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Thursday, 22 January, 2026
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BMC जीतने के बाद, अब बेंगलुरु नगर निकाय चुनावों पर बीजेपी क्यों लगा रही है बड़ा दांव

2023 में विधानसभा सीटें 104 से घटकर 66 रह जाने के बावजूद, बेंगलुरु में बीजेपी का वोट शेयर अच्छा रहा है. इसके अलावा, शहर की चारों लोकसभा सीटें बीजेपी के पास हैं.

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बेंगलुरु: बेंगलुरु सिटी कॉरपोरेशन के लंबे समय से टलते आ रहे चुनावों की निगरानी के लिए राम माधव की नियुक्ति यह दिखाती है कि भारत की आईटी कैपिटल पर जीत हासिल करना और नियंत्रण बनाए रखना कितना अहम है.

महाराष्ट्र में नगर निकाय चुनावों में मिली सफलता के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) भारत के सबसे बड़े शहरी केंद्रों और आर्थिक विकास के इंजनों में से एक, ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (जीबीए) के पहले चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है.

बुधवार को एक पोस्ट में, माधव ने कहा कि स्थानीय निकाय चुनाव “पूरी तरह स्थानीय मुद्दों” पर लड़े और जीते जाते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी इन “प्रतिष्ठित” चुनावों को जीतने की पूरी कोशिश करेगी.

उन्होंने कहा, “बीबीएमपी बहुत प्रतिष्ठित है, क्योंकि यह 5 कॉरपोरेशनों का एक समूह है, जिसमें बेंगलुरु शहर के अलावा कई कस्बे और 120 से ज्यादा गांव शामिल हैं. 90 लाख से ज्यादा मतदाताओं और 369 कॉरपोरेशन वार्डों के साथ, यह राज्य के लिए विधानसभा चुनाव से कम नहीं है…”

पिछले साल नवंबर में, जीबीए ने बृहत्त बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) की जगह ली. इससे एक ही कॉरपोरेशन की जगह पांच कॉरपोरेशन बने, ताकि बेंगलुरु में बेहतर प्रबंधन और नगर सेवाओं को सुचारु किया जा सके.

इससे वार्डों की संख्या पहले के 198 से बढ़कर 369 हो गई. साथ ही, शहर की सीमा को मौजूदा करीब 800 वर्ग किलोमीटर से बढ़ाकर लगभग 1,400 वर्ग किलोमीटर तक करने का प्रावधान भी है, ताकि शहर की बाहरी परिधि में आने वाले इलाके, कस्बे और गांव शामिल किए जा सकें.

कर्नाटक का नर्व सेंटर होने और राज्य की लगभग एक-चौथाई आबादी का घर होने के कारण, बेंगलुरु बीजेपी और उसके राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए हमेशा से एक शीर्ष राजनीतिक प्राथमिकता रहा है. यह शहर भारत के 200 अरब डॉलर से ज्यादा के आईटी निर्यात का बड़ा हिस्सा देता है, इसे एक प्रमुख आरएंडडी केंद्र, स्टार्टअप और एविएशन हब माना जाता है, लेकिन हाल के दिनों में यह गलत कारणों से खबरों में रहा है.

जर्जर होती बुनियादी ढांचा व्यवस्था, व्यापक भ्रष्टाचार और सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा शहर का प्रबंधन—या कुप्रबंधन को लेकर बीजेपी ने तीन साल पुराने प्रशासन पर हमला बोला है.

बीजेपी और उसकी सहयोगी जनता दल (सेक्युलर) यानी जेडी(एस) ने इस प्रकरण के लिए सिद्धारमैया और उनके डिप्टी डी.के. शिवकुमार को जिम्मेदार ठहराया है.

बेंगलुरु के प्रभारी मंत्री के तौर पर शिवकुमार ने 40,000 करोड़ रुपये की लागत से 40 किलोमीटर लंबी टनल रोड, 500 करोड़ रुपये का स्काईडेक और डबल डेकर सड़कों के प्रस्ताव दिए हैं, जिन्हें ‘वैनिटी प्रोजेक्ट्स’ कहा जा रहा है. आलोचकों का कहना है कि ये योजनाएं गड्ढे भरने, अच्छी सड़कें बनाने, ट्रैफिक जाम कम करने, मेट्रो पूरा करने और 1.4 करोड़ निवासियों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने जैसे जरूरी कामों से ध्यान हटाती हैं.

वहीं, सिद्धारमैया सरकार का तर्क है कि केंद्र से राज्यों को मिलने वाले करों के हिस्से में कमी, सहकारी संघवाद में गिरावट और हिंदी थोपे जाने की वजह से बेंगलुरु के ‘विकास’ के लिए धन की कमी हो गई है, जिससे यह महानगर राजनीतिक टकराव का मंच बन गया है.

हालांकि, कॉरपोरेशन में सत्ता में रहते हुए भी बीजेपी बेंगलुरु की समस्याओं को कम करने में ज्यादा मदद नहीं कर पाई है, फिर भी उसने कई कारणों से नगर निकाय चुनावों को प्राथमिकता दी है.

कर्नाटक इन क्षेत्रों में बीजेपी के गिने-चुने मजबूत गढ़ों में से एक है और इस इलाके को ‘दक्षिण का प्रवेश द्वार’ माना जाता है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यहां जीत मिलने से तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के चुनावों से पहले पार्टी को बड़ा मनोवैज्ञानिक फायदा मिलेगा.

‘राज्य के बराबर नियंत्रण’

ताज़ा मतदाता ड्राफ्ट सूची के अनुसार, जीबीए चुनावों के लिए 88.41 लाख से ज्यादा मतदाता पंजीकृत हैं. मतदान 25 मई के बाद होगा.

बीजेपी के एम. गौतम कुमार ने दिप्रिंट से कहा, “जीबीए हमारे लिए बहुत अहम है. मुंबई चुनावों के बाद अगला लक्ष्य बेंगलुरु की पांचों कॉरपोरेशनों में जीत हासिल करना है. अगर बेंगलुरु पर नियंत्रण मिल गया, तो यह पूरे राज्य की बागडोर संभालने जैसा है.”

कुमार, पुराने बीबीएमपी के आखिरी मेयर थे, जिनका कार्यकाल सितंबर 2020 में खत्म हुआ था.

प्रतिष्ठा के अलावा, बेंगलुरु बीजेपी को कई फायदे भी देता है. चूंकि वार्डों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है, इसलिए सभी राजनीतिक दल अपने ज्यादा कार्यकर्ताओं को मौका दे सकते हैं और उन्हें विरोधी दलों में जाने से रोक सकते हैं.

2023 में विधानसभा सीटें 104 से घटकर 66 रह जाने के बावजूद, पार्टी का बेंगलुरु में रिकॉर्ड अच्छा रहा है. शहर की 28 विधानसभा सीटों में से बीजेपी ने 16 जीतीं और कांग्रेस को सिर्फ 12 पर सीमित कर दिया. खास तौर पर, बीजेपी को 46.44 प्रतिशत वोट शेयर मिला, जबकि कांग्रेस को 40.72 प्रतिशत. 2024 के आम चुनावों में बीजेपी ने बेंगलुरु की चारों लोकसभा सीटें जीतीं.

परिवहन मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने दिप्रिंट से कहा, “अगर लोग अच्छा काम और बेंगलुरु का विकास चाहते हैं, तो उन्हें कांग्रेस को वोट देना चाहिए. अगर वे सिर्फ भगवान, धर्म और बीजेपी के झूठ चाहते हैं, तो उन्हें बीजेपी को वोट देना चाहिए. क्या बीजेपी 2010 से 2020 के बीच अपने कार्यकाल की एक भी उपलब्धि गिना सकती है? उन्होंने शहर को और ज्यादा कर्ज़ में छोड़ दिया.”

राज्य चुनाव आयोग ने घोषणा की है कि आने वाले चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाएंगे, इस फैसले की बीजेपी ने आलोचना की है.

मंगलवार को कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खरगे ने बैलेट पेपर के फैसले को आर्थिक और तकनीकी पिछड़ेपन का संकेत बताने पर बीजेपी को घेरा. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या इसी पैमाने पर जापान जैसे उन्नत लोकतंत्रों को “अविकसित” और “तकनीकी रूप से कमज़ोर” कहा जाएगा.

बीजेपी के लिए, जीत मिलने से राहुल गांधी और कांग्रेस को मतदाता सूची और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर चुनावी हार के बाद फिर से घेरने का मौका मिलेगा.

पिछले अगस्त, राहुल ने बेंगलुरु से ‘वोट चोरी’ अभियान शुरू किया था. उन्होंने महादेवपुरा में बड़े पैमाने पर मतदाता धोखाधड़ी का आरोप लगाया था. यह एक बड़ा निर्वाचन क्षेत्र है, जहां बड़ी आईटी कंपनियां हैं और शहर का अंधेरा पक्ष भी छिपा है.

महादेवपुरा से जुड़े निष्कर्षों ने कांग्रेस और उसके सहयोगियों को कथित मतदाता सूची में हेरफेर के ठोस सबूत जैसे दिए, खासकर इससे पहले EVM ‘धोखाधड़ी’ को लेकर बीजेपी को घेरने की कोशिशें नाकाम रहने के बाद.

चुनाव के मुद्दों में अवैध बांग्लादेशी प्रवासी भी शामिल हैं, जबकि कांग्रेस सरकार ने इनके खिलाफ कार्रवाई भी की है. बीजेपी का आरोप है कि सत्तारूढ़ पार्टी उन्हें शरण देती है और बेंगलुरु में कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में उन्हें शामिल करती है. शहर में बड़ी संख्या में प्रवासी—व्हाइट कॉलर और ब्लू कॉलर, रहते हैं, जो आईटी, एविएशन और अन्य कंपनियों में काम करते हैं, साथ ही कम कौशल वाले लोग भी हैं जो छोटे-मोटे कामों में लगे हैं.

बीजेपी के एक वर्ग ने प्रो-कन्नड़ संगठनों को समर्थन दिया है, जिनका कहना है कि सर्वेक्षणों से यह सामने आ सकता है कि प्रवासियों की अधिक संख्या वाले इलाके अपने प्रतिनिधियों के तौर पर गैर-स्थानीय लोगों को चुन रहे हैं.

कांग्रेस कार्ड

बीजेपी का मानना है कि बेंगलुरु, जो काफी हद तक वोक्कालिगा बहुल शहर है, कांग्रेस सरकार की गारंटियों को ज्यादा ध्यान में रखकर वोट नहीं करेगा. शिवकुमार, जो खुद वोक्कालिगा हैं, इस समुदाय से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने यह भरोसा दिलाया है कि वह सिद्धारमैया की जगह मुख्यमंत्री बनेंगे.

लेकिन पार्टी का अच्छा चुनावी रिकॉर्ड और जेडी(एस) के साथ गठबंधन, शिवकुमार के प्रभाव को कमजोर करने में मदद कर सकता है.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट से कहा, “कुछ सीमावर्ती इलाके जैसे यशवंतपुरा, दसराहल्ली और अन्य जगहें हैं जहां वोक्कालिगा आबादी ज्यादा है…कुछ हिस्सों में उनका जरूर प्रभाव है, लेकिन शहरी वोक्कालिगा वोटरों का बड़ा हिस्सा बीजेपी के पक्ष में रहा है.”

हालांकि, दोनों सहयोगी दलों ने अभी तक आगामी जीबीए चुनावों के लिए अपने गठबंधन की स्थिति साफ नहीं की है, लेकिन जेडी(एस) बेंगलुरु और अन्य इलाकों में अपनी खोई हुई साख वापस पाने की कोशिश कर रही है. पिछले एक दशक में जेडी(एस) को बेंगलुरु में काफी नुकसान हुआ है. इसमें 2019 में के. गोपालैया का बीजेपी में जाना और जमीर अहमद खान का कांग्रेस में शामिल होना शामिल है. फिलहाल जेडी(एस) का बेंगलुरु में कोई भी निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है.

लेकिन बीजेपी को उम्मीद है कि उसका गठबंधन, ठीक वैसे ही जैसे लोकसभा चुनाव में बेंगलुरु ग्रामीण सीट पर हुआ, उसे वोक्कालिगा समुदाय का ज़रूरी समर्थन दिलाएगा. वोक्कालिगा समुदाय राजधानी में बड़े पैमाने पर जमीन रखने वाला वर्ग माना जाता है.

अपने चुनावी वादों की ऊंची लागत को संभालने के लिए कांग्रेस सरकार ने पूंजी जुटाने के मकसद से वस्तुओं और जरूरी सेवाओं के दाम बढ़ाए हैं.

राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री और मल्लेश्वरम से बीजेपी विधायक अश्वथ नारायण ने दिप्रिंट से कहा, “उन्होंने जो कुछ भी किया है, वह समाज के हर वर्ग के खिलाफ है. पानी, बिजली, प्रॉपर्टी टैक्स, पेट्रोल की कीमतें बढ़ाना…बीपीएल कार्ड रद्द करना, सार्वजनिक परिवहन का किराया बढ़ाना, ई-खाता के लिए अतिरिक्त शुल्क…”

लेकिन बीजेपी सरकार के हालिया कदमों को लेकर सतर्क है और उस पर आरोप लगा रही है कि उसने अपने फायदे के लिए वार्ड सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया है और पार्टी के मजबूत इलाकों को तोड़ा है.

नारायण ने कहा, “वे बैलेट पेपर पर गए हैं, अपनी मर्जी से वोटर लिस्ट तैयार कर रहे हैं और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर रहे हैं. ये सभी बेहद खतरनाक मिसालें हैं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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