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Saturday, 21 February, 2026
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ट्रेड यूनियनों की शक्ति पर नियंत्रण के लिए कानूनी प्रावधान क्यों जरूरी हैं: एमएच मोदी

लेखक एमएच मोदी ने 1980 में लिखा था कि ब्यूरोक्रेट्स, पॉलिटिशियंस, बिज़नेसमैन और ट्रेड यूनियन बॉस के नए ग्रुप के बीच मिलीभगत कुछ हद तक शॉर्ट-टर्म फ़ायदों की वजह से और कुछ हद तक इसलिए बनी रहती है क्योंकि उन्हें सिस्टम से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखता.

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आज दुनिया की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में श्रमिक संघ आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका हो गई है. यहां तक कि जिन कम्युनिस्ट देशों में इसे बेरहमी से दबाया जाता है, वहां भी ये यूनियनें अपनी मांगें मनवाने के लिए सिस्टम पर दबाव बनाने में कामयाब रहती हैं. पोलैंड में हाल ही में जो कुछ हुआ, वह इसका जीता-जागता उदाहरण है कि कम्युनिस्ट देशों में भी ये आंदोलन क्या कर सकते हैं.

भारत और ज्यादातर पश्चिमी देशों में ट्रेड यूनियन शुरू करने का असली मकसद मजदूरों के कामकाज के हालात सुधारना था. इसमें कोई दो राय नहीं कि शुरुआती दौर में इन श्रमिक संघों ने मजदूरों की हालत बेहतर बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया. आज भी अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों में ईमानदारी से यूनियन चलाने की जरूरत है.

लेकिन जल्दी ही यूनियनों के बड़े नेताओं को यह समझ आ गया कि उनकी असली ताकत सिर्फ काम रोकने या हड़ताल करने में नहीं है. आधुनिक लोकतंत्र ने उन्हें वह शक्ति प्रदान की है जिससे वे पूरी राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकें, या कहें कि उसे अपनी बात मनवाने पर मजबूर कर सकें. यही वजह है कि ज्यादातर देशों में ट्रेड यूनियन अब राजनीति का एक अहम हिस्सा बन गई हैं. हालांकि, अमेरिका थोड़ा अलग है. वहां यूनियनों के पास ताकत तो बहुत है, लेकिन वे आज भी राजनीतिक सिस्टम से एक दूरी बनाकर रखती हैं और उस पर पूरी तरह भरोसा नहीं करतीं.

नियोक्ताओं ने स्वयं भी ट्रेड यूनियनों की शक्ति बढ़ाने में कम योगदान नहीं दिया है. ऐसा उन स्थितियों में होता है जब वे ऐसे कार्यों में संलग्न होते हैं जिनकी प्रकृति एकाधिकारवादी या अल्पाधिकारवादी होती है, या जब वस्तुओं की कमी होती है, जैसा कि विकासशील देशों की नियंत्रित अर्थव्यवस्थाओं में देखा जाता है.

इन परिस्थितियों में नियोक्ताओं ने अपनी ट्रेड यूनियनों के साथ उदार समझौते करने में संकोच नहीं किया है, जिनके अंतर्गत वे ऐसे वेतन और अन्य लाभ प्रदान करते हैं जो कर्मचारियों की योग्यता या अन्य उद्योगों में तुलनीय वेतन स्तरों की तुलना में बिल्कुल असंगत होते हैं.

उदाहरण के लिए, भारत में अनेक नियोक्ताओं ने, विपरीत कानूनी प्रावधान होने के बावजूद, विभिन्न बहानों के तहत 35 से 40 प्रतिशत की दर से बोनस देने वाले समझौते किए हैं. वे ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि उन्हें विश्वास था कि इस अतिरिक्त बोझ को वे ऊंची कीमतों के रूप में उपभोक्ताओं पर डाल सकेंगे, वो भी अपने व्यवसाय की लाभप्रदता को किसी भी प्रकार से प्रभावित किए बिना.

अब हमारे पास बड़े सार्वजनिक उपक्रमों के उदाहरण हैं जहां कंपनी के ड्राइवर उन व्यक्तियों की सूची में दिखाई देते हैं जिन्हें प्रति माह 3,000 रुपये से अधिक पारिश्रमिक मिलता है, जबकि आज भी कुछ लोग अपने यहां कार्यरत ड्राइवरों को मात्र 300 रुपये प्रतिमाह वेतन देते हैं.

व्यवसायियों और ट्रेड यूनियनों की एक मौन सहमति के परिणामस्वरूप वे अपने कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि केवल रोजगार के अवसरों में कमी करके या उन अन्य श्रमिकों की कीमत पर कर सकते हैं जो कम वेतन प्राप्त करते हैं. कई अर्थशास्त्रियों का मत रहा है कि सामूहिक सौदेबाज़ी अनिवार्य रूप से बेरोज़गारी तथा मुद्रास्फीति दोनों में वृद्धि का कारण बनेगी.

मेरा मानना है कि ट्रेड यूनियनों की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित तरीके से उचित कानूनी प्रावधान करना आवश्यक है.

  • अलग-अलग यूनियनों के बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा को समाप्त किया जाए. इसके लिए यह व्यवस्था हो कि किसी भी विनिर्माण इकाई में केवल एक ही यूनियन को वार्ता के प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी जाए.
  • यूनियन की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए यूनियन चेक-ऑफ प्रणाली लागू की जाए, ताकि यूनियनों के अंशदानों को सही और स्वैच्छिक तरीके से एकत्र किया जा सके.
  • यूनियन द्वारा किए गए सभी समझौते कानूनी रूप से बाध्यकारी हों. यदि समझौते का उल्लंघन हो, तो यूनियन और उसके पदाधिकारी भी अन्य व्यावसायिक अनुबंधों की तरह आर्थिक और अन्य दंड के लिए जिम्मेदार हों.
  • हड़ताल तभी शुरू की जा सके जब उसके लिए मतदान कराया गया हो और उसे कुल कार्यबल, चाहे वे यूनियन के सदस्य हों या नहीं, के बहुमत का समर्थन प्राप्त हो.

यह लेख सेंटर फ़ॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इस लेख को ‘फोरम ऑफ फ्री एंटरप्राइज़’ से लिया गया है, जिसका प्रकाशन दिसंबर 1980 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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