नयी दिल्ली, 18 मार्च (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी विवाहित महिला से परिवार के किसी सदस्य की देखभाल में मदद करने के लिए केवल कहना आपराधिक कानून के तहत क्रूरता नहीं है।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने यह फैसला पत्नी के खिलाफ कथित क्रूरता और घरेलू हिंसा के आरोप में पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करते हुए सुनाया।
दोनों पक्षों ने 2005 में उत्तराखंड के हल्द्वानी में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था। आपसी सहमति से यह तय हुआ था कि विवाह के बाद पति पत्नी रानीखेत स्थित याचिकाकर्ता के घर में रहेंगे, लेकिन पत्नी जल्द ही दिल्ली में अपनी मां के घर वापस चली गई और अपने पति पर भी वहीं रहने का दबाव डाला।
पति को 2012 में एकतरफा तलाक का आदेश दे दिया गया था।
पत्नी ने पति और उसके परिवार वालों पर गंभीर आरोप लगाए, जिनमें उसने कहा कि वे शराब के आदी थे और दहेज के लिए उसे प्रताड़ित करते थे और ताने मारते थे।
पत्नी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि उसके पति के भाई ने उस पर दबाव डाला कि वह उसके 11 वर्षीय बेटे की जिम्मेदारी ले और उसे स्थायी रूप से दिल्ली स्थित अपनी मां के घर पर रखे।
अदालत ने 10 मार्च को सुनाए गए फैसले में कहा, ‘शिकायतकर्ता से परिवार के किसी सदस्य की देखभाल में सहायता करने के लिए कहना मात्र अपने आप में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता।’
अदालत ने पत्नी के आरोपों को बिना स्पष्ट विवरण के लगाए गए सामान्य आरोप बताते हुए कहा कि, ‘परिवार के सदस्यों के खिलाफ ऐसे आरोप लगाना बहुत आसान है; उसके बिल्कुल अस्पष्ट आरोपों को स्पष्ट करने के लिए किसी विशिष्ट घटना का कोई स्पष्टीकरण नहीं है।’
आपराधिक मामलों को रद्द करते हुए अदालत ने कहा कि पत्नी के आरोप आईपीसी की धारा 498ए के तहत क्रूरता और उत्पीड़न के दायरे में नहीं आते।
भाषा अमित रंजन
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