नई दिल्ली: रविवार को पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026-27 में सशस्त्र बलों के लिए पूंजीगत खर्च यानी कैपिटल आउटले में 21.8 प्रतिशत की बड़ी बढ़ोतरी की गई है. वहीं कुल रक्षा बजट में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
कैपिटल आउटले वह राशि होती है, जिससे सेना के तीनों अंग आधुनिकीकरण करते हैं और जरूरी उपकरण खरीदते हैं. इसमें नए फाइटर विमान, जहाज, पनडुब्बियां और बख्तरबंद वाहन जैसी खरीद शामिल होती है.
इस बार कुल बजट का 27.95 प्रतिशत हिस्सा कैपिटल खर्च का है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में यह रक्षा बजट के हिस्से के तौर पर खरीद के लिए तीसरा सबसे बड़ा आवंटन है.
हालांकि 1999 से 2026 तक के सभी बजटों पर नजर डालें तो यह साफ होता है कि रक्षा बजट में कैपिटल खर्च का हिस्सा 2004 से 2014 के बीच मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकारों के दौरान सबसे ज्यादा रहा.
दिप्रिंट द्वारा विश्लेषित पिछले 28 बजटों में यूपीए सरकारों ने लगातार अपने रक्षा बजट का करीब 35 प्रतिशत कैपिटल खर्च के लिए रखा. कुल रकम के हिसाब से देखें तो यूपीए के 10 साल के शासन में रक्षा खर्च में 213 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. यह 2004-05 के पहले बजट में 89,136 करोड़ रुपये से बढ़कर 2014-15 के आखिरी बजट में 2,79,202.87 करोड़ रुपये हो गया. यह बजट चुनावों के कारण अंतरिम बजट था.
मोदी सरकार के 2014-15 से लेकर अब तक के बजटों को देखें तो कुल रक्षा बजट की राशि में करीब 175 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. यह 2,85,202.87 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 7,84,678.28 करोड़ रुपये हो गई है.
बीते वर्षों में रक्षा बजट में कैपिटल खर्च जरूरतों के हिसाब से घटता-बढ़ता रहा है. युद्ध या सुरक्षा हालात बदलने के बाद आमतौर पर इसमें बड़ी बढ़ोतरी देखी गई है.

कारगिल युद्ध के बाद 2000-01 का रक्षा बजट पिछले साल के मुकाबले 32.87 प्रतिशत ज्यादा था. इसी तरह 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद 2009-10 के रक्षा बजट में पिछले साल की तुलना में 34.91 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी. इन हमलों में नौ आतंकियों समेत 166 लोग मारे गए थे.
मौजूदा बजट में भी पिछले साल के मुकाबले 15.19 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. यह बढ़ोतरी पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद मई 2025 में पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों के खिलाफ किए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद देखी गई है.
2026-27 का केंद्रीय बजट देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के मुकाबले रक्षा खर्च में आई गिरावट को भी थामता है. इस साल रक्षा बजट का अनुमान जीडीपी का करीब 1.99 प्रतिशत है, जो 2 प्रतिशत के वैश्विक मानक के करीब है. यह मानक नाटो ने लगभग एक दशक पहले अपने सदस्य देशों के लिए तय किया था.
2025-26 में 6.81 लाख करोड़ रुपये का रक्षा बजट जीडीपी का करीब 1.9 प्रतिशत था. पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के विश्लेषण के मुताबिक 2023-24 में रक्षा खर्च जीडीपी के 2 प्रतिशत से थोड़ा नीचे चला गया था.
2022-23 में रक्षा खर्च जीडीपी का करीब 2 प्रतिशत था. वहीं 2012-13 में यह आंकड़ा करीब 2.3 प्रतिशत था. इससे साफ होता है कि सालों में रक्षा खर्च का जीडीपी में हिस्सा घटा है.
वाजपेयी सरकार के बाद से कैपिटल आउटले
फरवरी 1999 में वित्त मंत्री यशवंत सिंहा के दूसरे बजट में रक्षा बजट का अनुमान 53,395.55 करोड़ रुपये था. इसमें कैपिटल आउटले 12,229.68 करोड़ रुपये था, जो कुल रक्षा बजट का करीब 22.9 प्रतिशत था.
उसी साल गर्मियों में मई और जून के बीच भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध हुआ. इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में एनडीए सरकार गिरने के बाद चुनाव कराए और तीसरी बार प्रधानमंत्री बने.
2000-01 में वाजपेयी सरकार के पहले बजट और यशवंत सिंहा के तीसरे बजट में रक्षा बजट 32.87 प्रतिशत बढ़कर 70,947.79 करोड़ रुपये हो गया. यह कारगिल युद्ध के बाद पहला बजट था. इस दौरान कैपिटल आउटले 12,229.68 करोड़ रुपये से बढ़कर 17,926.4 करोड़ रुपये हो गया, यानी 46.58 प्रतिशत की बढ़ोतरी.
वाजपेयी के तीसरे कार्यकाल में 2000-01 का बजट सबसे बड़ी बढ़ोतरी वाला था. इसके बाद के वर्षों में बढ़ोतरी काफी सीमित रही, क्रमशः 3.1 प्रतिशत, 4.7 प्रतिशत और 0.42 प्रतिशत. इन वर्षों में कैपिटल खर्च करीब 27 प्रतिशत के आसपास रहा.
मनमोहन सिंह सरकार का पहला बजट 2004-05 जुलाई 2004 में पेश हुआ. इसमें कुल रक्षा बजट में 15.86 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई. उस साल रक्षा बजट 89,136 करोड़ रुपये था और कैपिटल आउटले 33,482.85 करोड़ रुपये रहा, जो कुल रक्षा बजट का 37.56 प्रतिशत था.
मनमोहन सिंह के पूरे कार्यकाल में रक्षा बजट में कैपिटल खर्च 30 प्रतिशत से ऊपर बना रहा. सबसे कम आंकड़ा 2009-10 में था, जब कुल 1,66,663 करोड़ रुपये के रक्षा बजट में कैपिटल खर्च 32.9 प्रतिशत रहा.

2014-15 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. उनका पहला बजट यूपीए सरकार के उसी साल पेश किए गए अंतरिम बजट के काफी करीब था. उस समय रक्षा बजट 2,85,202.87 करोड़ रुपये था. मोदी सरकार के पहले बजट में कैपिटल खर्च 94,587.95 करोड़ रुपये रहा, जो कुल रक्षा बजट का करीब 33.17 प्रतिशत था.
इसके अगले साल कैपिटल खर्च घटकर कुल रक्षा बजट का करीब 30 प्रतिशत रह गया और तब से यह लगातार इस स्तर से नीचे बना हुआ है.
पेंशन खर्च में बढ़ोतरी
2015 के अंत में मोदी सरकार ने पूर्व सैनिकों के लिए ‘वन रैंक, वन पेंशन’ यानी OROP योजना को अधिसूचित किया था. इससे 2016-17 के बजट में पेंशन खर्च बढ़ा.
2016-17 के केंद्रीय बजट में रक्षा पर कुल अनुमानित खर्च 3,40,921.98 करोड़ रुपये था. इस साल कैपिटल खर्च घटकर कुल बजट का 23.05 प्रतिशत रह गया. उसी साल नए रक्षा उपकरणों की खरीद के लिए 78,586.68 करोड़ रुपये रखे गए थे.
इसके अगले साल पेंशन का खर्च बढ़कर 85,740 करोड़ रुपये हो गया. 2018-19 के बजट में यह 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया. 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने पूर्व सैनिकों की पेंशन के लिए 1,71,338.22 करोड़ रुपये का अनुमान लगाया है.

वाजपेयी के दूसरे कार्यकाल में पेश किए गए 1999-00 के केंद्रीय बजट में पेंशन के लिए 7,348.65 करोड़ रुपये रखे गए थे. मनमोहन सिंह के 2004-05 के पहले बजट में इस मद के लिए 11,250 करोड़ रुपये का अनुमान था. वहीं यूपीए-दो के आखिरी पूर्ण बजट 2013-14 में पेंशन के लिए 44,500 करोड़ रुपये रखे गए थे.
1999-00 के बजट में 7,348.65 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 के वित्तीय वर्ष में पेंशन का खर्च 1,71,338.22 करोड़ रुपये हो गया है. यह एक बड़ी बढ़ोतरी है, जिसमें इन वर्षों के बीच भारतीय रुपये की कीमत में आए बदलाव को शामिल नहीं किया गया है.
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