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Thursday, 19 March, 2026
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राजस्थान में 960 करोड़ रुपये का जल जीवन मिशन घोटाला कैसे हुआ

राजस्थान के सचिवालय से लेकर हाई कोर्ट के गलियारों तक, दिप्रिंट ने उस मामले की पड़ताल की है, जिसने कांग्रेस नेता महेश जोशी, अब रिटायर हो चुके एक शीर्ष नौकरशाह और कई अन्य लोगों को कटघरे में खड़ा कर दिया है.

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जयपुर: जयपुर के पॉश सी-स्कीम इलाके के बीचों-बीच एक सफेद और हरे रंग का बंगला है. यह मैन रोड पर है, लेकिन दिखता नहीं है. यहां कोई नेमप्लेट नहीं है. चारों तरफ पेड़ों से घिरा हुआ है और अब इसकी हालत पहले जैसी नहीं रही. कई जगह पेंट उखड़ रहा है.

यहां रोज आने वाला सिर्फ एक माली है, जो बगीचे की देखभाल करता है. उसने थोड़ा उलझन में कहा, “ना मैडम जी रहती हैं, ना सर जी.”

जिस ‘मैडम जी’ की वह बात कर रहा है, वह इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) अधिकारी रोली अग्रवाल हैं, और ‘सर जी’ अब रिटायर हो चुके इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (IAS) अधिकारी सुबोध अग्रवाल हैं. सुबोध अग्रवाल, जो पहले अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) थे, अब 960 करोड़ रुपये के जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले में अपनी कथित भूमिका के कारण तलाश में हैं.

सुबोध अग्रवाल राजस्थान सरकार के लगभग हर बड़े विभाग में काम कर चुके हैं, जैसे ऊर्जा, खान और उद्योग. लेकिन 17 फरवरी से राजस्थान एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) एक अलग ही कहानी बता रहा है. उनका फोन आखिरी बार 16 फरवरी को रात करीब 9 बजे चालू था. उसके बाद से वह लापता हैं.

13 मार्च को ACB कोर्ट ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया. उन्हें ढूंढने के लिए 40 से ज्यादा टीमों ने 21 शहरों में 100 से ज्यादा जगहों पर छापे मारे हैं.

IAS officer Subodh Agarwal's residence in Jaipur’s C-Scheme neighbourhood | Samridhi Tewari/ThePrint
जयपुर के सी-स्कीम इलाके में IAS अधिकारी सुबोध अग्रवाल का आवास | समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

जल जीवन मिशन (JJM) भारत के लिए एक बड़ी योजना थी. इसे 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू किया था. इसका मकसद था हर ग्रामीण घर तक पानी पहुंचाना. लेकिन कुछ राज्यों में, जैसे राजस्थान में, यह योजना विवाद और जांच का विषय बन गई.

घोटाले का मुख्य मामला सीधा है. दो प्राइवेट कंपनियां—M/s श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी और M/s श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी—ने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए सरकारी ठेके हासिल किए. उन्होंने इरकॉन नाम की एक केंद्रीय सरकारी कंपनी के फर्जी “कंप्लीशन सर्टिफिकेट” जमा किए, ताकि वे काम के योग्य दिख सकें.

ACB, प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच में पता चला कि इरकॉन ने ऐसे कोई सर्टिफिकेट जारी ही नहीं किए थे. यहां तक कि सर्टिफिकेट में लिखे नाम भी नकली थे. इसके बावजूद इन कंपनियों को झुंझुनू, अलवर, जयपुर और अन्य जगहों पर पाइपलाइन, पंप और घरेलू नल लगाने के ठेके मिल गए. यह सब 2021 से 2023 के बीच हुआ.

इससे सरकार को 960 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

जो मामला पहले सिर्फ फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र की शिकायत से शुरू हुआ था, वह अब राजस्थान के सबसे चर्चित भ्रष्टाचार मामलों में से एक बन गया है. इसमें CBI, ED और ACB मिलकर कई राज्यों में तलाश कर रहे हैं. ACB और राजस्थान पुलिस ने चार एफआईआर दर्ज की हैं और एक CBI ने दर्ज की है.

जांच में यह भी सामने आया कि JJM के जरिए बिचौलियों और सरकारी अधिकारियों ने कथित तौर पर कमीशन लिया.

राजस्थान सचिवालय से लेकर राजस्थान हाई कोर्ट तक, यह मामला अब काफी बड़ा हो चुका है. इसमें कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री महेश जोशी, एक रिटायर शीर्ष अधिकारी और कई निजी लोग भी जांच के घेरे में हैं.

धोखे के सर्टिफिकेट

इस पूरे जाल के केंद्र में दो लोग थे. महेश मित्तल, जो गणपति ट्यूबवेल के मालिक और बिजनेसमैन हैं, और पदमचंद जैन, जो श्री श्याम ट्यूबवेल के मालिक और बिजनेसमैन हैं.

PHED टेंडर एक औपचारिक निमंत्रण होता है, जिसे पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट पानी की सप्लाई और सफाई से जुड़े सरकारी कामों के लिए प्राइवेट ठेकेदारों या कंपनियों को देता है. राजस्थान में PHED ही JJM के काम को लागू करने वाली एजेंसी है. PHED के टेंडर जीतने के लिए, चाहे पाइपलाइन बिछानी हो, ट्यूबवेल खोदना हो या पानी की टंकी बनानी हो, कंपनियों को अपना अनुभव दिखाना पड़ता है. इनके पास यह अनुभव नहीं था.

इसके बजाय, उन्होंने देवेंद्र सिंह राठौड़ नाम के एक “कंसल्टेंट” का इस्तेमाल किया, जिसने उनके लिए टेंडर फाइल किए. ACB की FIR के अनुसार, श्री गणपति ट्यूबवेल ने 68 टेंडर भरे, जबकि श्री श्याम ट्यूबवेल ने 169 टेंडर भरे, और दोनों ने एक ही फर्जी दस्तावेज इस्तेमाल किए. वहीं CBI की जांच में सामने आया कि राठौड़ के जरिए मित्तल ने 66 टेंडर और जैन ने 146 टेंडर भरे.

इंडियन रेलवे कंस्ट्रक्शन इंटरनेशनल लिमिटेड, जिसे इरकॉन भी कहा जाता है, रेलवे मंत्रालय के तहत एक सरकारी कंपनी है. यह इस धोखाधड़ी में शामिल नहीं थी. इसके बजाय, इसका नाम इस्तेमाल करके बिना योग्यता वाले ठेकेदारों के लिए फर्जी अनुभव सर्टिफिकेट बनाए गए. PHED टेंडर में किसी कंपनी को यह साबित करना होता है कि उसने पहले ऐसे बड़े प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूरे किए हैं. इस नियम को पार करने के लिए आरोपियों ने इरकॉन का नाम लेकर फर्जी सर्टिफिकेट बना लिए.

चेतावनी साफ थी. मार्च 2023 में जयपुर के वकील महेश कुमार कलवानिया, जिन्होंने शिकायत भी दर्ज कराई है, उन्होंने विभाग को तीन कानूनी नोटिस भेजे और इन आवेदन में गड़बड़ियों की ओर साफ इशारा किया. वकील टी.एन. शर्मा ने भी विभाग को बताया कि फर्जी सर्टिफिकेट इस्तेमाल हो रहे हैं. इरकॉन ने भी अग्रवाल को बताया कि ऐसे सर्टिफिकेट जारी किए जा रहे हैं.

TN Sharma, lawyer and complainant in the case | Samridhi Tewari/ThePrint
टी.एन. शर्मा, इस मामले में वकील और शिकायतकर्ता | समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

7 जून 2023 को इरकॉन के विजिलेंस डिपार्टमेंट की एक चिट्ठी में लिखा था, “Kind attn: Subodh Agarwal” (विशेष ध्यान दें: सुबोध अग्रवाल.) इसमें आगे लिखा था, “हमें शिकायत मिली है कि इरकॉन के लेटरहेड पर फर्जी कंप्लीशन सर्टिफिकेट का इस्तेमाल PHED, राजस्थान सरकार के अलग-अलग टेंडर में भाग लेने के लिए किया जा रहा है, M/s श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी, शाहपुर, जयपुर और श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी, शाहपुर, जयपुर द्वारा. ये सर्टिफिकेट फर्जी और बनावटी हैं.”

“आपसे अनुरोध है कि इन फर्जी सर्टिफिकेट पर क्या कार्रवाई की गई है, इसकी जानकारी दें, जो PHED, राजस्थान सरकार के टेंडर प्रक्रिया में इस्तेमाल हुए हैं.”

अग्रवाल ने क्या किया? ACB का आरोप है कि ज्यादा नहीं.

इस मामले में एक आरोपी विशाल सक्सेना हैं, जो एक एग्जीक्यूटिव इंजीनियर हैं.

ACB ने अपनी एक FIR में आरोप लगाया है, “विशाल सक्सेना ने PMLA, 2002 की धारा 50 के तहत अपने बयान में कहा है कि उन्हें M/s श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी द्वारा जमा किए गए सर्टिफिकेट के लिए पॉजिटिव वेरिफिकेशन रिपोर्ट देने को कहा गया था, यह बात रमेश चंद मीणा, सुबोध अग्रवाल और अन्य लोगों ने कही थी.”

पहली FIR अगस्त 2023 में दर्ज हुई, जिसमें इंजीनियरों और ठेकेदारों के नाम थे. दिसंबर 2025 में राजस्थान सरकार ने धारा 17A की मंजूरी दी, जो वरिष्ठ अधिकारियों की जांच के लिए जरूरी होती है. इसके बाद ACB को सुबोध अग्रवाल और अन्य लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की अनुमति मिली. एक और FIR अक्टूबर में JJM विभाग ने दर्ज की. फिर मई 2024 में CBI ने केस दर्ज किया.

अप्रैल 2024 में ACB ने एक और मामला दर्ज किया, जिसे इस घोटाले की “मेगा FIR” कहा गया.

‘मेगा FIR’ और ‘बड़ी मछलियां’

जब ACB ने फर्जी सर्टिफिकेट के मामले में दूसरी FIR दर्ज करने का फैसला किया, तब तक यह घोटाला राजस्थान और पूरे भारत में आम खबर बन चुका था.

लेकिन इस बार FIR में अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार में राजस्थान के PHED मंत्री रहे महेश जोशी समेत 21 अन्य लोगों के नाम शामिल थे. FIR में ACB ने दावा किया कि इस पूरे काम का तरीका एक चालाक तीन-स्टेप प्रक्रिया पर आधारित था.

पहला, दोनों ठेकेदारों ने इरकॉन के फर्जी अनुभव सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किया और टेंडर वेरिफिकेशन के दौरान अधिकारियों की तरह दिखने के लिए फर्जी जीमेल अकाउंट बनाए.

दूसरा, आरोपियों में शामिल अधिकारियों ने यह सुनिश्चित किया कि इन बिड्स को “रिस्पॉन्सिव” माना जाए. इसके लिए उन्होंने अपने मनपसंद इंजीनियर चुने, जिन्होंने झूठी और पॉजिटिव वेरिफिकेशन रिपोर्ट दी. उन्होंने कानूनी नोटिस को नजरअंदाज किया और इरकॉन के चेतावनी वाले ईमेल डिलीट कर दिए, ताकि सबूत मिटाया जा सके.

ACB की जांच में कहा गया, “केंद्रीय कंपनी होने के नाते और केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार, ऐसी किसी कंपनी द्वारा ईमेल के लिए gmail.com डोमेन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.”

जांच में आगे कहा गया, “LOA की स्पेलिंग भी LoA लिखी गई है, वह भी एक केंद्रीय सरकारी कंपनी की तरफ से. इसलिए gmail पर फर्जी ईमेल आईडी बनाई गई, ताकि विभाग के वेरिफिकेशन सवालों का जवाब दिया जा सके.” ACB अधिकारियों ने FIR में कहा, “बिडर दस्तावेज के अनुसार सभी शर्तें पूरी करता दिखता है और उसे रिस्पॉन्सिव घोषित कर दिया जाता है.”

आखिर में, रिश्वत का एक तय सिस्टम बनाया गया, जिसमें टेंडर की राशि का 4 प्रतिशत एडवांस कमीशन लिया जाता था, जिसे मंत्री, प्राइवेट सिंडिकेट और शीर्ष अधिकारियों के बीच बराबर बांटा जाता था.

ACB ने FIR में आरोप लगाया, “टेंडर में पदमचंद जैन और महेश मित्तल ने टेंडर राशि का 4 प्रतिशत एडवांस रिश्वत के रूप में ACS, PHED और संजय बडाया को दिया, जो महेश जोशी, PHED मंत्री के लिए काम करते थे. और जहां टेंडर की राशि Notice Inviting Tender (NIT) से कम थी, वहां 2 प्रतिशत-2 प्रतिशत दिया गया. कुछ मामलों में ACS, PHED को एकमुश्त राशि दी गई, जो इन कंपनियों के मामले में 0.40 से 1 प्रतिशत थी.”

Fake Ircon certificate attached in probe | By special arrangement
जांच में फर्जी इरकॉन सर्टिफिकेट | विशेष व्यवस्था के तहत

ACB के अनुसार, जोशी और अग्रवाल उस कमेटी के प्रमुख थे, जिसने इन फर्जी टेंडर को मंजूरी दी. इसके अलावा एक बिचौलिया भी था—संजय बडाया, जो एक निजी व्यक्ति है और कथित तौर पर मंत्री के लिए संपर्क का काम करता था, स्टाफ ट्रांसफर और रिश्वत वसूली संभालता था.

इसमें कुछ सहयोगी भी थे, जैसे वरिष्ठ इंजीनियर आर.के. मीणा और दिनेश गोयल, साथ ही विशाल सक्सेना, जिसने दबाव में झूठी रिपोर्ट देने की बात मानी. FIR के अनुसार अरुण श्रीवास्तव, ACE ने भी झूठी पॉजिटिव वेरिफिकेशन रिपोर्ट दी.

इसमें फायदा उठाने वाले भी थे—महेश मित्तल और पदमचंद जैन. इनके साथ इरकॉन के अंदर के व्यक्ति मुकेश पाठक थे, जिन्होंने फर्जी दस्तावेज खुद बनाकर दिए.

और कुछ लोग वित्तीय नियंत्रण में थे, जैसे सुशील शर्मा, जो फाइनेंशियल एडवाइजर थे, और नीरिल कुमार, जो चीफ इंजीनियर थे. इन्होंने फर्जीवाड़ा होने के बावजूद तकनीकी और वित्तीय बिड्स को मंजूरी दी.

लेकिन अब जांच सिर्फ ACB के हाथ में नहीं थी. CBI और ED भी इस मामले में शामिल हो गए, ताकि कथित गड़बड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग की जांच की जा सके. अब इसमें कई एजेंसियां, अधिकारी, कई FIR, नाम, वकील, जज, कोर्ट और गिरफ्तारियां शामिल हो गई थीं.

मई 2024 में CBI ने FIR दर्ज की और राजस्थान के पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर विशाल सक्सेना और मालिक पदमचंद जैन और महेश मित्तल के खिलाफ आपराधिक साजिश, फर्जीवाड़ा और धोखाधड़ी सहित कई आरोप लगाए.

CBI की यह कार्रवाई अगस्त 2023 में शुरू हुई आठ महीने की प्रारंभिक जांच के बाद हुई.

लापता अफसर

यह सब 2024 में शुरू हुआ, जब ACB ने “प्रशासनिक मंजूरी” का पता लगाया. जब केंद्रीय एजेंसियां पैसे के लेन-देन का पता लगा रही थीं, तब ACB ने विभाग की फाइलों और फाइनेंस कमेटी के रिकॉर्ड की गहराई से जांच की और इसी से वे अग्रवाल तक पहुंचे.

पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव सुबोध अग्रवाल की तलाश ने JJM जांच को राजस्थान हाई कोर्ट, सचिवालय और जल जीवन भवन के गलियारों में एक बड़े कानूनी ड्रामा में बदल दिया है.

17 फरवरी 2026 से ACB ने 40 से ज्यादा विशेष टीमों को लगाया है. ये टीमें 21 शहरों में 100 से ज्यादा जगहों पर तलाश कर रही हैं. इनमें दिल्ली, मुंबई और नोएडा जैसे शहर शामिल हैं. मुंबई के मालाबार हिल्स और दिल्ली के न्यू मोती बाग जैसे पॉश इलाकों से लेकर सोहना के फार्महाउस और नोएडा के ठिकानों तक छापे मारे गए हैं. ACB का आरोप है कि अग्रवाल ने स्पष्ट कानूनी चेतावनियों और व्हिसलब्लोअर नोटिस को नजरअंदाज किया और इस बड़े घोटाले को होने दिया.

Rajasthan High Court premises | Samridhi Tewari/ThePrint
राजस्थान हाई कोर्ट परिसर | समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

ACB ने अपनी FIR में कहा, “यह देखा गया कि सुबोध अग्रवाल ने कानूनी नोटिस में बताई गई बातों की जांच कराने की कोई कोशिश नहीं की. इसके अलावा, इन कंपनियों द्वारा दिए गए अन्य अनुभव सर्टिफिकेट की भी जांच नहीं कराई गई, जबकि नोटिस में साफ लिखा था कि दोनों कंपनियों ने PHED के टेंडर पाने के लिए चार से पांच सर्टिफिकेट इस्तेमाल किए थे.”

ACB ने अग्रवाल के खिलाफ लुक-आउट सर्कुलर जारी किया है. एक वरिष्ठ ACB अधिकारी ने कहा, “कुल 21 शहरों में 100 से ज्यादा जगहों पर तलाशी ली गई है, जिनमें जयपुर, उदयपुर, बाड़मेर, जोधपुर, झालावाड़, कोटा, नागौर, विराट नगर, निवाई टोंक, चांदवाजी आमेर, गगनपुर सिटी, नई दिल्ली, चंडीगढ़, हरियाणा के फरीदाबाद और सोहना, उत्तर प्रदेश के नोएडा, मेरठ, प्रयागराज, बुलंदशहर, खुर्जा, मुंबई और आसपास के इलाके शामिल हैं.”

उन्होंने बताया कि इन ठिकानों में आरोपी का खुद का घर, नई मोती बाग कॉलोनी, डिफेंस कॉलोनी और नई दिल्ली के होटल, फरीदाबाद के सेक्टर-39 का फ्लैट, नोएडा में रिश्तेदारों और दोस्तों के घर, सोहना का फार्महाउस, मुंबई के मालाबार हिल और जुहू में रिश्तेदारों के घर, जयपुर के सी-स्कीम, निर्माण नगर, बजाज नगर एक्सटेंशन में उनके घर, सुंदर नगर का मैन हाउस, सिवाड़, बगरू और बिंदायका के फार्महाउस शामिल हैं.

अब तक करीब 50 लोगों से पूछताछ की जा चुकी है, जिनमें अग्रवाल के करीबी रिश्तेदार, दोस्त, नौकर, ड्राइवर और उन्हें छुपाने वाले लोग शामिल हैं.

उन्होंने कहा, “दिल्ली, मुंबई, नोएडा, फरीदाबाद और मेरठ में मदद करने वाले चार लोगों—मुंबई से गौरव अग्रवाल, फरीदाबाद से सौरभ अग्रवाल, मेरठ से समीेर अग्रवाल और नोएडा से उनके करीबी दोस्त और बिजनेसमैन प्रणव चंद्र—को लाकर पूछताछ की गई.”

ACB के अधिकारी कहते हैं कि दूसरी तरफ अग्रवाल ने राजस्थान हाई कोर्ट में FIR रद्द कराने के लिए याचिका दायर की है. यह कदम पिछले महीने उठाया गया, जिसमें उन्होंने अपने वकील के जरिए “चुनिंदा निशाना बनाने” का आरोप लगाया.

उनका मुख्य तर्क है कि अतिरिक्त मुख्य सचिव के रूप में उन्होंने “अच्छी नीयत” से काम किया और फाइनेंशियल बिड्स की जांच तभी की, जब उन्हें बिड इवैल्यूएशन कमेटी से तकनीकी मंजूरी मिल गई थी. अग्रवाल का कहना है कि वह वरिष्ठ इंजीनियरों की “पॉजिटिव वेरिफिकेशन” पर भरोसा करने के लिए कानूनी रूप से सही थे, जिन्होंने इरकॉन सर्टिफिकेट की जांच की थी.

खुद को आपराधिक साजिश से अलग दिखाने के लिए अग्रवाल ने अपने सुधारात्मक कदमों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि अगस्त 2023 में फर्जीवाड़ा साबित होने के बाद कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया गया, सभी भुगतान रोके गए और दोषी एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को सस्पेंड किया गया.

उनके वकील ने कहा, “11.08.2023 को चीफ इंजीनियर ने भी आरोपी कंपनियों के खिलाफ पुलिस स्टेशन बजाज नगर में FIR दर्ज कराने के लिए शिकायत दी थी. 14.08.2023 और 18.08.2023 को M/s गणपति ट्यूबवेल कंपनी और M/s श्याम ट्यूबवेल को PHED विभाग ने ब्लैकलिस्ट कर दिया.”

उन्होंने आगे कहा, “इन तथ्यों से साफ है कि याचिकाकर्ता का इस अपराध में कोई रोल या मिलीभगत नहीं है. रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता ने कोई गलत काम किया या साजिश में शामिल थे. ऐसे में उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रखना कानून और तथ्यों के अनुसार सही नहीं है.”

अग्रवाल ने जिम्मेदारी आगे भी डालने की कोशिश की. उनके वकील ने कहा, “यह भी ध्यान देने वाली बात है कि 95 प्रतिशत से ज्यादा वर्क ऑर्डर पिछले ACS, PHED सुधांश पंत की अध्यक्षता वाली फाइनेंस कमेटी ने मंजूर किए थे, न कि याचिकाकर्ता ने.”

उन्होंने कहा, “याचिकाकर्ता के कार्यकाल में किसी भी वर्क ऑर्डर के लिए भुगतान मंजूर नहीं किया गया. इसलिए सरकारी खजाने को कोई नुकसान नहीं हुआ. इसी आधार पर FIR को रद्द किया जाना चाहिए.”

उन्होंने यह भी कहा कि ACB ने पहले के अधिकारियों को “मनमाने तरीके से क्लीन चिट” दे दी और सिर्फ उन्हें निशाना बनाया, जो “पिक एंड चूज” नीति और गलत इरादे को दिखाता है. उन्होंने FIR को गैरकानूनी बताया और कहा कि यह पहले से चल रही 2023 की जांच के उन्हीं तथ्यों पर आधारित है, इसलिए यह “प्रक्रिया का दुरुपयोग” है.

आरोपों को सिर्फ “ड्यूटी निभाने में गड़बड़ी” बताकर, न कि “साजिश”, अग्रवाल ने राजस्थान हाई कोर्ट को समझाने की कोशिश की कि यह आपराधिक मामला बेबुनियाद है. उनके वकील ने कहा, “FIR में याचिकाकर्ता की कोई खास भूमिका या साजिश का जिक्र नहीं है.”

ACB के एक सूत्र ने बताया कि ACB कोर्ट नंबर 1 ने सुबोध अग्रवाल, जितेंद्र शर्मा, संजीव गुप्ता और मुकेश गोयल के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं.

ACB headquarters in Jaipur | Samridhi Tewari/ThePrint
एसीबी मुख्यालय जयपुर में | समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

सूत्र ने कहा, “कोर्ट के आदेश के अनुसार ACB लगातार आरोपियों को गिरफ्तार करने की कोशिश कर रही है. अलग-अलग जगहों पर छापे मारे जा रहे हैं.”

अगर कोर्ट द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट लागू नहीं हो पाता है, तो आरोपियों की संपत्ति जब्त करने के आदेश भी लिए जाएंगे.

फर्जी ईमेल, फर्जी सर्टिफिकेट और कोच्चि की यात्रा

जब शुरुआत में ACB इस मामले की जांच कर रही थी, तब 3 मई 2024 को CBI ने धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े की जांच के लिए केस दर्ज किया. उसे आपराधिक साजिश, फर्जी दस्तावेज बनाना, धोखाधड़ी, सरकारी कर्मचारी द्वारा नुकसान पहुंचाने के इरादे से गलत दस्तावेज बनाना, सरकारी कर्मचारी बनकर धोखा देना और ऐसे अपराधों से जुड़े आरोपों का शक था.

30 अक्टूबर को ACB ने एक और केस दर्ज किया, जिसमें भ्रष्टाचार और प्रशासनिक गड़बड़ी पर ध्यान दिया गया. इसमें PHED के वरिष्ठ अधिकारी, मंत्री महेश जोशी और IAS अधिकारी सुबोध अग्रवाल शामिल थे.

CBI की जांच में सरकारी अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच कई स्तरों पर तालमेल सामने आया. इसमें केरल की एक “आधिकारिक जांच यात्रा” की योजना का भी खुलासा हुआ.

इस साजिश में विशाल सक्सेना एक अहम किरदार बनकर सामने आते हैं. अप्रैल 2023 में PHED के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर सक्सेना को इरकॉन के सर्टिफिकेट की जांच के लिए केरल भेजा गया था. CBI को पता चला कि यह “जांच” पूरी तरह से नकली थी.

CBI की चार्जशीट के अनुसार, सक्सेना के पहुंचने से एक दिन पहले ही ठेकेदार—मित्तल और गुप्ता—और कथित फर्जी दस्तावेज बनाने वाले मुकेश पाठक कोच्चि पहुंच गए और होटल वुडलार्क में ठहरे.

मित्तल ने होटल में अपना आईडी इस्तेमाल नहीं किया और अपनी मौजूदगी छिपाने के लिए संजीव गुप्ता के कमरे में रुके. उन्होंने अपने मोबाइल फोन जयपुर में ही छोड़ दिए और GPS ट्रैकिंग से बचने के लिए एक कर्मचारी की सिम का इस्तेमाल किया.

चार्जशीट में कहा गया, “जांच में सामने आया कि महेश मित्तल, विशाल सक्सेना, मुकेश पाठक और संजीव गुप्ता ने मिलकर साजिश रची. उन्होंने केरल के कट्टप्पना में अपने ठहराव के दौरान मुकेश पाठक को इरकॉन के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर विजय शंकर के रूप में पेश किया. इसी साजिश के तहत विशाल सक्सेना ने अपनी रिपोर्ट में मुकेश पाठक को इरकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड के सीईओ विजय शंकर बताया और अलग-अलग पंपहाउस और पानी की टंकियों की तस्वीरों को इरकॉन के काम के तौर पर दिखाया.”

CBI ने कहा कि जांच में यह भी सामने आया कि “विशाल सक्सेना ने जानबूझकर झूठी वेरिफिकेशन रिपोर्ट बनाई. PHED राजस्थान को धोखा देने के लिए उन्होंने मुकेश पाठक और अन्य स्थानीय लोगों को इरकॉन के अधिकारी बताकर पेश किया.”

कमीशन, नकद रिश्वत और दबाव की कहानी

पहली नजर में JJM घोटाले की जांच से यह सामने आया कि कुछ निजी लोगों के पास विभाग के प्रमुखों से भी ज्यादा ताकत थी. संजय बडाया ऐसा ही एक व्यक्ति था.

ED की चार्जशीट और PMLA की धारा 50 के तहत दर्ज बयानों के अनुसार, बडाया उस समय के मंत्री महेश जोशी का “बिचौलिया” और “भरोसेमंद सहयोगी” था.

बडाया की भूमिका तय थी. ठेकेदार महेश मित्तल और पदमचंद जैन के बयानों से पता चला कि पूरे सिस्टम पर उसका पूरा नियंत्रण था. मित्तल ने साफ कहा कि “PHED में काम करवाने के लिए किसी भी ठेकेदार को बडाया के पास जाना पड़ता था.”

चार्जशीट के अनुसार मित्तल ने ED को बताया, “संजय बडाया और महेश जोशी दोनों टेंडर की राशि पर कमीशन लेते थे. अगर कोई ठेकेदार पैसे देने से मना करता, तो वे PHED कर्मचारियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उसे परेशान करते और उसका काम करना मुश्किल बना देते. वे रिश्वत नकद में लेते थे.”

वहीं पदमचंद जैन ने ED को बताया कि महेश जोशी ने बडाया को PHED विभाग में “पूरी छूट” दे रखी थी और इस व्यवस्था से जोशी को भी रिश्वत मिलती थी.

वरिष्ठ ACB अधिकारियों ने कहा कि बडाया महेश जोशी का भरोसेमंद सहयोगी था. वह PHED के कर्मचारियों के कामकाज को देखता था, उनके ट्रांसफर तय करता था, जांच शुरू कराता था और उन्हें APO बनवाता था. एक अधिकारी ने कहा, “बडाया न तो PHED में काम करता था और न ही उसका कोई आधिकारिक संबंध था.”

ED ने अप्रैल 2024 में जोशी को गिरफ्तार किया. राजस्थान हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत देने से इनकार करते हुए कहा, “यह मामला दिखाता है कि याचिकाकर्ता महेश जोशी, जो एक जिम्मेदार पद पर थे, उन्होंने अपने पद की ईमानदारी और भरोसे को बनाए नहीं रखा.”

कोर्ट ने आगे कहा, “उन पर लगाया गया आपराधिक कदाचार एक गंभीर कर्तव्य का उल्लंघन है, जो सार्वजनिक जीवन में अस्वीकार्य है.”

बाद में जोशी को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई.

पूर्व मंत्री का कहना है कि उनकी तरफ से कोई लापरवाही नहीं हुई.

जोशी ने दिप्रिंट से कहा, “हम कई सालों से यह कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. और मैं अपनी बेगुनाही साबित करूंगा. मैं जयपुर और राजस्थान के लोगों के भरोसे पर खरा उतरूंगा.”

घोटालों का पैमाना

M/s श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी और M/s श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी 2023 के बाद राजस्थान में चर्चित नाम बन गए हैं. लेकिन JJM घोटाले का दायरा सिर्फ इन दो कंपनियों तक सीमित नहीं है.

इसमें राजस्थान ट्रांसपेरेंसी पब्लिक प्रोक्योरमेंट एक्ट, 2012 को व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया. आरोप है कि अधिकारियों ने टेंडर के नियमों में हेरफेर करके करीब 1,000 करोड़ रुपये के ठेके दिए. जनवरी 2026 में दर्ज एक FIR के अनुसार, M/s भूरथनोमन कंस्ट्रक्शन ने भीलवाड़ा, नागौर और सीकर में पांच बड़े प्रोजेक्ट हासिल किए और 187.33 करोड़ रुपये के अधूरे काम को फर्जी हलफनामों के जरिए छुपाया.

इस मिलीभगत के केंद्र में चीफ इंजीनियर दिनेश गोयल और ACE एम.पी. सोनी हैं, जिन्होंने कथित तौर पर अपने अधीन काम करने वालों पर दबाव डालकर रिकॉर्ड बदलवाए. 24 घंटे के अंदर एक सही रिपोर्ट को बदलकर अधूरे काम का जिक्र हटा दिया गया, जिससे कंपनियों को योग्य दिखाया जा सके.

ACB ने FIR में कहा, “पानी सप्लाई विभाग पहले से ही पूरे देश में बदनाम हो चुका है, क्योंकि फर्जी अनुभव सर्टिफिकेट और गलत बिडिंग क्षमता के कई मामले सामने आए हैं.”

JJM जांच के पूरे पैमाने को समझने के लिए सिर्फ शुरुआती गिरफ्तारी से आगे बढ़कर उस “अपराधिक गठजोड़” को देखना जरूरी है, जिसे अभी कोर्ट में चुनौती दी जा रही है.

जयपुर के वकील टी.एन. शर्मा, जो इस मामले के एक अहम व्हिसलब्लोअर हैं और जिन्होंने कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा के साथ मिलकर इस घोटाले को उजागर किया, उन्होंने एक जनहित याचिका और कई शिकायतें दर्ज की हैं. उनका कहना है कि यह धोखाधड़ी अभी सामने आए मामलों से कहीं ज्यादा गहरी है.

अपनी एक शिकायत में शर्मा ने कहा कि हाल के आरोपों का एक बड़ा हिस्सा M/s ओम इंफ्रा लिमिटेड से जुड़ा है, जिसने नोखा और खाजूवाला इलाके में काम किया. शर्मा का आरोप है कि “अर्थवर्क” में गड़बड़ी करके 22 करोड़ रुपये का घोटाला किया गया. उन्होंने कहा, “तरीका आसान था. कंपनी ने एक ही खाई में कई पाइप डाले, लेकिन हर पाइप के लिए अलग-अलग खाई का बिल बनाया.”

उन्होंने यह भी कहा कि M/s GA इंफ्रा लिमिटेड और SSG ने भी श्याम ट्यूबवेल और गणपति ट्यूबवेल की तरह फर्जी अनुभव सर्टिफिकेट जमा किए. “इन कंपनियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई,” उन्होंने कहा.

दिप्रिंट ने गणपति ट्यूबवेल के मालिक महेश मित्तल और श्याम ट्यूबवेल के मालिक पदमचंद जैन से फोन और ईमेल के जरिए प्रतिक्रिया मांगी है. जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.

JJM में गड़बड़ियां

सरकार अब सिर्फ पाइपलाइन नहीं बिछा रही है, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रही है कि वे सही से काम करें. पिछले हफ्ते केंद्रीय कैबिनेट ने जल जीवन मिशन 2.0 को मंजूरी दी, जिसका बजट 8.69 लाख करोड़ रुपये है. लक्ष्य है कि दिसंबर 2028 तक हर ग्रामीण घर तक पानी पहुंचाया जाए.

राजस्थान जैसे घोटालों को रोकने के लिए ‘सुजलम भारत’ नाम का एक नया डिजिटल सिस्टम शुरू किया जाएगा, जो पानी के स्रोत से लेकर नल तक हर पाइप का रिकॉर्ड रखेगा. अब गांवों को यह प्रमाण देना होगा कि पानी वास्तव में पहुंच रहा है, तभी उन्हें ‘हर घर जल’ घोषित किया जाएगा. इस तरीके का उद्देश्य पानी सप्लाई को सिर्फ निर्माण कार्य नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद सेवा बनाना है.

18 दिसंबर 2025 को लोकसभा में दिए गए जवाब में केंद्रीय मंत्री सी.आर. पाटिल ने बताया कि जल जीवन मिशन में गड़बड़ियों के खिलाफ पूरे देश में कार्रवाई की जा रही है. 32 राज्यों में 621 अधिकारियों, 969 ठेकेदारों और 153 जांच एजेंसियों पर वित्तीय गड़बड़ी और खराब काम के लिए कार्रवाई हुई है.

गुजरात में 120.65 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जिसके बाद 112 एजेंसियों को ब्लैकलिस्ट किया गया और नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया. इन सबके बावजूद, मिशन ने 2019 में 16.7 प्रतिशत कवरेज से बढ़कर 2025 के अंत तक 81.41 प्रतिशत तक पहुंच बनाई है. इसके तहत 15.67 करोड़ घरों तक नल का पानी पहुंचाया गया है, जिसमें थर्ड पार्टी ऑडिट और जियोटैगिंग का इस्तेमाल किया गया.

राजस्थान की स्थिति

27 मार्च 2025 को लोकसभा में दिए गए जवाब में जल शक्ति मंत्रालय ने बताया कि राजस्थान ने जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण पानी नेटवर्क को काफी बढ़ाया है, लेकिन यह अभी भी भ्रष्टाचार की जांच का केंद्र बना हुआ है.

2019 से अब तक राज्य ने नल कनेक्शन 10.84 प्रतिशत से बढ़ाकर 55.95 प्रतिशत कर दिए हैं और 60.29 लाख से ज्यादा ग्रामीण घरों तक पानी पहुंचाया है.

डूडी और शाहपुरा जैसे जिलों में 96 प्रतिशत कवरेज है, जबकि बाड़मेर में यह सिर्फ 19.02 प्रतिशत है.

राज्य सरकार ने माना है कि उसे रिश्वत और भ्रष्टाचार की कई शिकायतें मिली हैं और अब वह मिशन पर “करीबी नजर” रख रही है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे.

राजस्थान के कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने दिप्रिंट से कहा, “घोटाला सामने आने के बाद कई अधिकारी गायब हो गए, निष्क्रिय हो गए और कई डर गए. इससे राजस्थान की पेयजल योजनाओं पर असर पड़ा. वे ठप हो गईं, क्योंकि सारा पैसा भ्रष्टाचार में चला गया.”

जल जीवन मिशन विभाग में भी समय के साथ काफी बदलाव आया है. ऊपर से लेकर नीचे तक के अधिकारी इस घोटाले पर खुलकर बात नहीं करते. एक अधिकारी ने हंसते हुए कहा, “क्या पता हमारा नाम भी इसमें आ जाए.”

जल जीवन विभाग में अब प्रक्रिया बदल गई है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “राजस्थान ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक प्रोक्योरमेंट एक्ट को अब पूरी तरह लागू किया जा रहा है.”

उन्होंने कहा कि अब कर्मचारी ज्यादा सतर्क और जागरूक हो गए हैं. “पहले शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया जाता था. अब उन्हें गंभीरता से लिया जाता है.”

अधिकारी ने कहा कि सुजलम आईटी सिस्टम बनने के बाद हर योजना, कितना काम हुआ और कितना ढांचा तैयार हुआ, सब कुछ तकनीक के जरिए रिकॉर्ड किया जाएगा.

उन्होंने कहा, “राजस्थान अब टॉप तीन बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में है. सबसे बड़ी चुनौती ढांचा बनाना नहीं, बल्कि उसे संभालना है. इसके लिए हम ऑपरेशन और मेंटेनेंस पॉलिसी ला रहे हैं. पाइप टूटने पर उसे कौन ठीक करेगा, यह तय किया जाएगा. हर छह-सात क्लस्टर पर अधिकारी बैठेंगे, जो तकनीकी मदद देंगे.”

उन्होंने कहा कि एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग एक सॉफ्टवेयर है, जो इस सबकी निगरानी करेगा और राज्य स्तर पर बिना मैन्युअल हस्तक्षेप के डेटा चेक होगा. “घोटाले की वजह से बदनामी हुई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि काम नहीं हुआ. 60 लाख घरों तक पानी पहुंचा है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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