(फाइल फोटो के साथ)
कोलकाता, 23 जनवरी (भाषा) प्रसिद्ध गीतकार एवं कवि जावेद अख्तर ने शुक्रवार को कहा कि पिछले कुछ दशकों में देश की शिक्षा प्रणाली में साहित्य और कविता को उचित महत्व नहीं मिला है।
‘एक्ससाइड कोलकाता लिटरेरी मीट’ में वैश्विक परिवर्तन के समय में कविता और लेखक की भूमिका पर एक सत्र में ऑनलाइन तरीके से शामिल होते हुए अख्तर ने आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या कविता और साहित्य पर घरों में अन्य विषयों की तरह चर्चा की जाती है।
अख्तर ने कहा, ‘‘पिछले 50 वर्षों में हमारी शिक्षा प्रणाली में साहित्य और कविताओं को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘उर्दू जैसी भाषाओं के पाठकों की संख्या घट रही है, लेकिन उर्दू कविताओं के पाठकों की संख्या बढ़ रही है। यह एक विरोधाभास है।’’
जब उनसे पूछा गया कि वह कविता को किस नजरिये से देखते हैं, तो अख्तर ने कहा कि यह समाज की आवाज है, मौन व्यक्ति की आवाज है।
उन्होंने कहा, ‘‘हर तरह की भावना के लिए – प्रेम, स्वीकारोक्ति और पीड़ा – कविता मौजूद है, जिसमें अपना रूपक होता है क्योंकि संदेश सूक्ष्म होना चाहिए।’’
कवियों के बीच अभिव्यक्ति की विभिन्न शैलियों और तरीकों पर टिप्पणी करते हुए गीतकार-संगीतकार ने कहा कि अलग-अलग रचनात्मक लोग एक ही विषय पर अलग-अलग तरीके से बात करेंगे।
जब अख्तर से पूछा गया कि क्या कविता क्रांति से उत्पन्न होती है, तो उन्होंने कहा कि यह ‘‘समाज के प्रति असंतोष को व्यक्त कर सकती है।’’
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने कभी सोचा है कि यदि उन्होंने बीते वर्षों में कविताएं और गीत न लिखे होते तो क्या होता, तो अख्तर ने कहा, ‘‘हर व्यवस्था के दो रास्ते होते हैं – आपको एक चुनना ही पड़ता है। यह मत सोचिए कि क्या होता।’’
यह पूछे जाने पर कि उन्हें कभी लिखते समय डर लगा है, तो अख्तर ने इसका जवाब नहीं में देते हुए कहा, ‘‘अगर आपको डर लगता है, तो आपको अपने डर के बारे में लिखने में सक्षम होना चाहिए।’’
धर्म के बारे में लिखने पर अख्तर ने कहा कि सावधानी बरती जानी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोगों का अपना तर्क होता है और उनकी धार्मिक मान्यताएं भावनाओं से प्रेरित होती हैं।’’
उन्होंने कहा कि अगर धर्म की बात की जाये तो नैतिक अधिकारों को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
भाषा
देवेंद्र नरेश
नरेश
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