आज़ादी के बाद भारत की वैज्ञानिक व्यवस्था एक अजीब स्थिति पर बनी थी. एक तरफ वैज्ञानिकों को काम करने की आज़ादी दी गई थी, लेकिन दूसरी तरफ वे ऐसे सरकारी तंत्र में थे जो नियंत्रण को बहुत ज्यादा महत्व देता था. एक पीढ़ी तक होमी भाभा, विक्रम साराभाई और शांति स्वरूप भटनागर जैसे दूरदर्शी लोगों ने अपनी व्यक्तिगत पकड़ और देशहित के मकसद से इस संतुलन को संभाले रखा. उस समय संस्थान तेज़ी से काम करते थे, क्योंकि वैज्ञानिक नेताओं को फैसले लेने की पूरी ताकत मिली हुई थी.
लेकिन अब यह संतुलन धीरे-धीरे टूट चुका है.
वक्त के साथ भारतीय विज्ञान बहुत ज्यादा प्रक्रियाओं में उलझ गया है—कमेटियां, ऑनलाइन पोर्टल, वित्तीय मदें, ऑडिट का रिकॉर्ड, टेंडर और नियमों का कैलेंडर. इसका असर सिर्फ परेशानी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था ही बदल गई है. अब वैज्ञानिक समझ और सोच को प्रशासनिक नियमों के नीचे दबा दिया गया है. वैज्ञानिकों की सोच और ऊर्जा तेज़ी से कागज़ी काम में खर्च हो रही है और नया जोखिम लेने को चुपचाप गलत माना जा रहा है.
यह बात सिर्फ अनुभव पर आधारित नहीं है. 2022 में राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (NAAC) को दी गई अपनी सेल्फ-स्टडी रिपोर्ट में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) ने खुद माना है कि प्रशासनिक और वित्तीय प्रक्रियाएं बहुत कठोर और बोझिल हो गई हैं. इससे शिक्षकों का बहुत ज्यादा समय बर्बाद हो रहा है और शोध पर नकारात्मक असर पड़ रहा है.
क्या शोध को वित्तीय कैलेंडर के हिसाब से चलना चाहिए?
भारत में शोध फंडिंग की समस्या को अक्सर पैसे की कमी कहा जाता है, लेकिन असली और बड़ी समस्या फ्लेक्सिबिलिटी की कमी है.
जब एक बार ग्रांट मंजूर हो जाती है, तो उसका इस्तेमाल सख्त तय मदों में ही करना पड़ता है. एक मद से दूसरी मद में पैसा बदलना मुश्किल होता है और पैसा मिलने में भी देर होती है. जबकि वैज्ञानिक शोध इस तरह नहीं चलता. बड़ी खोजें वित्तीय कैलेंडर नहीं देखतीं. प्रयोग चलते-चलते बदल जाते हैं, कभी टीम छोटी होती है, कभी बड़ी. कई बार फील्ड या लैब में ज्यादा जाना पड़ता है, जिससे सामान की ज़रूरत अचानक बढ़ जाती है.
जब फ्लेक्सिबिलिटी नहीं दी जाती, तो ग्रांट खोज और नए प्रयोग का जरिया नहीं रह जाती, बल्कि सिर्फ नियम-कायदे पूरे करने का काम बन जाती है. ऐसे में प्रमुख शोधकर्ता नई और बड़ी वैज्ञानिक सोच की बजाय इस बात पर ध्यान देने लगते हैं कि ऑडिट में कोई सवाल न उठे.
TIFR की सेल्फ-स्टडी रिपोर्ट इसे सभ्य शब्दों में कहती है: “TIFR को सरकारी फंडिंग एजेंसियों के साथ बेहतर तालमेल बनाना चाहिए, ताकि फंडिंग में लचीलापन मिले और पैसा समय पर जारी हो सके.”
रिसर्च में रुकावट बनता इन्फ्रास्ट्रक्चर
प्रशासनिक कठोरता सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं है. यह ज़मीन पर भी दिखती है, जब इन्फ्रास्ट्रक्चर में देरी सीधे तौर पर शोध की क्षमता को सीमित कर देती है.
TIFR की सेल्फ-स्टडी रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि “स्टूडेंट्स की संख्या जगह की कमी के कारण सीमित है. TIFR के पास मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षमता और उच्च स्तर के वैज्ञानिक शिक्षक होने के बावजूद, यहां जितने छात्र तैयार हो सकते हैं, उससे कहीं कम स्टूडेंट्स हैं (लगभग 750 छात्र और 250 फैकल्टी).”
TIFR कोलाबा में एक हॉस्टल कई सालों से बन रहा है, लेकिन वह कमेटियों और अफसरशाही की अड़चनों में फंसा हुआ है. कमज़ोर इन्फ्रास्ट्रक्चर के कारण पीएचडी छात्रों की भर्ती, पोस्ट-डॉक्टोरल शोधकर्ताओं की नियुक्ति और आपसी सहयोग सीमित हो जाता है. इसका सीधा असर यह होता है कि शोध के नतीजे और आउटपुट कम हो जाते हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर सही इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध हो, तो “TIFR का कुल शोध आउटपुट आसानी से दोगुना हो सकता है, और देश को मिलने वाले उच्च प्रशिक्षित, उत्कृष्ट मानव संसाधनों की संख्या भी काफी बढ़ाई जा सकती है.”
वैज्ञानिक उद्यमिता को चुपचाप दबाना
शायद इस पूरे तंत्र का सबसे कम चर्चा में रहने वाला नुकसान एंटरप्रेन्योरशिप है.
दुनिया के बड़े शोध संस्थान एक बात मान चुके हैं—मूल विज्ञान और उद्यमिता एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं. बल्कि वे एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं. मैक्स प्लांक, एमआईटी, स्टैनफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसे संस्थान शोधकर्ताओं को बिना नौकरी छोड़े अपने विचारों को कंपनी में बदलने के रास्ते देते हैं. यहां तक कि भारत के आईआईटी और एनआईटी भी फैकल्टी को उद्यमी बनने की अनुमति देते हैं.
लेकिन TIFR में फैकल्टी के लिए उद्यमिता को संस्थागत रूप से मना किया गया है. बाहरी काम, कंसल्टिंग और व्यावसायीकरण के लिए कई स्तर की अनुमति और कमेटियों की मंजूरी चाहिए. आंतरिक इनक्यूबेशन ढांचे की कमी एक साफ संदेश देती है—गंभीर उद्यमिता तभी की जा सकती है, जब संस्थान छोड़ दिया जाए.
पेटेंट के आंकड़े भी इसी माहौल और प्रक्रियागत हतोत्साह को दिखाते हैं. सेल्फ-स्टडी रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से पहले के पांच वर्षों में TIFR को सिर्फ 15 पेटेंट मिले—जो इसके स्तर के संस्थान के लिए बेहद कम है. बताया जाता है कि TIFR में पेटेंट प्रक्रिया में 6 से 8 महीने लगते हैं, जबकि विदेशों में यही प्रक्रिया 2 से 3 हफ्तों में पूरी हो जाती है. पेटेंट फाइल करना अब रणनीतिक रूप से प्रोत्साहित होने के बजाय प्रशासनिक और कानूनी बोझ बन गया है.
यह नुकसान सिर्फ किसी एक संस्थान का नहीं, बल्कि पूरे देश का है. डीप-टेक नवाचार सिर्फ स्टार्ट-अप हब या को-वर्किंग स्पेस से नहीं निकलता. यह अक्सर उन प्रयोगशालाओं से निकलता है, जहां विश्व-स्तरीय विज्ञान को संस्थागत भरोसे का सहारा मिलता है.
जवाबदेही छोड़े बिना भरोसा बहाल करना
भारत अब संसाधनों की कमी वाला देश नहीं है, जो थोड़े-से संसाधनों की रक्षा में लगा हो. यह एक सभ्यतागत राष्ट्र है, जो बौद्धिक और आर्थिक नेतृत्व फिर से हासिल करना चाहता है. हमारी चुनौती दोहरी है—भ्रष्टाचार भी और ज़रूरत से ज्यादा सख्ती भी. दुरुपयोग रोकने के लिए बनाए गए सिस्टम अब इस्तेमाल को ही रोकने लगे हैं, और नतीजा यह है कि राज्य अपने ही वैज्ञानिकों पर उतना भरोसा नहीं करता, जितना दुनिया के दूसरे देश करते हैं.
फिर भी एक उम्मीद की किरण है. जून 2025 में, केंद्र सरकार ने माना कि सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के जरिए खरीद शोध के रास्ते में रुकावट बन रही है. इससे भारतीय वैज्ञानिकों की पहले उठाई गई चिंताओं को सही ठहराया गया और विशेष उपकरणों के लिए गैर-GeM खरीद की अनुमति दी गई.
अब ज़रूरत है समझदारी भरी स्वायत्तता की. न तो बिना सुरक्षा के पूरी छूट और न ही जरूरत से ज्यादा नियंत्रण—बल्कि ऐसा शासन, जो रोजमर्रा के खर्च और अत्याधुनिक विज्ञान के बीच फर्क समझे.
समय-सीमा में मंजूरी, आपत्ति न होने पर अपने-आप अनुमति मानी जाना, लंबे समय की ग्रांट, फंड के इस्तेमाल में लचीलापन, पेटेंट और बौद्धिक संपदा लाइसेंसिंग की तेज़ प्रक्रिया, और उद्यमिता को साफ-साफ प्रोत्साहन—ये सब दुनिया में आम बातें हैं, लेकिन TIFR में इनकी कमी है.
IISc का उलटा उदाहरण
इसका एक अच्छा उदाहरण है इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc), बेंगलुरु. IISc और TIFR में कई समानताएं हैं. IISc की शुरुआत भी टाटा फंड से हुई थी, बाद में यह सरकार के अधीन आया और कई दशकों तक यह भी मुख्य रूप से प्रकाशन-आधारित और अंदर की ओर देखने वाला शोध संस्थान रहा.
लेकिन पिछले करीब पंद्रह वर्षों में IISc ने जानबूझकर खुद को इस तरह बदला कि शोध का उपयोग और उद्यमिता बढ़ सके. तकनीक ट्रांसफर के लिए अलग दफ्तर, फैकल्टी के लिए औपचारिक स्टार्टअप नीतियां, Society for Innovation and Development (SID) और NSRCEL जैसे इनक्यूबेशन सेंटर, और व्यवस्थित आईपी मैनेजमेंट—इन सबने यह बदल दिया कि शोध और उद्योग कैसे जुड़े.
आज IISc एयरोस्पेस, मैटीरियल्स, एआई और मेडिकल डिवाइसेज जैसे क्षेत्रों में नियमित रूप से डीप-टेक स्टार्टअप तैयार कर रहा है. 2020 के अंत से अब तक, संस्थान से कम से कम 40 स्टार्टअप निकले हैं, जो देश के शोध और नवाचार को दिशा दे रहे हैं. इनमें से आधा दर्जन से ज्यादा स्टार्टअप में IISc के फैकल्टी सदस्य सह-संस्थापक हैं.
यह बदलाव इसलिए नहीं हुआ कि वैज्ञानिक अचानक ज्यादा होशियार या ज्यादा मेहनती हो गए. यह इसलिए हुआ क्योंकि प्रशासनिक रास्ते आसान किए गए, जोखिम को संस्थागत मान्यता दी गई, और शिक्षाविदों के लिए व्यवसायीकरण को पाप की तरह देखना बंद किया गया.
CSIR का विरोधाभास
दूसरी तरफ है काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR), जो दुनिया के सबसे बड़े सरकारी फंड वाले शोध नेटवर्क में से एक है. इसमें 30 से ज्यादा राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं और हजारों वैज्ञानिक हैं. इतने बड़े आकार और बजट के बावजूद, CSIR अहम क्षेत्रों में वैश्विक स्तर के औद्योगिक प्लेटफॉर्म तैयार करने में जूझता रहा है.
पिछले दो दशकों में हुई कई सरकारी समीक्षाओं ने कम तकनीकी व्यावसायीकरण, बिखरा हुआ मिशन फोकस और कमज़ोर उद्योग जुड़ाव की ओर इशारा किया है. शोध का आउटपुट अब भी छोटे-मोटे प्रकाशनों और सीमित उद्योग सेवाओं तक सिमटा हुआ है, न कि बड़े बदलाव लाने वाली तकनीकी प्रणालियों तक.
TIFR—और दूसरे वैज्ञानिक संस्थानों, के सामने अब दो रास्ते हैं. पहला, भारी अफसरशाही, कम व्यावसायीकरण, कम पेटेंट और उद्योग के अनुकूल समाधानों की कमी के साथ आगे बढ़ते रहना. दूसरा, प्रक्रियाओं में बदलाव करना, कमांड-एंड-कंट्रोल वाली सोच को पीछे छोड़ना और संस्थानों को समय के साथ अपडेट रखना.
वैज्ञानिक नेतृत्व को यह समझना चाहिए कि वैज्ञानिकों को नियम साबित करने में कम समय और खोज में ज्यादा समय लगाना चाहिए. महान विज्ञान को हल्के प्रशासनिक स्पर्श की जरूरत होती है. जब कागजी काम एक वैज्ञानिक के समय के लिए भौतिकी से मुकाबला करने लगे, तो देश चुपचाप, बिना दिखे और धीरे-धीरे नुकसान उठाता है.
(प्रसिद्ध TIFR वैज्ञानिकों के इनपुट के साथ)
हर्षिल मेहता एक कॉलमनिस्ट और पब्लिक पॉलिसी सलाहकार हैं, जो सामाजिक-राजनीतिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर लिखते हैं. उनका एक्स हैंडल @MehHarshil है. व्यक्त विचार निजी हैं.
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