अनियमितताओं से युवाओं के सपनों को ठेस पहुंची।

उन्होंने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग से जुड़ी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों का भी उल्लेख किया और कहा कि ऐसे मामलों की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा की जा रही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कानून “परीक्षा माफिया” के खिलाफ सख्त संदेश है और इसमें शामिल किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।

साय ने कहा, “यह केवल अपराधियों को सजा देने का कानून नहीं, बल्कि युवाओं का भविष्य सुरक्षित करने का प्रयास है।”

विपक्ष के नेता चरण दास महंत ने भी विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि नकल और संगठित गड़बड़ियों में शामिल लोगों के खिलाफ कड़े प्रावधान आवश्यक हैं। हालांकि, उन्होंने सरकार द्वारा बार-बार पिछली सरकार पर आरोप लगाने की आलोचना करते हुए कहा कि अब ध्यान बेहतर शासन पर होना चाहिए।

विधेयक के उद्देश्यों में लोक परीक्षाओं में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना बताया गया है, ताकि अभ्यर्थियों का विश्वास बना रहे और उनके प्रयासों को उचित सम्मान मिल सके। साथ ही, यह कानून अनुचित साधनों के जरिए लाभ कमाने वाले व्यक्तियों और संगठित गिरोहों पर अंकुश लगाने के लिए व्यापक कानूनी ढांचा प्रदान करता है।

विधेयक के अनुसार, किसी भी लोक परीक्षा में अनुचित साधनों का उपयोग पूर्णतः प्रतिबंधित होगा। इसके अलावा, ऐसे कृत्यों के लिए साजिश या मिलीभगत भी दंडनीय होगी। परीक्षा प्रक्रिया में बाधा डालने के उद्देश्य से अनधिकृत व्यक्तियों का परीक्षा केंद्र में प्रवेश भी वर्जित रहेगा।

विधेयक में अभ्यर्थियों के लिए भी सख्त प्रावधान किए गए हैं। यदि कोई अभ्यर्थी दोषी पाया जाता है, तो उसका परिणाम रोका जाएगा और उसे न्यूनतम एक वर्ष से लेकर अधिकतम तीन वर्षों तक परीक्षा में बैठने से प्रतिबंधित किया जा सकता है।

अन्य दोषियों के लिए तीन से 10 वर्ष तक की सजा और 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। यदि किसी सेवा प्रदाता या संस्था की संलिप्तता पाई जाती है, तो उस पर एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है और उसे कम से कम तीन वर्ष तक परीक्षा संचालन से प्रतिबंधित किया जाएगा। साथ ही, संबंधित अधिकारियों या प्रबंधन की सहमति से अपराध सिद्ध होने पर उन्हें भी तीन से 10 वर्ष तक की सजा और एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।

विधेयक में यह भी प्रावधान है कि ऐसे मामलों की जांच उप पुलिस निरीक्षक (सब-इंस्पेक्टर) से कम रैंक के अधिकारी द्वारा नहीं की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर राज्य सरकार जांच किसी केंद्रीय या राज्य एजेंसी को भी सौंप सकती है।

भाषा

संजीव रवि कांत

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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