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Friday, 20 February, 2026
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हरियाणा के गांव में रहस्यमयी बीमारी का कहर, बुखार के 48 घंटे में मौत, दूषित पानी पर उठे सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि छैनसा में 1 महीने में 20 लोगों की मौत हुई, सरकारी डॉक्टर मौत की संख्या 7 बता रहे हैं. मौत का कारण अभी पता नहीं चला है, इसलिए डॉक्टर ग्रामीणों की हेपेटाइटिस बी, सी और एचआईवी की जांच कर रहे हैं और पानी की भी जांच कर रहे हैं.

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छैनसा (पलवल, हरियाणा): फरवरी की एक सुबह करीब 10 बजे के आसपास धूप तेज़ होने लगी है, हरियाणा के पलवल जिले के छैनसा गांव में कुछ पुरुष हुक्का के चारों ओर गोल बैठकर एक रहस्य पर चर्चा कर रहे हैं—अचानक हो रही मौतें, जिसे यहां कोई समझ नहीं पा रहा है.

बीच में हकीमुद्दीन बैठे हैं, जिनका 24 साल का बेटा दिलशाद बुखार होने पर खुद चलकर अस्पताल गया और सिर्फ दो दिन बाद 11 फरवरी को लीवर फेल होने से उसकी मौत हो गई.

हकीमुद्दीन पहले दिलशाद को एक स्थानीय डॉक्टर के पास ले गए. जब बुखार कम नहीं हुआ, तो परिवार उन्हें पास के हथीन कस्बे के एक प्राइवेट अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टरों ने आगे जांच कराने की सलाह दी और रिपोर्ट में पीलिया बताया गया.

हथीन से वे बेटे को पड़ोसी नूंह जिले के एक सरकारी अस्पताल ले गए. हकीमुद्दीन याद करते हैं, “मेरा बेटा खुद चलकर अस्पताल गया था.” 48 घंटे के अंदर दिलशाद को मृत घोषित कर दिया गया.

उन्होंने पूछा, “उसकी हालत इतनी गंभीर नहीं थी, लेकिन कैसे 48 घंटे में सब खत्म हो गया?”

लेकिन इस गांव में दिलशाद की मौत अकेली घटना नहीं है.

10,000 से ज्यादा आबादी वाले इस गांव में, पिछले एक महीने में अचानक और बिना किसी कारण के कई मौतें हुई हैं. 13 और 18 साल के बच्चे भी बुखार आने के सिर्फ 24 से 48 घंटे के अंदर तीव्र लीवर फेल होने से मर गए. अधिकारियों ने गांव में 7 मौतों की पुष्टि की है, जिनमें से 4 बच्चे 15 साल से कम उम्र के हैं, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि पिछले 20 दिनों में 20-22 मौतें हुई हैं.

दिप्रिंट ने जिन परिवारों से बात की, सभी ने एक जैसा पैटर्न बताया: बुखार और पेट दर्द, जल्दी अस्पताल भेजना, तेज़ी से हालत बिगड़ना और मौत.

हकीमुद्दीन के घर से कुछ गलियों दूर, मोहम्मद शाकिर उस चारपाई की ओर इशारा करते हैं, जहां उनका 14 साल का बेटा सोता था. लड़का 26 जनवरी को बीमार हुआ.

शाकिर ने कहा, “मेरा बेटा बिल्कुल स्वस्थ था.” जब उसे बुखार और पेट दर्द हुआ, तो अल्ट्रासाउंड किया गया, जिसमें लीवर में सूजन और पेट में पानी की पुष्टि हुई. शाकिर ने कहा, “लड़का अपने पैरों पर गाड़ी में बैठा.” अस्पताल में भर्ती होने के 20 घंटे के अंदर ही उसकी मौत हो गई.

उन्होंने रोते हुए पूछा, “एक 14 साल के बच्चे का लीवर सिर्फ 24 घंटे में कैसे फेल हो सकता है? इतना छोटा बच्चा.”

हरियाणा के छैनसा गांव में जमा गंदा पानी | फोटो: रमेश्वर सिंह
हरियाणा के छैनसा गांव में जमा गंदा पानी | फोटो: रमेश्वर सिंह

शाकिर अपने बेटे की मौत के लिए दूषित पानी को जिम्मेदार ठहराते हैं. उन्होंने कहा, “हमारे गांव में सुरक्षित पीने का पानी नहीं है. हमारे खेतों में गंदा पानी जमा रहता है क्योंकि निकलने का रास्ता नहीं है.”

गांव में साफ पीने के पानी का अपना स्रोत नहीं है, इसलिए लोग या तो पैसे देकर टैंकर का पानी लेते हैं या पाइपलाइन का पानी इस्तेमाल करते हैं. स्वास्थ्य अधिकारियों को शक है कि ग्रामीण अक्सर पानी को लंबे समय तक स्टोर करके रखते हैं, जिससे दूषित होने का खतरा बढ़ जाता है.

गांव के आसपास के खेतों में काला और गंदा पानी जमा रहता है. ग्रामीणों का कहना है कि इन खेतों से गुज़रने वाली पानी की पाइपलाइन में लीकेज है, जिससे पाइप का पानी दूषित हो जाता है. इसी पानी का इस्तेमाल पीने और नहाने के लिए किया जाता है.

पलवल के डिप्टी कमिश्नर हरीश कुमार वशिष्ठ ने दिप्रिंट को बताया, “जब दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे का निर्माण हुआ, तब पानी जमा होने की समस्या शुरू हुई. यह पिछले चार-पांच साल से बनी हुई है. तब से हमने कई सुधार किए हैं, जिसमें पानी निकासी के लिए पाइपलाइन डालना शामिल है. पहले करीब 4,000 एकड़ में पानी भरा रहता था, जो अब घटकर करीब 1,200 एकड़ रह गया है.”

सरकारी डॉक्टरों ने छैनसा गांव में 31 पानी के स्रोतों की जांच की है | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
सरकारी डॉक्टरों ने छैनसा गांव में 31 पानी के स्रोतों की जांच की है | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

दूषित पानी

अब तक गांव के अलग-अलग स्रोतों से कुल 31 पानी के सैंपल लिए गए हैं. अधिकारियों ने कहा कि पीने के मुख्य पानी के स्रोत, जैसे टैंकर का पानी, में कोई बड़ी समस्या नहीं मिली. हालांकि, छह सैंपल में खराब स्टोरेज और साफ-सफाई की कमी के कारण बैक्टीरिया से दूषित पानी मिला.

छैनसा के ग्रामीणों ने दिप्रिंट को बताया कि दूषित पानी की समस्या नई नहीं है. उन्होंने कहा कि वे पहले भी कई बार जिला प्रशासन से शिकायत कर चुके हैं, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई.

जहां ग्रामीणों का कहना है कि मौतें एक महीने में हुईं, वहीं जिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. सतिंदर वशिष्ठ के अनुसार मौतें 31 जनवरी से 11 फरवरी के बीच हुईं.

हालात संभालते हुए: जिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. सतिंदर वशिष्ठ | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
हालात संभालते हुए: जिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. सतिंदर वशिष्ठ | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

डॉ. वशिष्ठ ने दिप्रिंट को बताया, “सभी मौतें हेपेटाइटिस बी से नहीं हुईं. सिर्फ चार लोग हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव थे. हमें अभी मौत का सही कारण पता नहीं है. हम अपनी मेडिकल कॉलेज टीम के साथ मिलकर रिकॉर्ड और मरीजों की हिस्ट्री देख रहे हैं, ताकि कारण पता चल सके.”

उन्होंने आगे कहा, “हेपेटाइटिस बी या सी आमतौर पर अचानक मौत का कारण नहीं बनते, इसलिए इसके पीछे कोई और कारण हो सकता है. हम इसकी जांच कर रहे हैं.”

डॉ. वशिष्ठ ने कहा, “पानी के टैंकर में क्लोरीन डाली जा रही है और क्लोरीन की गोलियां बांटी जा रही हैं. हम लोगों को साफ पानी पीने और साफ-सफाई रखने की सलाह दे रहे हैं. स्थिति नियंत्रण में है और घबराने की ज़रूरत नहीं है.”

उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन को गांव में कुछ झोलाछाप डॉक्टरों के इलाज करने की जानकारी मिली थी और अधिकारियों को शक है कि उन्होंने संक्रमित मेडिकल उपकरण इस्तेमाल किए होंगे, जिससे हेपेटाइटिस बी और सी फैल सकता है.

उन्होंने कहा, “जब हमारी टीम वहां गई, तो उनके क्लीनिक बंद थे. हमने पुलिस को उन्हें ढूंढने के लिए कहा है. ग्रामीणों को बिना डिग्री वाले डॉक्टरों से इलाज न कराने की सलाह दी गई है.”

डॉ. वशिष्ठ ने माना कि छैनसा गांव के खेतों में पानी जमा रहने की समस्या है, जो खराब जल निकासी और मछली पालन के तालाबों के कारण है. हालांकि, लोग इस पानी को नहीं पीते, लेकिन उन्होंने कहा कि पानी जमा रहने से आसपास के इलाकों में दूषित होने का खतरा बढ़ जाता है.

सरकार को कारण समझ नहीं आ रहा

1 फरवरी को एक रैपिड रिस्पॉन्स टीम गांव पहुंची और 2 फरवरी से स्वास्थ्य कैंप शुरू किए गए.

हाल की मौतों का सही कारण पता नहीं चलने के कारण, स्थानीय अधिकारी कई संभावनाओं की जांच कर रहे हैं, जिसमें दूषित पीने का पानी, जमा हुआ पानी, दूषित पाइपलाइन का पानी और बिना लाइसेंस वाले डॉक्टरों की लापरवाही शामिल है.

हालांकि इन सभी पर शक है, लेकिन अभी तक मौतों और हेपेटाइटिस ए, बी या सी के मामलों के बीच सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है. फिर भी, मेडिकल टीमें ग्रामीणों की हेपेटाइटिस बी, सी और एचआईवी की जांच कर रही हैं.

एचआईवी की जांच इसलिए की जा रही है क्योंकि एचआईवी भी हेपेटाइटिस बी और सी की तरह ही फैलता है—संक्रमित खून, यौन संपर्क, एक ही सुई का इस्तेमाल या गर्भावस्था, जन्म या स्तनपान के दौरान मां से बच्चे में.

एक स्वास्थ्य कैंप देख रहे सीएचओ सुनील कुमार ने कहा, “हम लोगों की हेपेटाइटिस बी, सी और ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) की जांच कर रहे हैं. आज इस कैंप में अब तक करीब 150 लोगों की जांच हुई है. ज्यादातर रिपोर्ट सामान्य हैं, सिर्फ एक-दो हेपेटाइटिस बी और सी पॉजिटिव मिले हैं.”

छैनसा गांव में मेडिकल कैंप | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
छैनसा गांव में मेडिकल कैंप | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

जिला प्रशासन ने गांव में तीन अस्थायी मेडिकल कैंप लगाए हैं. गांव के सरपंच के घर के बाहर टेबल लगाई गई हैं. मास्क पहने स्वास्थ्यकर्मी, जिनमें डॉक्टर, कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर (सीएचओ), लैब टेक्नीशियन, एएनएम और आशा कार्यकर्ता शामिल हैं, सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक ड्यूटी कर रहे हैं.

16 फरवरी को, केंद्र सरकार ने भी पलवल में राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) की टीम भेजी.

एनसीडीसी के निदेशक डॉ. रंजन दास ने दिप्रिंट को बताया, “हम जांच कर रहे हैं. हमारी टीम परसों (16 फरवरी) वहां गई थी. कल भी माइक्रोबायोलॉजिस्ट की टीम भेजी गई थी. वे आज स्वास्थ्य मंत्रालय को अंतरिम रिपोर्ट देंगे.”

‘हर एंगल से जांच’

एनसीडीसी के निदेशक ने कहा कि वे कई एंगल से जांच कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, “हेपेटाइटिस बी फैलने के कई तरीके होते हैं, और इसके पीछे दूसरे कारण भी हो सकते हैं. यह पुलिस जांच की तरह है—विस्तृत और गहराई से. अलग-अलग क्षेत्रों की कई टीमें इसमें शामिल हैं. हर टीम अपनी अलग रिपोर्ट देगी, जिसे बाद में मिलाकर स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजा जाएगा.”

छैनसा गांव में मेडिकल कैंप | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
छैनसा गांव में मेडिकल कैंप | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

गांव के कैंप में, सफेद कोट पहनी नर्सें दवाइयों के पत्तों, खांसी की दवा की बोतलों और दवाइयों के डिब्बों के पीछे बैठी हैं. सिर पर दुपट्टा ढके महिलाएं बच्चों के साथ इंतजार कर रही हैं. एक सरकारी स्वास्थ्य वैन पास में खड़ी है, जिसके दरवाजे खुले हैं और अंदर सामान दिखाई दे रहा है.

एक टेबल पर, एक कर्मचारी ध्यान से गोलियां गिन रहा है और दवा लेने का तरीका दो बार समझा रहा है. दूसरी टेबल पर खून के सैंपल लिए जा रहे हैं.

कैंप की एक टेबल पर, प्रिया को अभी बताया गया है कि उसे “काला पीलिया” है—यह उत्तर भारत में गंभीर और लंबे समय तक रहने वाले लीवर संक्रमण, खासकर हेपेटाइटिस बी और सी के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है.

प्रिया ने धीरे से कहा, “मुझे बुखार था. मुझे अक्सर टाइफाइड होता है. आज मेरा टेस्ट हुआ. उन्होंने कहा कि मुझे पीलिया है. उन्होंने कहा कि मुझे पलवल जाना होगा.”

एक-एक करके ग्रामीण अपने कागज़ लेकर आगे आ रहे हैं. उनके नाम और जानकारी लिखी जा रही है. इन कागज़ों में पहचान पत्र, टेस्ट रिपोर्ट और टीकाकरण का रिकॉर्ड शामिल है.

अब तक छैनसा के इन तीन कैंपों में 2,000 से ज्यादा लोगों की जांच हो चुकी है और कुल 32 लोग हेपेटाइटिस बी और सी पॉजिटिव पाए गए हैं. इन 32 मामलों में से 3 को हेपेटाइटिस बी है और बाकी को हेपेटाइटिस सी है.

‘हमारी बात नहीं सुनी गई’

गांव के रहने वाले और रिटायर्ड आर्मी कर्मचारी रमेश्वर सिंह एक मोटी फाइल दिखाते हैं, जिसमें उनके अनुसार कई शिकायतें हैं, जो उन्होंने सालों में स्थानीय विधायक, मुख्यमंत्री, डिप्टी कमिश्नर और अन्य अधिकारियों को दी हैं.

उन्होंने कहा, “पानी की सप्लाई लाइन में लीकेज है. गंदे नाले का पानी पीने के पानी में मिल जाता है. हम वही पानी पीते हैं.”

गांव के सरपंच मोहम्मद इस्लाम ने कहा कि मौतों की संख्या प्रशासन के बताए आंकड़े से ज्यादा है.

उन्होंने दावा किया, “पिछले एक महीने में करीब 20 से 22 लोगों की मौत हुई है” और कहा कि गांव में लंबे समय से पानी जमा रहने की समस्या है.

उन्होंने कहा, “हमारी जमीन 15 साल से पानी में डूबी हुई है. हम फसल नहीं उगा सकते. पीने के पानी की सही सुविधा नहीं है. हम टैंकर पर निर्भर हैं. मैंने इस बारे में प्रशासन को लिखा है.”

मौतों की संख्या पर अभी स्पष्टता नहीं

जबकि प्रशासन मौतों का कारण पता करने की कोशिश कर रहा है, असली संख्या को लेकर सवाल बने हुए हैं. हाल के हफ्तों में 75 साल से ज्यादा उम्र के कुछ लोगों की भी मौत हुई है, लेकिन चूंकि इन मौतों का संदिग्ध संक्रमण से सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है, इसलिए अधिकारियों ने उन्हें प्राकृतिक मौत मानकर गिनती में शामिल नहीं किया है.

लेकिन नाहीद जैसी कहानियां अभी भी परेशान कर रही हैं और सवाल उठा रही हैं.

उनकी 18 साल की बेटी ने पहले पेट दर्द की शिकायत की. अगले दिन उसे बुखार हो गया. जब उसे सरकारी अस्पताल ले जाया गया, तो डॉक्टरों ने कहा कि पीलिया ने उसके लीवर को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया है.

नाहीद ने पूछा, “डॉक्टर भी कह रहे थे—जो लीवर 40 या 50 साल में फेल नहीं होता, वह इतनी छोटी लड़की में कैसे खराब हो गया?”

“डॉक्टरों ने हमसे कहा कि उन्हें नहीं पता कि यह कौन-सी बीमारी थी.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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