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Monday, 9 March, 2026
होमहेल्थआयुष मंत्रालय ने 8 साल में 65 हज़ार भ्रामक विज्ञापन पकड़े, 3000 दवाओं के साइड इफेक्ट दर्ज: आयुष सचिव

आयुष मंत्रालय ने 8 साल में 65 हज़ार भ्रामक विज्ञापन पकड़े, 3000 दवाओं के साइड इफेक्ट दर्ज: आयुष सचिव

उन्होंने कहा, आयुष मंत्रालय AIIMS, IISc, IIT-दिल्ली और ICMR जैसे बड़े संस्थानों के साथ रिसर्च सहयोग बढ़ा रहा है.

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नई दिल्ली: आयुष मंत्रालय ने पिछले आठ सालों में बीमारियों के इलाज का दावा करने वाले 65,000 से ज्यादा भ्रामक विज्ञापनों को चिन्हित किया है. आयुष सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने यह जानकारी दी. यह कार्रवाई ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 के तहत की गई है.

उन्होंने गुरुवार को दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “प्रिंट मीडिया में भ्रामक विज्ञापनों को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह बड़ी समस्या बन जाती है.” उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों की जानकारी मंत्रालय के क्षेत्रीय केंद्रों के जरिए मिलती है, जिन्हें ऐसे विज्ञापनों की पहचान कर रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी दी गई है.

1954 का यह कानून कुछ बीमारियों को ठीक करने के दावे वाले विज्ञापनों पर रोक लगाता है. उदाहरण के लिए, कोई भी विज्ञापन यह दावा नहीं कर सकता कि वह कैंसर, डायबिटीज, मिर्गी, अंधापन जैसी 50 से ज्यादा बीमारियों का इलाज कर सकता है.

कोटेचा ने कहा कि जब ऐसे विज्ञापन सामने आते हैं, तो “हम इसे राज्य के लाइसेंसिंग प्राधिकरण को भेजते हैं ताकि तुरंत कार्रवाई हो सके और विज्ञापन देने वालों को इसे बंद करने का नोटिस दिया जाए.”

यह बयान ऐसे समय आया है जब सरकार ट्रेडिशनल ट्रीटमेंट को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है. आयुष मंत्रालय के बजट में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है. पिछले वित्त वर्ष में यह 3,992.90 करोड़ रुपये था, जिसे बढ़ाकर 4,408 करोड़ रुपये कर दिया गया है.

कोटेचा ने कहा कि इस नई फंडिंग से नए आयुर्वेद संस्थान खोले जाएंगे, रिसर्च सहयोग बढ़ाया जाएगा और दवाओं की निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा.

उन्होंने यह भी बताया कि 2018 से अब तक आयुष दवाओं से जुड़े 3,000 से ज्यादा साइड इफेक्ट दर्ज किए गए हैं. इनमें से कोई भी मामला जानलेवा नहीं था और ज्यादातर मामलों में एक-दो दिन में असर अपने आप ठीक हो गया.

दवाओं के साइड इफेक्ट को एडवर्स ड्रग रिएक्शन (एडीआर) कहा जाता है और यह आयुर्वेदिक दवाओं के लिए भी एक चिंता का विषय है. यह गलत तरीके से दवा इस्तेमाल करने, भारी धातुओं की मिलावट या दवा में मिलावट के कारण हो सकता है.

कोटेचा ने बताया कि आयुष दवाओं को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 और उसके तहत बने नियमों के अनुसार नियंत्रित किया जाता है. आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी (एएसयू) दवाओं की दो मुख्य श्रेणियां होती हैं—क्लासिकल फॉर्मूलेशन और पेटेंट या मालिकाना दवाएं.

एएसयू दवाओं के निर्माण लाइसेंस के लिए आवश्यक शर्तें ड्रग्स रूल्स, 1945 के नियम 158B के तहत तय की गई हैं. इनमें सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रभावशीलता से जुड़े मानकों का पालन करना ज़रूरी होता है.

होम्योपैथिक दवाओं के लिए निर्माण लाइसेंस देने की व्यवस्था ड्रग्स रूल्स के नियम 85A से 85I के तहत तय की गई है.

उन्होंने कहा, “आयुष दवाओं के निर्माण का लाइसेंस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों द्वारा नियुक्त राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण देते हैं. नीति स्तर पर हम ऐसी व्यवस्था को मजबूत करने पर काम कर रहे हैं जिससे आयुष दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और क्लिनिकल परीक्षण सुनिश्चित हो सके.”

हाई-एंड सबूत तैयार करना

आयुष मंत्रालय साथ-साथ बड़े संस्थानों जैसे ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी-दिल्ली (IIT-Delhi) और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के साथ रिसर्च सहयोग भी बढ़ा रहा है.

कोटेचा के अनुसार, इन साझेदारियों का उद्देश्य वैज्ञानिक अध्ययन और क्लिनिकल ट्रायल के जरिए ट्रेडिशनल ट्रीटमेंट के लिए “हाई-एंड सबूत” तैयार करना है. अभी एनीमिया, ऑस्टियोआर्थराइटिस और पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) जैसी बीमारियों पर कई बड़े ट्रायल की योजना बनाई जा रही है या वे पहले से चल रहे हैं.

उन्होंने कहा, “हम आईसीएमआर के साथ कई जगहों पर क्लिनिकल ट्रायल कर रहे हैं. सबूत तैयार करना मंत्रालय की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है.”

मंत्रालय तीन नए ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद भी स्थापित करने की योजना बना रहा है, हालांकि इनके स्थान अभी तय नहीं हुए हैं.

उन्होंने कहा, “हम इस पर चर्चा कर रहे हैं और राज्यों से काफी मांग आ रही है. इसके लिए कुछ मानक तय किए जा रहे हैं और फिर उनका मूल्यांकन किया जाएगा. शायद दो हफ्तों में फैसला हो जाएगा.”

रोज़गार के मौके

सरकार ने अप्रैल 2025 में संसद को बताया था कि भारत में 7,51,768 पंजीकृत आयुष चिकित्सक हैं. दिसंबर 2024 तक देश में 886 अंडरग्रेजुएट और 251 पोस्टग्रेजुएट कॉलेज थे. इन कॉलेजों में हर साल आयुष विषयों में 59,643 यूजी छात्रों और 7,450 पीजी छात्रों का दाखिला होता है.

रोज़गार के मौकों के बारे में सचिव ने कहा कि आयुष से पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए सिर्फ क्लिनिक में काम करना ही एकमात्र विकल्प नहीं है.

कोटेचा ने कहा, “सबसे पहले हम चाहते हैं कि हमारे छात्र इस सोच से बाहर आएं कि वे केवल इसी क्षेत्र में प्रैक्टिस कर सकते हैं.” उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में बड़े अवसर मौजूद हैं.

उन्होंने औषधीय पौधों की खेती, रिसर्च, पढ़ाई-लिखाई, उद्योग और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों का जिक्र किया. इसमें पारंपरिक चिकित्सा के लिए डिजिटल टूल बनाने वाली कंपनियां भी शामिल हैं.

उन्होंने कहा, “इंडस्ट्री स्थापित करने, मैन्युफैक्चरिंग, प्रैक्टिस, सरकारी सेवा और पब्लिक सिस्टम में काम करने जैसे कई अवसर हैं.” उन्होंने यह भी कहा कि योग्य ग्रेजुएट्स को अक्सर जल्दी नौकरी मिल जाती है.

उन्होंने कहा, “अब कई कामों के लिए अच्छे आयुर्वेदिक डॉक्टर मिलना मुश्किल हो रहा है क्योंकि अवसर बहुत ज्यादा हैं.”

उन्होंने यह भी कहा कि न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) और यूरोपीय संघ के साथ चल रही बातचीत में पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं. इससे भारतीय योग्यता वाले चिकित्सकों को विदेश में काम करने का मौका मिल सकता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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