केरल में भारतीय जनता पार्टी तिरुवनंतपुरम नगर निगम में अपनी ऐतिहासिक जीत का जश्न मना रही है. हालांकि, राज्य की राजधानी में मिली इस बड़ी सफलता के बावजूद, कुल मिलाकर पार्टी का प्रदर्शन औसत ही रहा—खासकर तब, जब पिछले लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का वोट शेयर 20 प्रतिशत तक पहुंच गया था.
एक खास बात जो चौंकाने वाली रही, वह था ईसाई बहुल इलाकों में पार्टी का कमजोर प्रदर्शन और इस समुदाय से उतारे गए उम्मीदवारों की बेहद खराब जीत दर. यह मुद्दा तब भी सामने आया, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 12 जनवरी को तिरुवनंतपुरम पहुंचे थे, ताकि हालात का जायज़ा लें और विधानसभा चुनावों की तैयारी को मजबूत किया जा सके.
राज्यभर में बीजेपी ने रिकॉर्ड 1,926 ईसाई उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन इनमें से सिर्फ 25 ही जीत सके. यह फैसला राज्य स्तर पर पार्टी की नीति के तहत लिया गया था, जिसे तब लागू किया गया जब राजीव चंद्रशेखर ने केरल बीजेपी इकाई के अध्यक्ष का पद संभाला था. चुनावों से पहले पार्टी की कन्नूर नॉर्थ जिला समिति का एक सर्कुलर मीडिया में लीक हुआ था, जिसमें एक तय प्रतिशत में ईसाई उम्मीदवार उतारने की बात कही गई थी.
समझौते वाला रुख
हालांकि, बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व लंबे समय से इस रणनीति को हरी झंडी दे चुका था, लेकिन हिंदुत्व के पोस्टर बॉय माने जाने वाले के. सुरेंद्रन के नेतृत्व में राज्य इकाई ईसाई समुदाय को खुलकर साधने से हिचक रही थी. इसके उलट, चंद्रशेखर इस मुद्दे पर पूरी तरह केंद्रीय नेतृत्व के साथ हैं. केरल बीजेपी अध्यक्ष के रूप में पहली बार उन्होंने दो ईसाई चेहरों को राज्य इकाई की कोर कमेटी में शामिल किया—राज्य उपाध्यक्ष शोन जॉर्ज और महासचिव अनूप एंटनी.
इसके बावजूद, जॉर्ज के गढ़ पाला नगर पालिका में बीजेपी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा, जहां सात ईसाई उम्मीदवार उतारने के बावजूद पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली. पाला विधानसभा क्षेत्र के मुथोली पंचायत में, जो पहले बीजेपी के नियंत्रण में था, पार्टी सिर्फ छह में से दो प्रतिनिधि जिता पाई और सत्ता से बाहर हो गई. इसी तरह, एंटनी के गृह क्षेत्र थिरुवल्ला में भी पार्टी के दोनों ईसाई उम्मीदवार हार गए.
नीलांबूर उपचुनाव चंद्रशेखर के लिए राज्य अध्यक्ष के रूप में पहला चुनावी इम्तिहान था. केरल कांग्रेस से आए एक ईसाई नेता को बड़े प्रचार के साथ बीजेपी के टिकट पर उतारने के बावजूद, पार्टी अपने प्रदर्शन में सुधार नहीं कर सकी और निर्दलीय उम्मीदवार पी. वी. अनवर से पीछे रहकर चौथे स्थान पर रही.
हिंदू प्रतिक्रिया
ईसाई समुदाय तक पहुंच बनाने की कोशिश से कोई बड़ी सफलता नहीं मिली, इसके अलावा बीजेपी के कट्टर नेताओं को, जिन्हें वी. मुरलीधरन गुट का समर्थन हासिल है—सबसे ज्यादा चिंता हिंदू प्रतिक्रिया (बैकलैश) की है. उनके नज़रिए से, स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे उनकी बात सही साबित करते हैं क्योंकि वामपंथी दल 2024 में बीजेपी को मिले हिंदू वोटों के कुछ हिस्से वापस लेने में सफल रहे. यह बदलाव खास तौर पर त्रिशूर, अलाप्पुझा और तिरुवनंतपुरम जैसे जिलों में साफ दिखा, जहां लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने बड़ी बढ़त बनाई थी.
यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी सभी को साथ लेकर चलने पर चंद्रशेखर की बयानबाजी से बहुत प्रभावित नहीं दिखता. दरअसल, मुस्लिम समुदाय के प्रति राज्य अध्यक्ष की पहल—जो तय लाइन से आगे जाती नज़र आई, ने संघ नेतृत्व को चौंका दिया. यह भी साफ नहीं था कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में मुस्लिम प्रतिनिधित्व की कमी को लेकर उनकी टिप्पणी इसी अंदरूनी मतभेद का नतीजा थी या नहीं.
उम्मीद की एक किरण
एकमात्र राहत की बात मुनंबम के कडप्पुरम वार्ड में पार्टी की चौंकाने वाली जीत रही. यह इलाका वक्फ के खिलाफ हुए प्रदर्शनों का केंद्र रहा है, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं. बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के फिलिप जोसेफ के मुताबिक, यह जीत तब हासिल हुई, जब लैटिन चर्च, जिसका प्रतिनिधित्व वेलंकन्नी माता चर्च के विकार ने किया—पार्टी के खिलाफ प्रचार कर रहा था.
जोसेफ ने मुझसे कहा था, “फादर जोशी मय्यात्तिल को छोड़कर हमें पादरियों का कोई सपोर्ट नहीं मिला, लेकिन हमने मतदाताओं को यह समझाने में कामयाबी हासिल की कि अपनी राजस्व अधिकारों की स्थायी बहाली के लिए उन्हें बीजेपी के साथ खड़ा होना चाहिए.”
पहले के दौर में बीजेपी ने कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले इस इलाके से कभी उम्मीदवार तक नहीं उतारा था.
हालांकि, देशभर से ईसाइयों के खिलाफ सामने आई हमलों की खबरों ने मुनंबम से आगे केरल इकाई द्वारा किए गए ईसाई संपर्क के किसी भी दावे को कमजोर कर दिया. त्रिशूर के आर्चबिशप एंड्रयूज थाझाथ—जो कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी हैं—आर्चबिशप जोसेफ पाम्पलानी और मलनकारा ऑर्थोडॉक्स चर्च के प्रमुख बेसिलियोस मार्थोमा मैथ्यूज तृतीय जैसे नेता, जिन्हें पहले बीजेपी के प्रति नरम माना जाता था, इन घटनाओं के बाद कड़े बयान देने लगे.
चंद्रशेखर ने तुरंत नुकसान की भरपाई की कोशिश शुरू की. पिछले साल छत्तीसगढ़ में केरल की ननों की बहुचर्चित गिरफ्तारी के बाद, चंद्रशेखर ने स्थानीय निकाय चुनावों से पहले दिल्ली में सीरो-मालाबार चर्च के प्रतिनिधियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एक बैठक भी करवाई थी, लेकिन यह शायद काफी नहीं था.
क्रिसमस पर हमले
क्रिसमस के मौके पर प्रधानमंत्री का नई दिल्ली के कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेम्पशन में टीवी पर दिखाया गया दौरा होने के बावजूद, उसी हफ्ते देश के अलग-अलग हिस्सों से समुदाय पर हमलों की खबरें आईं. इसमें बरेली में एक चर्च के बाहर हिंदू संगठनों द्वारा हनुमान चालीसा गाने की घटना भी शामिल थी.
क्रिसमस मनाने वालों पर हुए ये हमले केरल तक भी पहुंचे, जब पालक्काड में बच्चों की कैरोल पर हमले की खबर सामने आई. आरोपित व्यक्ति आरएसएस-बीजेपी का कार्यकर्ता बताया गया, लेकिन मलयालियों को इससे ज्यादा झटका राज्य बीजेपी के उपाध्यक्ष सी. कृष्णकुमार के बयान से लगा. उन्होंने कैरोल गा रहे बच्चों को “नशे में” बताया, जिस पर उनके माता-पिता ने कड़ी प्रतिक्रिया दी.
कृष्णकुमार ने इससे पहले पालक्काड उपचुनाव में पार्टी उम्मीदवार के रूप में प्रचार के दौरान कोच्चि के मुनंबम तक जाकर काफी कोशिश की थी, लेकिन उनके शब्दों ने उनके असली चेहरे को सामने ला दिया और चर्च के साथ बीजेपी के लेन-देन वाले रिश्ते को उजागर कर दिया.
कभी-कभार औपचारिक बयान देने के अलावा, ईसाई समुदाय के मूल मुद्दों पर पार्टी गंभीर नज़र नहीं आती. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री द्वारा इन हमलों की सार्वजनिक निंदा न किया जाना आर्चबिशप थाझाथ, पाम्पलानी और मार्थोमा मैथ्यूज तृतीय जैसे धर्मगुरुओं की नजर से नहीं चूका और इसी वजह से उन्होंने खुलकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की.
थाझाथ ने बिना शब्दों को तोड़े कहा, “सरकार कहती है कि इसके लिए हाशिये के समूह जिम्मेदार हैं. अगर ऐसा है, तो फिर चुप्पी क्यों? सार्वजनिक निंदा क्यों नहीं? चुप्पी तटस्थता नहीं होती—यह मिलीभगत होती है.”
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग
पिछले पांच साल से ‘बिना अध्यक्ष’ चल रहे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में किसी भी ईसाई का प्रतिनिधित्व नहीं रहा है. यही स्थिति राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शिक्षा आयोग में ईसाई प्रतिनिधित्व को लेकर भी है. केरल के सबसे पुराने अखबार ‘दीपिका’ के पूर्व एसोसिएट एडिटर जॉर्ज कल्लिवयालिल—जिसे सीरो-मालाबार चर्च बढ़ावा देता है, ने लिखा कि केंद्रीय सरकार ने तकनीकी कारणों की आड़ में पोप फ्रांसिस को नज़रअंदाज़ किया, जबकि पोप ने भारत आने की इच्छा जताई थी.
2010 में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया द्वारा ‘ईशनिंदा’ के आरोप में हाथ काटे जाने के शिकार टीजे जोसेफ से भी कथित तौर पर बीजेपी ने संपर्क किया था और उन्हें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में नामित करने में रुचि के बारे में पूछा गया था. प्रोफेसर जोसेफ ने मुझे बताया कि कोच्चि में मोदी के एक कार्यक्रम में उन्हें दिखाने के बाद, प्रस्ताव को स्वीकार करने के बावजूद उनसे आगे कोई संपर्क नहीं किया गया.
सीरो-मालाबार चर्च हाल के दिनों में पलायन, घटती संख्या और सरकार में कमजोर प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लेकर चिंतित रहा है. 2026 को ‘समुदाय सशक्तिकरण वर्ष’ घोषित करने और कैथोलिक युवाओं से राजनीति में आने की अपील को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
स्थानीय निकाय चुनावों के बाद की स्थिति
हाल के समय में सीरो-मालाबार चर्च पिनराई विजयन सरकार से भी कई चूक और गलतियों को लेकर निराश रहा है. इसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीश जेबी कोशी द्वारा दी गई उस रिपोर्ट को सार्वजनिक न करने का फैसला भी शामिल है, जिसमें सरकार की सेवाओं में प्रतिनिधित्व सहित ईसाइयों के ‘पिछड़ेपन’ पर चर्चा की गई थी.
थाझाथ ने अफसोस जताया, “ईसाई हर उस पैमाने पर पीछे जा रहे हैं, जिससे सत्ता को मापा जाता है.”
स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ईसाई बहुल सेंट्रल त्रावणकोर में बड़ी जीत हासिल करता दिखा, जो 2021 से बदलाव का संकेत है. हाल के अतीत में चर्च के कांग्रेस के साथ भी कई मतभेद रहे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि यूडीएफ के सत्ता में लौटने की स्थिति में राजनीतिक हिस्सेदारी की उम्मीद में उन्हें भुला दिया गया है. इसी संभावना ने चर्च को समुदाय-समर्थित केरल कांग्रेस (मणि) को देर से ही सही, यूडीएफ में लौटने के लिए मनाने पर भी मजबूर किया—हालांकि, विजयन को इसकी भनक लगते ही यह साकार नहीं हो सका.
यूडीएफ ईसाइयों की स्वाभाविक मतदान पसंद रहा है. भले ही 2021 में समुदाय के कुछ हिस्सों ने वामपंथियों को वोट दिया हो, लेकिन 1959 के विमोचना समरम (मुक्ति आंदोलन) के दौरान अंगमाली चर्च पर हुई गोलीबारी जैसी घटनाएं समुदाय की स्मृति में इतनी गहराई से दर्ज हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ना संभव नहीं है.
बीजेपी की दुविधा
प्रधानमंत्री मोदी ने 23 जनवरी को राज्य की राजधानी का दौरा किया. चंद्रशेखर और राज्य इकाई के सामने केरल में आगे की राह को लेकर दुविधा है, जहां पार्टी के पास अल्पकालिक और दीर्घकालिक—दोनों लक्ष्य हैं. जब पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनावों के लिए बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर इतने सारे ईसाई चेहरों को उतारने का फैसला किया, तो एक अप्रत्याशित समस्या उपयुक्त उम्मीदवार ढूंढने की भी सामने आई. अंत में, उम्मीदवार जुटाने के लिए उसे बीजेपी समर्थक संगठन क्रिश्चियन एसोसिएशन एंड अलायंस फॉर सोशल एक्शन (CASA) पर निर्भर रहना पड़ा.
यह स्थिति अब भी बनी हुई है. वामपंथी खेमे से आए पार्टी के नए प्रवक्ता रेजी लुकोस का BJP द्वारा गर्मजोशी से स्वागत हताशा की बू देता है. जब वामपंथी दल हिंदू वोटों में आक्रामक तरीके से सेंध लगा रहे हैं, तो बीजेपी के लिए अल्पकाल में अपने मूल आधार को मजबूत करना, ईसाई समुदाय तक दायरा बढ़ाने से ज्यादा फायदेमंद हो सकता है. इसके उलट कदम उठाने से 2024 में हासिल की गई बढ़त भी हाथ से जा सकती है.
हाथ का पक्षी झाड़ियों में बैठे दो पक्षियों से हमेशा बेहतर होता है.
आनंद कोचुकुडी केरल बेस्ड पत्रकार और कॉलमनिस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @AnandKochukudy है. ये उनके निजी विचार हैं.
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