पुणे: पहले एक धीमी रफ्तार वाले शहर के रूप में पहचाना जाने वाला पुणे, जहां दोपहर में दुकानें थोड़ी देर के लिए बंद हो जाती थीं, अब बदलता हुआ दिख रहा है. इसकी सड़कें और तंग गलियां अब पूरे दिन गुलज़ार रहती हैं—कोचिंग सेंटरों के बाहर लाइन में खड़े किशोर, कंधों पर बैग, हाथ में कॉपी और कॉफी के कप लिए आसानी से दिख जाते हैं.
सुबह की क्लास खत्म होने के कुछ घंटों बाद ही शाम की लेक्चर के लिए दूसरा ग्रुप पहुंच जाता है. वहीं आसपास के हॉस्टल और पीजी में रहने वाले स्टूडेंट्स अगली सुबह के टेस्ट के लिए फॉर्मूले दोहराते हुए नज़र आते हैं.
पिछले एक दशक में, “ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईस्ट” के नाम से पहचाना जाने वाला यह शहर चुपचाप भारत के सबसे तेज़ी से बढ़ते प्राइवेट कोचिंग हब में बदल गया है. यहां ऐसे संस्थान हैं, जो स्टूडेंट्स को जॉइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (JEE) और नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET) की तैयारी कराते हैं, जो क्रमशः इंजीनियरिंग और मेडिकल अंडरग्रेजुएट कोर्स में दाखिले के लिए होते हैं.
पुणे, संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) और महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) की तैयारी के लिए भी लोकप्रिय हो गया है.
पुणे के लंबे शैक्षणिक इतिहास, बड़ी छात्र आबादी और दिल्ली व कोटा (राजस्थान) जैसे पारंपरिक कोचिंग हब की तुलना में अपेक्षाकृत सस्ते रहने के खर्च से आकर्षित होकर, बड़े राष्ट्रीय संस्थानों के साथ-साथ स्थानीय कोचिंग सेंटरों ने भी शहर में तेज़ी से विस्तार किया है.

हालांकि, यह कोचिंग हब अभी भी दिल्ली और कोटा जैसा नहीं बना है क्योंकि पुणे में पढ़ने वाले ज्यादातर स्टूडेंट्स लोकल हैं या महाराष्ट्र के अंदरूनी इलाकों से आते हैं, न कि दूसरे राज्यों से. इसके अलावा, पुणे के कुछ चुनिंदा कोचिंग सेंटरों में ही टॉप फैकल्टी बाहर से आती है, जबकि बाकी जगहों पर अधिकतर स्थानीय या क्षेत्रीय शिक्षक हैं.
दिप्रिंट से बात करते हुए, पुणे के सदाशिव पेठ में एक कोचिंग सेंटर के संस्थापक, जिन्होंने नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त रखी, मानते हैं कि शहर में युवाओं की भरमार होने के बावजूद यह अभी कोटा या दिल्ली जैसी कोचिंग अर्थव्यवस्था के करीब नहीं पहुंचा है.

उन्होंने कहा, “पुणे में पढ़ने आने वाले छात्र अभी भी स्थानीय ही हैं. महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ इलाकों से यहां पढ़ने के लिए कई छात्र आते हैं, लेकिन दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में छात्र नहीं आते. दिल्ली और कोटा जैसे शहर अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रहे हैं और आज भी उसी प्रतिष्ठा पर टिके हुए हैं.”
उन्होंने यह भी कहा कि “पुणे में सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी ज्यादा से ज्यादा छात्रों को आकर्षित करने की क्षमता है, लेकिन अभी वह स्थिति नहीं आई है.”
पुणे की शिक्षा यात्रा
2000 के शुरुआती वर्षों में कुछ स्थानीय ट्यूटोरियल्स से शुरू हुई यह कहानी अब एक बड़े तंत्र का रूप ले चुकी है. इसमें कोचिंग कैंपस, इंटीग्रेटेड स्कूल प्रोग्राम, टेस्ट-सीरीज़ सेंटर, लाइब्रेरी और छात्र हॉस्टल शामिल हैं. इसने पुणे के शिक्षा परिदृश्य को बदल दिया है और शहर के कुछ हिस्सों को पूरी तरह परीक्षा-तैयारी वाले इलाकों में बदल दिया है.
सदाशिव पेठ, शिवाजीनगर, फर्ग्यूसन कॉलेज रोड, स्वारगेट, बानेर, औंध और पिंपरी-चिंचवड जैसे इलाकों में छोटे-बड़े कोचिंग कैंपस, स्टडी हॉस्टल और टेस्ट तैयारी केंद्र अब शहर के दृश्य का अहम हिस्सा बन चुके हैं.

एजुकेशन हब के रूप में पुणे की पहचान 19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत से जुड़ी है, जब शहर में कई प्रमुख संस्थान स्थापित हुए. इनमें सबसे प्रभावशाली संस्थानों में से एक सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना 1949 में हुई थी और जो आगे चलकर भारत के प्रमुख उच्च शिक्षा केंद्रों में शामिल हो गया.
इसके साथ ही फर्ग्यूसन कॉलेज, सर परशुरामभाऊ (SP) कॉलेज और मॉडर्न कॉलेज जैसे संस्थानों ने शैक्षणिक उत्कृष्टता की पहचान बनाई और महाराष्ट्र तथा दूसरे राज्यों से छात्रों को आकर्षित किया. समय के साथ कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग पुणे, फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सिम्बायोसिस के कई संस्थानों की मौजूदगी ने शहर के शिक्षा तंत्र को और मजबूत किया.
भारत की कोचिंग अर्थव्यवस्था की एक अहम ताकत बन चुके पुणे में अब बकलीवाल ट्यूटोरियल्स, प्राइम एकेडमी और चाणक्य मंडल परिवार जैसे स्थानीय संस्थान तेजी से फैल चुके हैं. वहीं, Allen Career Institute, Aakash Institute और Vision IAS जैसी राष्ट्रीय श्रृंखलाओं ने भी पिछले एक दशक में शहर में अपनी मजबूत मौजूदगी बना ली है.

चाणक्य मंडल परिवार में छात्र परामर्शदाता स्वरदा ओक के मुताबिक, पुणे की कोचिंग क्लासों में अलग-अलग इलाकों से आए छात्रों की बड़ी मौजूदगी दिखती है. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “हमारे यहां करीब 80 से 90 प्रतिशत छात्र पुणे के बाहर से आते हैं.”
इनमें से कई छात्र महाराष्ट्र के छोटे शहरों से आते हैं, जो शहर की पहचान और पहुंच की सुविधा से आकर्षित होते हैं. रेल और बस मार्गों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ और हॉस्टल व पीजी से भरा पुणे एक बीच का रास्ता देता है—इतना पास कि परिवार बार-बार आ सकें, और इतना दूर कि छात्र अपनी तैयारी पर ध्यान दे सकें.
इसी मेल ने शहर की पहचान बदलने में मदद की है.
जो पुणे कभी एक आरामदायक रिटायरमेंट शहर और विश्वविद्यालय नगर माना जाता था, वही आज एक कई परतों वाली शिक्षा अर्थव्यवस्था की तरह काम करता है, जहां विश्वविद्यालय, कोचिंग सेंटर, हॉस्टल और लाइब्रेरी साथ-साथ चलते हैं और पूरे इलाकों की रोजमर्रा की रफ्तार तय करते हैं.
और जैसे-जैसे भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की संस्कृति बढ़ती जा रही है, इस पूरे ढांचे में पुणे की भूमिका भी आगे और बढ़ने की संभावना है और इससे उसकी पहचान उस नाम से और मजबूत होगी, जिसे अब कई छात्र आम बोलचाल में “पश्चिम का कोटा” कहने लगे हैं.
पुणे क्यों काम करता है
कई स्टूडेंट्स के लिए पुणे एक ऐसा संतुलन देता है, जो पारंपरिक कोचिंग शहर न तो देते हैं और न दे सकते हैं.
शिवाजीनगर में एक कोचिंग संस्थान की दूसरी मंजिल पर बने ठंडे क्लासरूम में 23 साल का रोहन, जो Vision IAS में सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे हैं, अपनी शाम की क्लास शुरू होने का इंतज़ार करते हैं. सांगली जिले से आने वाले रोहन का दिन लेक्चर हॉल भरने से बहुत पहले शुरू हो जाता है.
उन्होंने कहा, “मेरा दिन सुबह 4 बजे रिविजन से शुरू होता है. फिर मैं दोपहर के खाने तक पढ़ाई करता हूं. क्लास दोपहर 3 बजे से रात 8 बजे तक चलती है.”
रोहन से उम्मीद थी कि वह आगे चलकर अपने परिवार का बिजनेस संभाल लेंगे, लेकिन उन्होंने सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी करने का फैसला किया. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मेरे माता-पिता इस बात से ठीक थे कि मैं फैमिली बिजनेस से जुड़ जाऊं, लेकिन मैं कुछ ऐसा करना चाहता था, जिसका ज्यादा असर हो. इसलिए मैंने UPSC चुना.”
उनकी पहली योजना दिल्ली जाने की थी, जो सिविल सर्विसेज कोचिंग का देश का सबसे मशहूर हब है, लेकिन उनके पिता की गिरती सेहत की वजह से यह मुश्किल हो गया.
उन्होंने कहा, “पुणे एक बेहतर समझौता था. इमरजेंसी में यह घर के ज्यादा करीब है, लेकिन यहां बहुत अच्छे कोचिंग संस्थान भी हैं.”
अब वह अपनी क्लास से करीब 8 किलोमीटर दूर एक पेइंग गेस्ट (PG) में रहते हैं. इतना पास कि लंबा सफर न करना पड़े और इतना दूर कि घर से अलग रहकर पढ़ाई पर ध्यान बना रहे. तैयारी करने वाले छात्रों में इस तरह का हिसाब अब तेज़ी से आम होता जा रहा है.

इंदौर की 17 साल की प्रिया राय, जिन्होंने पुणे के सदाशिव पेठ में IQRA IAS चुना, उनके लिए यह शहर सिर्फ सुरक्षित विकल्प ही नहीं, बल्कि एक समझदारी भरा विकल्प भी है. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मैंने अपने पिता से कहा कि मैं IAS अधिकारी बनना चाहती हूं और वह बहुत खुश हुए. दिल्ली शुरू से ही नामंजूर थी, सिर्फ उनके लिए नहीं बल्कि मेरे लिए भी.”
दिल्ली लंबे समय से UPSC की तैयारी करने वालों का बड़ा हब रही है, लेकिन वहां सुरक्षा को लेकर चिंता कई लोग जताते रहे हैं. अब बढ़ते प्रदूषण की समस्या के कारण भी छात्र बेहतर विकल्प तलाशने का फैसला सोच-समझकर कर रहे हैं.
प्रिया की मां अंजलि ने दिप्रिंट से कहा, “उसके पिता के लिए दिल्ली में सुरक्षा एक बड़ी चिंता थी, लेकिन उसने खुद भी पुणे चुना क्योंकि राजधानी की हवा इतनी खराब है कि वह वहां जाकर वह ठीक से महसूस नहीं कर रही थी. हमारे लिए और उसके लिए पुणे सबसे अच्छा विकल्प था.”
कोचिंग की अर्थव्यवस्था
महाराष्ट्र के छोटे शहरों से आने वाले कई छात्रों के लिए, दिल्ली जैसे शहरों के मुकाबले पुणे का सस्ता होना भी एक बड़ी वजह है.
शुभम राउत, जो अब प्रोफेसर हैं और 2013 में पहली बार UPSC परीक्षा की तैयारी के लिए पुणे आए थे, ने कहा कि उन्होंने भी यही हिसाब लगाया था.
उन्होंने कहा, “यह फैसला दो बातों पर आधारित था. पहली थी व्यवहारिकता. पुणे मेरे लिए बिल्कुल नया शहर नहीं था. और दूसरी थी खर्च. यह सस्ता था.”
उन्होंने याद किया कि उस समय उनकी क्लास के कई छात्र भी राज्य के छोटे शहरों से आए थे.
उन्होंने आगे कहा, “मेरे UPSC के ज्यादातर सहपाठी पुणे के बाहर से थे—मराठवाड़ा, विदर्भ, नागपुर, अहमदनगर. हममें से कई यहां अंडरग्रेजुएट कॉलेज में दाखिला लेकर साथ-साथ परीक्षा की तैयारी भी कर रहे थे.”
मध्यम वर्गीय परिवारों के छात्रों के लिए यह सस्ता होना बहुत मायने रखता है. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “क्योंकि पुणे तुलनात्मक रूप से सस्ता है, इसलिए यहां सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए ज्यादा गुंजाइश है.” उन्होंने आगे कहा, “खासकर उन लोगों के लिए, जो मिडिल क्लास पृष्ठभूमि से आते हैं.”
उन्होंने कहा कि यह शहर खास तौर पर महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) परीक्षा की तैयारी करने वालों के लिए बहुत आकर्षक है. “पहले UPSC की तैयारी करने वाले लोग सीधे दिल्ली जाते थे, लेकिन अब दिल्ली के बड़े सिविल सर्विसेज संस्थानों ने भी पुणे में अपनी शाखाएं खोल ली हैं.”
शहर में कई संस्थानों के कई सेंटर हैं. सदाशिव पेठ, फर्ग्यूसन कॉलेज रोड, स्वारगेट, शिवाजीनगर और पिंपरी-चिंचवड छात्रों के बड़े केंद्र बन चुके हैं, जहां इन सड़कों पर एक के बाद एक कोचिंग सेंटर दिखाई देते हैं.

ये कोई आलीशान इमारतों में बने बड़े क्लासरूम नहीं हैं. इनमें से कुछ पुराने भवनों में हैं, जिन तक पहुंचने के लिए पतली और लंबी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. वहां ऐसे सेंटर हैं जो बहुत कम जगह में बने हैं और जिनके क्लासरूम में 30 से ज्यादा छात्र मुश्किल से बैठ पाते हैं.
कोचिंग फीस देशभर में लगभग एक जैसी रहती है. फर्क पुणे में रहने के खर्च से पड़ता है.
Vision IAS की सालाना फीस जनरल स्टडीज के लिए 1,30,000 रुपये है, जबकि IQRA IAS उसी के लिए 75,000 रुपये लेता है. Bakliwal Tutorials, क्लास 11 के छात्रों के लिए JEE की विशेष कोचिंग देता है, जिसकी दो साल की फीस आमतौर पर 3,65,000 रुपये से 3,85,000 रुपये के बीच है. ऑनलाइन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, Allen Career Institute कक्षा 12 के छात्रों के लिए एक साल की JEE Mains कोचिंग के लिए 1 लाख रुपये लेता है, जबकि दो साल की कोचिंग के लिए 1,20,000 रुपये प्रति वर्ष लेता है.
पुणे में पेइंग गेस्ट के रूप में रहने का खर्च जगह और सुविधाओं के हिसाब से 5,000 रुपये से 20,000 रुपये तक होता है. छात्रों ने बताया कि डबल और ट्रिपल शेयरिंग कमरे सस्ते होते हैं, जिनका किराया 5,000 रुपये से 12,000 रुपये के बीच रहता है, जबकि सिंगल रूम का किराया 15,000 रुपये से 20,000 रुपये के बीच होता है.
पुणे के सदाशिव सेठ में सरस्वती सदन नामक गर्ल्स हॉस्टल की एक केयरटेकर ने दिप्रिंट से कहा, “हॉस्टल का किराया ज्यादा से ज्यादा 2,000 रुपये महीना है और टिफिन का दाम तय है—दोपहर और रात के खाने के लिए 2,000 रुपये.”

दूसरी ओर, दिल्ली में रहने और दूसरे खर्चों के मामले में लागत ज्यादा है.
कोलकाता के रिजू चंदा, जो इस समय दिल्ली में पढ़ाई कर रहे हैं, उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “एक ठीक-ठाक सिंगल रूम, जिसमें सिंगल बेड, टेबल, बाथरूम, अलमारी और दिन में तीन बार खाने की सुविधा हो, उसका खर्च 18,000 रुपये से 20,000 रुपये तक होता है और यह 22,000 रुपये तक भी जा सकता है. डबल शेयरिंग के लिए एक अच्छे पीजी में, जहां दिन में तीन बार खाना, बेड, अलमारी और बाथरूम हो, प्रति व्यक्ति 15,000 रुपये से 17,000 रुपये तक लगते हैं. ट्रिपल शेयरिंग में यही सुविधाएं 11,000 रुपये से 12,000 रुपये प्रति व्यक्ति में मिलती हैं.”
उन्होंने कहा, “लड़कियों के लिए पीजी थोड़ा महंगा होता है, जिसकी लागत 4,000 रुपये से 5,000 रुपये ज्यादा होती है, क्योंकि वे बेहतर तरीके से रखे जाते हैं, वहां सुरक्षा होती है और खाना भी बेहतर होता है. ज्यादातर लड़कियां पूरे कॉलेज और कोचिंग के दौरान PG में ही रहती हैं. लड़के, पहला साल पूरा करने के बाद या दिल्ली में रह चुके होने पर, दोस्तों के साथ फ्लैट में शिफ्ट हो जाते हैं. फ्लैट में प्रति व्यक्ति खर्च 8,000 रुपये से 10,000 रुपये तक आ जाता है.”
दिल्ली में टिफिन की कीमतें दिन में दो बार खाने के लिए 1,700 रुपये से 2,500 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति महीने तक हैं.
छात्रों के लिए बना शहर
पुणे की तरफ छात्रों की बढ़ती भीड़ को शहर के लंबे शैक्षणिक इतिहास ने भी सहारा दिया है. यहां बड़े शैक्षणिक संस्थानों की मौजूदगी ने छात्रों की घनी आबादी बनाई है और शहर का ढांचा भी पढ़ाई-केंद्रित जीवन के हिसाब से तैयार हुआ है.
Vision IAS में प्रशासक योगेश कुलावड़े ने कहा, “पुणे हे शिक्षणाचं माहेरघर आहे! (पुणे शिक्षा का मायका है)”. उन्होंने मराठी में शहर की पहचान को इसी तरह बताया.
FC रोड पर लगा बोर्ड, जिस पर लिखा है ‘Adviteeye Pune’ यानी ‘अनोखा पुणे’ | फोटो: कस्तूरी वालिंबे/दिप्रिंट
शहर में आने वाले छात्र अक्सर पहले से ही यही छवि लेकर आते हैं.
महाराष्ट्र के अहमदनगर शहर से 20 साल के UPSC अभ्यर्थी यश, जिसने पिछले साल Vision IAS जॉइन किया, ने दिप्रिंट से कहा कि उन्होंने किसी दूसरे शहर के बारे में गंभीरता से सोचा ही नहीं.
उन्होंने कहा, “पुणे तो पढ़ाई के लिए मशहूर है ही. हर कोई यहां पढ़ने आता है. पुणे चुनने को लेकर मुझे कोई शक नहीं था.”
यश सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ Bachelor of Science की डिग्री भी कर रहे हैं, लेकिन व्यवहार में, उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर कोचिंग का शेड्यूल ही हावी रहता है.
उन्होंने माना, “मैं हर दिन कॉलेज नहीं जाता. अटेंडेंस ज्यादातर सिर्फ परीक्षा के लिए होती है. मेरा पूरा दिन कोचिंग संस्थान में ही निकल जाता है.” उन्होंने कहा कि उनके कुछ सहपाठी अलग शेड्यूल अपनाते हैं.
“पुणे के छात्र सुबह कॉलेज जाते हैं और शाम की क्लास के लिए यहां आते हैं.”
यही लचीलापन, जो शहर में कॉलेजों और कोचिंग सेंटरों के घने नेटवर्क से संभव हुआ है—पुणे के शिक्षा तंत्र की एक बड़ी पहचान बन गया है.
सदाशिव पेठ में Vision IAS के एक दूसरे प्रशासक ने थोड़ी अलग राय रखी. उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि पहले पुणे महाराष्ट्र के स्थानीय छात्रों की पहली पसंद था, लेकिन अब यह स्थिति बदल गई है.
उन्होंने कहा, “अब हमारे पास महाराष्ट्र के दूर-दराज इलाकों से बहुत कम छात्र आते हैं क्योंकि हम एक स्थापित संस्था हैं, हमारी फीस ज्यादा है, जिससे खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है. अब हमारे सेंटर नासिक, नागपुर, संभाजी नगर, अहिल्यानगर आदि में भी हैं, इसलिए छात्रों को ज़रूरी नहीं कि वे यहां तक आएं.”
ऑनलाइन लेक्चर और टेस्ट सीरीज़ आने के बाद छात्रों को घर छोड़कर बाहर जाने और यात्रा, खाने-पीने व रहने पर अतिरिक्त खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती. इससे उनकी ज़िंदगी आसान हुई है.
Vision IAS के प्रशासक ने कहा, “Covid-19 महामारी के दौरान कोचिंग सेंटर के कारोबार को बड़ा झटका लगा था. उस समय एकमात्र रास्ता पूरी तरह ऑनलाइन जाना था, जिसके अपने अलग मसले थे. अब ऑनलाइन पढ़ाई उन छात्रों के लिए ज्यादा सुविधाजनक विकल्प बन गई है, जो कॉलेज और कोचिंग दोनों संभालते हैं. गांवों में रहने वाले कई छात्र, जिनके पास यात्रा करने के साधन नहीं हैं, अब अपने घर से आराम से लेक्चर अटेंड करते हैं.”
नया इंटीग्रेटेड सिस्टम
कई मामलों में, कोचिंग संस्थान सीधे स्कूलों और जूनियर कॉलेजों के साथ काम करते हैं.
Bakliwal Tutorials जैसे संस्थान स्कूलों के साथ साझेदारी में इंटीग्रेटेड प्रोग्राम चलाते हैं. छात्र औपचारिक रूप से अपने स्कूल में नामांकित रहते हैं, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ज़रूरी विषय कोचिंग फैकल्टी पढ़ाती है. इस मॉडल से स्कूल और कोचिंग के बीच आने-जाने की ज़रूरत खत्म हो जाती है और दोनों सिस्टम एक ही शेड्यूल में सिमट जाते हैं.
लेकिन इसके साथ-साथ एक और सिस्टम भी चुपचाप चल रहा है. कुछ मामलों में छात्र आधिकारिक रूप से कॉलेज में नामांकित रहते हैं, लेकिन नियमित क्लास में बहुत कम जाते हैं. छात्रों के बीच इसे “डमी कॉलेज” सिस्टम के नाम से जाना जाता है.
हालांकि, महाराष्ट्र में यह कानूनी नहीं है, लेकिन कहा जाता है कि डमी कॉलेज 11वीं और 12वीं के छात्रों का दाखिला तो कर लेते हैं, पर उनसे क्लास में आने की मांग नहीं करते. इससे छात्र JEE और NEET जैसी प्रतियोगी प्रवेश परीक्षाओं की फुल-टाइम तैयारी कर पाते हैं.
नाम न बताने की शर्त पर Prime Academy में JEE की तैयारी कर रहे 12वीं के एक छात्र ने बताया कि उनका शेड्यूल कैसे चलता है.
उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “मैं अपने रेगुलर स्कूल सिर्फ प्रैक्टिकल और फॉर्म भरने के लिए जाता हूं.” उनके माता-पिता पुणे के IT सेक्टर में काम करते हैं.
उन्होंने कहा, “मैं सुबह 6 बजे बस लेकर कोचिंग संस्थान जाता हूं. क्लास के बाद मैं और मेरे बैचमेट वहीं साथ में पढ़ते हैं. संस्थान में शांत लाइब्रेरी जैसा माहौल होता है.” उन्होंने यह भी कहा कि “रूटीन बहुत कड़ा है, लेकिन व्यवस्थित है.”
कोचिंग का मानवीय पक्ष
प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े दबाव के बावजूद, कुछ छात्रों का कहना है कि पुणे का कोचिंग माहौल, कोटा से जुड़ी सख्त छवि की तुलना में कम कठोर लगता है.

Allen Career Institute में पढ़ रही एक NEET एस्पिरेंट ने दिप्रिंट से कहा, “यहां हमारे शिक्षक हमसे हालचाल लेते रहते हैं. हाल ही में हमारा एक मेडिटेशन सेशन भी हुआ था. अगर कोई पीछे रह रहा हो या उदास महसूस कर रहा हो, तो वह शिक्षकों से बात कर सकता है. जरूरी नहीं कि बात सिर्फ पढ़ाई की हो, घर की परेशानियों की भी हो सकती है.”
उन्होंने कहा कि संस्थान काउंसलिंग सेवाएं और मोटिवेशनल सेशन भी देता है. मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कई साल तक चल सकती है. उन्होंने कहा, “आमतौर पर आप NEET की तैयारी एक साल से ज्यादा करते हैं. अगर पहली बार में नहीं निकलता, तो फिर दोबारा कोशिश करते हैं. इसलिए लोगों को अक्सर हौसला बढ़ाने की जरूरत पड़ती है.”
लेकिन यह सिस्टम दबाव से पूरी तरह खाली भी नहीं है. उसके बैच को दो समूहों में बांटा गया है. उन्होंने कहा, “हमारे यहां दो डिवीजन हैं, एक टॉपर्स के लिए और एक फॉलोअर्स के लिए. पढ़ाए जाने वाले कंटेंट की मात्रा और गहराई में काफी अंतर होता है.”
उनके पिता ने कहा कि इस सिस्टम के फायदे भी हैं और नुकसान भी.
उन्होंने कहा, “यह अच्छे अंक लाने वाले छात्रों को उनकी पूरी क्षमता तक पहुंचने के लिए प्रेरित करता है, लेकिन इससे यह खतरा भी बनता है कि दूसरे छात्रों को नजरअंदाज कर दिया जाए.”
उनका मानना है कि कोचिंग संस्थान कभी-कभी छात्रों की अलग-अलग क्षमताओं के अनुसार खुद को ढालने में कठिनाई महसूस करते हैं. उन्होंने कहा, “सभी छात्र अलग होते हैं. हमारे हाथ की पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं होतीं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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