नई दिल्ली: सोशल मीडिया के जरिए मामले को “संवेदनशील” बनाने पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने शुक्रवार को जिम मालिक दीपक कुमार की उस याचिका का निपटारा कर दिया, जिसमें उन्होंने 26 जनवरी को कोटद्वार में दक्षिणपंथी समूहों के साथ हुई भिड़ंत के मामले में एफआईआर दर्ज करने और कथित मौत की धमकियों के कारण पुलिस सुरक्षा देने की मांग की थी.
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस राकेश थपलियाल ने पुलिस को जांच आगे बढ़ाने की अनुमति दी और कहा, “याचिकाकर्ताओं को भी जांच में सहयोग करने और सोशल मीडिया पर शामिल न होने का निर्देश दिया जाता है.”
कुमार का नाम दूसरी तरफ से दर्ज एफआईआर में भी आरोपी के रूप में है. इसी वजह से हाईकोर्ट ने गुरुवार को उनकी याचिका की वैधता पर सवाल उठाया था और पूछा था कि एक आरोपी पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है.
शुक्रवार को सुनवाई जारी रखते हुए जस्टिस थपलियाल ने कहा, “याचिकाकर्ता को एफआईआर को चुनौती देने का अधिकार है, लेकिन जैसा कि राज्य ने बताया है, सभी अपराधों में सजा सात साल से कम है, इसलिए जांच एजेंसी पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन करने की कानूनी जिम्मेदारी है.”
उन्होंने आगे कहा, “याचिकाकर्ताओं को इस घटना से जुड़ा कोई संदेश या वीडियो भेजकर इसमें शामिल नहीं होना चाहिए. निष्पक्ष जांच के लिए यह जरूरी है. अगर कोई सोशल मीडिया पर संदेश और वीडियो भेजता है, तो इससे निश्चित रूप से जांच प्रभावित होगी…वह इस देश का नागरिक है और उसे कानून का पालन करना चाहिए. भारत का नागरिक होने के नाते उसे यह उम्मीद और विश्वास रखते हुए जांच में सहयोग करना चाहिए कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से होगी.”
कुमार के वकील नवनीश नेगी ने इस पर आपत्ति जताई और दलील दी कि “हर कोई सोशल मीडिया पर है” और कुमार ने सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बिगाड़ने वाला कुछ पोस्ट नहीं किया.
यह मामला इस साल 26 जनवरी का है, जब कुमार ने एक बुजुर्ग मुस्लिम व्यक्ति को उसके दुकान के नाम में “बाबा” शब्द होने पर परेशान कर रहे दक्षिणपंथी समूह का सामना किया था. दीपक बीच में आए और खुद को ‘मोहम्मद’ दीपक बताया. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है.
वीडियो वायरल होने के बाद से कुमार का जिम बंद है और उनके परिवार व दोस्तों को कथित तौर पर मौत की धमकियां मिल रही हैं. उनके खिलाफ दंगा, चोट पहुंचाने और शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करने के आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई है.
अदालत में कार्यवाही
नेगी ने शुक्रवार को अदालत से कहा कि घटना वाले दिन दक्षिणपंथी कार्यकर्ता हरिद्वार समेत कई जगहों से आए थे और उन्हें उनके फेसबुक अकाउंट से पहचाना गया है. लेकिन पुलिस ने अब तक उनके खिलाफ FIR दर्ज नहीं की है.
हालांकि, अदालत ने कहा कि पुलिस पर जनता का भरोसा होना चाहिए और कहा, “जब भी ऐसी घटनाएं हुई हैं, पुलिस की पहली भूमिका कानून-व्यवस्था बनाए रखना होती है.”
जज ने पुलिस पर सवाल उठाने को लेकर वकील को भी फटकार लगाई. उन्होंने मौखिक रूप से कहा, “इसे संवेदनशील मत बनाइए, मैं आपको सोशल मीडिया को कोई बयान देने से रोक दूंगा.”
इस पर नेगी ने कहा, “हम करें तो दिक्कत, और कोई करे तो ओके?,” उनका इशारा दक्षिणपंथी समूहों के सदस्यों की सोशल मीडिया पोस्ट की तरफ था.
इसके बाद जज ने कहा, “किसी को भी सोशल मीडिया को कोई बयान देने की अनुमति नहीं है.”
नेगी ने यह मानते हुए कि उनके मुवक्किल ने सोशल मीडिया पोस्ट किए थे, सरकारी वकील से कहा कि वह कोई भी ऐसी पोस्ट दिखाएं जिससे कानून-व्यवस्था बनाए रखने में बाधा आई हो.
कुमार की याचिका का निपटारा करते हुए अदालत ने कहा कि “राज्य के वकील ने याचिकाकर्ता की मांगी गई राहतों पर गंभीर आपत्ति जताई है, यह कहते हुए कि इस चरण पर ये पूरी तरह अनुचित हैं, जब याचिकाकर्ता खुद एफआईआर में आरोपी है,” और कुमार के खिलाफ दर्ज अपराधों में सात साल तक की सजा है.
जज ने कहा, “अदालत की राय में मांगी गई राहतें मामले को संवेदनशील बनाने और एफआईआर की जारी जांच को विफल करने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं हैं.”
अदालत ने कुमार के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से भी इनकार कर दिया और जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि “याचिकाकर्ता को पुलिस पर उम्मीद और भरोसा रखते हुए जांच में सहयोग करना होगा.”
इसके बाद जस्टिस थपलियाल ने यह भी कहा कि पुलिस पर काम का बहुत ज्यादा बोझ है.
उन्होंने कहा, “एक आईओ (जांच अधिकारी) को 50 जांचों का ध्यान रखना पड़ता है…पुलिस को दोष देना बहुत आसान है, लेकिन उनकी दिक्कत भी देखिए” और कुमार से कहा कि वे “कानून को अपने हाथ में न लें” और पुलिस जांच में सहयोग करें.
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