scorecardresearch
Friday, 27 February, 2026
होममत-विमतपूर्वोत्तर के लोगों पर नस्लीय हमले ने आखिरकार सरकार का ध्यान खींचा, लेकिन मुसलमानों का क्या?

पूर्वोत्तर के लोगों पर नस्लीय हमले ने आखिरकार सरकार का ध्यान खींचा, लेकिन मुसलमानों का क्या?

भारत में पहचान के आधार पर सबसे ज्यादा गाली-गलौज और दुर्व्यवहार के शिकार मुसलमान होते हैं. इस मामले में यह दुर्व्यवहार ऊपर बैठे लोगों की तरफ से आता है और कोई भी इसके खिलाफ कुछ करने को तैयार नहीं है.

Text Size:

जब बात भेदभाव के खिलाफ लड़ाई की आती है, तो थोड़ी राहत की वजह है, लेकिन चिंता की भी बहुत वजह है. पहले अच्छी खबर से शुरू करते हैं. अरुणाचल की तीन महिलाओं के साथ नफरत भरी नस्लीय गालियां दी गईं, उनके खिलाफ अपमानजनक शब्द बोले गए और उन पर ‘‘लूज़ कैरेक्टर’’ होने का आरोप लगाया गया.

पूर्वोत्तर से आने वाले किसी भी व्यक्ति को बताइए कि यह दिल्ली में हुआ, तो आपको सिर्फ बेबसी भरी दुखी सांस ही मिलेगी. इस क्षेत्र के लोगों के खिलाफ इतना ज्यादा भेदभाव है कि इसके शिकार लोग अब इसके आदी हो चुके हैं.

लेकिन इस बार मामला अलग था. बड़े राजनीतिक नेता इसमें शामिल हो गए. अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इस बारे में पोस्ट किया और केंद्र सरकार में पूर्वोत्तर मामलों के मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी इसे मुद्दा बनाया. अपशब्द कहने वालों को गिरफ्तार किया गया और उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि गालियां गुस्से में दी गई थीं. (ऐसा लगा जैसे उन्हें लगा कि इससे उनका काम सही हो जाता है.) इस मामले में बड़े राजनीतिक ध्यान की वजह से यह मामला खत्म नहीं होगा और शायद आरोपियों को मिलने वाली सज़ा दूसरों के लिए चेतावनी बनेगी.

अब चिंता की बात. हम कह सकते हैं कि कुछ साल पहले ऐसा दुर्व्यवहार अज्ञानता की वजह से होता था. भारत के बाकी हिस्सों के लोग पूर्वोत्तर के बारे में बहुत कम जानते थे, लेकिन अब यह सच नहीं है. भारत के बड़े शहरों में लोग खासी, मिजो, नागा और दूसरे समुदायों के बारे में जानते हैं. वे जानते हैं कि वे न तो नेपाली हैं और न ही चीनी.

फिर भी, जब भी किसी तरह का झगड़ा होता है, तो वही पुरानी गालियां दी जाती हैं: इन लोगों को ‘चिंकी’ कहा जाता है. महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं और भी बहुत कुछ कहा जाता है.

ऐसा लगता है कि यह सब जल्दी खत्म नहीं होने वाला है और पूर्वोत्तर के हज़ारों युवा अपने ही देश में अपमान झेलते रहेंगे.

बदलाव में कितना समय लगेगा?

कुछ लोग मुझसे कहते हैं कि धैर्य रखो. वो कहते हैं कि वक्त के साथ सब बेहतर हो जाता है. 1960 के दशक के आखिर तक दक्षिण भारतीयों की स्थिति को याद कीजिए. हिंदी फिल्मों में उनका मज़ाक बनाया जाता था और उनके सांवले रंग की वजह से उन्हें “कालू” जैसे नाम दिए जाते थे. इसमें कुछ मज़ाक हो सकता था, लेकिन इसमें हमेशा एक चुभन भी होती थी. शुरुआत में, उत्तर भारतीयों को यह समझने में भी बहुत समय लगा कि सभी दक्षिण भारतीय मद्रासी नहीं होते.

इससे कुछ अजीब हालात पैदा हुए. 1967 में, जब शिव सेना बॉम्बे में मलयाली लोगों को पीट रही थी, तो वह अपने पीड़ितों से कहती थी कि यहां से चले जाओ. मद्रास वापस जाओ क्योंकि शिव सेना के गुस्से का शिकार हुए ज्यादातर लोग अपनी ज़िंदगी में कभी मद्रास गए ही नहीं थे, इसलिए उन्हें समझ नहीं आता था कि अब क्या करें.

लगभग हमेशा ऐसा ही होता है. यह एक मज़ाक जैसे शब्द से शुरू होता है (‘अरे चिंकी’ या ‘ओए कालिया’) और फिर, जब ये छवि बन जाती है, तो इन्हें आसानी से हथियार बना लिया जाता है.

यह कहा जाता है कि जैसे दक्षिण भारतीयों ने उत्तर भारतीयों के भेदभाव और अज्ञानता को पार कर लिया, वैसे ही पूर्वोत्तर के लोग भी कर लेंगे. मुझे उम्मीद है कि यह सच होगा, लेकिन मैं बैठकर इस धीरे-धीरे होने वाले बदलाव का इंतज़ार नहीं करना चाहता. हमें नस्लवादी लोगों को जेल भेजते रहना चाहिए और पूर्वोत्तर के किसी भी व्यक्ति का अपमान करने वाले को गिरफ्तार करना चाहिए. अब जब सज़ा देने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, तो इसे पूरी तेज़ी से जारी रखना चाहिए.

काश मैं यहां खत्म कर पाता और आपको बता पाता कि भारत भेदभाव के खिलाफ यह लड़ाई जीत जाएगा, लेकिन हम दोनों जानते हैं कि पूर्वोत्तर के लोगों पर हमलों को लेकर हम जितने भी गुस्से में हों, समस्या यहीं खत्म नहीं होती. हिंदू समाज निचली जातियों के प्रति सम्मान की कमी और दलितों के प्रति तिरस्कार पर बना है. बराबरी के सिद्धांत की सिर्फ बातें होती हैं, लेकिन हम इसके लिए बहुत कम करते हैं.

जब पिछड़ी जातियां और दलित अपने अधिकार मांगते हैं, तो अक्सर टकराव हो जाता है क्योंकि ऊंची जातियां बिना विरोध के उन्हें सम्मान नहीं देतीं. अच्छी बात यह है कि इन टकरावों में ज्यादातर लड़ाई चुनाव के जरिए हुई है, इसलिए हम खून-खराबे से बचे रहे हैं.

लेकिन यहां एक बड़ी समस्या भी है. जब दिल्ली में दो आम लोग पूर्वोत्तर की महिलाओं का अपमान करते हैं, तो हम गुस्सा हो जाते हैं, मंत्री बयान देते हैं और जब मामला अदालत में जाता है, तो और भाषण दिए जाते हैं.

यह अच्छी बात है और इसे बढ़ावा देना चाहिए, लेकिन यह एक और गहरी समस्या को छिपा देता है.

वोट के लिए मुसलमानों को निशाना बनाना

भारत में पहचान के आधार पर होने वाले अपमान के सबसे ज्यादा शिकार मुसलमान हैं और उनके मामले में, यह अपमान बढ़ रहा है. पिछले दो दशकों में किसी भी समय से ज्यादा, उन्हें खुद को हीन महसूस कराया जा रहा है—उन पर शक किया जाता है और उनकी भारतीयता और वफादारी पर लगातार सवाल उठाए जाते हैं.

इस मामले में, अपमान ऊपर बैठे लोगों की तरफ से आता है और कोई भी इसके बारे में कुछ करने को तैयार नहीं है. कुछ नेताओं के लिए, मुसलमानों को भड़काना और उनका अपमान करना एक राजनीतिक तरीका है, जिससे सांप्रदायिक हिंदुओं से वोट जीते जा सकें.

सिर्फ एक मामला देख लीजिए. असम—जहां चुनाव होने वाले हैं, वहां के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में मुसलमानों के बारे में कई ऐसी बातें कही हैं जो साफ तौर पर गलत हैं. उन्होंने हिंदुओं को मुसलमानों को कम पैसे देने के लिए प्रोत्साहित किया और एक वीडियो में वह मुसलमानों पर बंदूक तानते हुए दिखते हैं. बाद में उन्होंने उस वीडियो से अपना संबंध होने से इनकार कर दिया, लेकिन बाकी बातें अभी भी कायम हैं. चुनाव आयोग ने कुछ नहीं कहा है. और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को देखने से इनकार कर दिया और इसे निचली अदालत में भेज दिया.

इस सब में न्याय कहां है?

तो हां, मुझे खुशी है कि सरकार पूर्वोत्तर के लोगों पर हमला करने वालों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है. हर तरह के भेदभाव के खिलाफ लड़ना चाहिए.

लेकिन क्या हम सच में भेदभाव के खिलाफ लड़ने की बात कर सकते हैं, जब हमारी 15 प्रतिशत आबादी अपमान और भेदभाव के खतरे में है और उनके पास न्याय पाने का कोई तरीका नहीं है?

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: मुसलमानों को ‘गोली मारने’ वाले हिमंत बिस्वा सरमा के वीडियो पर कानून क्या कहता है


 

share & View comments