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Friday, 27 February, 2026
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आबकारी नीति में हेरफेर करने का केजरीवाल के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता: अदालत

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नयी दिल्ली, 27 फरवरी (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को कहा कि सीबीआई पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ आबकारी नीति में हेरफेर का मामला प्रथम दृष्टया साबित करने में नाकाम रही।

अदालत ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक को आरोपमुक्त करते हुए यह बात कही।

विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने केजरीवाल के खिलाफ लगाये गए इस आरोप पर गौर किया कि वह मामले में एक ‘‘केंद्रीय व्यक्ति’’ हैं, जिन्होंने तथाकथित ‘‘साउथ ग्रुप’’ के लाभ के लिए और साथ ही खर्च किये गए पैसे को वापस प्राप्त करने के उद्देश्य से नीति में हेरफेर किया था।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘अभियोजन पक्ष ने मुख्य रूप से गवाह संख्या 225 एम श्रीनिवासुलु रेड्डी के बयान के उस एक वाक्य के आधार पर आरोपी संख्या 18 (केजरीवाल) को जोड़ने की कोशिश की, जिसमें कहा गया है, ‘इसके बाद, उन्होंने मुझे बताया कि तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता इस संबंध में मुझसे संपर्क करेंगी’।’’

हालांकि, अदालत ने अपने समक्ष मौजूद साक्ष्यों पर गौर करते हुए कहा कि केजरीवाल को किसी भी कथित नीतिगत हेरफेर या अवैध रिश्वत से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ने वाला कोई प्रासंगिक दस्तावेज, फाइल नोटिंग, इलेक्ट्रॉनिक संचार, वित्तीय लेनदेन या डिजिटल साक्ष्य मौजूद नहीं है।

अदालत ने कहा, ‘‘ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे पता चले कि वह साजिश रची जाने वाली किसी बैठक में मौजूद थे या उन्हें किसी गैरकानूनी करार की जानकारी थी। उन्हें फंसाने की कोशिश एक अप्रमाणित, सह-आरोपी जैसे बयान से निकाले गए निष्कर्ष पर आधारित है।’’

अदालत ने कहा कि केवल ‘‘षड्यंत्र’’ शब्द का प्रयोग करने से सहमति और भागीदारी दर्शाने वाले सबूतों की आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाती।

अदालत ने कहा, ‘‘अभियोजन पक्ष इस आधार पर आगे बढ़ा कि नीति में आपराधिक इरादे से हेरफेर किया गया था। यदि यह आधार स्थापित नहीं होता है, तो बाद के आरोप (बड़े षड्यंत्र के) स्वतः ही निराधार हो जाते हैं।’’

न्ययाधीश ने 598 पृष्ठों के आदेश में यह भी कहा कि नीति की जांच के दौरान केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा जुटाए गए सबूत ‘‘नीति को छिपाने, पक्षपातपूर्ण फैसले लेने’’ का प्रथम दृष्टया मामला उजागर करने में विफल रहे तथा मामले में पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को भी आरोपमुक्त कर दिया।

अदालत ने कहा, ‘‘आरोपी संख्या 18 (केजरीवाल) को किसी भी आपराधिक साजिश से जोड़ने वाले ठोस सबूतों के अभाव में और एक सह-आरोपी जैसे गवाह के बयानों की स्वतंत्र पुष्टि के अभाव में, उनपर षड्यंत्र में केंद्रीय भूमिका निभाने का आरोप लगाना उचित नहीं है।’’

न्यायाधीश ने कुछ गवाहों के साक्ष्य के संबंध में ‘‘गंभीर खामी’’ की ओर इशारा किया।

उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों के अनुसार, जिन व्यक्तियों ने कथित लेन-देन में भागीदारी स्वीकार की थी, उनसे केवल अभियोजन पक्ष के गवाहों के रूप में पूछताछ की गई, उन्हें आरोपी के रूप में पेश नहीं किया गया और न ही उन्हें सरकारी गवाह के रूप में क्षमादान दिया गया था।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘फिर भी, ऐसा लगता है कि उनके बयान को पूरी तरह से स्वतंत्र गवाहों के बयान के समान माना गया। यह भी संभव है कि एजेंसियां ​​कानून में स्थापित स्थिति से अवगत थीं, लेकिन उन्होंने अपने मामले को अधिक मजबूत बनाने के लिए ऐसे गवाहों को स्वतंत्र गवाह के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की।’’

उन्होंने कहा कि षड्यंत्र के लिए जवाबदेही का अनुमान केवल एक व्यक्ति के आधार पर नहीं लगाया जा सकता, बल्कि यह निकटवर्ती, सुसंगत और परस्पर संबद्ध परिस्थितियों से उत्पन्न होता है।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘ऐसे प्रासंगिक साक्ष्यों के अभाव में, जिस प्रकार के कथन पर भरोसा किया गया है, वह अपने आप में आगे की कार्यवाही के लिए आवश्यक कानूनी आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकता।’’

अदालत ने कहा कि जब रेड्डी के बयान का सही मूल्यांकन ‘‘खुद को फंसाने वाला, सहभागी बयान के रूप में किया गया, जो एक सरकारी गवाह के समान है’’, और स्वतंत्र पुष्टि के अभाव के आधार पर इसकी जांच की गई, तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस तरह का असत्यापित बयान केजरीवाल के खिलाफ कार्यवाही करने का कानूनी रूप से टिकाऊ आधार नहीं है।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ‘‘नीति में हेरफेर का प्रथम दृष्टया मामला भी स्थापित करने में विफल रहा’’ और न ही ऐसा कोई सबूत है, जो (आबकारी) नीति के निर्माण में आपराधिक षड्यंत्र होने का संकेत देने वाले किसी पूर्व करार या बनी सहमति की ओर इशारा करता हो।’’

अदालत ने कहा कि आबकारी नीति से जुड़े रिकॉर्ड विभिन्न स्तरों पर विचार-विमर्श, सक्षम प्राधिकारों द्वारा जांच और नीतिगत ढांचे के क्रमिक विकास को दर्शाता है, जिसका समापन उपराज्यपाल की मंजूरी के साथ हुआ।

केजरीवाल द्वारा गोवा चुनाव के लिए धन का उपयोग करने के आरोपों के संबंध में, अदालत ने कहा कि यदि आपराधिक इरादे को आगे बढ़ाने के लिए नीति में हेरफेर का मूल आरोप प्रथम दृष्टया जांच में खरा नहीं उतरता है, तो बाद का आरोप स्वतः ही अपना आधार खो देता है।

अदालत ने संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति पर मुकदमा चलाने के गंभीर परिणामों को भी रेखांकित किया।

अदालत ने कहा, ‘‘ऐसी परिस्थितियों में गिरफ्तारी और मुकदमा चलाने के परिणाम व्यक्ति विशेष तक ही सीमित नहीं होते। इससे संस्थाओं में जनता का विश्वास भी प्रभावित होता है…।’’

भाषा सुभाष दिलीप

दिलीप

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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