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Sunday, 15 February, 2026
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मेघालय में कागज़ों पर बैन, ज़मीन पर काम जारी: 22,000 रैट-होल खदानें अब भी चालू

ईस्ट जयंतिया हिल्स में प्रतिबंधित रैट-होल माइनिंग, जहां एक धमाके में 31 लोगों की मौत हुई, कम निवेश और ज्यादा मुनाफे का मॉडल है. 10 साल का बैन भी इसे नहीं रोक पाया.

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शिलांग: पांच दिन पहले, 20 साल की संजना मलाकर शिलांग के NEIGRIHMS अस्पताल के कॉरिडोर में बार-बार दौड़ रही थीं. वह गार्ड और अजनबियों को रोककर पूछ रही थीं कि क्या वे उनके पति देब को बचाने में मदद कर सकते हैं. मेघालय के ईस्ट जयंतिया हिल्स के थांगस्को में रैट-होल कोयला खदान में हुए धमाके में वह बुरी तरह झुलस गए थे. वे अभी उनके इलाज के लिए पैसे का इंतजाम ही कर रही थीं, तभी 11 फरवरी को, धमाके के छह दिन बाद, उनकी मौत हो गई.

जब वे अपने पति का शव अंतिम संस्कार के लिए घर ले जाने की तैयारी कर रही थीं, संजना उतनी ही गुस्से में थीं जितनी दुखी, प्रकरण के लिए वे अवैध खदान के ऑपरेटर को जिम्मेदार मानती हैं.

संजना ने कहा, “वो उस दिन काम पर नहीं जाना चाहते थे. सरदार ने उनको मजबूर किया. यह आम मौत नहीं, बल्कि हत्या है. उन्होंने मेरे पति की जान ले ली.” उन्होंने कहा कि उनकी मौत के साथ ही उनका भविष्य खत्म हो गया—वे बच्चे जिनकी उन्होंने योजना बनाई थी, वह छोटा घर जिसे बनाने का देब ने वादा किया था. अब, वह कहती हैं, उनके पास सहारा लेने के लिए कोई नहीं बचा.

अब तक चार खदान ऑपरेटरों को गिरफ्तार किया गया है, लेकिन मेघालय में रैट-होल माइनिंग को लेकर गुस्सा अब धीरे-धीरे ठंडा पड़ने लगा है.

देब मलाकर 31 पीड़ितों में से एक थे, जो विनाशकारी घटनाओं की श्रृंखला का शिकार हुए. यह 5 फरवरी को सुबह 11 बजे शुरू हुआ, जब एक खाली गड्ढे में डायनामाइट विस्फोट से मीथेन गैस निकलने लगी, इसके बाद आग लग गई और ढहने से पास की तीन सक्रिय खदानें भी इसकी चपेट में आ गईं और मजदूर अचानक फंस गए. क्योंकि धमाका एक दूरदराज इलाके में हुआ था, बचाव दल शाम तक वहां नहीं पहुंच सका. जब तक वे पहुंचे, 18 मजदूरों की मौत हो चुकी थी. बाकी, देब की तरह, बाद के दिनों में अपनी चोटों के कारण मर गए. यह कोई अकेली घटना नहीं थी; इससे कुछ हफ्ते पहले, 23 दिसंबर को, थांगस्को में एक और धमाके में एक मजदूर की मौके पर ही मौत हो गई थी.

Sanjana Malakar, whose husband Deb died six days after the Meghalaya rat-hole mine blast, called his death ‘murder’
संजना मालाकार, जिनके पति देब की मेघालय रैट-होल माइन ब्लास्ट के छह दिन बाद मौत हो गई थी, ने उनकी मौत को ‘हत्या’ बताया | फोटो: प्रवीण जैन | दिप्रिंट

‘रैट-होल माइनिंग’ में पहाड़ियों के किनारों में संकरी क्षैतिज सुरंगें खोदी जाती हैं, जो अक्सर तीन या चार फीट से ज्यादा ऊंची नहीं होतीं, ताकि पतली कोयला परत तक पहुंचा जा सके क्योंकि ये खदानें अवैध और बिना नियम की होती हैं, इनमें कोई वैज्ञानिक वेंटिलेशन या गैस मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं होता. सही निकास न होने के कारण, विस्फोट होने पर मजदूरों के पास बचने का बहुत कम मौका होता है. धमाके आमतौर पर तब होते हैं जब चट्टान तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया गया डायनामाइट या औज़ारों से निकली चिंगारी कोयले में फंसी मीथेन गैस में आग लगा देती है.

एक पल में यह संकरी सुरंग मौत का कमरा बन सकती है और इन तंग, आपस में जुड़ी सुरंगों में तबाही आसानी से पास की खदानों तक फैल सकती है.

कई पहले मर चुके हैं और कई आगे मरेंगे. वे इसे अवैध कहते हैं, लेकिन यह खुलेआम होता है. सैकड़ों ट्रक सड़कों से गुजरते हैं—पुलिस, नेता, सब देखते हैं, लेकिन यह नहीं रुका

— सिस, पूर्व रैट-होल खनिक

2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा बैन लगाए जाने के बावजूद, अनुमान है कि मेघालय के पहाड़ी जिलों में ऐसी करीब 22,000 खदानें अभी भी चल रही हैं. यह एक खुला रहस्य है कि इस कम निवेश और ज्यादा मुनाफे वाले मॉडल को ‘माफिया’ चलाते हैं—जिसमें अक्सर सिर्फ ज़मीन और मजदूरों की ज़रूरत होती है.

rat-hole mining in Meghalaya
थांगस्को में बचाव अभियान देखता एक कोयला मज़दूर। इस काम के लिए हर दिन लगभग 800-1,500 रुपये मिलते हैं, जो यहां के ज़्यादातर दूसरे मेहनत के कामों से ज़्यादा है। | फोटो: प्रवीण जैन | दिप्रिंट

यह प्रथा 1980 के दशक के आखिर से इस क्षेत्र में मौजूद है, जब यहां पहली बार कोयला मिला था और जल्दी ही यह इन इलाकों की अर्थव्यवस्था का आधार बन गई. आज भी, यह अवैध कारोबार ज़मीन मालिकों, ट्रांसपोर्टरों और सरदारों के बड़े नेटवर्क को चलाता है, जिनका कोयला बाद में पड़ोसी राज्यों के सीमेंट प्लांट और ईंट भट्ठों में इस्तेमाल होता है.

कमजोर कार्रवाई के कारण यह गठजोड़ बना हुआ है, जबकि एक्टिविस्ट और निगरानी संस्थाएं लगातार आवाज़ उठा रही हैं, जब भी कोई हादसा होता है, अधिकारी छापे मारते हैं और गिरफ्तारी करते हैं, लेकिन स्थानीय एक्टिविस्ट कहते हैं कि दबाव कुछ समय बाद कम हो जाता है और फिर काम शुरू हो जाता है.

एक पूर्व खदान मालिक ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “एनजीटी बैन के बाद रैट-होल माइनिंग केवल तीन-चार साल के लिए रुकी थी, लेकिन 2018 के आसपास से यह फिर शुरू हो गई और सबको इसके बारे में पता है. हज़ारों परिवार और कारोबार इस पर निर्भर हैं—पूरी अर्थव्यवस्था इससे चलती है.”

असम, पश्चिम बंगाल, नेपाल और बांग्लादेश से हजारों प्रवासी मजदूर यहां आते रहते हैं क्योंकि यहां रोज़ की मजदूरी ज्यादा मिलती है. मजदूर आमतौर पर प्रति टन कोयला 800 से 1,500 रुपये कमाते हैं, जो लगभग एक दिन की मजदूरी होती है.

अवैध माइनिंग की निगरानी करने वाली समिति के प्रमुख और गुवाहाटी हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज बीपी कटेके ने कहा, “अवैध माइनिंग रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई और निगरानी की कमी है.” 2022 में नियुक्त किए गए कटेके ने मेघालय हाई कोर्ट में रैट-होल माइनिंग बैन के उल्लंघन पर 36 से ज्यादा रिपोर्ट जमा की हैं. उन्होंने थांगस्को में धमाके वाली जगह का दौरा करने के बाद अपनी ताज़ा रिपोर्ट दाखिल की.

अदालत ने कटेके की ताज़ा रिपोर्ट को “चिंताजनक” बताया और कहा कि स्थानीय अधिकारियों ने अपने कर्तव्य में “स्पष्ट लापरवाही” की है और वह इस मामले की जांच किसी केंद्रीय एजेंसी से कराने का आदेश दे सकती है.

India-Bangladesh border in Meghalaya
मेघालय में भारत-बांग्लादेश सीमा का एक हिस्सा. रैट-होल खदानों का कोयला अक्सर बांग्लादेश भेजा जाता है | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

एक पूरी तरह से चलने वाला सिस्टम

थांगस्को जाने वाले 30 किमी के रास्ते में, कम से कम 30 छोड़ी गई रैट-होल खदानें पहाड़ियों में दिखाई देती हैं—लाल मिट्टी में बने काले गड्ढे, जिनमें से कुछ के आसपास ढीले बांस का ढांचा लगा है. उनके पास कुछ क्रेन और कोयले के ढेर भी पड़े हैं.

इन खदानों को चलाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं चाहिए. बस एक ज़मीन का टुकड़ा, मजदूरों को संभालने के लिए एक सरदार और लोगों को नीचे उतारने के लिए एक क्रेन. औपचारिक माइनिंग के उलट, जहां मजदूर पोर्टेबल ऑक्सीजन, हेलमेट, चश्मा, गैस डिटेक्टर और मजबूत जूते पहनते हैं, यहां मजदूर सिर्फ प्लास्टिक के दस्ताने और सिर पर लगी लाइट के साथ नीचे उतरते हैं. मजदूरी आमतौर पर निकाले गए कोयले के प्रति टन के हिसाब से मिलती है. सरदार मजदूरों से कहीं ज्यादा कमाते हैं.

rat-hole mines
ईस्ट जयंतिया हिल्स में एक रैट-होल खदान. एक्टिविस्ट कहते हैं कि हादसों के बाद काम रुकता है, फिर मामला शांत होते ही दोबारा शुरू हो जाता है | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

एक स्थानीय कोयला खरीदार ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “सरदार एक ठेकेदार की तरह होता है. खदान मालिक को प्रति टन के हिसाब से पैसा मिलता है और सरदार को ठेके के आधार पर, हालांकि, कुछ मामलों में उन्हें भी प्रति टन पैसा मिलता है.”

मुनाफा बहुत ज्यादा है. खरीदार ने बताया कि निवेश और मजदूरी मिलाकर लागत 2,000-3,000 रुपये प्रति टन पड़ती है, लेकिन बाज़ार में यह 12,000-13,000 रुपये प्रति टन बिकता है.

रैट-होल माइनिंग सबके लिए काम करती है क्योंकि लागत कम और मुनाफा ज्यादा है. अगर आप देखेंगे कि अवैध खदानें ज्यादा कमा रही हैं, तो कोई वैज्ञानिक माइनिंग में निवेश क्यों करेगा?

— पूर्व खदान मालिक

मेघालय का कोयला, जो ज्यादा ऊर्जा और कम राख के लिए जाना जाता है, सीमेंट फैक्ट्रियों और ईंट भट्ठों में लगातार मांग में रहता है क्योंकि वहां लगातार भट्टी की गर्मी चाहिए होती है. बैन के बावजूद, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क कोयले को असम और दूसरे राज्यों के रास्ते ले जाता है. कुछ खेप बांग्लादेश भी भेजी जाती है.

कोयला खरीदार ने कहा, “पहले 1990 और 2000 के दशक में जब यह कानूनी था, तब यह हरियाणा और पंजाब भी जाता था. ट्रकों से गुवाहाटी और फिर ट्रेन से.”

Coal labourers ride in the back of a truck in East Jaintia Hills
ईस्ट जयंतिया हिल्स में ट्रक के पीछे बैठे कोयला मजदूर | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

मेघालय में कोयला ज़मीन के अंदर परतों में दबा होता है. मजदूरों को कोयले तक पहुंचने के लिए कई फीट नीचे खोदना पड़ता है, जब एक परत खत्म हो जाती है, तो अगली परत तक पहुंचने के लिए रेत और पत्थर काटना पड़ता है. ऑपरेटर कहते हैं कि इससे मशीन से माइनिंग करना मुश्किल हो जाता है और रैट-होल माइनिंग ही एकमात्र तरीका है.

एक पूर्व खदान मालिक ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “आप कोयला निकालने के लिए क्रेन या भारी मशीनों का इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि यह परतों में होता है. अगर मशीन इस्तेमाल करेंगे तो यह रेत के साथ मिल जाएगा और बेकार हो जाएगा. इन खदानों से कोयला निकालने का एकमात्र तरीका हाथ से खोदना है.”

rat-hole mining site
रैट-होल माइनिंग साइट पर फेंके गए दस्ताने. मजदूर अक्सर बिना सुरक्षा के नीचे उतरते हैं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

मजदूर अपनी जान जोखिम में डालते हैं क्योंकि मजदूरी के बेहतर विकल्प कम हैं.

खदान मालिक ने कहा, “यहां उन्हें रोज 800-1,500 रुपये मिलते हैं. उन्हें किसी और मजदूरी में इतना पैसा नहीं मिलेगा.”

नेपाल से चार महीने पहले थांगस्को आए 39 साल के तारा मुंगेट पास की साइट पर काम कर रहे थे, जब धमाका हुआ. इस हादसे के बावजूद, वह अभी भी वहीं हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि काम फिर शुरू होगा.

rat-hole mining in Meghalaya
रैट-होल खदानों की संकरी सुरंगों में एक चिंगारी या डायनामाइट मीथेन गैस में आग लगाकर सुरंग को भट्टी बना सकता है | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

मुंगेट ने कहा, “हमें नहीं पता क्या कानूनी है या अवैध. यहां पैसा अच्छा मिलता है. अगर कोई ज्यादा कोयला निकाल ले, तो वह एक दिन में 5,000 रुपये तक कमा सकता है. ऐसा पैसा कहीं और मिलना बहुत मुश्किल है.”

सिर्फ मजदूर ही नहीं. ट्रक ड्राइवर, पेट्रोल पंप, सड़क किनारे होटल और किराना दुकानें भी कोयले के कारोबार पर निर्भर हैं.

एक्टिविस्ट एग्नेस खारशींग ने कहा, “खदान मालिक बहुत ज्यादा मुनाफा कमाते हैं. यह गरीबों की मदद नहीं कर रहा बल्कि उनकी ज़िंदगी से खेल रहा है. जिसे अदालत और सरकार ने अवैध घोषित किया है, उसे रोका जाना चाहिए. यह कारोबार जलवायु और पहाड़ों को नुकसान पहुंचा रहा है और इंसानों की जान इसकी कीमत चुका रही है.”

ईस्ट जयंतिया हिल्स के एसपी विकास कुमार ने गिरफ्तारी की पुष्टि की और कहा कि पुलिस हाई कोर्ट के लिए रिपोर्ट तैयार कर रही है. मामला अदालत में होने के कारण उन्होंने ज्यादा टिप्पणी करने से मना कर दिया. अब तक तीन खदान मालिक और एक ऑपरेटर गिरफ्तार किए गए हैं और पुलिस इस पूरे नेटवर्क की जांच भी कर रही है, जिसमें फंडिंग करने वाले लोग भी शामिल हैं.

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “यह माफिया राज्य के बड़े राजनीतिक लोगों से जुड़ा हुआ है.”

माफिया

ईस्ट जयंतिया हिल्स में, लोग धीमी आवाज़ में “कोल माफिया” के बारे में बात करते हैं, जो रैट-होल कोयले की खुदाई, ट्रांसपोर्ट और बिक्री को कंट्रोल करता है.

लेकिन इसके नेताओं की पहचान करना मुश्किल है. जिन जमीनों पर माइनिंग होती है, उनमें से ज्यादातर निजी स्वामित्व में हैं या समुदाय के कबीले के पास हैं, जिनके जमीन के अधिकार संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षित हैं. इससे जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है, जबकि आरोप है कि राजनीतिक संरक्षण में यह माइनिंग का कारोबार चलता रहता है.

खारशींग ने कहा, “पुलिस दिखावे के लिए कुछ गिरफ्तारियां करती है, ताकि लगे कि कार्रवाई हो रही है, लेकिन असली माफिया को पुलिस और नेताओं से संरक्षण मिलता है.”

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कोयले से भरा एक ट्रक. बैन के बावजूद मेघालय में करीब 22,000 रैट-होल खदानें चल रही हैं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

हालांकि, ये खदानें सबको दिखाई देती हैं, लेकिन एक्टिविस्ट और स्थानीय लोगों का कहना है कि जब काम चल रहा हो, तब इनके पास जाना या फोटो लेना “खतरनाक” होता है.

नवंबर 2018 में, सिविल सोसायटी विमेन ऑर्गनाइजेशन (CSWO) की तत्कालीन अध्यक्ष खारशींग और उनकी सहयोगी अमिता संगमा पर ईस्ट जयंतिया हिल्स में अवैध ट्रांसपोर्ट का रिकॉर्ड बनाते समय बेरहमी से हमला किया गया था. इस हमले में उन्हें जानलेवा चोटें आई थीं. इसके बाद के वर्षों में खारशींग को धमकी भरे फोन भी आए.

coal workers
ईस्ट जयंतिया हिल्स में घर लौटते कोयला मजदूर. माइनिंग कई दशकों से इस इलाके की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

जो लोग खदानों से बचकर निकल चुके हैं, वे भी किसी का नाम लेने या सीधे आरोप लगाने से बचते हैं.

39 साल के सिस पहले रैट-होल माइनर थे. पांच साल पहले, एक संकरी सुरंग में हादसे में उनका पैर कट गया था—इस चोट के कारण उसे हमेशा के लिए खदान छोड़नी पड़ी. आज वे नकली पैर के सहारे चलते हैं और हर हादसे और धमाके पर नज़र रखते हैं.

सिस ने धीमी आवाज़ में कहा, “पहले भी कई लोग मरे और आगे भी मरेंगे. यह चलता रहेगा. वे इसे अवैध कहते हैं, लेकिन यह खुलेआम होता है. सैकड़ों ट्रक सड़कों से गुजरते हैं—पुलिस, नेता, सब देखते हैं. अदालतें भी जानती हैं, लेकिन यह बंद नहीं हुआ.”

कागज़ पर बैन

एनजीटी ने 2014 में मेघालय में रैट-होल कोयला माइनिंग पर बैन लगा दिया था, क्योंकि बार-बार पानी प्रदूषण की शिकायतें आ रही थीं—खदानों से निकलने वाला एसिड और गंदगी नदियों को ज़हरीला बना रहा था, लेकिन इस बैन में उन हज़ारों लोगों के लिए कोई योजना नहीं थी, जो इस कोयला अर्थव्यवस्था पर निर्भर थे.

एक पूर्व खदान मालिक ने कहा, “मामला कोर्ट पहुंचा और उन्होंने सीधे बैन लगा दिया. उन्होंने आर्थिक पहलू पर ध्यान नहीं दिया. कई लोगों की ज़िंदगी इस पर निर्भर थी.”

बैन के बाद के शुरुआती वर्षों में, सख्ती बढ़ी. कई खदानें बंद हुईं, ट्रांसपोर्ट कम हुआ और कोयले के ट्रकों की आवाजाही घट गई.

पूर्व मालिक ने कहा, “2014 से 2018 के बीच माइनिंग कुछ हद तक रुकी, लेकिन पूरी तरह कभी बंद नहीं हुई. कुछ जगहों पर जारी रही.”

coal mining
सड़क किनारे रखा कोयला, पास में ट्रक और क्रेन खड़े हैं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

2019 में सुप्रीम कोर्ट ने बैन से पहले निकाले गए कोयले के ट्रांसपोर्ट और निपटान की अनुमति दी, लेकिन नियमों और निगरानी के साथ.

हालांकि, इससे पहले भी, कोयले के ट्रक अलग-अलग जिलों के चेक गेट से गुज़रते रहे.

पूर्व मालिक ने कहा, “तब भी माइनिंग हो रही थी, लेकिन इस अनुमति के बाद ट्रकों की संख्या बढ़ गई. ट्रांसपोर्ट ज्यादा खुलेआम होने लगा.”

उन्होंने सीधे बैन लगा दिया. उन्होंने आर्थिक पहलू पर ध्यान नहीं दिया. कई लोगों की ज़िंदगी इस पर निर्भर थी

— पूर्व खदान मालिक

“पहले से निकाला गया कोयला” वाली कैटेगरी जल्द ही विवाद का विषय बन गई. एक्टिविस्ट और निगरानी रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि नए निकाले गए कोयले को पुराने स्टॉक के रूप में दिखाकर ट्रांसपोर्ट किया जा रहा था. निगरानी में जमीन पर बड़े-बड़े कोयले के ढेर पाए गए.

एक्टिविस्ट अमिता संगमा ने कहा, “सरकार सब कुछ जानती थी. लोगों की जान जा रही थी. हज़ारों खदानें पुलिस और नेताओं के संरक्षण में खुलेआम चल रही थीं.”

जनवरी 2025 में, मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने घोषणा की कि केंद्र सरकार से तीन ऑपरेटरों को मंजूरी मिलने के बाद मेघालय में ‘वैज्ञानिक’ कोयला माइनिंग शुरू की जाएगी. उन्होंने यह भी कहा कि 12 अन्य आवेदनों की मंजूरी अंतिम चरण में है.

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निकाले गए कोयले के ढेर पर बैठा एक मजदूर | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

लेकिन ज़मीन पर, एक्टिविस्ट और पूर्व ऑपरेटरों का कहना है कि ऐसी ‘वैज्ञानिक’ खदानें न तो दिख रही हैं और न ही बड़े स्तर पर चल रही हैं.

खारशींग ने कहा, “मुख्यमंत्री कहते हैं कि वैज्ञानिक खदानें हैं—उन्हें हमें बताना चाहिए कि वे कहां हैं, क्योंकि ऐसी कोई खदान नहीं है.”

इस कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि मेघालय की जमीन और स्वामित्व व्यवस्था में वैज्ञानिक माइनिंग करना मुश्किल और महंगा है.

पूर्व खदान मालिक ने कहा, “रैट-होल माइनिंग सबके लिए काम करती है क्योंकि लागत कम और मुनाफा ज्यादा है. अगर अवैध खदानें ज्यादा कमा रही हैं, तो कोई वैज्ञानिक माइनिंग में निवेश क्यों करेगा?”

सरकारी रिपोर्टें बनती रहती हैं और एक्टिविस्ट जांच की मांग करते रहते हैं, लेकिन पहाड़ियों में अंतिम संस्कार जारी हैं.

संजना मलाकर ने कहा, “उस दिन मेरी दुनिया खत्म हो गई. अब वे जो भी करेंगे, उससे कुछ नहीं बदलेगा.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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