कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दावोस में एक अहम भाषण दिया, जहां वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम चल रहा है. बारीकियों को हटाकर देखें तो यह भाषण लगभग वैसा ही लगता है, जैसे आज की दुनिया में भारत अपने फैसलों और कदमों को पेश करता है, या उस दुनिया में करता था जो डॉनल्ड ट्रंप के सत्ता में आने और हालात बिगाड़ने से पहले धीरे-धीरे बन रही थी.
कार्नी ने तीन मुख्य बातें कहीं.
पहली, यह मानने का अब कोई मतलब नहीं है कि नियमों पर आधारित ग्लोबल सिस्टम अभी भी काम कर रहा है. नियमों पर आधारित व्यवस्था उतनी ही मौजूद है, जितनी कोई देश अपनी इच्छा को ताकतवर देशों के आगे झुकाने को तैयार हो. उन्होंने इसे साफ शब्दों में कहा. हमें हकीकत स्वीकार करनी होगी और “नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था” का जिक्र ऐसे करना बंद करना होगा जैसे वह अब भी अपने वादे के मुताबिक काम कर रही हो. इसे वही कहना चाहिए जो यह है, यानी बड़ी ताकतों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा की एक व्यवस्था, जहां सबसे ताकतवर देश अपने हित साधते हैं और आर्थिक एकीकरण का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए करते हैं. (उनका भाषण का पूरा टेक्स्ट यहां पढ़ें.)
दूसरी, यह समझदारी होगी कि सभी देश विकास के लिए अपने संसाधनों पर ज्यादा भरोसा करें, लेकिन नई दुनिया को आपसी निर्भरता की एक ज्यादा निष्पक्ष व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें देशों के हाथ में पर्याप्त संप्रभुता बनी रहे. पूरी तरह आत्मनिर्भर होना सबसे बेहतर विकल्प नहीं है. उन्होंने कहा, “मजबूती के लिए सामूहिक निवेश, हर किसी के अपनी-अपनी दीवारें खड़ी करने से सस्ता पड़ता है. साझा मानक बिखराव को कम करते हैं. आपसी पूरकता से सभी को फायदा होता है. और कनाडा जैसे मिडिल पावर देशों के लिए सवाल यह नहीं है कि हमें नई हकीकत के साथ ढलना है या नहीं, हमें ढलना ही होगा. सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ ऊंची दीवारें बनाकर ढलेंगे या कुछ ज्यादा महत्वाकांक्षी करेंगे.” इससे उनका मतलब गैर-प्रभुत्वशाली देशों के साथ व्यापार और दूसरे अवसर खोलने से था.
तीसरी, नई विश्व व्यवस्था में हर मुद्दे पर सबकी सहमति जरूरी नहीं है, बल्कि खास मुद्दों पर आगे बढ़ने को तैयार देशों के बीच कई तरह के गठजोड़ की जरूरत है. और यह काम मिडिल पावर देश कर सकते हैं, जो दो सुपरपावर, पुराने प्रभुत्वशाली देश और उभरते हुए, तेजी से बढ़ते चीन से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. कार्नी ने साफ किया कि मिडिल पावर देश ताकतवर देशों की शक्ति के मुताबिक खुद को ढालने को मजबूर हैं, लेकिन मिलकर उनके पास कहीं ज्यादा मोलभाव की ताकत होती है. उन्होंने इसे संक्षेप में कहा, “मिडिल पावर देशों को साथ काम करना होगा, क्योंकि अगर हम मेज पर नहीं हैं, तो हम मेन्यू में हैं.”
“वैरिएबल ज्योमेट्री” जैसे नए शब्द का इस्तेमाल करते हुए कार्नी ने कहा, “हम तेजी से विदेशों में अपने रिश्तों को विविध बना रहे हैं. हमने यूरोपीय संघ के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी की है, जिसमें SAFE यानी यूरोपीय रक्षा खरीद व्यवस्था भी शामिल है. हमने छह महीनों में चार महाद्वीपों में 12 और व्यापार और सुरक्षा समझौते किए हैं. पिछले कुछ दिनों में हमने चीन और कतर के साथ नए रणनीतिक साझेदारी समझौते पूरे किए हैं. हम भारत, आसियान, थाईलैंड, फिलीपींस और मर्कोसुर के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहे हैं. हम एक और काम भी कर रहे हैं. दुनिया भर की समस्याओं को सुलझाने लिए हम वैरिएबल ज्योमेट्री अपना रहे हैं. यानी अलग-अलग मुद्दों पर, साझा मूल्यों और हितों के आधार पर अलग-अलग गठबंधन.”
मैं सुझाव देता हूं कि सभी भारतीयों को मार्क कार्नी के भाषण को पूरा पढ़ना चाहिए. कम से कम इससे हम अपनी बात को ज्यादा साफ और बेहतर तरीके से रखना सीखेंगे, और ऐसी बातें बुदबुदाने से बचेंगे जो दुनिया को जरूरत से ज्यादा घमंडी लगें.
अमेरिका की छाया में लंबे समय तक आराम से रहने के बाद, अब कनाडा भी भारत और ब्रिक्स की भाषा बोलने लगा है. हालांकि इसमें चीन शामिल नहीं है. डॉनल्ड ट्रंप के एक जोरदार झटके ने कार्नी को जगा दिया है. ठीक वैसे ही जैसे उसने यूरोपीय संघ के बड़े नेताओं को भी जगा दिया. देर से सही, लेकिन बेहतर है.
खासतौर पर, भारत को नए कनाडा को उन उभरती मध्य शक्तियों के समूह का हिस्सा मानना चाहिए, जो पुराने वैश्विक व्यवस्था में जो अच्छा है उसे बचाना चाहता है और भविष्य के लिए बेहतर संस्थाएं बनाना चाहता है. ऐसी व्यवस्था जहां नियम सिर्फ कमजोर देशों पर मनमाने ढंग से लागू न हों, और ताकतवर देश या बड़े तकनीकी खिलाड़ी यानी चीन अपने फायदे के लिए उनकी मनचाही व्याख्या न कर सकें.
कार्नी की बातों में अमेरिका और चीन से बाहर की नई सोच दिखती है. ऐसी ही सोच पिछले साल फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने भी रखी थी. स्टब ने कहा था कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था अनुचित है और उसे नई भू-राजनीतिक और आर्थिक हकीकत के अनुसार बदलना होगा. संयुक्त राष्ट्र के बारे में उन्होंने कहा था कि भारत को सुरक्षा परिषद में जरूर शामिल किया जाना चाहिए, और कोई भी देश, चाहे वह कितना ही ताकतवर क्यों न हो, उसे वीटो का अधिकार नहीं होना चाहिए.
हमें ट्रंप का धन्यवाद करना चाहिए, जिन्होंने कार्नी और स्टब जैसे नेताओं के साथ-साथ यूरोपीय संघ के दिमाग में भी चीजों को साफ कर दिया. भारत को इन बदली हुई हवाओं का पूरा फायदा उठाने में देर नहीं करनी चाहिए, ताकि एक नई, ज्यादा न्यायपूर्ण और समावेशी विश्व व्यवस्था बनाने की शुरुआत हो सके.
और हां, अगर कार्नी छह महीने में इतना कुछ हासिल कर सकते हैं, तो भारत को वही काम करने में सदियां क्यों लग रही हैं. बेशक, हमें यह मानना होगा कि विविधताओं से भरे भारत को तेजी से आगे बढ़ाना कनाडा के मुकाबले ज्यादा मुश्किल है. फिर भी, हमें पहले से कहीं ज्यादा तेजी से आगे बढ़ना होगा.
आर. जगन्नाथन, स्वराज्य मैगज़ीन के पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. वह @TheJaggi हैंडल से ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.
यह लेख पहले उनके पर्सनल ब्लॉग पर पब्लिश हुआ था.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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