हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट का आदेश, जिसमें कांस्टेबल्स को ऑर्डरली के रूप में काम कराने पर बात की गई है, पूरे भारत पर असर डाल सकता है. इसका पुलिस व्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है, खासकर उन लोगों की गरिमा पर जो ‘लॉवर लेवल’ पर काम करते हैं.
यह खबर तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया (यानी एनसीआर से निकलने वाले अखबारों) की सुर्खियों में नहीं आई, यह हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि उत्तर भारत अपने दक्षिणी राज्यों की तुलना में ज्यादा ‘जमींदारी सोच’ वाला माना जाता है.
11 मार्च 2026 को मद्रास हाई कोर्ट के जज एसएम सुब्रमण्यम और के. सुरेंद्र ने तमिलनाडु सरकार को साफ निर्देश दिए कि 21 जनवरी के आदेश का 100% पालन सुनिश्चित किया जाए, जिसमें राज्य पुलिस में ‘ऑर्डरली सिस्टम’ खत्म करने की बात कही गई है. साथ ही, जो जिला कलेक्टर और पुलिस अधिकारी इस नीति को लागू नहीं करेंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई करने को भी कहा गया.
यह आदेश एक याचिका के बाद आया, जिसमें पुलिस सुरक्षा की मांग की गई थी और यह सामने आया कि पुलिस बल में स्टाफ की कमी है क्योंकि कई कांस्टेबल्स को वरिष्ठ अधिकारियों के घरों में ऑर्डरली के रूप में लगाया गया है. यह मुद्दा नया नहीं है—2022 में भी हाई कोर्ट ने इस सिस्टम को खत्म करने का निर्देश दिया था और पहले से लगे सरकारी प्रतिबंध को फिर से लागू करने को कहा था.
यह सच है कि दिसंबर 2025 में तमिलनाडु के डीजीपी और पुलिस प्रमुख बनने के बाद अभय कुमार सिंह ने इस आदेश को पूरी तरह लागू करने की बात कही थी, लेकिन एक हफ्ते के अंदर ही अखबारों में इसके उल्लंघन की खबरें सामने आईं. इसके बाद सरकार ने हर जिला कलेक्टर के तहत एक कमेटी बनाने का फैसला किया, जो हर दूसरे महीने की 10 तारीख तक होम डिपार्टमेंट को रिपोर्ट देगी.
इसी महीने की शुरुआत में पड़ोसी राज्य कर्नाटक में डीजीपी केए सलीम ने 3,000 कांस्टेबल्स को, जो अधिकारियों के घरों में ऑर्डरली ड्यूटी कर रहे थे, वहां से हटाने का आदेश दिया. रिकॉर्ड के लिए बता दें कि इस सिस्टम पर 2017 में ही आधिकारिक रूप से रोक लगा दी गई थी, क्योंकि इसके खिलाफ पुलिस कर्मियों में काफी विरोध हुआ था.
इसी तरह, केरल सरकार ने भी आठ साल पहले ‘कैंप फॉलोअर सिस्टम’ को खत्म कर दिया था, जब एक पुलिस ड्राइवर के साथ मारपीट का आरोप सामने आया था, जिसमें एक एडीजीपी की बेटी का नाम जुड़ा था.
क्या उत्तर भारत भी दक्षिण भारत के इस उदाहरण को अपनाएगा?
यह एक और उदाहरण लगता है कि दक्षिणी राज्य सामाजिक सुधारों में आगे हैं, जैसे मंदिर प्रवेश, स्कूलों में मिड-डे मील, ज़मीन का बंटवारा, महिलाओं की सेहत और शिक्षा को प्राथमिकता देना और दूर-दराज गांवों तक सस्ती सड़क परिवहन सुविधा पहुंचाना.
कानून और नीति बनाना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा ज़रूरी है राजनीतिक नेतृत्व की प्रतिबद्धता, ताकि इनका पालन हो सके. उदाहरण के लिए ज़मीन सुधार को ही लें. दक्षिणी राज्यों (और पश्चिम बंगाल) में ज़मीन सुधार का रिकॉर्ड हिंदी पट्टी से काफी बेहतर रहा है. जबकि बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में जमींदारी खत्म करने के कानून लगभग एक जैसे थे, फर्क सिर्फ उनके लागू होने में पड़ा.
यानी सुधार के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं होता. इसके लिए ऊपर से मजबूत इच्छा शक्ति, नीचे से लोगों का समर्थन और एक ऐसा माहौल चाहिए जिसमें समाज, मीडिया, शिक्षा जगत और न्यायपालिका—ऑल एक ही दिशा में काम करें.
कॉन्स्टेबल शब्द की उत्पत्ति (एटिमोलॉजी)
आगे बढ़ने से पहले, आइए ‘कॉन्स्टेबल’ शब्द का मतलब और ‘ऑर्डरली’ का डिक्शनरी मतलब समझते हैं. बेल्जियम के विद्वान अर्नेस्ट मंडेल के अनुसार ‘कॉन्स्टेबल’ शब्द ‘स्टैबुली’ से आया है, जिसका मतलब होता है “अस्तबल का मुख्य नौकर, जिसे (जमींदारी दौर में) मालिक की जरूरतें पूरी करने के लिए रखा जाता था.”
कैम्ब्रिज डिक्शनरी के अनुसार ‘ऑर्डरली’ एक ऐसा व्यक्ति होता है जो अस्पताल में नर्स का बिना ट्रेनिंग वाला सहायक होता है, या “एक सैनिक जो अधिकारी का निजी सहायक (नौकर) बनकर काम करता है.” उससे कोई स्वतंत्र फैसला लेने की उम्मीद नहीं की जाती.
भारत में यह सिस्टम 1861 के औपनिवेशिक पुलिस एक्ट से जुड़ा है. उस समय सड़कों का नेटवर्क नहीं था, अधिकारी घोड़ों पर निरीक्षण के लिए जाते थे और डाक बंगलों में रुकते थे. इसलिए उस समय अधिकारियों के साथ कांस्टेबल्स को लगाना कुछ हद तक सही माना जाता था—उनके हथियार संभालने, यूनिफॉर्म की देखभाल करने और सबसे जरूरी, अधिकारियों की ‘धाक’ बनाए रखने के लिए.
आजादी के बाद, समय-समय पर इस ऑर्डरली सिस्टम के खिलाफ कई निर्देश जारी हुए. यह कांस्टेबल्स और अधिकारियों के बीच विवाद का बड़ा कारण बन गया. समय बदल चुका था. पहले के दौर में कांस्टेबल्स को तथाकथित ‘मार्शल रेस’ से लिया जाता था और उनकी पहचान अपने अधिकारी के प्रति ‘वफादारी’ थी. लेकिन नई पीढ़ी के कांस्टेबल ज्यादा पढ़े-लिखे, ट्रेनिंग पाए हुए, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और इस सिस्टम से नाराज थे.
इस सिस्टम से फायदा उठाने वाले IPS अधिकारी (जो पहले के IP सर्विस के बाद आए) ने 1977 में नेशनल पुलिस कमीशन (NPC) को एक दिलचस्प तर्क दिया. उन्होंने कहा कि ऑर्डरली सिस्टम “निचले स्तर के कर्मचारियों को अपने अधिकारी से अनौपचारिक रूप से मिलने और उन्हें इंसान के रूप में समझने का मौका देता है.”
उन्होंने यह भी कहा, “इससे भरोसा, सम्मान और लगाव पैदा होता है, और साथ ही एक प्रशिक्षित कांस्टेबल मिलता है जो मेहमानों को संभाल सकता है, संदिग्धों को पहचान सकता है, उनसे समझदारी से सवाल कर सकता है, फोन संभाल सकता है और अधिकारी के सुरक्षा सहायक की तरह काम कर सकता है.”
लेकिन यह तर्क सभी सदस्यों ने खारिज कर दिया. NPC ने अपनी पहली रिपोर्ट में साफ कहा, “घरेलू कामों के लिए कांस्टेबल्स को ऑर्डरली बनाकर इस्तेमाल करना गलत है…कांस्टेबल इस प्रथा से नाराज हैं क्योंकि यह जमींदारी सोच को दिखाता है और उनके आत्मसम्मान और मनोबल के खिलाफ है…हमें लगता है कि यह सिस्टम गलत तरीकों के लिए खुला है और सिर्फ निर्देश देने से इसे ठीक नहीं किया जा सकता…इसलिए हम सुझाव देते हैं कि मौजूदा ऑर्डरली सिस्टम को खत्म कर दिया जाए.”
जब यह रिपोर्ट संसद में रखी गई, तो सभी ने इस बात पर सहमति जताई कि कांस्टेबल्स से “घरेलू काम जैसे खाना बनाना, कपड़े धोना, सामान लाना” जैसे निजी काम कराना गलत है और इसे रोका जाना चाहिए.
तमिलनाडु ने इस मुद्दे पर जल्दी कदम उठाया और 1979 में ही ऑर्डरली सिस्टम खत्म करने का आदेश जारी किया. हालांकि, यह प्रथा जारी रही, जिसके कारण बाद में बार-बार कोर्ट को दखल देना पड़ा.
क्या ऑर्डरली सिस्टम का सच में अंत होने वाला है?
2005 की दूसरी प्रशासनिक सुधार आयोग की 36वीं सिफारिश और 2008 की छठी वेतन आयोग रिपोर्ट—दोनों ने ऑर्डरली सिस्टम खत्म करने की सिफारिश की.
2013 में गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति, जिसकी अध्यक्षता एम. वेंकैया नायडू कर रहे थे (जो बाद में उपराष्ट्रपति बने), ने कहा कि पुलिस में चल रहा ऑर्डरली सिस्टम भेदभावपूर्ण है और ब्रिटिश दौर की याद दिलाता है. इससे पुलिसकर्मियों का मनोबल गिरता है, क्योंकि उन्हें सुरक्षा देने के लिए ट्रेन किया जाता है, लेकिन उनसे खाना बनवाना, गाड़ी चलवाना, या घरेलू काम कराए जाते हैं.
समिति ने सुझाव दिया कि ऑर्डरली सिस्टम पूरी तरह खत्म किया जाए और अगर जरूरत हो तो अधिकारियों के घरों के लिए अलग से कुक, ड्राइवर, अटेंडेंट की पोस्ट बनाई जाए.
इसी दौरान यह मामला कोर्ट में भी पहुंचा. 2003 में ‘रामबृकाश सिंह बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य’ केस में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने इस सिस्टम की समीक्षा की और पाया कि ऐसा कोई साफ कानून या आदेश नहीं है जो अलग से ‘ऑर्डरली सिस्टम’ को मंजूरी देता हो. कोर्ट ने 1967 से जुड़े रिकॉर्ड, 1978 की IGP नोट और 1979 के गृह मंत्रालय के सर्कुलर को भी देखा, जिसमें इस सिस्टम को खत्म करने की सलाह दी गई थी.
हालांकि, लागू करने में देरी हुई और विरोध भी हुआ. 21 सितंबर 2016 को अमित शाह के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय ने एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि “अधिकारियों के घरों पर स्टाफ, गाड़ी, पर्सनल सिक्योरिटी जैसी सुविधाएं एक महीने के अंदर हटा दी जाएं.” लेकिन इसके बावजूद यह प्रथा जारी रही.
सितंबर 2025 में बीएसएफ के एक डीआईजी ने दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की, जिसमें 2016 के आदेश को लागू न करने की बात उठाई गई. मामला अभी कोर्ट में चल रहा है, लेकिन कोर्ट के फैसलों के रुझान को देखते हुए लगता है कि ऑर्डरली सिस्टम के ताबूत में आखिरी कील ठोकने का समय अब करीब है.
संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और वैली ऑफ वर्ड्स साहित्य महोत्सव के निदेशक हैं. हाल तक वे LBSNAA के निदेशक रहे हैं और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (एलबीएस म्यूज़ियम) के ट्रस्टी भी हैं. वे सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज़, पीएमएमएल के सीनियर फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.
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