हाल के समय में ही बेरोज़गारी की समस्या पर ज़्यादा ध्यान दिया जाने लगा है. यह बहुत पुरानी बात नहीं है जब बेरोजगारी का कारण व्यक्ति की अपनी किसी कमी को माना जाता था. यह समझने में काफी वक्त लगा कि आर्थिक व्यवस्था की अक्षमता के कारण पैदा होने वाली बेरोजगारी का व्यक्ति के निजी स्वभाव से कुछ लेना देना नहीं भी हो सकता है. जब यह बात समझ में आई, तो बेरोज़गारी की समस्या का गहराई से अध्ययन किया गया, क्योंकि बेरोज़गारी की क़ीमत समाज को बहुत भारी पड़ती है. इसलिए बेरोजगारी को जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी दूर करना जरूरी है, क्योंकि लंबे समय तक बेरोज़गार रहना उस फंदे की तरह होता है, जिसमें उलझकर एक बेरोजगार कामगार, बेकार कामगार बनकर रह जाता है. यहां बेरोज़गारी से हमारा मतलब मजबूरी में बेरोज़गार होना है. भारतीय परिस्थितियों में हमें बेरोज़गारी के एक और प्रकार को जोड़ना होगा, जिसे प्रछन्न बेरोज़गारी कहते हैं.
भारत में बेरोज़गारी की समस्या काफी गंभीर होती जा रही है, क्योंकि जनसंख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है और हर साल लगभग 15 से 20 लाख नए लोग काम करने की उम्र में आ जाते हैं.
क्या समाजवाद बेरोज़गारी की समस्या का समाधान है?
ऊपरी तौर पर देखा जाए तो किसी खास “वाद” जैसे समाजवाद या पूंजीवाद और बेरोज़गारी की समस्या के समाधान के बीच सीधा संबंध नहीं दिखता. कोई भी आर्थिक व्यवस्था बेरोज़गारी को अपनी व्यक्त या स्वाभाविक हिस्सा नहीं मानती है.
भारत में बेरोज़गारी और अर्द्धरोज़गारी का सबसे बड़ा कारण पूंजी की कमी है. इसलिए समाधान यह है कि निवेश की मात्रा बढ़ाई जाए. बेरोज़गारी की समस्या के सकारात्मक उपाय के लिए हमें राष्ट्रीय आय का लगभग 20 प्रतिशत निवेश करना पड़ सकता है. लेकिन इसके साथ कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है.
पहली बात है उपभोग यानी खपत की वृद्धि. जब रोज़गार बढ़ेगा तो उपभोक्ता वस्तुओं की माँग भी बढ़ेगी. अगर खपत को नियंत्रित करने के लिए कदम नहीं उठाए गए तो अर्थव्यवस्था पर महँगाई का दबाव बढ़ेगा. इससे या तो विकास की रफ्तार धीमी हो जाएगी या महंगाई के कारण लोगों के उपभोग में असमानता आ जाएगी. इसलिए ज़रूरी वस्तुओं की क़ीमतों पर नियंत्रण और ग़ैर-ज़रूरी वस्तुओं पर कर लगाकर या उनके उत्पादन व आयात को सीमित करके खपत को नियंत्रित करना होगा. साथ ही, उपभोक्ता वस्तुओं, ख़ासकर मज़दूरी से जुड़ी वस्तुओं, की आपूर्ति बढ़ानी होगी और उपलब्ध संसाधनों की उत्पादकता बढ़ानी होगी.
ऐसे कड़े नियंत्रण मुक्त बाज़ार वाली अर्थव्यवस्था में अपने आप नहीं चल सकते. लेकिन समाजवादी अर्थव्यवस्था में सरकार के माध्यम से इन्हें लागू करने और सफल बनाने के पर्याप्त मौके होते हैं.
उत्पादन के क्षेत्र में ऐसे अनेकों काम हैं जिनमें कम समय के लिए मज़दूरों को लगाया जा सकता है, जैसे ग्रामीण क्षेत्रों की श्रम-प्रधान गतिविधियाँ. इनमें स्थानीय पूंजी निर्माण, जैसे जल आपूर्ति बढ़ाने और उसे नियंत्रित करने के लिए कार्य करना, सड़कें बनाना, भंडारण सुविधाओं का निर्माण करना, गांव की सामाजिक सेवाओं और सुविधाओं में सुधार करना शामिल है. खेती की अधिक श्रम-प्रधान विधियाँ भी अपनाई जा सकती हैं, जैसे दोहरी या तिहरी फसल उगाना, अधिक खाद का उपयोग, गहरी जुताई, पास-पास बोआई और अधिक निराई-गुड़ाई. इसके अलावा ग्रामीण उद्योगों या अन्य उत्पादन गतिविधियों का विकास किया जा सकता है, जैसे पशुपालन, वनीकरण, कुक्कुट पालन, फलोत्पादन और ग्रामीण हस्तशिल्प.
शहरी क्षेत्रों में अधिक रोजगार के अवसर मौजूदा उत्पादन क्षमता के पूर्ण उपयोग, यानी एक से अधिक पालियों में काम, हस्तशिल्प, कुटीर एवं लघु उद्योगों के विकास और निर्माण कार्यों के माध्यम से सृजित किए जा सकते हैं. तथापि यह उल्लेखनीय है कि इन उपायों के सफल क्रियान्वयन की मूल समस्या काफी हद तक एक केंद्रीय संगठन की क्षमता और कार्यकुशलता पर निर्भर करती है.
उपलब्ध संसाधनों की उत्पादकता बढ़ाकर बिना ज़्यादा नए निवेश के भी पूरक संसाधनों की आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है. इससे पूंजी और उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन बढ़ेगा और रोज़गार की संभावनाएँ भी बढ़ेंगी. खेती में सरल सुधारों, बेहतर बीज, फसल चक्र, मिट्टी संरक्षण, मशीनों और कीटनाशकों के प्रयोग से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है.
हस्तशिल्प तथा लघु उद्योगों में उत्पादकता को पर्याप्त और सस्ती ऋण सुविधाएं प्रदान करके, क्रय यानी खरीद की बेहतर व्यवस्थाएँ करके, सस्ते और उत्तम कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करके, विपणन की उन्नत व्यवस्थाएं करके, छोटे और अलाभकारी इकाइयों के विलय द्वारा तथा सहकारी संस्थाओं की स्थापना के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है. इसके अतिरिक्त, लघु उद्योगों की स्थापना आधुनिक उद्योगों के साथ पूरक संबंध बनाए रखते हुए की जा सकती है, जिससे उनकी उत्पादकता में वृद्धि होगी और श्रमिकों के विस्थापन की समस्या भी कम होगी. अंततः, आधुनिक बड़े पैमाने के उद्योगों में उत्पादकता और उत्पादन को मौजूदा संयंत्र और उपकरणों के प्रभावी उपयोग तथा श्रम शक्ति के बेहतर प्रयोग द्वारा बढ़ाया जा सकता है.
यह तथ्य कि लगभग हर देश में स्थायी रूप से बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी विद्यमान है, जनमत द्वारा इस बात का निर्णायक प्रमाण माना जाता है कि पूँजीवाद इस आर्थिक समस्या को सुलझाने में असमर्थ है और इसलिए सरकारी हस्तक्षेप, सर्वसत्तावादी नियोजन तथा समाजवाद आवश्यक हैं.
पूंजीवादी देशों में बेरोज़गारी होना पूंजीवादी व्यवस्था की अक्षमता का प्रमाण नहीं है, और न ही साम्यवादी रूस में बेरोज़गारी का अभाव साम्यवादी व्यवस्था की दक्षता का प्रमाण है. स्थायी सामूहिक बेरोज़गारी की बुराइयों के लिए पूँजीवाद ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि वे राज्यनायकों की उन नीतियों का परिणाम हैं जो इसके कार्य को पंगु बना देती हैं. हाल के वर्षों में जो कुछ किया गया है, वह उस आर्थिक नीति के प्रभावों को छिपाने के प्रयासों की एक श्रृंखला मात्र है, जिसे श्रम की उत्पादकता में गिरावट के लिए उचित रूप से दोषी ठहराया जाता है. अब आवश्यकता ऐसी नीति की ओर लौटने की है जो श्रम की उच्च उत्पादकता सुनिश्चित करे.
यदि हम जापान, सिंगापुर आदि देशों में पूंजीवादी दृष्टिकोण द्वारा लाए गए चमत्कार पर नज़र डालें, तो बेरोज़गारी की समस्या को सुलझाने में पूंजीवादी तरीकों के प्रति हमारा विश्वास और अधिक सुदृढ़ हो जाएगा.
तो क्या हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि वे तथा अनेक अन्य विकासशील देश जन-स्तरीय रोज़गार सृजन, व्यापक रूप से साझा समृद्धि और अपने लोगों के लिए स्थिरता स्थापित करने में हमसे कहीं बेहतर क्यों और कैसे सफल रहे हैं, जबकि बीस वर्षों की योजना, कठोर नियंत्रणों और विकास में 30,000 करोड़ रुपये के निवेश के बाद भी हमारी अर्थव्यवस्था ठहरी हुई है, बेरोज़गारी बढ़ रही है और थोक स्तर पर वस्तुओं की कमी बनी हुई है.
ये सभी देश, भारत के विपरीत, आर्थिक सिद्धांतवाद से पूरी तरह मुक्त हैं.
इन सभी देशों में, जिनमें समाजवादी सरकारों वाले देश शामिल हैं, उत्पादन और वितरण के लिए मुख्य रूप से निजी उद्यम पर भरोसा किया जाता है और इसी के माध्यम से रोज़गार के अवसर पैदा किए जाते हैं.
ये सभी देश निजी निवेश, पहल और उद्यमिता के अनुकूल परिस्थितियां बनाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं.
इनमें से कोई भी अपने व्यापार और औद्योगिक समुदाय पर भारत जैसी भयावह लाइसेंस प्रणाली और पंगु बना देने वाले सर्वव्यापी नियंत्रण नहीं थोपता. इनमें से कोई भी निजी हाथों में आर्थिक शक्ति के संकेन्द्रण के काल्पनिक खतरे का मुकाबला कुछ गिने-चुने मंत्रियों और नौकरशाहों के हाथों में उसे केंद्रित करके नहीं करता.
इनमें से कोई भी यह नहीं मानता, जैसा कि हमारी सरकार मानती है, कि समाजवाद का मुख्य अर्थ व्यापार और उद्योग का राष्ट्रीयकरण तथा एक प्रभुत्वशाली सार्वजनिक क्षेत्र है. इसके विपरीत, वे प्रभुत्वशाली निजी क्षेत्र को समाजवाद के साथ पूरी तरह संगत मानते हैं. इनमें से किसी भी देश ने यहाँ प्रचलित अत्यंत ऊंची व्यक्तिगत कर दरों को नहीं अपनाया है, जिन्होंने निवेश और पहल को हतोत्साहित किया है और परिणामस्वरूप अधिक रोज़गार के अवसरों के सृजन में बाधा डाली है.
इस प्रकार हम देखते हैं कि आधुनिक समाजवादी सरकारें निजी उद्यम को प्रोत्साहित करने के लिए हर संभव प्रयास करती हैं, ताकि वह संपत्ति उत्पन्न कर सके, जिससे वे समाजवादी राज्य की कल्याणकारी सेवाओं के लिए आवश्यक कर संसाधन जुटा सकें. उन्होंने वह बात समझ ली है जिसे हमारे समाजवादी समझने में असफल रहे हैं—कि पूंजीवादी उद्यम समाजवाद के वित्तपोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और आर्थिक विकास की प्रक्रिया के दौरान ही उसके फलों को जनता तक पहुंचा सकते हैं. अर्थात्, कहें तो केक बनते समय ही उसे बांट दिया जाता है.
यह लेख सेंटर फ़ॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इस लेख का प्रकाशन मूलरूप से जुलाई 1971 को “द इंडियन लिबर्टेरियन” पत्रिका में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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