scorecardresearch
Sunday, 22 February, 2026
होमफीचरकोलकाता की बिरयानी की लड़ाई में दादा बौडी और हैंगलाथेरियम ने नई चुनौती पेश की

कोलकाता की बिरयानी की लड़ाई में दादा बौडी और हैंगलाथेरियम ने नई चुनौती पेश की

जहां भारत में ज़्यादातर लोग इस बात पर बहस कर रहे हैं कि लखनवी, हैदराबादी या कोलकाता की बिरयानी बेहतर है, वहीं बंगाल की बहस अब अंदर की ओर मुड़ गई है: अब कौन सी लोकल बिरयानी वफ़ादारी की हकदार है, क्योंकि नए दावेदार पुराने अरसलान और अमीनिया को चुनौती दे रहे हैं.

Text Size:

कोलकाता: बंगाल की हमेशा चलने वाली बिरयानी की जंग, जिस पर लंबे समय से अमीनिया और अरसलान जैसे पुराने बड़े नामों का दबदबा रहा है, अब दो नए दावेदारों को मिल गई है. खाने के मामले में सख्त माने जाने वाले कोलकाता में यह कोई छोटी हलचल नहीं है. कोलकाता के एक शांत रेलवे उपनगर में दादा बौडी होटल ने धीरे-धीरे बनी अपनी पहचान को अब एक अलग “बराकपुर-स्टाइल” बिरयानी में बदल दिया है, जैसा कि उसके वफादार ग्राहक कहते हैं. दक्षिण कोलकाता के पॉश इलाके में हैंगलाथेरियम उसी मशहूर डिश को कैफे संस्कृति और सोशल मीडिया की लोकप्रियता के जरिए आगे बढ़ा रहा है. दो रेस्टोरेंट, दो तरीके. शहर की बिरयानी के प्रति दीवानगी कायम है, लेकिन तरीका बदल गया है.

कोलकाता का खाने से रिश्ता लगभग स्वामित्व जैसा है. लेकिन पिछले एक दशक में बिरयानी जैसी पसंदीदा डिश ने इस पैटर्न को तोड़ा है. नए खिलाड़ी बिरयानी को पेश करने, बेचने और खाने के तरीके में बदलाव करके अपने पक्के ग्राहक बना रहे हैं.

1960 के दशक में रेलवे लाइन के पास एक साधारण हिंदू होटल के रूप में शुरू हुआ दादा बौडी होटल, जो मजदूर वर्ग को बंगाली थाली परोसता था, उसने दशकों में धीरे-धीरे खुद को बदल लिया. उसकी बिरयानी, जो कभी 11 रुपये की एक प्रयोगात्मक डिश थी, अब बराकपुर के सात मंजिला रेस्टोरेंट में रोज 2,000 लोग खाते हैं. यह अब बंगाल के सबसे व्यस्त बिरयानी ठिकानों में से एक है.

शहर के बाहरी हिस्से में बिरयानी का जुनून धैर्य, केले के पत्ते की प्लेट, बड़े-बड़े मटन के टुकड़े और सादा बैठने की व्यवस्था जैसा दिखता है.

लेकिन दक्षिण कोलकाता के पॉश जोधपुर पार्क में, जो करीब 30 किलोमीटर दूर है, हैंगलाथेरियम एक अलग तरह की सफलता दिखाता है. इसके संस्थापक इसे नए दौर का ‘बिरयानी कैफे’ कहते हैं. यह जगह 5 फुट बाय 10 फुट के छोटे कियोस्क से शुरू हुई थी, जहां खुशबूदार और घी से भरपूर बिरयानी की प्लेट मिलती थी. अक्सर लोग इंस्टाग्राम रील्स देखकर यहां आते हैं. कुछ लोग खास तौर पर मालिक सुनंदो बनर्जी से मिलने आते हैं, जिन्हें इंस्टाग्राम का वायरल “बिरयानी मैन” कहा जाता है.

अगर दादा बौडी की सफलता यादों और लोगों की बातों से बढ़ी, तो हैंगलाथेरियम की सफलता दिखावे और वायरल होने से बढ़ी है. लेकिन बंगाल में बिरयानी हमेशा सिर्फ कारोबार से ज्यादा रही है.

“यह नई बिरयानी दीवानगी सिर्फ क्षेत्रीय नहीं है. यह बाहर की डिशों को भी स्वीकार करती है और खाने के मामले में धार्मिक या संकीर्ण नहीं है. बिरयानी असल में एक मुस्लिम डिश है, लेकिन बंगाल की भावना ऐसी है कि वहां खाने को हिंदू या मुस्लिम नहीं माना जाता. आज के समय में यह महत्वपूर्ण है, जब खाना लोगों को बांट रहा है,” वरिष्ठ फूड कॉलमनिस्ट वीर सांघवी ने कहा.

जहां देश के कई हिस्सों में लखनऊई, हैदराबादी या कोलकाता बिरयानी को बेहतर बताने की बहस होती है, वहीं बंगाल की बहस अब अंदर की हो गई है, कुछ-कुछ फुटबॉल की तरह. अब सवाल यह है कि किस स्थानीय बिरयानी के प्रति वफादारी होनी चाहिए.

A new biryani war has broken out in Kolkata. The contenders are Dada Boudi and Hanglaatherium. Photo: Commons
कोलकाता में एक नई बिरयानी जंग छिड़ गई है. इसमें दादा बौडी और हंगलाथेरियम आमने-सामने हैं | फोटो: कॉमन्स

दादा बौडी का नजारा

गर्म बुधवार को ठीक दोपहर 3 बजे, बराकपुर रेलवे स्टेशन के बाहर व्यस्त बाजार में दो लंबी कतारें दिखती हैं, बिल्कुल दुर्गा पूजा पंडाल के बाहर की भीड़ जैसी. पास से देखें तो यह साधारण दृश्य है. लोग दादा बौडी होटल में बिरयानी के लिए इंतजार कर रहे हैं. इमारत से आती मटन और घी की खुशबू के साथ उनकी बेचैनी बढ़ रही है.

“और 20 मिनट बाद मैं एक बड़ा रसीला मटन का टुकड़ा खा रही होऊंगी,” मिनू मंडल ने अपने पेट पर हाथ रखते हुए कहा, जब लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी.

1963 में एक दंपति द्वारा शुरू किया गया दादा बौडी, जिसका मतलब है भाई और भाभी, पिछले दशक में बहुत मशहूर हो गया. फूड व्लॉगर्स ने इसे ज्यादा दिखाना शुरू किया और मीडिया ने इसके संघर्ष से सफलता तक के सफर पर लिखा.

A serpentine queue outside Dada Boudi Hotel. Tina Das | ThePrint
दादा बौडी होटल के बाहर लंबी कतार | टीना दास | दिप्रिंट

दादा बौडी होटल 1940 के दशक में जनता हिंदू होटल के नाम से शुरू हुआ था, जो बराकपुर स्टेशन से गुजरने वाले रेलवे कर्मियों, रिक्शा चालकों, ड्राइवरों और कुलियों को पारंपरिक बंगाली थाली परोसता था.

“जब मेरे माता-पिता रेस्टोरेंट चलाते थे, तब बैंक और सरकारी अधिकारी भी आते थे. वे मेरी मां से कहते थे कि उनके लिए चिकन या मटन की एक कटोरी बचाकर रखें,” संजीब साहा ने कहा, जो अपने बेटे शुभम के साथ यह व्यवसाय संभालते हैं.

संजीब की मां ने 1960 के दशक में रसोई की जिम्मेदारी संभाली.

1980 के शुरुआती सालों में संजीब और उनके दोस्त कामिल खान ने यहां बिरयानी शुरू करने का फैसला किया.

“उन दिनों यहां बिरयानी की दुकानें बहुत कम थीं. काफी सोच-विचार के बाद हमने मेन्यू में चिकन बिरयानी की एक प्लेट शामिल की. इसकी कीमत 11 रुपये रखी,” संजीब ने कहा.

लेकिन पहली बार बनाई गई तीन किलो बिरयानी का कोई खरीदार नहीं मिला.

“हमें सब नाली में फेंकना पड़ा,” 58 वर्षीय संजीब ने सड़क के पार एक नाले की ओर इशारा करते हुए कहा. उनके चेहरे पर आज भी निराशा दिखती है.

उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अगले दिन फिर पकाया. इस बार सारे बर्तन खाली हो गए.

अब बैठने की जगह 64 सीटों से बढ़कर करीब 400 सीटों की हो गई है. तीन दशक बाद दादा बौडी बराकपुर में दो आउटलेट चला रहा है और शहर से बाहर विस्तार की योजना बना रहा है.

A signboard of Dada Boudi Hotel. Tina Das | ThePrint
दादा बौडी होटल का एक साइनबोर्ड | टीना दास | दिप्रिंट

बिरयानी की तैयारी

दादा बौडी में दिन की तैयारी सुबह 7 बजे शुरू होती है. मांस की जांच होती है, किराने का सामान छांटा जाता है और बड़े-बड़े हांडी के नीचे कई चूल्हे जलाए जाते हैं.

दिनभर रसोई में ताजा बिरयानी बनती रहती है. हर कुछ घंटों में एक टेंपो खाली बर्तनों की जगह नए बर्तन उतार जाता है.

मालिक शुभम साहा का कहना है कि गुणवत्ता सबसे अहम है.

“हम मटन की गुणवत्ता को लेकर बहुत सावधान रहते हैं. मसाले भी बहुत ध्यान से चुने जाते हैं,” 28 वर्षीय शुभम साहा ने कहा.

रेस्टोरेंट रोज 300 से 400 किलो बिरयानी बनाता है. पिछले साल इसका कारोबार 80 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो 2020-21 में 15 करोड़ रुपये था.

कामिल खान आज भी रसोइयों को उस खास तरीके से बिरयानी बनाना सिखाते हैं, जिसे मालिक परिवार की रेसिपी बताते हैं.

आलू के साथ एक प्लेट मटन बिरयानी की कीमत 360 रुपये है. चिकन बिरयानी 260 रुपये में मिलती है.

“मुझे यह जगह इसलिए पसंद है क्योंकि वे पूछते हैं कि आपको बिरयानी में मटन का कौन सा टुकड़ा चाहिए,” पीहू कुंडू ने जल्दी डिनर खत्म करते हुए कहा. उनके पिता, जो 80 के दशक से यहां आते रहे हैं, ने कहा, “अब गुणवत्ता थोड़ी घटी है, लेकिन फिर भी बहुत अच्छी है,” उन्होंने कहा.

A packed Dada Boudi Hotel. Tina Das | ThePrint
दादा बौडी होटल खचाखच भरा हुआ है | टीना दास | दिप्रिंट

कोलकाता की बिरयानी संस्कृति

दशकों तक कोलकाता की बिरयानी की जंग के सिर्फ दो ही पक्ष थे. या तो आप अमीनिया या अरसलान जैसे पुराने नामों के वफादार थे, वरना आप गलत माने जाते थे. इस शहर में पीढ़ियां एक ही मिठाई की दुकान, एक ही मछली बाजार या एक ही बिरयानी की दुकान के प्रति वफादारी निभाते हुए बड़ी होती हैं.

1980 और 1990 के दशक में बिरयानी शाही रसोई से निकलकर सड़क के किनारे तक पहुंच गई. मांस महंगा होने के कारण उत्तर प्रदेश से आए रसोइयों ने आलू और अंडे वाली ज्यादा मीठी अवधी शैली की बिरयानी बेची, जिससे यह डिश सस्ती और आम हो गई. आज सड़क किनारे की दुकान पर एक प्लेट 70 रुपये में मिल सकती है, जबकि अच्छे रेस्टोरेंट में इसकी कीमत 500 रुपये तक हो सकती है.

“पूरी बिरयानी की दीवानगी 1960 के दशक के अंत में शुरू हुई. मैं 1986 में वहां कोलकाता में रहने लगा था और तब बिरयानी बस लोकप्रिय हुई थी. अब तो यह जैसे एकमात्र अहम डिश बन गई है. बंगाली इस पर गर्व करेंगे और कहेंगे कि असली बिरयानी सिर्फ कलकत्ता बिरयानी है. वे यह नहीं बताते कि कलकत्ता बिरयानी असल में अवधी बिरयानी का गरीब आदमी वाला रूप है,” वीर सांघवी ने कहा.

कहा जाता है कि कोलकाता बिरयानी नवाब वाजिद अली शाह ने बनाई थी, जिन्हें 1856 में अंग्रेजों ने कलकत्ता भेज दिया था. मांस खरीदने की क्षमता न होने के कारण स्थानीय रसोइयों ने मांस की जगह सुनहरे भूरे और अच्छी तरह पके आलू डाल दिए.

“हालांकि अब इसमें मांस है, लेकिन आलू अब भी इस डिश का महत्वपूर्ण हिस्सा है,” ब्लूम्सबरी बुक ऑफ इंडियन क्यूज़ीन 2023 में बिरयानी की उत्पत्ति पर लिखा है.

धीरे-धीरे ये खाने की जगहें बढ़ती गईं और शहर को अमीनिया मिला, जो लगभग 100 साल पहले शुरू हुआ और आज सबसे पसंदीदा बिरयानी ब्रांड में से एक है. इसके शहर और देशभर में कई आउटलेट हैं.

अरसलान, जो भीड़ का एक और पसंदीदा नाम है, इसके मुकाबले काफी नया है.

शुरुआती योजना एक पारिवारिक बिरयानी रेस्टोरेंट की थी, जिसमें पर्याप्त बैठने की जगह और अच्छा इंटीरियर हो. शहर में मुगलई रेस्टोरेंट की कमी को पूरा करने के लिए इस ब्रांड की स्थापना हुई और 2002 में इसका पहला रेस्टोरेंट खुला.

इंडिया रेस्टोरेंट, रॉयल इंडिया, शिराज गोल्डन रेस्टोरेंट और निजाम्स भी इस क्षेत्र के बड़े नाम हैं. ये शहर में फैले हुए हैं, लगातार विस्तार कर रहे हैं और वर्षों से इनके वफादार ग्राहक हैं. अब नए खिलाड़ी इस दोतरफा स्थिति को बदल रहे हैं.

Customers at Dada Boudi Hotel. Tina Das | ThePrint
दादा बौडी होटल में ग्राहक | टीना दास | दिप्रिंट

दक्षिण कोलकाता की बिरयानी

अपने 9 से 5 की एकरस नौकरी से ऊबकर तीन दोस्तों ने काम के बाद बिरयानी बेचने का फैसला किया. इसी तरह 15 साल पहले नए दौर का बिरयानी ‘कैफे’ हैंगलाथेरियम शुरू हुआ.

“यह दरअसल शराब के असर में किया गया एक ऐलान था, जब मैंने दोस्तों से कहा कि मैं बिरयानी की जगह खोलना चाहता हूं. अगले दिन ऑफिस की प्रस्तुति के दौरान मेरे दोस्त का फोन आया और उसने कहा कि उसने सच में एक जगह बुक कर ली है. इसी तरह हैंगलाथेरियम शुरू हुआ,” बनर्जी ने कहा.

हांगला का मतलब बोलचाल की बंगाली में पेटू होता है. कैफे का नाम सुकुमार रे की कहानी ‘हेशोराम हुशियारेर डायरी’ 1923 से लिया गया है, जिसमें हैंगलाथेरियम नाम का किरदार खाने का दीवाना है.

कैफे 5 फुट बाय 10 फुट के छोटे कियोस्क से शुरू हुआ, जिसकी लाल और सफेद दीवारों पर बिरयानी के चित्र बने थे. यह शहर के भव्य मुगलई रेस्टोरेंट से बिल्कुल अलग था. विचार सरल था. पार्सल लेकर जाने की जगह बैठकर बिरयानी खाते हुए बातचीत की जाए.

“कोलकाता में हम आमतौर पर बिरयानी पैक कर लेते हैं या रेस्टोरेंट में बैठकर खाते हैं. लेकिन हमें कैफे भी पसंद हैं. मैं दोनों को साथ लाना चाहता था. क्यों न बिरयानी के लिए भी एक कैफे हो, जैसे कॉफी के लिए होता है,” सुनंदो बनर्जी ने कहा, जिन्होंने अपने दो दोस्तों अविजीत मजूमदार और पियाली के साथ यह रेस्टोरेंट शुरू किया.

Hanglaatherium has opened multiple outlets both in Kolkata and other parts of the state. Tina Das | ThePrint
हंगलाथेरियम ने कोलकाता और राज्य के दूसरे हिस्सों में कई आउटलेट खोले हैं | टीना दास | दिप्रिंट

उनकी बिरयानी वही हल्की, खुशबूदार कोलकाता बिरयानी थी, जिसमें साधारण आलू शामिल था. लेकिन एक नियम था. सामग्री स्वास्थ्यकर होनी चाहिए.

“जो भी हम पकाते थे, मैं उसे अपने उस समय के 5 साल के बेटे के लिए भी घर ले जाता था. इसलिए मैं अपनी बिरयानी में वनस्पति घी का इस्तेमाल न करने पर अड़ा रहा. हम घी का इस्तेमाल करते हैं, जो बेहतर विकल्प है. इससे पेट भारी नहीं लगता,” सुनंदो ने कहा.

हैंगलाथेरियम के हेड शेफ एसके रज्जाक, जो पहले द पार्क और करीम्स में काम कर चुके हैं, बनर्जी के साथ मिलकर सभी छह आउटलेट में रेसिपी संभालते हैं.

पहला बैच सुबह 11 बजे पकना शुरू होता है. मटन तला जाता है, चावल उबाले जाते हैं और फिर प्याज, दही, घी और आलू की परतें लगाई जाती हैं.

हैंगलाथेरियम सिर्फ ज्योति या चंद्रमुखी किस्म के आलू का इस्तेमाल करता है, ताकि हर प्लेट में आलू का आकार एक जैसा रहे. यहां दिल्ली से प्रेरित असलम बटर चिकन और ट्विस्ट के साथ निहारी भी मिलती है.

दोपहर 12:30 बजे तक रेस्टोरेंट घर पर डिलीवरी और बैठकर खाने दोनों के लिए खुल जाता है.

पिछले सात महीनों में रेस्टोरेंट की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी, जब बनर्जी ने बंगाली फूड ह्यूमर और ग्राहकों के साथ बातचीत पर आधारित रील बनाना शुरू किया. अब वे ‘द बिरयानी मैन’ के नाम से वायरल हैं.

The meat and gravy are prepared separately to be layered into biryani at Hanglaatherium. Tina Das | ThePrint
हंगलाथेरियम में बिरयानी में डालने के लिए मीट और ग्रेवी को अलग-अलग तैयार किया जाता है | टीना दास | दिप्रिंट

‘द बिरयानी मैन’

एक युवा महिला हैंगलाथेरियम में आती है और ‘द बिरयानी मैन’ को देखकर मुस्कुराती है.

“मुझे आपकी रील बहुत पसंद है. कोई और बंगाली जगह ऐसा नहीं करती. इसलिए मैंने बिरयानी ट्राई करने का फैसला किया,” पियाली ने कहा, जो 20 किलोमीटर दूर बेलघरिया से आई थीं.

Sunando Banerjee has made the doodles that hang in the interior of the cafe. Tina Das | ThePrint
सुनंदो बनर्जी ने कैफे के अंदर लगे डूडल बनाए हैं | टीना दास | दिप्रिंट

वह अरसलान की वफादार ग्राहक रही हैं. लेकिन उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन रिव्यू के आधार पर वह कम से कम एक बार बदलाव करने को तैयार हैं. बनर्जी की रणनीति काम कर रही थी.

“कोलकाता की समस्या यह है कि हम खुद को सही तरीके से मार्केट करना नहीं जानते. अब जब मैं खुद मार्केटिंग करता हूं, तो कुछ लोग कहते हैं रील बनाना बंद करो और बिरयानी बनाओ,” बनर्जी ने मुस्कुराते हुए कहा.

चश्मा पहने लगभग 50 साल के इस व्यक्ति को मुंबई विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग की डिग्री के बाद मोटरोला में पहली नौकरी मिली थी. लेकिन उन्होंने जल्दी ही नौकरी छोड़ दी, एक डॉट कॉम कंपनी में कार्टूनिस्ट बने और बाद में लगभग 50 देशों में ग्लोबल रिटेल ब्रांड के लिए कंसल्टिंग की, उसके बाद हैंगलाथेरियम शुरू किया. उन्हें आरके लक्ष्मण से पुरस्कार भी मिला.

Sunando Banerjee is the 'biryani man' of Hanglaatherium, popular for his funny and quirky reels. Tina Das | ThePrint
सुनंदो बनर्जी हंगलाथेरियम के ‘बिरयानी मैन’ हैं, जो अपनी मज़ेदार और अनोखी रील्स के लिए मशहूर हैं | टीना दास | दिप्रिंट

कैफे के सह-संस्थापक और सीईओ होने के अलावा बनर्जी मार्केटिंग एजेंसी एनोनिमस डिजिटल में चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर भी हैं. इस एजेंसी ने ओह कलकत्ता चेन के संस्थापक अंजन चटर्जी जैसे ग्राहकों के साथ काम किया है.

हैंगलाथेरियम सब कुछ खुद करता है. स्क्रिप्ट लिखने से लेकर कलाकार, शूटिंग और सोशल मीडिया पर अपलोड तक.

14 लाख से ज्यादा व्यू वाली एक रील में बनर्जी मजाक में मटन की शिकायत करने वाले ग्राहक को मुआवजा देने की पेशकश करते दिखते हैं. 17 लाख व्यू वाली एक और रील में बिरयानी को एक बंगाली की जिंदगी के हर संकट का इलाज बताया गया है.

अब लोग सड़क पर बनर्जी और उनके स्टाफ को पहचान लेते हैं, वीडियो देखकर उन्हें रोकते हैं और आने का वादा करते हैं.

Workers unloading handis of biryani from a mini truck. Tina Das | ThePrint
मिनी ट्रक से बिरयानी की हांडी उतारते मज़दूर | टीना दास | दिप्रिंट

एल्गोरिदम से आगे

जहां हैंगलाथेरियम ने सोशल मीडिया के एल्गोरिदम को समझ लिया है, वहीं दादा बौडी मुंहजबानी प्रचार से ही संतुष्ट है और अलग-अलग देशों से लोगों को खींच लाता है.

2017 में कोलकाता में उस समय के अमेरिकी काउंसल जनरल क्रेग हॉल, उनकी पत्नी मीरयुंग हॉल और वाणिज्य दूतावास के अन्य सदस्य यहां आए थे.

कई लोग इसकी ‘सीक्रेट’ रेसिपी जानना चाहते हैं या कारोबार का हिस्सा बनना चाहते हैं. लेकिन इसके मालिक इसमें खास दिलचस्पी नहीं रखते.

“कोलकाता में कई जगहें वायरल हो जाती हैं और फिर बंद हो जाती हैं क्योंकि वे गुणवत्ता बनाए नहीं रख पातीं. इसलिए हम धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहते हैं. हमारे लिए यह मायने रखता है कि हर ग्राहक अपनी प्लेट खत्म करे, जब तक कि वह बहुत ज्यादा भर न जाए,” शुभम ने कहा.

इनका सोशल मीडिया ट्रैफिक भी पूरी तरह स्वाभाविक है.

“हम प्रचार पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं करते. हमारी बिरयानी ही हमारी पीआर है,” उन्होंने कहा.

शाम को दादा बौडी में मुश्किल से दो घंटे की ही थोड़ी शांति रहती है. रात के खाने तक कर्मचारी तेजी से गलियारों में आते-जाते रहते हैं और लगातार प्लेटें परोसते हैं.

फ्लोर मैनेजर मेजों पर नजर रखते हैं और इंतजार कर रहे ग्राहकों को कुछ ही सेकंड में अंदर बैठा देते हैं.

संजीब और शुभम लगातार पूरे फ्लोर पर घूमते रहते हैं, प्लेटें देखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि सभी ने भरपेट खाया है.

जगह भले ही शोरगुल वाली हो, लेकिन जब बिरयानी मेज पर आती है तो अक्सर मेजों पर सन्नाटा छा जाता है, जैसे सम्मान में.

“आज के समय में जब लोग 15 सेकंड की रील भी नहीं देखते, ग्राहक हमारी बिरयानी खाने के लिए आधा घंटा इंतजार करते हैं,” शुभम ने कहा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: बजट 47% बढ़ाने से सहकारी संस्थाओं की हालत नहीं सुधरेगी, इसके लिए भीतर से बदलाव करना होगा


 

share & View comments