नयी दिल्ली, 20 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के एक अधिकारी की उस अर्जी पर सुनवाई करने से मना कर दिया, जिसमें उन्होंने उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में कथित गैर-कानूनी निर्माण कार्य और पेड़ों की बड़े पैमाने पर कटाई से जुड़े एक मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को मिली अभियोजन की मंजूरी को चुनौती दी थी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि अगर अधिकारी राहुल मंजूरी दिए जाने के खिलाफ और दलील देते हैं, तो वह आरोप तय करने का आदेश भी दे सकती है।
पीठ ने कहा, ‘‘आप कृपया अपना मामला यहीं खत्म करें। अगर आप आगे बहस करते हैं, तो हम मानेंगे कि यह आपराधिक आरोप तय करने के लिए सही मामला है।’’
इसके बाद वन अधिकारी के वकील को अर्जी वापस लेनी पड़ी।
पीठ ने कहा कि पेड़ों की गैर-कानूनी कटाई को ‘‘वैध रूप से की गई कटाई’’ के तौर पर दिखाया गया है, और सवाल किया कि क्या यह अपराध नहीं बनता।
उच्चतम न्यायालय ने 11 नवंबर 2025 को अधिकारी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही बंद कर दी थी। अधिकारी ने राष्ट्रीय उद्यान में कथित अवैध निर्माण के लिए दर्ज सीबीआई के एक मामले में खुद के अभियोजन पर रोक लगाने के लिए उत्तराखंड उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर बिना शर्त माफी मांगी थी।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के उस आदेश पर रोक लगा दी थी जिसमें अधिकारी पर मुकदमा चलाने की मंजूरी दी गई थी, जबकि मामला शीर्ष अदालत में विचाराधीन था। अधिकारी कॉर्बेट बाघ अभयारण्य के पूर्व निदेशक भी थे।
उच्चतम न्यायालय ने 15 अक्टूबर 2025 को इस मामले पर कड़ी नाराजगी जताई और पूछा कि उसकी टिप्पणियों तथा आदेशों के खिलाफ अपील पर उच्च न्यायालय ने कैसे सुनवाई की।
उच्चतम न्यायालय ने अधिकारी को अवमानना नोटिस जारी किया था, उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाई थी, और न्यायिक रिकॉर्ड अपने पास हस्तांतरित कर लिए थे। बाद में उसने बिना शर्त माफी को संज्ञान में लिया और अधिकारी की 21 साल की ‘बेदाग सेवाओं’ और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें माफ कर दिया।
भाषा वैभव खारी
खारी
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
