नई दिल्ली: एविएशन सेक्टर में एक बड़ा सहयोग हो सकता है, भारत फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (एससीएएस) प्रोग्राम के तहत भविष्य के छठी पीढ़ी के फाइटर जेट के को-डेवलपमेंट और को-मैन्युफैक्चर के लिए फ्रांस के साथ मिलकर काम करने की संभावना तलाश रहा है. दिप्रिंट को इस बारे में जानकारी मिली है.
इस प्रोग्राम में भारत के शामिल होने की संभावना पर शुरुआती बातचीत पहले ही हो चुकी है, जिसे 2017 में फ्रांस, जर्मनी और स्पेन ने यूरोप की रक्षा और सुरक्षा में संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए शुरू किया था.
हालांकि, करीब नौ साल बाद, यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट मुश्किल दौर से गुज़र रहा है क्योंकि लीडरशिप और काम के बंटवारे को लेकर बड़े मतभेद इसके भविष्य के लिए खतरा बन रहे हैं.
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने पिछले हफ्ते कहा कि 100 बिलियन यूरो का यह प्रोग्राम अब उनके लिए काम नहीं कर रहा है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यह “राजनीतिक विवाद नहीं” बल्कि तकनीकी मुद्दा है.
फ्रांस को ऐसा जेट चाहिए जो परमाणु हथियार ले जा सके और एयरक्राफ्ट कैरियर से उड़ान भर सके, जबकि जर्मनी को इसकी ज़रूरत नहीं है क्योंकि वह परमाणु हथियारों के खिलाफ है और उसने अपने परमाणु पावर प्लांट भी बंद कर दिए हैं.
इस प्रोजेक्ट में शामिल कंपनियां हैं—Dassault Aviation (फ्रांस), Airbus (जर्मनी/स्पेन) और Indra Sistemas (स्पेन).
Airbus और Dassault के बीच विवाद इतना बढ़ गया है कि यूरोप की इस बड़ी एविएशन कंपनी ने सार्वजनिक रूप से “टू-फाइटर सॉल्यूशन” का सुझाव दिया है, जिसमें फ्रांस और जर्मनी/स्पेन अलग-अलग फाइटर जेट डिजाइन कर सकते हैं, लेकिन एफसीएएस के साझा सिस्टम के तहत काम करेंगे, ताकि पूरा प्रोग्राम बंद न हो जाए.
द गार्डियन के अनुसार, Airbus के चीफ एग्जीक्यूटिव गिलाउम फॉरी ने गुरुवार को कहा कि फ्रांस और जर्मनी अलग-अलग जेट बना सकते हैं, लेकिन उन्हें साझा कॉम्बैट क्लाउड और ड्रोन सिस्टम से जोड़ा जा सकता है.
कंपनी के सालाना नतीजों की घोषणा के दौरान उन्होंने कहा कि यह गतिरोध “इस हाई-टेक यूरोपीय क्षमता के पूरे भविष्य को खतरे में नहीं डालना चाहिए, जो हमारी सामूहिक रक्षा को मजबूत करेगा.”
फॉरी ने कहा, “अगर हमारे ग्राहक ऐसा चाहते हैं, तो हम टू-फाइटर सॉल्यूशन का समर्थन करेंगे और यूरोपीय सहयोग के जरिए नए एफसीएएस में प्रमुख भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.”
द गार्डियन ने फॉरी के हवाले से रिपोर्ट किया, उन्होंने कहा कि एफसीएएस “मुश्किल दौर” में है, लेकिन “हम अब भी मानते हैं कि यह पूरा प्रोग्राम सही है”.
भारत की दिलचस्पी
रक्षा और सुरक्षा से जुड़े सूत्रों ने कहा कि भारत ने फ्रांस को “साफ-साफ” बता दिया है कि अगर जर्मनी के साथ बात नहीं बनती है, तो वह एफसीएएस प्रोजेक्ट में शामिल होने के लिए तैयार है.
भारत पहले से ही अपना पांचवीं पीढ़ी का ए़डवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) बना रहा है और एफसीएएस में सहयोग से भारत को छठी पीढ़ी की तकनीकों जैसे मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग, कॉम्बैट क्लाउड नेटवर्किंग और एडवांस्ड प्रोपल्शन और स्टैल्थ तक तेज़ी से पहुंच मिल सकती है.
एफसीएएस एक संयुक्त यूरोपीय प्रोग्राम बना रहेगा, अलग-अलग प्रोग्राम में बंट जाएगा, या भारत-फ्रांस साझेदारी में बदल जाएगा, यह अभी देखना बाकी है, लेकिन शुरुआती बातचीत से पता चलता है कि नई दिल्ली यूरोप के इस महत्वाकांक्षी एयर कॉम्बैट प्रोजेक्ट पर करीबी नजर रखे हुए है.
यह दूसरी बार होगा जब भारत एविएशन सेक्टर में भविष्य की तकनीक के विकास के लिए किसी विदेशी देश के साथ काम करेगा.
भारत ने पहले रूस के साथ फिफ्थ जनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट (एफजीएफए) के लिए समझौता किया था, लेकिन काम के बंटवारे और विमान के पांचवीं पीढ़ी के मानकों पर खरा न उतरने के कारण 2018 में इससे बाहर हो गया था.
भारतीय अधिकारियों ने फ्रांस पर भरोसा जताया है और यह भरोसा 1950 के दशक से है. तब से ऐसा कोई समय नहीं रहा जब भारतीय वायु सेना ने Dassault Aviation का बना हुआ या फ्रांस से जुड़ा फाइटर जेट न उड़ाया हो.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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