नई दिल्ली: जब केंद्र सरकार अदालतों में जाती है, तो ज्यादातर उसकी ओर से पुरुष वकील ही बोलते हैं.
2025 में देश भर के हाई कोर्ट से जारी पैनल नोटिफिकेशन के विश्लेषण से पता चलता है कि केंद्र सरकार के वकीलों में महिलाओं की हिस्सेदारी मुश्किल से पांच में एक है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति भारतीय न्यायपालिका के हर स्तर पर दिखने वाले लैंगिक अंतर को ही दर्शाती है, और इसके बाहर भी यही स्थिति है.
ये वकील—जिन्हें सेंट्रल गवर्नमेंट स्टैंडिंग काउंसल, सीनियर पैनल काउंसल और गवर्नमेंट प्लीडर के रूप में नामित किया जाता है—केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय के लीगल अफेयर्स विभाग द्वारा नियुक्त किए जाते हैं.
देश की हर अदालत, जिनमें 25 हाई कोर्ट भी शामिल हैं, में वकीलों का एक पैनल होता है जो किसी भी मुकदमे में केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करता है. इन पैनलों के लिए कोई तय या एक समान संख्या नहीं होती. वकीलों की नियुक्ति केंद्र सरकार अपने विवेक और जरूरत के अनुसार करती है. हालांकि कानून मंत्रालय इन्हें नियुक्त करता है, लेकिन अदालतों में केंद्र सरकार का औपचारिक प्रतिनिधित्व दिखाने के लिए नोटिफिकेशन राष्ट्रपति के नाम से जारी किया जाता है.
डेटा क्या दिखाता है
दिप्रिंट के विश्लेषण में पाया गया कि अलग-अलग अदालतों के पैनल का डेटा एक जैसी कहानी बताता है.
सुप्रीम कोर्ट में इस समय नियुक्त 11 अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल में से केवल 2 महिलाएं हैं. पैनल वकीलों में—नवंबर 2025 में जारी ताजा सूची के अनुसार—654 में से 141 महिलाएं हैं. यानी महिलाओं की हिस्सेदारी 21.5 प्रतिशत है.
जिन हाई कोर्ट में 2025 में पैनल को फिर से अधिसूचित किया गया या बढ़ाया गया, वहां भी केंद्र सरकार के वकीलों में महिलाएं अल्पसंख्यक ही रहीं.
दिल्ली हाई कोर्ट में सितंबर 2025 की अधिसूचना के अनुसार 684 केंद्र सरकार के वकीलों में 161 महिलाएं थीं, यानी 21.8 प्रतिशत. बॉम्बे हाई कोर्ट में पिछले साल की दो अलग-अलग अधिसूचनाओं में भी लगभग यही स्थिति दिखी. नवंबर 2025 के पैनल में 276 वकीलों में 54 महिलाएं थीं यानी 19.5 प्रतिशत. जबकि सितंबर 2025 की अधिसूचना में 17 वकीलों में केवल 2 महिलाएं थीं यानी 11.7 प्रतिशत. दोनों को मिलाकर महिलाओं की कुल हिस्सेदारी 19.11 प्रतिशत रही.
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट, जिसकी तीन बेंच जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर में हैं, वहां मार्च 2025 की अधिसूचना के अनुसार 105 पैनल वकीलों में 21 महिलाएं थीं यानी 20 प्रतिशत. कर्नाटक हाई कोर्ट के नवंबर 2025 के नोटिफिकेशन के अनुसार भी लगभग यही स्थिति रही. सूची में हर पांच नामों में से एक महिला थी.
सबसे कम हिस्सेदारी पटना हाई कोर्ट में रही. जून 2025 की अधिसूचना के अनुसार 86 वकीलों में केवल 8 महिलाएं थीं, यानी 9.3 प्रतिशत. यह जांचे गए हाई कोर्ट में सबसे कम हिस्सा था.
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मई 2025 के पैनल में 12 वकीलों में 2 महिलाएं थीं यानी 16.6 प्रतिशत. वहीं ओडिशा हाई कोर्ट की जनवरी 2025 की अधिसूचना में 53 वकीलों में 8 महिलाएं थीं यानी 15 प्रतिशत.
कुछ हाई कोर्ट में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहतर था.
केरल हाई कोर्ट के 2025 में जारी अलग-अलग पैनलों में महिलाओं की हिस्सेदारी 15.3 प्रतिशत, 23.5 प्रतिशत और 31.4 प्रतिशत रही. इन सभी को मिलाकर कुल हिस्सेदारी 26 प्रतिशत बनी.
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में दिसंबर 2025 की अधिसूचना के अनुसार 47 वकीलों में 13 महिलाएं थीं यानी 27.6 प्रतिशत. तेलंगाना हाई कोर्ट के दिसंबर 2025 के नोटिफिकेशन में 110 वकीलों में 31 महिलाएं थीं यानी 28 प्रतिशत. और कलकत्ता हाई कोर्ट, जिसमें कई सर्किट बेंच शामिल हैं, वहां अगस्त 2025 के एक्सटेंशन नोटिफिकेशन के अनुसार 278 वकीलों में 71 महिलाएं थीं यानी 25.5 प्रतिशत.
कई हाई कोर्ट में 2025 में नया पैनल जारी ही नहीं हुआ और पुराने पैनल को ही बढ़ाकर जारी रखा गया. इनमें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट, गुजरात हाई कोर्ट, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट, उत्तराखंड हाई कोर्ट और गुवाहाटी हाई कोर्ट शामिल हैं.
इनमें से कुछ अदालतों में सबसे हाल का पैनल कई साल पुराना है. गुजरात हाई कोर्ट का आखिरी पैनल 2018 में जारी हुआ था, जिसमें 31 वकीलों में 4 महिलाएं थीं यानी 12.9 प्रतिशत. गुवाहाटी हाई कोर्ट का आखिरी पैनल 2019 का है, जिसमें 28 वकीलों में 6 महिलाएं थीं यानी 21.4 प्रतिशत.

सरकार क्या कहती है
लैंगिक असमानता के आंकड़े संसद में रखे गए आंकड़ों में भी दिखाई दिए.
2023 में राज्यसभा में कानून और न्याय मंत्रालय के जवाब के अनुसार, विभाग के वकीलों के पैनल में 5,382 पुरुष वकील और 411 महिला वकील थे. इसमें केंद्र सरकार के वकीलों के साथ अन्य पद भी शामिल हैं.
फिलहाल पैनल में महिलाओं के लिए कोई औपचारिक आरक्षण या सीट तय नहीं है.
दिप्रिंट ने शनिवार को पैनलों में लैंगिक प्रतिनिधित्व पर टिप्पणी के लिए कानून मंत्रालय से संपर्क किया. जवाब मिलने पर रिपोर्ट अपडेट की जाएगी.
यह सवाल भी उठे हैं कि आखिर पैनल में वकीलों को शामिल करने के फैसले किस तरह लिए जाते हैं.
पिछले साल दिसंबर में दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह तीन महीने के भीतर भारतीय अदालतों में केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों के पैनल के लिए स्पष्ट और पारदर्शी दिशानिर्देश तैयार करे और अधिसूचित करे. फिलहाल पैनल नियुक्तियों के लिए कोई स्पष्ट नियम नहीं हैं.
यह निर्देश एक जनहित याचिका के बाद दिया गया था, जिसमें सितंबर की अधिसूचना से नियुक्त हाई कोर्ट पैनल को चुनौती दी गई थी. याचिका में आरोप लगाया गया था कि पैनल में शामिल कुछ वकीलों ने ऑल इंडिया बार एग्जाम पास नहीं किया था, जो वकालत करने के लिए जरूरी शर्त है.
हाई कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा कि निष्पक्ष, योग्यता आधारित और पारदर्शी नियुक्तियों के लिए गैर-मनमाना और वस्तुनिष्ठ ढांचा जरूरी है. यह मामला अभी लंबित है.
महिला वकीलों का क्या कहना है
वरिष्ठ वकील, जिन्होंने खुद भी इन पदों पर काम किया है, कहते हैं कि कम संख्या उनके लिए हैरानी की बात नहीं है. उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि ये आंकड़े उन व्यवस्थाओं का नतीजा हैं जो काफी हद तक बदली नहीं हैं, और उन अनौपचारिक बाधाओं का भी जो सिर्फ औपचारिक नियुक्तियों से खत्म नहीं होतीं.
वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद, जो 2014 से 2020 तक भारत की अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रह चुकी हैं, ने कहा कि समस्या सिर्फ संख्या की नहीं है. यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि पैनल में शामिल होने के बाद महिलाओं को समान अवसर और महत्वपूर्ण काम मिलते हैं या नहीं.
आनंद ने कहा कि सरकारी पैनलों में प्रवेश भी उसी तरह की चुनौतियों को दोहराता है जिनका सामना महिलाएं पूरे पेशे में करती हैं.
उन्होंने कहा, “शुरुआती अवसरों तक पहुंच और करियर में लगातार आगे बढ़ना कई महिलाओं के लिए मुश्किल बना रहता है. ‘बॉयज क्लब’ की संस्कृति अभी भी इन बाधाओं को मजबूत करती है.”
उनके अनुसार, सरकारी पैनल जिन गुणों को महत्व देते हैं, वे खुद समस्या नहीं हैं, बल्कि समस्या यह है कि उन्हें किस तरह देखा और समझा जाता है.
उन्होंने कहा, “नेटवर्किंग, प्रयास, महत्वाकांक्षा, प्रतिबद्धता, समय और ऊर्जा, ये सभी आगे बढ़ने के लिए जरूरी चीजें हैं.” उन्होंने जोड़ा कि “महिलाओं को लेकर बने रूढ़िगत विचार” प्रगति में बड़ी बाधा बने रहते हैं क्योंकि अक्सर इन गुणों को महिलाओं के स्वभाव से अलग माना जाता है.
उन्होंने कहा, “एक और बड़ी बाधा महिलाओं की जिम्मेदारियां हैं, चाहे वे वास्तविक हों या मानी गई हों. परिवार, शादी, बच्चों की देखभाल, घर संभालना और जरूरी व्यावहारिक अनुभव को लगातार बनाए रखना, ये सब चुनौतियां बन जाती हैं.”
उनका कहना है कि करियर में निरंतरता ही इस समस्या का मुख्य हिस्सा है. “अक्सर करियर में ब्रेक आ जाता है और शादी व पारिवारिक जीवन के बाद काम में वापसी से यह निरंतरता टूट जाती है.”
आनंद ने कहा कि इस असमानता को दूर करने के लिए संस्थागत ढांचे और सामाजिक सोच दोनों में बदलाव जरूरी है, ताकि अवसर और पहुंच पूरी तरह योग्यता के आधार पर तय हो.
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि एक ऐसी प्रवृत्ति भी है जो दिखने में महिलाओं को आगे बढ़ाने जैसी लगती है लेकिन वास्तव में उन्हें सीमित कर देती है. यह मान लिया जाता है कि महिलाओं की विशेषज्ञता केवल महिलाओं से जुड़े मुद्दों में है.
उन्होंने कहा, “महिलाएं समाज में बराबर की भागीदार हैं और कानून के हर क्षेत्र में योगदान देती हैं. इस तरह का बंटवारा समानता को कमजोर करता है.”
वरिष्ठ अधिवक्ता नंदिता राव, जो दिल्ली सरकार की स्टैंडिंग काउंसल रह चुकी हैं, ने कहा कि ऐसे पैनल बाजार पर आधारित नहीं होते, इसलिए वे कानूनी पेशे में विविधता बढ़ाने का अच्छा अवसर बन सकते हैं.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मेरे विचार से सरकारी पैनल महिलाओं और पहली पीढ़ी के वकीलों को प्रोत्साहित करने का बहुत अच्छा तरीका हैं, क्योंकि इससे उन्हें अपनी योग्यता साबित करने का मौका मिलता है.” उन्होंने कहा कि ऐसी नियुक्तियां उन कामों तक पहुंच बढ़ा सकती हैं जिन्हें हासिल करना अन्यथा मुश्किल होता है.
राव ने सुझाव दिया कि सरकारी पैनलों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए. साथ ही चुनी गई महिलाओं में जाति, धर्म और यौनिकता के आधार पर विविधता सुनिश्चित करने का प्रावधान भी होना चाहिए. उन्होंने कहा कि ज्यादा विविधता से नए प्रतिभाशाली लोग सामने आएंगे और पेशा भी मजबूत होगा.
उन्होंने कहा कि ऐसे कदम संविधान के अनुच्छेद 15 और 21 के तहत समानता और गरिमा की प्रतिबद्धता के अनुरूप होंगे.
वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी गोराडिया दीवान, जो दिसंबर 2018 से जून 2023 तक सुप्रीम कोर्ट में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रही हैं, ने कहा कि समस्या को केवल इस नजरिए से देखना कि कितनी महिलाएं किसी खास पद तक पहुंचीं, सही नहीं होगा.
उन्होंने कहा, “असल समस्या यह है कि हम ऐसे पद और माहौल नहीं बना पा रहे हैं जहां बड़ी संख्या में महिलाएं लंबे समय तक टिक सकें.”
उन्होंने कहा कि कानून के कॉलेजों में बड़ी संख्या में महिलाएं पढ़ रही हैं, अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं और दाखिले की दर भी ज्यादा है. लेकिन समस्या व्यवस्था में है, क्योंकि यह उनके लिए बनाई ही नहीं गई थी और जब उन्हें पारिवारिक जीवन और पेशे के बीच संतुलन बनाना पड़ता है तो यह उन्हें पर्याप्त समर्थन नहीं देती.
उन्होंने कहा कि पुरुषों के हिसाब से बनी यह व्यवस्था अब काम तो करने लगी है, लेकिन इसकी बहुत बड़ी कीमत महिलाएं अपनी निजी जिंदगी में चुका रही हैं. उन्होंने कहा कि यही वह बात है जिस पर हम अभी बात भी नहीं कर रहे हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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