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Friday, 13 February, 2026
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भारत के डिजिटल नशामुक्ति केंद्रों में बढ़े मरीज, लत छुड़ाने में AI करेगा मदद

जैसे-जैसे भारत में मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ज्यादा लोग ऐसी लत का शिकार हो रहे हैं जिसमें कोई नशा नहीं होता, जैसे ज़रूरत से ज्यादा इंटरनेट चलाना, गेम खेलना, मोबाइल और सोशल मीडिया पर ज्यादा निर्भर रहना.

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नई दिल्ली: फरवरी की एक ठंडी सुबह, 35-साल के एक व्यक्ति फॉलो-अप के लिए नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के बिहेवियरल एडिक्शंस क्लिनिक में मनोचिकित्सकों से मिलने वापस आए.

छह महीने पहले उनके परिवार वाले उन्हें इस क्लिनिक में लेकर आए थे, जब उन्होंने एक ऑनलाइन गेम खेलते हुए 35 लाख रुपये गंवा दिए थे. यह गेम शेयर बाज़ार जैसा है. खिलाड़ी इसमें वैसे ही पैसा लगाते हैं जैसे शेयर मार्केट में—अगर शेयर की कीमत बढ़ती है तो पैसा मिलता है और अगर गिरती है तो नुकसान होता है.

एम्स में मनोचिकित्सा के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. यतन पाल सिंह बलहारा ने दिप्रिंट को बताया, “खेलते रहने के लिए उस व्यक्ति ने कर्ज़ लिया. उसने एक समझौता किया, जिसके तहत उसकी सैलरी सीधे कर्ज देने वाले को जाती थी, बदले में उसे एडवांस पैसा मिला. आखिर में उसके परिवार ने कर्ज़ का कुछ हिस्सा चुकाने के लिए ज़मीन बेच दी.”

बलहारा, जो मनोचिकित्सा विभाग और नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर (एनडीडीटीसी) के तहत चलने वाली वीकली ओपीडी सेवा बिहेवियरल एडिक्शंस क्लिनिक (बीएसी) के इंचार्ज हैं, उन्होंने कहा, “जब तक वह एम्स पहुंचे, तब तक आर्थिक नुकसान हो चुका था.”

एम्स, नई दिल्ली | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट
एम्स, नई दिल्ली | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट

बलहारा ने दिप्रिंट को बताया कि व्यक्ति में गैंबलिंग डिसऑर्डर (जुआ विकार) और गेमिंग डिसऑर्डर की पहचान हुई, जिन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के रूप में मान्यता देता है. उन्होंने कहा, “इलाज शुरू होने के बाद छह महीनों में मरीज़ ने और पैसा नहीं गंवाया, लेकिन दोबारा लत लगने का खतरा हमेशा रहता है.”

गौरतलब है कि यह मरीज अकेला मामला नहीं है.

2016 में शुरू होने के बाद से, बिहेवियरल एडिक्शंस क्लिनिक (बीएसी) में ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जिन्हें बिना नशे वाली लत है, जैसे ज़रूरत से ज्यादा इंटरनेट चलाना, गेम खेलना, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर निर्भर रहना. जैसे-जैसे भारत में डिजिटल इस्तेमाल बढ़ रहा है, डॉक्टर्स का कहना है कि वे मोबाइल फोन, ऑनलाइन गेम, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और असली या नकली जुए से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे ज्यादा लोगों को देख रहे हैं.

गाजियाबाद की घटना समेत कई मामलों ने ध्यान खींचा है. गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों ने अपने फ्लैट की नौवीं मंजिल की बालकनी से कूदकर जान दे दी थी. खबरों के मुताबिक, उनके माता-पिता ने उनका मोबाइल इस्तेमाल सीमित कर दिया था. इन घटनाओं ने ऑनलाइन कंटेंट के ज्यादा इस्तेमाल पर चिंता बढ़ाई है.

पिछले महीने संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी डिजिटल लत को भारत के युवाओं के लिए बढ़ता खतरा बताया गया.

इसमें कहा गया कि 2014 में 25.15 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन थे, जो 2024 में बढ़कर 96.96 करोड़ हो गए. इसके साथ लोगों में डिजिटल निर्भरता बढ़ी है, जिसका असर खासकर 15 से 24 साल के युवाओं के मेंटल हेल्थ पर गंभीर रूप से पड़ा है.

नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज (इंडिया) की मैगज़ीन में 2017 में छपे एक रिसर्च लेख के अनुसार, एम्स क्लिनिक में काउंसलिंग लेने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है.

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. रचना भार्गव, जो बलहारा के साथ इस क्लिनिक को चलाती थीं, उन्होंने द टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि 2016 में शुरू होने पर क्लिनिक में रोज छह से सात मरीज आते थे.

भार्गव ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि 2018 तक इंटरनेट की लत के लिए मदद लेने वालों की संख्या दोगुनी हो गई थी.

बलहारा ने दिप्रिंट से कहा कि जैसे-जैसे लोगों को क्लिनिक के बारे में जानकारी हुई, वैसे-वैसे ज्यादा लोग मदद के लिए आने लगे.

उन्होंने कहा, “पिछले कुछ सालों में हमने कुछ रिसर्च की है, जिससे पता चला है कि मामलों की संख्या बढ़ रही है.”

उन्होंने यह भी बताया कि सिर्फ क्लिनिक में आने वाले लोगों की संख्या से यह तय नहीं होता कि डिजिटल लत बढ़ी है, “यह भी हो सकता है कि अब ज्यादा लोगों को जानकारी हो. कई और कारण हो सकते हैं. शायद सामान्य तौर पर फोन का इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है.”

डिप्रेशन, चिंता और डिजिटल लत

एम्स के बिहेवियरल एडिक्शंस क्लिनिक में ज्यादातर मरीज 13 से 18 साल के बीच के हैं, लेकिन दूसरे उम्र के लोग भी मदद लेने आते हैं. बलहारा ने कहा, “20 और 30 साल के लोग भी आते हैं. कभी-कभी बुजुर्ग लोग भी आते हैं क्योंकि उनके परिवार वालों को लगता है कि वे हमेशा फोन पर रहते हैं और बस चुपचाप कंटेंट देखते रहते हैं.”

2017 के एम्स के रिसर्च आर्टिकल में बताया गया था कि क्लिनिक ने ‘ब्लू व्हेल चैलेंज’ जैसे ऑनलाइन मामलों से जुड़े केस भी संभाले हैं.

सर गंगाराम अस्पताल के सीनियर साइकेट्रिस्ट डॉ. राजीव मेहता ने तीन बड़े ग्रुप बताए: ऐसे किशोर जिनकी पढ़ाई प्रभावित होती है, मध्यम उम्र की महिलाएं जो अकेलेपन या मिडलाइफ तनाव से जूझ रही हैं और बुजुर्ग जो अकेले हैं या अकेले रहते हैं.

नई दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल का इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट
नई दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल का इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट

सर गंगाराम अस्पताल में साइकोथेरेपी डिपार्टमेंट के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. राजेश गोयल ने 17 साल के एक स्टूडेंट्स का केस याद किया, जिसके 10वीं में 97 प्रतिशत स्कोर थे, लेकिन 12वीं में नंबर काफी गिर गए. गोयल ने कहा, “वह इंस्टाग्राम और फेसबुक पर घंटों बिताता था. ध्यान लगाने और काम पूरा करने की उसकी क्षमता प्रभावित हुई. टीचर्स ने कहा कि उसे सिलेबस आता था, लेकिन वह अच्छा परफॉर्म नहीं कर पा रहा था.”

फोर्टिस नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम के अध्यक्ष डॉ. समीर पारिख ने एक और किशोर का उदाहरण दिया, जो दिन-रात बहुत ज्यादा ऑनलाइन गेम खेलता था. इससे उसकी नींद और रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित हो गई.

अदयु केंद्र का नेतृत्व करने वाले पारिख ने कहा, “उस किशोर की सोने-जागने की दिनचर्या बिगड़ गई, लगातार थकान रहने लगी, चिड़चिड़ापन बढ़ गया, शारीरिक गतिविधि कम हो गई और धीरे-धीरे उसकी सेहत और मानसिक-सामाजिक स्थिति खराब होने लगी.”

मेहता ने कहा कि कई झगड़ने वाले पति-पत्नी भी आते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका साथी हमेशा मोबाइल पर रहता है.

मेहता ने दिप्रिंट से कहा, “मुझे एक मामला याद है, जहां एक वकील अपनी 12 साल की बेटी को स्क्रीन की लत के कारण लेकर आया. समस्या घर से शुरू हुई थी—जब बच्ची टाइम और फोकस मांगती थी, तो उनकी मां, जो खुद ऑनलाइन गेम में ज्यादा लगी रहती थीं, उन्हें दूसरा फोन दे देती थीं.”

उन्होंने कहा कि महामारी के बाद ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है.

मेहता ने कहा, “कोविड से पहले शायद महीने में एक केस आता था. अब हर दिन दो से तीन ऐसे मामले आते हैं, खासकर किशोरों के.”

हालांकि, डॉक्टर्स ने कहा कि ज्यादा स्क्रीन टाइम का मतलब हमेशा लत नहीं होता.

बलहारा ने कहा, “सिर्फ स्क्रीन टाइम से कुछ तय नहीं होता. यह इस पर निर्भर करता है कि उसका इस्तेमाल किस काम के लिए हो रहा है. कोई कोडर या कंटेंट क्रिएटर कई घंटे स्क्रीन पर काम कर सकता है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि उसे लत हो.”

डॉक्टर ने समझाया कि मेडिकली तौर पर लत का मतलब कंट्रोल खो देना है. बलहारा ने कहा, “मरीज यह तय करने में संघर्ष करते हैं कि कब शुरू करें और कब बंद करें और साफ नुकसान होने के बावजूद जारी रखते हैं. ज़िंदगी के दूसरे हिस्से—जैसे नींद, खाना, पढ़ाई, काम और रिश्ते—पीछे छूट जाते हैं.”

“जब कोई व्यक्ति नींद, खाना, रिश्ते और जिम्मेदारियों से ज्यादा स्क्रीन को महत्व देता है और नुकसान जानने के बाद भी रुक नहीं पाता—तभी हम उसे लत कहते हैं.”

बलहारा ने कहा कि स्क्रीन से जुड़ी लत की पहचान सिर्फ स्क्रीन टाइम के आधार पर नहीं होती.

डॉक्टर यह भी देखते हैं कि क्या यह व्यवहार व्यक्ति की निजी, सामाजिक, शैक्षिक या कामकाजी ज़िंदगी पर गंभीर असर डाल रहा है और क्या यह लंबे समय तक—आमतौर पर लगभग 12 महीने, से जारी है.

यह जांच आईसीडी-11 के मानकों पर आधारित होती है, जो स्वास्थ्य डेटा, चोटों और मौत के कारणों को दर्ज और तुलना करने का ग्लोबल स्टैंडर्ड है.

डॉक्टर्स का कहना है कि डिजिटल लत और दूसरी मेंटल हेल्थ समस्याएं अक्सर अलग-अलग नहीं होतीं.

उदाहरण के लिए, जो किशोर रातभर गेम खेलता है, वह पढ़ाई में असफल होने और परिवार में तनाव के बाद डिप्रेशन का शिकार हो सकता है. वहीं, जिसे सामाजिक चिंता होती है, वह ऑनलाइन जगहों को सुरक्षित मानकर वहां ज्यादा समय बिताने लगता है और धीरे-धीरे कंट्रोल खो देता है.

मेहता ने इसे एक चक्र बताया. “डिप्रेशन और चिंता डिजिटल लत की ओर ले जा सकते हैं और डिजिटल लत डिप्रेशन और चिंता को और बढ़ा सकती है.”

गेमिंग डिसऑर्डर की WHO द्वारा पहचान

2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अपनी इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीज (आईसीडी-11) में गेमिंग डिसऑर्डर को आधिकारिक रूप से शामिल किया. आईसीडी-11 बीमारियों और स्वास्थ्य स्थितियों की पहचान, रिकॉर्ड और निगरानी का ग्लोबल स्टैंडर्ड है. इसी तरह जुआ (गैंबलिंग) को भी आईसीडी-11 में शामिल किया गया.

डब्ल्यूएचओ ने जुआ विकार को “नशे वाली आदतों से होने वाले विकार” के तहत रखा. इसमें बताया गया है कि यह ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति बार-बार जुआ खेलता है, उस पर कंट्रोल खो देता है, रोज़मर्रा की ज़िंदगी से ज्यादा जुए को महत्व देता है और नुकसान होने के बावजूद उसे जारी रखता है.

कई देशों ने युवाओं में हानिकारक डिजिटल इस्तेमाल को रोकने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए हैं. ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगा दी है, जबकि चीन ने असली नाम की पहचान प्रणाली के जरिए नाबालिगों के ऑनलाइन गेम खेलने का समय सीमित किया है.

सिंगापुर स्वस्थ डिजिटल आदतों को बढ़ावा देने के लिए मीडिया लिटरेसी और साइबर-वेलनेस एजुकेशन पर जोर देता है, जबकि ब्रिटेन ने स्कूलों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए डिजिटल रेजिलिएंस फ्रेमवर्क शुरू किया है. इसके अलावा, कई देशों ने क्लास में स्मार्टफोन के इस्तेमाल को सीमित या बंद करना शुरू कर दिया है.

रोकथाम, जल्दी पहचान

समस्या की गंभीरता को देखते हुए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने फरवरी 2025 में देश के पहले सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च ऑन एडिक्टिव बिहेवियर्स (सीएआर-एबी) की स्थापना को मंजूरी दी.

सीएआर-एबी का मकसद तकनीक के गलत और ज्यादा इस्तेमाल, खासकर बच्चों और युवाओं में, से निपटने के लिए सबूतों पर आधारित उपाय विकसित करना है.

एम्स में अब इलाज के साथ रिसर्च भी की जा रही है. आईसीएमआर द्वारा फंडिड यह सेंटर बच्चों और किशोरों में इंटरनेट और तकनीक से जुड़ी लत के बढ़ते सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दों पर कई स्टडीज़ कर रहा है.

बलहारा ने कहा, “एक स्टडी एआई आधारित मॉडल तैयार करने पर है, जिससे उन बच्चों और किशोरों की पहचान की जा सके जो आगे चलकर नशे वाली आदतों के जोखिम में हो सकते हैं.”

शोधकर्ता स्कूलों और कॉलेजों से डेटा इकट्ठा कर रहे हैं, ताकि मशीन लर्निंग मॉडल तैयार किया जा सके, जो अगले दो, पांच या दस साल में लत लगने की संभावना का अनुमान लगा सके.

एक और स्टडी स्टूडेंट्स और पैरेंट्स के लिए रोकथाम पर बेस्ड प्रोग्राम तैयार करने पर है.

बलहारा ने कहा, “यह भारतीय संदर्भ में सबूतों पर आधारित शुरुआती रोकथाम प्रोग्राम में से एक होगा. यह प्रोग्राम इस साल अप्रैल-मई के आसपास शुरू होने की उम्मीद है और इसे स्कूल और कॉलेज के स्टूडेंट्स के बीच टेस्ट किया जाएगा.”

इसके अलावा, टीम ऐसे स्क्रीनिंग टूल तैयार कर रही है, जिससे इंटरनेट के गलत या नशे जैसे इस्तेमाल की जल्दी पहचान हो सके. साथ ही एक तय काउंसलिंग मॉड्यूल भी बनाया जा रहा है, जिसे अगले साल शुरू किया जा सकता है.

एआई बेस्ड जोखिम पहचान मॉडल के पहले स्टडी के लिए डेटा इकट्ठा करना शुरू हो चुका है और इसे अप्रैल 2026 तक पूरा करने की योजना है. यह शोध छह जगहों—दिल्ली, ऋषिकेश, शिलांग, पटना, भोपाल और पुडुचेरी, में किया जा रहा है और इसमें कम से कम 2,000 स्टूडेंट्स को शामिल किया जाएगा. लक्ष्य 3,000-4,000 प्रतिभागियों तक पहुंचने का है.

बलहारा ने कहा, “विश्लेषण मई में पूरा होने की उम्मीद है और महीने के अंत तक नतीजे आ सकते हैं. हम लोगों से इंटरनेट को पूरी तरह छोड़ने के लिए नहीं कहते. इंटरनेट दुश्मन नहीं है. हमारा ध्यान गलत इस्तेमाल को रोकने और सुरक्षित, स्वस्थ इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर है. लक्ष्य कंट्रोल है, पूरी तरह हटाना नहीं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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