आईए, 1915 में चलें. अभी बंगाल का विभाजन नहीं हुआ है. एक पिता अपने ढाई साल, पांच साल और सात साल के तीन बच्चों को छोड़कर ओड़ीशा के समुद्रतट पर बालेश्वर की ओर जा रहा है. प्रथम विश्वयुद्ध अपने चरम पर है. बालेश्वर के समुद्रतट पर बाघा जतिन के नाम से मशहूर जतीन्द्रनाथ मुखर्जी हथियारों का जखीरा लेकर आ रहे जर्मन युद्धपोत का इंतजार कर रहे हैं. योजना बड़ी दुस्साहसपूर्ण थी—ब्रिटिश राज के खिलाफ़ देश भर में पूरे तालमेल के साथ बगावत छेड़ दी जाए.
लेकिन वह युद्धपोत भारतीय तट पर कभी नहीं आ पाता. ब्रिटिश खुफिया तंत्र हथियारों की उस खेप को बीच में ही रोक देता है. इसके बाद जो होता है वह इतिहास में ‘बैटल ऑफ बालेश्वर’ के नाम से दर्ज है. माउजर पिस्तौलों से लैस पांच क्रांतिकारियों और ब्रिटिश पुलिस के बीच 75 घंटे तक गोलियों की जंग चलती है. मुखर्जी को लगी गोली 10 सितंबर 1915 को उनकी जान ले लेती है.
इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में इस घटना को दर्ज तो किया गया है लेकिन शायद ही कोई यह पूछता है कि इसके बाद क्या हुआ था.
बाघा जतिन की पोती मंजूषा चटर्जी पूछती हैं कि “उन तीन बच्चों का क्या हुआ?” वे याद करती हैं कि उनके दादा की मृत्यु के बाद दादी इंदुबाला का जीवन कैसे बीता था. विधवा इंदुबाला पर हमेशा पुलिस की टोही नजर लगी रहती और वे एक जगह से दूसरी जगह शरण लेती रहतीं, जबकि औपनिवेशिक सरकार के अधिकारी क्रांतिकारियों के परिजनों को शरण देने वाले घरों पर छापे मारती रहती थी. रिश्तेदार दंडित किए जाने के डर से इंदुबाला को शरण देने से प्रायः मना कर देते. वर्षों तक वे और उनके बच्चे घरेलू नौकरानी-नौकरों की तरह छिपकर आउटहाउसों में रहते, निरंतर स्थान बदलते जीवन बिताते रहे.

अब 2022 के कोलकाता में आ जाइए. जो शहर कभी बंगाल के भूमिगत क्रांतिकारी आंदोलन का केंद्र था वहां मैंने 2022 में एक जन सर्वेक्षण के दौरान मध्यवय के एक शख्स से सवाल किया था: “आप जानते हैं, बाघा जतिन कौन थे?” जवाब मिला था: “बाघा और जतिन दो अलग-अलग व्यक्ति थे.“
महान बलिदानों के बारे में लोक स्मृति में इतनी अनभिज्ञता देखकर मैंने श्रीया दासगुप्ता के साथ मिलकर 2022 में ‘अग्निजुग आर्काइव’ की स्थापना की. अग्निजुग यानी आग का युग. हमारा अभिलेखागार मौखिक इतिहास की एक स्वतंत्र परियोजना है जिसमें 1900 से 1946 के बीच उपनिवेशवाद विरोधी उग्रवादी आंदोलनों का इतिहास जीवित क्रांतिकारियों, उनके परिवारों और वंशजों की यादों के रूप में दर्ज किया जा रहा है.
इस परियोजना के तहत मैंने 100 ज्यादा लोगों से बातचीत की है, व्यक्तिगत पत्रों तथा तस्वीरों को इकट्ठा किया है और औपनिवेशिक काल के उन दस्तावेजों और राष्ट्रवादी इतिहास-लेखों को उपलब्ध कराने की कोशिश की है, जो लगभग मिट चुके थे. इन सबके जरिए यह पता लगाने की कोशिश की गई है कि जिन पुरुषों-महिलाओं ने भारत को आजाद कराने की लड़ाई लड़ने के लिए सब कुछ त्याग दिया था उनके पारिवारिक जीवन, बचपन, प्यार-लगाव, और उनकी आंतरिक दुनिया को क्रांतिकारी राजनीति ने किस तरह बदल दिया था.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के राजनीतिक इतिहास-लेखन में मुख्यतः संगठनों, नेताओं, हिंसा की छिटपुट घटनाओं पर ही ध्यान दिया गया है. इस आख्यान में यह दर्ज नहीं हो पाया है कि भूमिगत राजनीति ने कई घरेलू ज़िंदगियों को किस तरह प्रभावित किया, पत्नियां निरंतर खुफिया निगरानी में किस तरह जी रही थीं, बच्चों की गुप्त परवरिश कैसे हो रही थी, जेल या निष्कासन या फांसी के कारण प्रेम कथाएं किस तरह अधूरी रह जाती थीं.
ऐसी कहानियों को सुनकर हमें एहसास हुआ कि निजी जीवन क्रांतिकारी राजनीति का बाहरी हिस्सा नहीं बल्कि उसके ताने-बाने का ही अभिन्न हिस्सा था.
इन अनुभवों को सामने लाकर हमारा अभिलेख क्रांतिकारी राष्ट्रवाद को व्यक्तिगत शौर्य की कड़ी के रूप में नहीं बल्कि उपनिवेशवादी सत्ता के साथ निरंतर तालमेल बैठा रहे एक सामाजिक संदर्भ के रूप में प्रस्तुत करता है.
93 साल बाद फिर से जुड़े
बाईस वर्षीय बिनॉय बसु, 18 साल के बादल गुप्ता, और 19 साल के दिनेश गुप्ता 8 दिसंबर 1930 को कलकता की राइटर्स बिल्डिंग में घुसकर जेलों के आइजी एन.एस. सिंपसन की हत्या कर देते हैं. इसके तुरंत बाद बिनॉय खुद को गोली मार देते हैं, बादल पोटासियम सायनायड खाकर जान दे देते हैं, और दिनेश गिरफ्तार कर लिये जाते हैं, जिन्हें 7 जुलाई 1931 को फांसी दे दी जाती है.
लेकिन ये तीन युवक वास्तव में थे कौन?
‘अग्निजुग आर्काइव’ के जरिए हमने इन तीनों के परिवारों का पता लगाया और बिनॉय बसु की भतीजी की पोती सोमा बल, बादल गुप्ता के भतीजे बिश्वनाथ दास गुप्ता, और दिनेश गुप्ता की भतीजी की पोती सुनंदा सेनगुप्ता से बातचीत की.

सोमा बल ने याद करते हुए बताया कि बिनॉय डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे और टेनिस के प्रतिभाशाली खिलाड़ी थे, जिनकी परवरिश अंग्रेजी तहजीब वाले समृद्ध परिवार में हुई थी. उनकी मां यूरोपीय व्यंजन बनाने के लिए मशहूर थीं. अंग्रेजी संस्कृति के माहौल में पले होने के बावजूद बिनॉय उग्रवादी संगठन ‘बंगाल वोलंटियर्स’ की ओर आकर्षित हुए, जो उपनिवेशवादी शासन के खिलाफ बंगाल में प्रतिरोध आंदोलन चला रहा था.
बिश्वनाथ दास गुप्ता ने बताया कि किशोरवय बादल छापा पड़ने से एक दिन पहले किस तरह उनके घर आए थे और उन्होंने छह साल की बहन को एक गुड़िया उपहार में दिया था. हमले के बाद बादल के चाचा तारिणीनाथ ने उनके पार्थिव शरीर की पहचान करने और उनका अंतिम संस्कार करने के लिए लालबाजार पुलिस मुख्यालय में आत्मसमर्पण किया था. बादल के पिता ने पुलिस अत्याचार के डर से इससे मना कर दिया था.
दिनेश गुप्ता ने अपनी जेल की कोठरी से 93 पत्र लिखे. हमसे बातचीत करते हुए सुनंदा सेनगुप्ता ने याद किया कि दिनेश किस तरह अपनी नन्ही भतीजी के आने का इंतजार करते थे और उसे रवींद्र संगीत सीखने के लिए प्रोत्साहित करते थे. आज वह बच्ची जानी-मानी गायिका माया सेन के नाम से मशहूर है.
हमारे आर्काइव ने 2023 में तीन परिवारों का फिर से मेल कराया और 1930 में शोक तथा हालात की वजह से अलग हुए वंशजों के लिए एक मिलन स्थल उपलब्ध कराया ताकि वे अपनी क्षति और यादों को 93 साल बाद पहली बार साझा कर सकें.
सार्वजनिक आयोजन में उनमें से कुछ पत्रों का पाठ किया गया, जो दिनेश गुप्ता ने कलकता की अलीपुर जेल में फांसी की सजा का इंतजार करते हुए अपने परिजनों और मित्रों को लिखे थे. एक पत्र के कोने पर उन्होंने अपनी जेल कोठरी की खिड़की का एक रेखाचित्र भी उकेर रखा था.

हाथ में बम, दिल में प्यार
हमारे आर्काइव ने जिन सबसे असाधारण व्यक्तियों के जीवन को रेकॉर्ड किया उनमें उल्लासकर दत्ता का जीवन भी है, जिन्होंने 1908 के अलीपुर षड्यंत्र कांड में बम बनाया था. अंडमान की सेलुलर जेल में दी गई बर्बर यातनाओं ने उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ डाला था.
लेकिन उनका एक दूसरा रूप भी था. दत्ता गिरफ्तार किए जाने से पहले राष्ट्रवादी नेता बिपिन चंद्र पाल की बेटी लीला पाल से प्यार कर बैठे थे. दत्ता जब जेल में थे तब लीला की शादी किसी और से कर दी गई. लेकिन प्यार को आखिर राह मिल ही गई.
देश की आजादी के बाद, लीला के पहले पति की मृत्यु हो गई तो दत्ता ने लीला से शादी की, बावजूद इसके कि कमर के नीचे से वे पंगु हो चुकी थीं. शेष जीवन भर वे जहां भी गए, लीला को अपने साथ रखा. सिलचर के लोग इस दंपती को ‘शिव-पार्वती’ की जोड़ी कहा करते थे. पौराणिक कथा है कि पार्वती के नश्वर शरीर के नष्ट होने के बाद शिव उन्हें लेकर घूमते थे. लेकिन दत्ता-लीला की कहानी सरकारी दस्तावेजों में उपलब्ध नहीं है लेकिन क्रांतिकारी राजनीति के भावनात्मक दौर की मिसाल प्रस्तुत करती है.
आर्काइव में ऐसे कई विवरण उपलब्ध हैं: देशनिकाला देकर जापान भेजे गए रासबिहारी बोस ने जापानी महिला से शादी की और भूमिगत रहने के लिए बेकरी चलाई; बीसवीं सदी के भारत की प्रथम महिला शहीद प्रीतिलता वड्डेदार अपने परिवार की एकमात्र कमाऊ व्यक्ति थीं लेकिन पहाड़तली यूरोपियन क्लब पर हमला करने के लिए उन्होंने अपने परिवार की गरीबी का कोई ख्याल नहीं किया; स्कूली बच्चे किस तरह क्लासरूम छोड़कर क्रांति के मैदान में कूद पड़े; कई परिवार पुलिस की निगरानी और लंबी कैद के कारण किस तरह तबाह हुए.
पाठ्यपुस्तकों से आगे क्रांति का इतिहास
केवल दस्तावेजीकरण हमें अपर्याप्त लगा. हमने इस इतिहास को कोलकाता में कथावाचन की कार्यशालाओं और मौखिक इतिहास यात्राओं के जरिए लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की. इनमें, क्रांतिकारियों की गाथा को परिचित पड़ोसों, पूर्व शरणस्थलों, और औपनिवेशिक स्थलों की पृष्ठभूमि के साथ प्रस्तुत किया. क्लासरूमों, सार्वजनिक मंचों, और कोलंबिया यूनिवर्सिटी समेत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में किए गए आयोजनों में हमने राजनीतिक इतिहास में प्रवेश करने के लिए जिए गए अनुभवों का इस्तेमाल किया.
भाग लेने वालों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे क्रांतिकारियों को कहीं दूर नजर आ रहे नायकों के रूप में नहीं बल्कि ऐसे युवाओं, पारिवारिक व्यक्तियों और नागरिकों के रूप में देखें जिनके जीवन ने उनके अपने फैसलों और उनके नतीजों से आकार ग्रहण किया. क्रांतिकारियों की उम्र, उनके रिश्तों, उनकी कमजोरियों के बारे में जानना खास तौर से युवा श्रोताओं के लिए स्वतंत्रता संग्राम को एक विशद नहीं बल्कि एक व्यक्तिगत अनुभव के रूप में महसूस करना था.
औपनिवेशिक खुफिया तंत्र क्रांतिकारियों को व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि खतरे के रूप में दर्ज करता था. ऐसा करके उसने कई ज़िंदगियों को इतिहास से निष्कासित कर दिया. उनके साहस की कहानियों ने भी उनकी जटिलताओं को कमजोर किया.

आज जब भारत के सार्वजनिक विमर्श अभिलेखों, निगरानियों, और राज्यसत्ता पर केंद्रित हो रहे हैं, इन इतिहासों को नई प्रासंगिकता हासिल हो रही है. ‘अग्निजुग आर्काइव’ के अब तक के चार वर्षों में हमें धीरे-धीरे यह एहसास हो गया है कि इन खामोशियों को आवाज देना महज पुरानी यादों के प्रति आकर्षण नहीं है बल्कि यह हमें यह भी याद दिलाता है कि सत्ता किस तरह यह फैसला करती है कि किसे रेकॉर्ड में दर्ज करना है और किसे भुला देना है.
इस खाई को पाटने की कोशिश के तहत ‘अग्निजुग आर्काइव’ उन राजनीतिक हस्तियों को पुनर्जीवित करने के लिए मौखिक तथा सार्वजनिक इतिहास का इस्तेमाल कर रहा है जिन हस्तियों के जीवन को अभिलेखों या लोक स्मृति में बनाए रखना जरूरी नहीं समझा गया था. इन कहानियों को विदेश में साझा करने से इस विचार को मजबूती मिली है कि वे सार्वभौमिक महत्व रखती हैं. आतंकवाद और उपनिवेशवाद जैसे विषा विषय ऐसे हैं जो न केवल सीमाओं से बंधे नहीं हैं बल्कि वे निजी दायरों में भी प्रतिध्वनित होते हैं.
ओयेशी गांगुली बर्लिन में रहने वाली एक ओरल हिस्टोरियन, आर्काइविस्ट और अग्निजुग आर्काइव की फाउंडर हैं. उनका काम उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों, सांस्कृतिक इतिहास और पर्यावरणीय इतिहास पर केंद्रित है. विचार निजी हैं.
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