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Monday, 23 February, 2026
होमदेशISI जासूसी केस: कोलकाता कोर्ट ने पाकिस्तानी समेत 4 को सुनाई जेल, देश को अस्थिर करने की थी साजिश

ISI जासूसी केस: कोलकाता कोर्ट ने पाकिस्तानी समेत 4 को सुनाई जेल, देश को अस्थिर करने की थी साजिश

इन लोगों पर रक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी इकट्ठा कर भेजने और नकली भारतीय नोट चलाने का आरोप था. पांचवें आरोपी की ट्रायल के दौरान मौत हो गई.

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नई दिल्ली: यह कहते हुए कि इन लोगों ने रक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी इकट्ठा करने और भेजने तथा नकली भारतीय करेंसी नोट चलाने सहित भारत को अस्थिर करने के मकसद से मिलकर साजिश रची, कोलकाता की एक अदालत ने शुक्रवार को एक पाकिस्तानी नागरिक समेत चार लोगों को जेल की सज़ा सुनाई. 10 साल तक चले ट्रायल के दौरान पांचवें मुख्य आरोपी की मौत हो गई.

कोर्ट ने यह भी कहा कि यह अपराध “राष्ट्रीय सुरक्षा के दिल पर हमला” करता है और आरोपियों ने “गुप्त योजना और संगठित साजिश” के जरिए राज्य के “अस्तित्व को ही चुनौती” दी.

कोर्ट इरशाद अंसारी (जिसकी 2023 में मौत हो गई), उसके बेटे अशफाक अंसारी, उनके रिश्तेदार मोहम्मद जहांगीर और साथियों शेख बादल और एजाज उर्फ मोहम्मद कलाम, जिसकी पहचान पाकिस्तानी नागरिक के रूप में हुई, के खिलाफ ट्रायल चला रही थी.

अशफाक, जहांगीर और कलाम को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923, और विदेशी अधिनियम, 1946 की धाराओं के तहत 10 साल की जेल की सजा दी गई, जबकि बादल को पांच साल की सज़ा सुनाई गई.

यह मामला नवंबर 2015 में पश्चिम बंगाल स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) द्वारा इरशाद अंसारी, अशफाक अंसारी और मोहम्मद जहांगीर और दो अन्य—इरफान अंसारी और सलीम, के खिलाफ दर्ज एफआईआर से शुरू हुआ. 29 नवंबर 2015 को आरोपियों से पूछताछ के आधार पर एसटीएफ ने इरफान को इरशाद का भाई बताया और इरफान और सलीम को इस रैकेट में पाकिस्तान में बैठे हैंडलर के रूप में पहचाना.

शुरुआत में आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराएं लगाई गईं, जबकि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की धाराएं पहली चार्जशीट में जोड़ी गईं और आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम और विदेशी अधिनियम की धाराएं बाद की सप्लीमेंट्री चार्जशीट में जोड़ी गईं. बाद में शेख बादल और मोहम्मद कलाम के नाम सह-आरोपी के रूप में जोड़े गए.

जांच में, पश्चिम बंगाल एसटीएफ ने पाया कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) का जासूस इरफान जहाजों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी, जैसे प्लान और डायग्राम, और कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स और नेताजी सुभाष डॉक जैसे महत्वपूर्ण रक्षा प्रतिष्ठानों की जानकारी इकट्ठा करने की साजिश रच रहा था.

एसटीएफ ने चार्जशीट में कहा कि आरोपियों के समूह ने यह जानकारी, जिसमें फोटो और दस्तावेज शामिल थे, फोन नंबर और ईमेल आईडी के जरिए सीधे और पाकिस्तान में मौजूद इरफान के जरिए आईएसआई हैंडलर को भेजी. एजेंसी ने यह भी पाया कि आरोपी कई बार पाकिस्तान और बांग्लादेश गए और कोलकाता में फर्ज़ी भारतीय दस्तावेजों के जरिए अन्य पाकिस्तानी नागरिकों को पनाह भी दी.

2015 में इरशाद की गिरफ्तारी के समय एसटीएफ ने उसके पास से 2 लाख रुपये के हाई क्वालिटी वाले नकली भारतीय नोट बरामद किए, जबकि अशफाक के पास से ऐसे 1.5 लाख रुपये के नोट बरामद हुए. इरशाद के पास से गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स, जहां वह कॉन्ट्रैक्ट मजदूर के रूप में काम करता था और नेताजी सुभाष डॉक के हाथ से बने नक्शे भी मिले.

कोलकाता सेशंस कोर्ट के मुख्य जज सुकुमार राय ने अपने आदेश में कहा, “इसमें कोई शक नहीं है कि दोषियों ने देश की सुरक्षा और संरक्षा को अस्थिर करने के मकसद से और नकली भारतीय करेंसी नोट चलाकर देश की अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने के लिए मिलकर साजिश रची.”

उन्होंने कहा, “इसके अलावा, उन्होंने रक्षा प्रतिष्ठानों के संवेदनशील ड्रॉइंग को किसी गलत मकसद से बाहर भेजने की साजिश रची, जिसे उसकी समय पर गिरफ्तारी से रोका गया. अगर सभी को समय पर गिरफ्तार नहीं किया जाता, तो वे क्या अंतिम मकसद हासिल कर सकते थे, यह सोचकर ही डर लगता है.”

अदालत ने यह भी कहा कि आज का आतंकवाद पुराने तरीकों से आगे बढ़ चुका है और अब युद्ध के मैदान का इस्तेमाल नहीं करता; बल्कि “गुप्त नेटवर्क, छिपे हुए कट्टरपंथ, डिजिटल प्रचार और गुरिल्ला तरीकों” का इस्तेमाल करके संवैधानिक व्यवस्था को अस्थिर करता है.

इन परिस्थितियों में, अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रतिक्रिया “कमजोर या नरम” नहीं हो सकती.

जज ने कहा, “कई देशों में और दुख की बात है कि हमारे अपने देश के कुछ हिस्सों में भी—विद्रोह ने खुद को विचारधारा, जातीयता या राजनीतिक शिकायत के भ्रामक पर्दे में छिपा लिया है, जबकि असल में यह वैध सत्ता को गिराने की हिंसक कोशिश ही है. आज का आतंकवादी, पुराने विद्रोहियों की तरह, युद्ध के मैदान में नहीं आता…”

उन्होंने आगे कहा, “हथियारबंद संघर्ष, तोड़फोड़, या गैरकानूनी बल के जरिए बनी सरकार को गिराने की मंशा एक गंभीर और बार-बार सामने आने वाला खतरा बन गई है, जिसके लिए न्यायपालिका की सख्त निगरानी जरूरी है. जब ऐसी साजिशों का सामना होता है, तो न्यायिक प्रतिक्रिया कमजोर या नरम नहीं हो सकती.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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