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Tuesday, 20 January, 2026
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नितिन नबीन को अपने पूर्ववर्ती नड्डा से अलग रास्ता क्यों बनाना होगा

बड़ा सवाल यह है कि नितिन नबीन RSS के साथ कितनी सक्रियता से जुड़ेंगे. संघ को उनका नाम एक तय फैसले के तौर पर बताया गया—पुष्टि के लिए नहीं, सिर्फ जानकारी के लिए.

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नितिन नबीन माधुरी दीक्षित के फैन हैं. हालांकि, 45 साल की उम्र में जब वे जेपी नड्डा की जगह संभाल रहे हैं, तो शायद उन्हें दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में शाहरुख खान द्वारा निभाए गए किरदार राज की बात भी सुननी चाहिए.

राज सिमरन (काजोल) की मां से कह रहा था—“ज़िंदगी के हर मोड़ पर तुम्हें दो रास्ते मिलेंगे, एक सही, एक गलत.” वह बात दोहराते हुए, जो उसके पापा (अनुपम खेर) ने उसे बताई थी. गलत रास्ता बहुत आसान होता है, लेकिन वह आखिरकार हार की तरफ ले जाता है; सही रास्ता बहुत मुश्किल होता है, लेकिन वही अंत में जीत दिलाता है.

यह तो रील लाइफ थी और राज प्यार में था, लेकिन असल ज़िंदगी में, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए ‘गलत’ या असफल होने वाला कोई रास्ता नहीं होता. वह पहले ही विजेता हैं. अब वे जानते हैं कि ‘ऊपरवाला जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है’. नबीन यह भी जानते हैं कि वह ‘ऊपरवाला’ कौन है, जिसने उन्हें उनकी कल्पना से भी ज्यादा दिया है. कृतज्ञता दिखाने का सबसे आसान तरीका है उस ऊपरवाले के लिए ब्रायन एडम्स गाना—“I’m going one way/your way/it’s such a strong way.”

जेपी नड्डा ने बिल्कुल यही किया. नबीन भी ऐसा कर सकते हैं, लेकिन यह एक आसान रास्ता होगा, ज़रूरी नहीं कि ‘सही रास्ता’. उन्हें कृतघ्न होने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन वे पार्टी के लिए सही कई काम फिर भी कर सकते हैं.

फिलहाल, उनके कई साथी खुश नहीं हैं. उनके चयन का मतलब नेताओं की एक पूरी पीढ़ी के लिए रास्ते का अंत है. 45 साल के नेता के नेतृत्व में आने से, आपातकाल से पहले जन्मे नेताओं को अब राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में अपनी प्रासंगिकता और आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करना होगा.

संदेहास्पद प्रामाणिकता

पार्टी के कई लोग अभी इसी उलझन में हैं कि नए पार्टी अध्यक्ष को किस नाम से संबोधित करें—भाई साहब/नीतिन जी/नीतिन भाई/नबीन बाबू/सर/महोदय? पार्टी के अंदर कई किस्से भी घूम रहे हैं. उनमें से एक यह है कि नबीन, परिचय बढ़ाने के मकसद से, केंद्रीय मंत्रियों से संपर्क कर रहे थे और जब कुछ मंत्रियों ने फोन पर आने से पहले उन्हें होल्ड पर रखा तो वे नाराज़ हो गए. एक और नैरेटिव यह है कि वरिष्ठ पार्टी पदाधिकारियों ने दो बैठकें कीं, ताकि यह तय किया जा सके कि नबीन को पार्टी अध्यक्ष के रूप में पूरा सम्मान मिले.

यह बात भी कई नेताओं को पसंद नहीं आई है कि संगठनात्मक, राजनीतिक और चुनावी अनुभव और काबिलियत रखने वाले कई योग्य नेताओं को नज़रअंदाज़ कर एक तरह के नए और अनुभवहीन व्यक्ति को उनका बॉस बना दिया गया. वे अनुशासित कार्यकर्ता हैं और यह भी जानते हैं कि फैसला किसका था, इसलिए चुप और उदास हैं, लेकिन जरा गहराई में जाएं तो उनकी नाराज़गी सामने आ जाती है: भाजपा में मेहनत और काबिलियत का इनाम क्या है? जब बड़े और अहम फैसले सिर्फ एक-दो लोग ही लेते हैं, तो भाजपा और कांग्रेस में फर्क क्या रह जाता है? वे कहते हैं—युवाओं को आगे बढ़ाइए, लेकिन काबिलियत और अनुभव की कीमत पर नहीं.

नबीन को अपनी पार्टी में टूटी महत्वाकांक्षाओं और आहत स्वाभिमान का अंदाज़ा ज़रूर होगा. उन्हें वह गलती नहीं करनी है जो राहुल गांधी ने 2007 में यूथ कांग्रेस और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के प्रभारी महासचिव बनने के बाद की थी. कांग्रेस नेता ने इस पद को पुराने नेताओं को हटाने के मौके के तौर पर देखा, जिससे ऐसी श्रृंखला शुरू हुई, जिससे पार्टी आज तक उबर नहीं पाई.

नबीन की पहली परीक्षा यह है कि वे अपने पार्टी साथियों को यह भरोसा दिलाएं कि उन्हें शीर्ष पद पर इसलिए नहीं चुना गया ताकि भविष्य में नड्डा बहुत ही कामयाब अध्यक्ष के रूप में देखे जाएं. उन्हें अपने साथियों को कुछ अलग कर दिखाना होगा. इसका यह मतलब नहीं कि वे ऐसा ऊपरवाले के खिलाफ जाकर करें क्योंकि ऊपरवाला राजनीति और चुनावों को सबसे बेहतर जानता है. नबीन यह काम ऊपरवाले के विचार साझा करने वाले साथी बनकर कर सकते हैं, सिर्फ आदेश लिखने वाले नहीं और पार्टी में शीर्ष नेतृत्व और बाकी लोगों के बीच सेतु बनकर. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच दूरी बढ़ती जा रही है क्योंकि कार्यकर्ताओं को ऊपर से सिर्फ निर्देश मिलते हैं और फिर उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है. दिल्ली में भाजपा मुख्यालय किसी भी सामान्य दिन जाकर देख लीजिए—राष्ट्रीय पदाधिकारियों से मिलने कितने कार्यकर्ता और नेता होते हैं. ज्यादातर समय वहां सन्नाटा ही रहता है.

‘चुनाव के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को भूल जाती है’

कुछ दिन पहले मैं पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए काम करने वाले एक व्यक्ति से उसकी चुनावी संभावनाओं के बारे में पूछ रहा था. वह इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त था कि ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ जबरदस्त सत्ता-विरोधी माहौल है. अगर लोग वोट डालने निकलें, तो भाजपा कम से कम शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में तो पूरी तरह जीत हासिल कर लेगी. मुझे हैरानी हुई कि लोग वोट डालने क्यों नहीं निकलेंगे.

उसने जवाब दिया, “अगर भाजपा नहीं जीती तो उनकी सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?” फिर उसने कहा, “वोटरों को छोड़िए, खुद भाजपा कार्यकर्ता भी डरे हुए हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि चुनाव के बाद पार्टी उन्हें भूल जाती है और उन्हें अपनी सुरक्षा खुद ही देखनी पड़ती है. पार्टी तो उन कार्यकर्ताओं को कानूनी मदद तक नहीं देती, जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो जाती है.”

पश्चिम बंगाल से लेकर कर्नाटक और केरल तक, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दूसरे भाजपा नेता राजनीतिक विरोधियों द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या की बात करते रहते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वे इसे भूल जाते हैं. 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान शाह ने बार-बार भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 24 से ज्यादा कार्यकर्ताओं की हत्या का ज़िक्र किया था. उन्होंने कहा था, “जब हम सत्ता में आएंगे, तो न्याय दिलाएंगे.”

कुछ समय बाद भाजपा कर्नाटक में सत्ता में भी आ गई, लेकिन तब तक शाह उन पीड़ितों को भूल चुके थे. शायद इसके लिए उन्हें दोष भी नहीं दिया जा सकता. उनके दिमाग में बहुत सारी बातें रहती हैं. भाजपा कार्यकर्ता चाहेंगे कि नबीन ऐसे मुद्दों में रुचि लें और पहल करें. इससे उन्हें अपनी पार्टी के साथियों का सम्मान जीतने में काफी मदद मिलेगी.

अब बड़ा सवाल यह है कि वे आरएसएस के साथ कितनी सक्रियता से जुड़ते हैं. भाजपा अध्यक्ष के रूप में वे आरएसएस की पसंद नहीं हैं. संघ को उनका नाम एक तयशुदा फैसले के तौर पर बताया गया—सिर्फ जानकारी के लिए, मंजूरी के लिए नहीं. संघ ने यह मान लिया है कि उसका वैचारिक शिष्य, भाजपा, संगठन या सरकार चलाने में उसकी सलाह नहीं चाहता. जैसा कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं, भाजपा के साथ मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं. इसके अलावा, संघ को अपने पूर्व प्रचारकों के देश चलाने से ही फायदा हुआ है.

हालांकि, नए भाजपा अध्यक्ष की नियुक्ति में कोई भूमिका न होने से संघ के भीतर बेबसी और निराशा का भाव पैदा हुआ है. संघ जानता है कि आज भाजपा उसकी “मजबूरी” है और इसके लिए वह कांग्रेस को भी जिम्मेदार मानता है. आरएसएस के संपर्क प्रमुख रामलाल ने पिछले हफ्ते नई दिल्ली में मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ बातचीत के दौरान यह बात कही. आरएसएस द्वारा हमेशा भाजपा का समर्थन करने के सवाल पर रामलाल ने कहा, “मैं कांग्रेस के लोगों से मिलता हूं और कहता हूं कि जब तक आप संघ को गाली देते रहेंगे, हम भाजपा को समर्थन देते रहेंगे…हम आपको कैसे समर्थन दें…आप समर्थन मांगते ही नहीं? आप हमें गाली देते रहते हैं. आपने संघ की मजबूरी भाजपा बना दी है.”

रामलाल भाजपा के सबसे लंबे समय तक रहने वाले राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) रहे हैं. उन्होंने 2019 में आरएसएस में लौटने से पहले 13 साल तक यह जिम्मेदारी निभाई थी. उन्हें अच्छी तरह पता था कि वे क्या कह रहे हैं. आरएसएस से जुड़े एक व्यक्ति ने इसे इस तरह समेटा: “नबीन की नियुक्ति के साथ नंबर 1 और नंबर 2 ने संघ को साफ संदेश दे दिया है—आप तो शाखा चलाइए, बाकी हम संभाल लेंगे.”

जो व्यक्ति भाजपा के हितों को सबसे ऊपर रखता है, उसके लिए नबीन का आरएसएस में फैली इस निराशा से उदासीन रहना ठीक नहीं होगा. व्यक्ति आते-जाते रहते हैं, लेकिन आरएसएस और भाजपा जैसे संस्थान बने रहते हैं. नवीन के लिए अच्छा होगा कि वे अपनी पहली यात्रा नागपुर से शुरू करें.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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