scorecardresearch
Saturday, 21 February, 2026
होमThe FinePrintAI समिट ने दिखाया आज के भारत का सच—अव्यवस्था और लापरवाही की तस्वीर

AI समिट ने दिखाया आज के भारत का सच—अव्यवस्था और लापरवाही की तस्वीर

इसमें कोई हैरानी नहीं कि बिल गेट्स ने AI समिट में भाषण नहीं दिया. यह आखिरी झटका हो सकता है.

Text Size:

क्या इंडिया AI समिट के गेटकीपर्स ने तय किया कि उन्हें ‘गेट्सकीपर्स’ बनना है? क्या बिल गेट्स को चुपचाप बता दिया गया कि उनका उस समिट में स्वागत नहीं होगा, जो पहले से ही एक के बाद एक विवादों से घिरा हुआ है?

ऐसा ही लगता है. इवेंट से पहले ही सरकार के ‘सूत्रों’ के हवाले से कहा गया था कि प्लान में बदलाव हुआ है और गेट्स अब भाषण नहीं देंगे, लेकिन गेट्स फाउंडेशन ने जोर देकर कहा कि वह तय कार्यक्रम के अनुसार समिट को संबोधित करेंगे.

आखिरी समय में रद्द किया गया कार्यक्रम, जब गेट्स पहले से ही भारत में मौजूद थे, यह दिखाता है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग एक और दिन की नकारात्मक खबरें नहीं चाहते थे क्योंकि उस समय समिट के असली मुद्दों की बजाय गेट्स और जेफरी एपस्टीन की चर्चा ज्यादा हो रही थी.

यह उसी तरह का समिट रहा और जबकि इसके समर्थक यह कहते हैं और कुछ हद तक सही भी कहते हैं, कि विवादों को हमें ध्यान भटकाने नहीं देना चाहिए, सच्चाई यह है कि दिल्ली में बहुत कम लोग इस समिट को किसी खास अच्छे तरीके से याद रखेंगे.

कुछ हद तक इसलिए भी, क्योंकि इन विवादों ने यह दिखाया कि आजकल भारत कैसे काम करता है.

एक शर्मनाक दिखावा

मुझे नहीं लगता कि आयोजकों सहित कोई भी इस बात से इनकार करता है कि पहले दिन बहुत ज्यादा गड़बड़ियां हुईं. सोशल मीडिया पर कार्यक्रम स्थल पर चोरी की शिकायतों की भरमार थी (कम से कम एक मामले में चोरों की पहचान हुई, उन्हें गिरफ्तार किया गया और चोरी का सामान वापस मिल गया); खराब व्यवस्था; खराब वाईवाई और यह आरोप कि दुकानदार यूपीआई लेने से मना कर रहे थे और ग्राहकों से कह रहे थे कि पहले कूपन खरीदो और फिर उससे सामान खरीदो. तो फिर आईटी सुपरपावर होने का क्या हुआ!

दूसरे दिन चीज़ें बेहतर हो गईं. या हो जातीं, अगर गलगोटियास का डॉग नहीं होता.

थोड़ा बैकग्राउंड: गलगोटियास यूनिवर्सिटी यूपी में स्थित एक एजुकेशन इंस्टीट्यूट है, जिसके संस्थानों को कई गंभीर शिक्षाविद ज्यादा सम्मान नहीं देते, हालांकि, यह शायद सिर्फ अहंकार की वजह से भी हो सकता है.

लेकिन इससे गलगोटियास यूनिवर्सिटी को कोई फर्क नहीं पड़ता, जो खुद का प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ती. विवाद सामने आने के अगले दिन ही, एक बड़े भारतीय अखबार में एक पेड विज्ञापन छपा, जिसमें गलगोटियास ने खुद की जमकर तारीफ की.

यह ‘यूनिवर्सिटी’ खुलकर राजनीतिक व्यवस्था के करीब जाने की कोशिश करती है और अति-राष्ट्रवाद का इस्तेमाल भी अपने प्रचार के रूप में करती है. अगर गलगोटियास जैसी ‘यूनिवर्सिटी’ को उनकी विशेषज्ञता के आधार पर आंका जाए, तो शायद ‘चापलूसी 101’ ही एकमात्र कोर्स होगा जो वह सही तरीके से दे सकती है.

लेकिन आज के भारत में, इस तरह का घटिया, कम-समझ वाला और ज्यादा कमाई वाला तरीका काम करता है, और गलगोटियास उन छात्रों से करोड़ों कमाती है, जिनके माता-पिता प्रचार और ताकतवर मंत्रियों से ‘अवार्ड’ लेते हुए फोटो देखकर प्रभावित हो जाते हैं.

सत्ता के करीब होने की वजह से यह हैरानी की बात नहीं थी कि गलगोटियास को समिट में अपनी AI ‘उपलब्धियां’ दिखाने की अनुमति मिल गई. इन तथाकथित उपलब्धियों में एक रोबोट डॉग भी था, जिसके बारे में कहा गया कि इसे गलगोटियास के प्रतिभाशाली लोगों ने बनाया है.

यह इस तरह के ‘शैक्षणिक संस्थान’ की असली सच्चाई के अनुसार ही था कि गलगोटियास के लोगों की प्रतिभा विज्ञान में नहीं बल्कि खरीदारी में थी. यह रोबोट डॉग चीन का था और पत्रकारों ने जल्दी ही पता लगा लिया कि इसे इंटरनेट पर लगभग 2 लाख रुपये में खरीदा जा सकता है.

जब आयोजकों को चिंता हुई कि समिट दूसरे दिन भी विवाद में फंस रहा है, तो उन्होंने डॉग को पसंद करने वाली गलगोटियास टीम से जाने को कहा. जब उन्होंने नहीं माना, तो खबर है कि उनके स्टॉल की बिजली काट दी गई.

लेकिन गलगोटियास नहीं रुकी. उसने अपने शिक्षकों को मीडिया से बात करने भेजा और कहा कि यह सब गलतफहमी है. इससे संस्थान की समझ का स्तर पता चला. नेहा सिंह नाम की एक महिला, जिन्हें कम्युनिकेशन फैकल्टी की सदस्य बताया गया, उन्होंने कहा कि पूरी समस्या इसलिए हुई क्योंकि वह इसे “ठीक से कम्युनिकेट नहीं कर पाईं.” गलगोटियास में किसी ने भी इस विडंबना को नहीं समझा.

जब यह सब काम नहीं आया, तो गलगोटियास ने एक प्रेस रिलीज़ जारी कर दी और इस गड़बड़ी का दोष अपने शिक्षकों पर डाल दिया, जैसे इससे उन बड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है, जो इन शिक्षकों द्वारा दी जाने वाली ‘शिक्षा’ से पैसा कमाते हैं.

समिट के समर्थकों, जिन्हें बाद में सोशल मीडिया पर बचाव के लिए भेजा गया, उन्होंने कहा कि हमें इस गड़बड़ी और रोबोट बनाने की हमारी झूठी क्षमता पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए.

वो शायद सही थे, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी. गलगोटियास का डॉग दुनिया भर के मीडिया में छा गया. खासकर चीन ने, उनके काम को अपना बताने की हमारी कोशिश को, भारत के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के दावों के प्रतीक के रूप में देखा.

बुद्धिमत्ता की कमी साफ दिखी

यह सब अपने आप में काफी शर्मनाक था, लेकिन दिल्ली के इतने लोग इसलिए ज्यादा परेशान थे क्योंकि जल्दी ही यह साफ हो गया कि प्रशासन के पास आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिट को आयोजित करने के लिए ज़रूरी समझदारी (आर्टिफिशियल या असली) नहीं थी. प्रतिनिधियों ने शिकायत की कि टैक्सियों को समिट के पास आने नहीं दिया जा रहा था और उन्हें किसी भी तरह का वाहन ढूंढने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ा. साफ है कि समिट की योजना बनाते समय आम प्रतिनिधियों के हितों के बारे में किसी ने नहीं सोचा.

ध्यान सिर्फ VIP और विदेशी नेताओं पर था. मकसद यह था कि समिट के जरिए महत्वपूर्ण विदेशियों को हमारी AI क्षमता, रोबोट डॉग सहित, दिखाया जाए. इसलिए आम नागरिकों को, यहां तक कि जिनकी AI में कोई दिलचस्पी नहीं थी, उन्हें भी परेशानी झेलनी पड़ी. सड़कों को अचानक बंद कर दिया गया और जो सफर आमतौर पर 30 मिनट में पूरा होता था, उसमें 5 घंटे तक लग गए.

कोई भी इस बात से इनकार नहीं करता कि VIP की सुरक्षा ज़रूरी है, लेकिन किसी भी प्रशासन को सुरक्षा और आम नागरिकों के हितों के बीच संतुलन बनाना होता है. लोग आमतौर पर 5-10 मिनट के लिए अपनी गाड़ी रोकने से परेशान होते हैं ताकि कोई VIP निकल सके, लेकिन वे इसे सह लेते हैं, लेकिन जब हर बार किसी VIP के निकलने पर 40 मिनट तक ट्रैफिक रोक दिया जाए (और समिट में बहुत सारे VIP थे), तो इससे ट्रैफिक का ऐसा संकट पैदा हो जाता है कि पूरा शहर रुक जाता है, सिर्फ समिट वाला इलाका नहीं. जो पहले सिर्फ असुविधा थी, वह पुलिस की नाकामी का मामला बन जाता है.

समिट के आयोजकों और प्रशासन की खराब व्यवस्था के लिए कोई अच्छा कारण नहीं है, जिससे दिल्ली में इतना ज्यादा अराजकता पैदा हुई. हां, शहर में बहुत सारे VIP थे, लेकिन दुनिया की कई राजधानियों में इससे ज्यादा बड़े नेताओं की मेजबानी हुई है, बिना आम नागरिकों की ज़िंदगी को नरक बनाए.

यह दुनिया का पहला समिट या बड़ा सम्मेलन नहीं था. दूसरे शहर सुरक्षा को बेहतर तरीके से संभालते हैं क्योंकि वहां सक्षम लोग होते हैं. दिल्ली में, नाकामी, VIP-पूजा और आम नागरिकों की अनदेखी का मिश्रण दिखाता है कि आजकल भारत में काम कैसे होता है.

कई मायनों में, इस समिट ने आज के भारत की एक तस्वीर दिखाई: एक शानदार तकनीकी सोच, प्रतिभाशाली और उत्साही नागरिक, जिनकी वजह से दुनिया का ध्यान भारत की ओर है, लेकिन साथ ही: अयोग्य प्रशासक और पुलिस; नागरिकों की कोई परवाह नहीं; और ऐसे संदिग्ध संस्थानों का अमीर और मशहूर होना, चाहे वे शैक्षणिक हों या अन्य, जो चापलूसी, जुगाड़ और भोले-भाले लोगों को ठगकर पैसा कमाते हैं.

क्या आपको हैरानी है कि उन्होंने बिल गेट्स को बोलने नहीं दिया? वह आखिरी झटका होता.

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: भारत-अमेरिका ट्रेड डील एकदम बजट जैसी है. दोनों की तारीफ करने के लिए चापलूसों को मजबूर किया जाता है


 

share & View comments