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Thursday, 5 March, 2026
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भारत-ईरान रिश्ते जमीन से ज्यादा वादों पर टिके रहे. हमारे लिए असली जोखिम US का ध्यान बंट जाना है

ईरान भारत के लिए एक और चिंता बन गया है क्योंकि ट्रंप के पास ध्यान भटकाने का एक और कारण हो सकता है.

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अमेरिका और इजरायल का ईरान पर हमला कम से कम कुछ समय में इलाके को और ज्यादा अस्थिर बना सकता है. दोनों देशों के पास हमला करने की वजह थीं, क्योंकि दशकों से ईरान पर इजरायल और अमेरिका को निशाना बनाने वाले आतंकवाद का आरोप रहा है, और तेहरान की सरकार से इजरायल को अस्तित्व का खतरा भी था. फिर भी यह साफ नहीं है कि खास तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अंत में क्या होगा, इस पर ठीक से सोचा था या नहीं.

इसका मतलब यह हो सकता है कि वह एक कमजोर लेकिन अभी भी सत्ता में मौजूद सरकार को पीछे छोड़ दें. ऐसी स्थिति और ज्यादा अराजकता पैदा कर सकती है. ट्रंप ने ईरान की जनता से उठ खड़े होने की अपील की है. लेकिन अगर यह कोई रणनीति है भी, तो यह मूर्खता है. दरअसल यह मुश्किल फैसले, यानी जमीनी सेना भेजने के सवाल से बचने का तरीका लगता है, क्योंकि सिर्फ हवाई हमलों से ईरान की सरकार की समस्या हल होने की संभावना कम है. तानाशाही सरकारें बाहर से मजबूत दिखती हैं, लेकिन वे अंदर से कमजोर हो सकती हैं. फिर भी यह बताना मुश्किल होता है कि वे कब टूटेंगी.

भारत के लिए यह मायने रखता है कि यह युद्ध कैसे आगे बढ़ेगा. लेकिन इसका सीधा संबंध ईरान से नहीं है.

अमेरिका पर उल्टा पड़ सकता है यह युद्ध

अमेरिकी हमले के कारण लगातार बदलते दिख रहे हैं. पहले कहा गया कि यह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है, जबकि ट्रंप ने पिछले साल दावा किया था कि उसे पहले ही खत्म कर दिया गया है. बाद में कहा गया कि यह ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को लेकर है. फिर आतंकवाद को समर्थन देने का मुद्दा आया. बीच में कहीं यह भी कहा गया कि ईरान में लोकतंत्र को बढ़ावा देना मकसद है. सोमवार को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने यह चौंकाने वाला दावा किया कि अमेरिका को आशंका थी कि इजरायल के हमले के जवाब में ईरान अमेरिका पर हमला कर सकता है, इसलिए यह कार्रवाई की गई.

मुमकिन है कि इन सभी कारणों का मिलाजुला असर रहा हो. लेकिन यह भी संभव है कि ट्रंप ने सभी नतीजों पर पूरा विचार किए बिना ही हमला शुरू कर दिया. ट्रंप के साथ हमेशा यही खतरा रहा है कि उनकी जानकारी की कमी, मूर्खता, जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास और कम ध्यान अवधि किसी रणनीतिक आपदा को जन्म दे सकती है. अमेरिकी सेना ने उन्हें सैन्य कार्रवाई के खतरे बताए थे, लेकिन लगता है उन्होंने उन पर ध्यान नहीं दिया.

बेशक, ट्रंप कुछ हफ्तों बाद जीत का ऐलान कर सकते हैं और अपनी सेना वापस बुला सकते हैं. लेकिन इससे इलाका और ज्यादा अराजक हो सकता है. इससे कुछ हद तक इजरायल के हित पूरे हो सकते हैं, क्योंकि इजरायल उस सरकार को कमजोर करना चाहता है जो उसके लिए लगातार खतरा रही है. लेकिन अराजक इलाका जरूरी नहीं कि अमेरिका के हित में हो.

इसके अलावा ईरान ने दिखाया है कि वह अमेरिकी सेना और उसके सहयोगियों पर जवाबी हमला करने की क्षमता रखता है, भले ही इजरायल और अमेरिका उसकी शीर्ष नेतृत्व को निशाना बना रहे हों. ट्रंप खुद को एक लंबे युद्ध में फंसा पा सकते हैं, जो उनकी योजना से ज्यादा लंबा हो, क्योंकि फैसले ठीक से नहीं लिए गए. अमेरिका की भारी ताकत भी ट्रंप की गलतियों की भरपाई न कर पाए.

इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान की उस सख्त और धार्मिक सरकार के लिए कोई सहानुभूति है. उस पर देश के अंदर और बाहर आतंकवाद में शामिल होने के आरोप रहे हैं. हाल के हफ्तों में इस सरकार ने हजारों अपने ही नागरिकों, ज्यादातर युवाओं, को मार दिया जो विरोध करने की हिम्मत कर रहे थे. खासकर महिलाओं के प्रति उसकी क्रूरता डरावनी है. यही कारण है कि ईरान के कई लोग, खासकर महिलाएं, अयातुल्ला की हत्या पर खुलकर जश्न मना रही हैं.

जहां तक किसी देश के नेता की हत्या का सवाल है, ईरान के हाथ भी साफ नहीं हैं. ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के सदस्यों पर लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफ़िक हरिरी की हत्या का आरोप रहा है. यह मानना मुश्किल है कि ईरानी नेतृत्व को इस हत्या की कम से कम जानकारी या मंजूरी न रही हो, भले ही उसने सीधे आदेश न दिया हो.

ईरान युद्ध और भारत की चीन समस्या

जहां तक भारत के हितों का सवाल है, तस्वीर कुछ उलझी हुई है. वैसे भी भारत की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह इसमें बहुत कुछ कर सके. बहुध्रुवीय दुनिया की बात चाहे जितनी हो, भारत और बाकी दुनिया अभी किनारे बैठकर ही देख सकते हैं. न सीधे और न ही परोक्ष रूप से वे नतीजों पर ज्यादा असर डाल सकते हैं. ‘ग्लोबल साउथ’, ब्रिक्स या ‘मिडल पावर कोएलिशन’ जैसी बातें सिर्फ नाम की हैं. ये अंतरराष्ट्रीय राजनीति को आगे बढ़ाने की असली ताकत नहीं हैं. ये विदेश मंत्रालयों और नेताओं को बड़े-बड़े शब्द बोलने और बेकार शिखर बैठकों में दस्तखत करने का मौका देती हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से इनका कोई मतलब नहीं है.

यह बात नई नहीं है और न ही सिर्फ ईरान के मामले में है. भारत का अपना अनुभव भी ऐसा ही रहा है. आजादी के बाद जिन देशों को भारत अपना साथी मानता था, जरूरत पड़ने पर उन्होंने निराश ही किया. चाहे 1962 हो, 1971 हो या हाल के समय में संसद पर आतंकी हमला या 2008 का मुंबई हमला, वे या तो मौजूद नहीं थे या स्थिति और खराब कर गए.

ईरान खुद भी भारत के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी बात की जाती है. हां, भारत और ईरान के बीच संबंध उपयोगी हैं. लेकिन वे क्षेत्र के अरब देशों, खासकर खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों से ज्यादा अहम नहीं हैं. और इजरायल भारत के लिए कई व्यावहारिक तरीकों से ज्यादा मायने रखता है. ट्रंप के बावजूद, चीन से मिलने वाले असली खतरे से निपटने में अमेरिका भारत के लिए और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है.

इसके अलावा भारत और ईरान के संबंध हमेशा हकीकत से ज्यादा उम्मीद पर आधारित रहे हैं. तेल जरूर अहम है, लेकिन वह कोई दुर्लभ चीज नहीं है. भारत पहले ही ईरानी तेल का आयात कम कर चुका था. अब यह मात्रा बहुत कम है, करीब एक अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर, जबकि कुल तेल आयात बिल 137 अरब अमेरिकी डॉलर से ज्यादा है.

ईरान को सेंट्रल एशिया के लिए एक पुल के तौर पर देखना और भी बेतुकी बात है. मध्य एशिया कोई ऐसा खजाना नहीं है जो भारत के लिए बेहद जरूरी हो. असली समस्या वहां पहुंचने की भौतिक दूरी नहीं है, बल्कि ऐसे संबंध बनाने में भारत की अपनी कमजोरी है. दक्षिण-पूर्व एशिया को ही देख लीजिए, जो भारत के लिए कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है और जहां ऐसी भौतिक रुकावटें भी नहीं हैं. फिर भी दशकों से चल रही लुक ईस्ट या एक्ट ईस्ट नीति में भारत को वहां खास सफलता नहीं मिली.

फिर भी एक असली चिंता है, जिस पर भारत को ट्रंप के ईरान युद्ध के संदर्भ में ध्यान देना चाहिए.

वह चिंता यह है कि अगर अमेरिका फिर से मध्य पूर्व में उलझ गया, तो वह इंडो-पैसिफिक और चीन पर ध्यान नहीं दे पाएगा.

यह हमेशा साफ नहीं था कि ट्रंप लगातार और गंभीर तरीके से चीन के बारे में सोच सकते हैं या नहीं. उनका स्वार्थ और दूरदर्शिता की कमी हमेशा यह खतरा पैदा करती रही कि वे बीजिंग के साथ अपने फायदे का कोई समझौता कर लें और अमेरिका के साझेदारों को असमंजस में छोड़ दें. अब ईरान एक और चिंता बन गया है, क्योंकि उनके पास ध्यान भटकाने का एक और कारण हो सकता है. यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ट्रंप के साथ सभी कठिनाइयों के बावजूद, चीन को संतुलित करने के लिए अमेरिका ही भारत की असली उम्मीद है.

राजेश राजगोपालन जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली में इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के प्रोफेसर हैं. वे @RRajagopalanJNU पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं. 

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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