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Friday, 23 January, 2026
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नितिन नबीन की BJP अध्यक्ष के पद पर नियुक्ति इलेक्शन नहीं, सिलेक्शन है

नितिन नबीन की नियुक्ति दिखाती है कि बीजेपी भी अन्य राजनीतिक दलों की तरह है, जहां पार्टी के बड़े नेता चुनाव प्रक्रिया को सख्ती से नियंत्रित करके संगठन के प्रमुख का फैसला करते हैं.

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नितिन नबीन औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के अध्यक्ष नियुक्त हो गए हैं। उनकी नियुक्ति को इसलिए खास बताया जा रहा है क्योंकि वे सबसे युवा अध्यक्ष हैं, जो भविष्य में पार्टी के भीतर पीढ़ीगत बदलाव को दिशा देंगे। इस मौके का इस्तेमाल करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी की पुरानी सैद्धांतिक नीति को फिर से दोहराया कि बीजेपी ‘अन्य पार्टियों से अलग’ है.

क्या नितिन नबीन की नियुक्ति वाकई बीजेपी को अन्य पार्टियों के मुकाबले अलग बनाती है. खास तौर पर तब जब उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के पास भी अब गैर-वंशवादी पृष्ठभूमि से आया अध्यक्ष है.

मेरा मानना है कि बीजेपी और कांग्रेस में अध्यक्ष की नियुक्ति की प्रक्रिया मिलती-जुलती है, लेकिन अहम फर्क नतीजे में है—बीजेपी में नतीजा अनिश्चित होता है, जबकि कांग्रेस में नहीं। बीजेपी में यह अनिश्चितता कार्यकर्ताओं के बीच बड़ी उम्मीद पैदा करती है, जो मानते हैं कि पार्टी में कोई भी कार्यकर्ता किसी भी पद तक पहुंच सकता है.

नियुक्ति का तरीका

बीजेपी की एक खास पहचान यह रही है कि वह गैर-वंशवादी पृष्ठभूमि से पार्टी अध्यक्ष नियुक्त करती है. उसके पूर्व अध्यक्ष— अटल बिहारी वाजपेयी (1980-86), लाल कृष्ण आडवाणी (1986-91; 1993-98; 2004-2005), मुरली मनोहर जोशी (1991-93), कुशभाऊ ठाकरे (1998-2000), बंगारु लक्ष्मण (2000-2001), जना कृष्णमूर्ति (2001-2002), वेंकैया नायडू (2002-2004), राजनाथ सिंह (2005-2009; 2013-2014), नितिन गडकरी (2009-2013), अमित शाह (2014-20), जगत प्रकाश नड्डा (2020-26), और अब नितिन नबीन —इस श्रेणी में आते हैं.

हालांकि, बीजेपी गैर-वंशवादी पृष्ठभूमि से पार्टी प्रमुख नियुक्त करती है, लेकिन उसकी नियुक्ति प्रक्रिया को लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता. इसकी वजह ‘गेटकीपर’ की बड़ी भूमिका और चुनावी प्रतिस्पर्धा की कमी है.

राजनीति पार्टियों के तुलनात्मक अध्ययन में, खासकर नेतृत्व के लिए भर्ती के संदर्भ में संगठन में ताकतवर पदों पर बैठे वरिष्ठ नेताओं को ‘गेटकीपर’ कहा जाता है. भारत में ‘हाई कमान’ संस्कृति इसी श्रेणी में आती है. किसी पार्टी को नियंत्रित करने के लिए ऐसे नेता अक्सर इलेक्शन की बजाय सिलेक्शन पर भरोसा करते हैं. दबाव बढ़ने पर वे इनडायरेक्ट इलेक्शन को तरजीह देते हैं. भारतीय राजनीतिक दलों में यह रुझान साफ दिखता है.

बीजेपी, जो खुद को ‘अन्य पार्टियों से अलग’ बताती है, इस प्रवृत्ति से अलग नहीं है। लगातार तीन राष्ट्रीय चुनाव जीतने के बावजूद, वह अप्रत्यक्ष चुनावों पर निर्भर रहती है और पार्टी के भीतर सुधार के बहुत कम संकेत दिखते है। .

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव आधुनिक लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है. यह सिर्फ राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय चुनावों पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के भीतर भी लागू होता है. दुर्भाग्य से, भारत में दूसरा पक्ष यानी दलों के भीतर लोकतंत्र गायब है। किसी चुनाव के दो ज़रूरी तत्व होते हैं—नतीजे की अनिश्चितता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा.

बीजेपी के मामले में, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया पहला मानदंड तो पूरा करती है, लेकिन दूसरा नहीं। फिर भी, नियुक्तियों में अनिश्चितता का तत्व बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच बड़ी उम्मीद पैदा करता है, जो सोचते हैं कि वे पार्टी में किसी भी पद तक पहुंच सकते हैं. बीजेपी पर अपने फील्ड इंटरव्यू में मैंने पाया है कि उसके नेता बार-बार कहते हैं—‘हमारी पार्टी में कोई भी कार्यकर्ता किसी भी पद तक पहुंच सकता है.’ इसलिए जब मोदी कहते हैं कि ‘मैं पार्टी का एक कार्यकर्ता हूं’, तो इसका मकसद कार्यकर्ताओं के बीच इस विश्वास को मजबूत करना होता है। नितिन नबीन की नियुक्ति इसका ठोस उदाहरण देती है.

इसके उलट, कांग्रेस पार्टी में भले ही अब निर्वाचित अध्यक्ष हो, लेकिन उसके चुनाव में अनिश्चितता का तत्व नहीं था. लगभग तय था कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष उसके चार-पांच वरिष्ठ नेताओं में से ही होगा. इसके मुकाबले, नितिन नबीन के अंतरिम अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा से पहले, उनके शीर्ष पर पहुंचने की संभावना का किसी को अंदाजा तक नहीं था.

पार्टी प्रमुख की ऐसी नियुक्ति पद्धति, जिसमें कार्यकर्ताओं को सीधे वोट देने की अनुमति नहीं होती, लोकतंत्र को सीमित करती है. ऐसे में पार्टी के बड़े नेता प्रभावी रूप से गेटकीपर की भूमिका निभाते हैं. जैसा कि नितिन नबीन के मामले में देखा गया, उन्हें पहले अंतरिम अध्यक्ष घोषित किया गया, ताकि पार्टी के भीतर बड़े नेताओं की पसंद का स्पष्ट संकेत मिल सके.

नितिन नबीन के खिलाफ किसी की संभावित उम्मीदवारी का मतलब सिर्फ नबीन को चुनौती देना भर नहीं था, बल्कि उन बड़े नेताओं को भी चुनौती देना हो जाता, जिनका गुस्सा मोल लेने की हिम्मत शायद ही कोई नेता कर सकता है. इसे हम शशि थरूर के मामले में देख रहे हैं, जो पार्टी अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की पसंद से बाहर हो गए. भारतीय दल इस समस्या का समाधान नहीं कर पाए हैं; जबकि पश्चिमी लोकतंत्रों में नेताओं से पूछा जाता है कि वे नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा में अपने विरोधियों को अपनी टीम में कैसे शामिल करेंगे.

फिर भी, नितिन नबीन को अंतरिम अध्यक्ष घोषित किए जाने से उनकी नियुक्ति तय हो गई, लेकिन वे निर्वाचित अध्यक्ष नहीं, बल्कि चयनित अध्यक्ष हैं. जहां चयन होता है, वहां रणनीति भी होती है.

नितिन नबीन की नियुक्ति में रणनीतिक पहलू

नबीन की नियुक्ति के पीछे की रणनीति को समझने के लिए कई तरह की व्याख्याएं सामने आई हैं. इनमें सबसे प्रमुख उनकी उम्र और उनकी जातिगत पृष्ठभूमि है. इसमें कोई शक नहीं कि वे युवा पीढ़ी के नेता हैं और बीजेपी जल्द ही परिवर्तन के दौर से गुजरेगी.

इसलिए, अपने कार्यकाल में वे ऐसे नेता को तैयार करेंगे या खुद ऐसे नेता बनेंगे, जो आगे चलकर पार्टी को चलाएंगे. उनकी जातिगत पहचान को लेकर भी व्याख्या है—वे कायस्थ समुदाय से आते हैं, जिसका पश्चिम बंगाल में खासा प्रभाव है. बीजेपी पश्चिम बंगाल में इस समुदाय को संगठित करने की कोशिश कर रही है.

इन व्याख्याओं के अलावा, उनके चयन के पीछे दो और कारणों हो सकते हैं—क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाना और पार्टी की गुजराती पहचान से दूरी बनाना। फिलहाल, बीजेपी के संगठन महासचिव (जो अध्यक्ष के बराबर शक्ति रखते हैं) दक्षिण भारत (कर्नाटक) से हैं। इससे उसी क्षेत्र से अध्यक्ष नियुक्त करने की गुंजाइश कम हो जाती है. यानी अध्यक्ष का चयन उत्तर भारत से होना था. मोदी-शाह के उभार के साथ यह धारणा बन रही है कि बीजेपी गुजराती लोगों द्वारा चलाई जाती है. ऐसे में, नितिन नबीन की बिहारी पहचान एक अच्छा संतुलन बना सकती है.

संक्षेप में, नितिन नबीन की नियुक्ति की प्रक्रिया दिखाती है कि बीजेपी भी अन्य राजनीतिक दलों की तरह है, जहां पार्टी के बड़े नेता चुनाव प्रक्रिया को सख्ती से नियंत्रित करके संगठन प्रमुख तय करते हैं. फर्क सिर्फ नतीजे में है. बीजेपी में अनिश्चितता वास्तविकता है, जो अन्य दलों में नहीं दिखती. यही अनिश्चितता पार्टी के भीतर आगे बढ़ने की उम्मीद जगाती है और इससे बीजेपी कार्यकर्ताओं में ज्यादा उत्साह पैदा होता है.

अरविंद कुमार यूनिवर्सिटी ऑफ हर्टफोर्डशायर, यूके में पॉलिटिक्स और इंटरनेशनल रिलेशन के विज़िटिंग लेक्चरर हैं. उनका एक्स हैंडल @arvind_kumar__ है. यह लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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