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Saturday, 11 April, 2026
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गुजरात विधानसभा में वंदे मातरम प्रस्ताव को लेकर भाजपा, कांग्रेस के बीच जुबानी जंग

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गांधीनगर, 23 फरवरी (भाषा) गुजरात विधानसभा में सोमवार को मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने राष्ट्र गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक प्रस्ताव पेश किया जिसके बाद सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के सदस्यों को बीच जुबानी जंग छिड़ गई।

पटेल द्वारा प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद हुई बहस में भाग लेते हुए, उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने कांग्रेस और इसके पूर्व नेतृत्व, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी शामिल हैं, पर वोट बैंक की राजनीति के लिए राष्ट्र गीत को कमजोर करने और उसका अपमान करने का आरोप लगाया।

संघवी ने कहा, “वंदे मातरम महज एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्र को मां के समान पूजने की एक श्रद्धा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ राजनीतिक दलों और लोगों को इस पवित्र गीत से भी घृणा है। अतीत में भी उनमें यह घृणा थी, और मुझे इसमें कोई बदलाव की गुंजाइश नहीं दिखती।”

उन्होंने पूछा कि किसी भारतीय को उस गीत को गाने पर क्या आपत्ति हो सकती है जिसे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान फांसी पर चढ़ते समय क्रांतिकारियों ने गाया था?

संघवी ने आरोप लगाया कि वंदे मातरम का विरोध स्वतंत्रता-पूर्व दौर से चला आ रहा है।

उन्होंने कहा, “अंग्रेजों को इस गीत पर आपत्ति थी। उनके साथ-साथ (मुहम्मद अली) जिन्ना को भी आपत्ति थी, और उनके अनुयायियों को भी।”

संसद में वंदे मातरम का गायन 1992 में ही शुरू हुआ, जब भाजपा ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें कहा गया कि भाजपा के लिए देशभक्ति राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में निहित एक अंतर्निहित मूल्य है।

कांग्रेस पर हमला करते हुए, संघवी ने कहा कि ठीक 50 साल पहले, जब इस गीत ने 100 साल पूरे किए थे, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था और वंदे मातरम का नारे लगाने वालों को जेल में डाल दिया था।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में 150वें वर्षगांठ समारोह के दौरान, संसद में कांग्रेस नेताओं ने वंदे मातरम पर चर्चा करने का विरोध किया और कुछ नेता इसके गायन के दौरान अनुपस्थित रहे।

उन्होंने कहा, “नेहरू जी से लेकर कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व तक, वंदे मातरम के प्रति उनकी नापसंदगी बरकरार है।”

संघवी ने आरोप लगाया कि 1937 में मुस्लिम लीग के दबाव में आकर कांग्रेस नेताओं ने गीत के केवल पहले दो छंद गाने पर सहमति जताई थी।

उन्होंने कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति के माध्यम से अलगाववादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा, “वंदे मातरम का यह विभाजन मात्र एक गीत का विभाजन नहीं था; यह देश के विभाजन का बीज था।”

संघवी ने कहा कि अगर कांग्रेस और नेहरू ने उस समय साहस दिखाया होता, तो शायद देश को विभाजन का सामना नहीं करना पड़ता।

उन्होंने जोर देकर कहा कि जो लोग भारत माता का सम्मान नहीं करते, उन्हें इस सदन में बैठने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

इन आरोपों का जवाब देते हुए, कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक शैलेश परमार ने वंदे मातरम के साथ अपनी पार्टी के ऐतिहासिक जुड़ाव का बचाव किया और भाजपा पर इतिहास को विकृत करने का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा, “देशभक्ति की भावना भारतीयों के रक्त में बहती है। इसे किसी को याद दिलाने की जरूरत नहीं है।” परमार ने स्पष्ट किया कि वह और उनकी पार्टी मुख्यमंत्री के प्रस्ताव का समर्थन करते हैं।

उन्होंने वंदे मातरम को एक “क्रांतिकारी सूत्र” बताया जिसने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी और स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बन गया।

परमार ने इसकी कालानुक्रमिक जानकारी देते हुए बताया कि बंकिम चंद्र ने सर्वप्रथम 1875 में इन छंदों को लिखा और बाद में 1882 में “आनंदमठ” में इनका विस्तार किया।

उन्होंने कहा कि 1905 के बंगाल विभाजन आंदोलन के दौरान, रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को लोकप्रिय बनाया और इसे एकता का प्रतीक बना दिया।

परमार ने कहा, “आप नारे और विमर्श बदल सकते हैं, लेकिन इतिहास को मिटा नहीं सकते।”

उन्होंने बताया कि 1946 में कलकत्ता में महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल और नेहरू की उपस्थिति में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम को राष्ट्र गीत का दर्जा देने का प्रस्ताव पारित किया गया था।

उन्होंने कहा कि आजादी के बाद, संविधान सभा ने जनसंघ के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित सभी नेताओं की सहमति से इसे राष्ट्र गीत के रूप में मान्यता दी थी।

चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवानी ने कहा कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन कांग्रेस के नेतृत्व में सभी जाति और धर्म के लोगों की एकता पर आधारित था।

उन्होंने अब्दुल रसूल, जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, “सभी जातियों और धर्मों के लोग एकजुट हुए और हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की नींव रखी।”

मेवानी ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ का नारा लगाने का अधिकार प्रत्येक भारतीय का है।

उन्होंने कहा, “मुझे कांग्रेस का कार्यकर्ता होने पर गर्व है, जिसके सैनिक ब्रिटिश लाठियों का सामना करते हुए, गोलियां खाते हुए और जेल जाते हुए भी मुस्कुराते रहे।”

व्यापक बहस के दौरान सत्ता पक्ष के सदस्यों की आलोचनाओं से नेहरू का बचाव करते हुए मेवानी ने कहा कि लोकतंत्र में कोई भी नेता की आलोचना कर सकता है।

लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि नेहरू ने मातृभूमि के लिए 11-12 साल जेल में बिताए।

मेवानी ने कहा, “हम सभी इस नारे को लगा सकते हैं, लेकिन कौन इसे नहीं लगा सकता? जासूसी घोटालों में शामिल लोग और जिनके नाम एप्स्टीन फाइलों में सामने आए हैं, उन्हें वंदे मातरम का नारा लगाने का नैतिक अधिकार नहीं है।”

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के समर्थन से यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया।

भाषा प्रशांत नेत्रपाल

नेत्रपाल

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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