अमेरिकी फौज ने ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ के तहत 3 जनवरी की सुबह जो छापेमारी की, वह वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरस को हिरासत में लिए जाने के साथ खत्म हुई. इस सैन्य कार्रवाई ने खुफिया पहुंच, साहस, तेज़ी, अलग-अलग डोमेन में तालमेल, हवाई-इलेक्ट्रॉनिक और साइबर सेक्टर में बढ़त और इलीट स्पेशल फोर्स के इस्तेमाल के कारण पूरी दुनिया का ध्यान खींचा.
इस ऑपरेशन पर आई ज़्यादातर टिप्पणियों में इसकी वैधता, नैतिकता और संभावित भू-राजनीतिक असर पर ज़ोर दिया गया, लेकिन भारत के लिए इसका असली महत्व इसके लक्ष्यों या राजनीतिक संदर्भ की नकल करने में नहीं है, बल्कि उन सैन्य क्षमताओं और संयुक्त युद्ध की तैयारी को समझने में है, जिनकी वजह से ऐसा ऑपरेशन संभव हो पाया. ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ ने उन तमाम क्षमताओं को दिखाया है, जो 21वीं सदी के युद्ध की बुनियाद बन सकती हैं.
इरादों और क्षमताओं में फर्क
अमेरिका ने अपनी सैन्य ताकत का इस्तेमाल कर दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष को पकड़ लिया और अपने सैनिकों को वहां स्थायी रूप से तैनात किए बिना उसके बाद के राजनीतिक नेतृत्व पर अपनी इच्छा थोप दी. भारत जिस रणनीतिक संस्कृति का पालन करता आया है वह अंतरराष्ट्रीय कानून और दीर्घकालिक हितों के सम्मान पर आधारित है और ऐसे दुस्साहस की इजाज़त नहीं देती.
फिर भी, ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. यह अहम सबक देता है कि आधुनिक सेना कैसे तैयार की जाती है और राजनीतिक लक्ष्यों को तेज़ी से, निर्णायक ढंग से और नियंत्रित सैन्य तैयारी के ज़रिये हासिल करने के लिए क्षमताओं को कैसे जोड़ा और इस्तेमाल किया जाता है. इस ऑपरेशन की सफलता उन क्षमताओं पर टिकी थी, जो हर गंभीर सेना के लिए बेहद ज़रूरी हैं—खुफिया बढ़त, संयुक्त योजना, हवाई-इलेक्ट्रॉनिक-साइबर क्षमता में श्रेष्ठता, सटीक हमला, इलीट स्पेशल फोर्स और तेज़ निर्णय लेने की क्षमता.
भारत के सामने जो सुरक्षा चुनौतियां हैं—चाहे आतंकवाद से निपटना हो, पाकिस्तान के साथ परमाणु माहौल में सीमित संघर्ष की स्थिति हो, या चीन को संतुलित करना हो—उनका स्वरूप इन्हीं तकनीकी और सैद्धांतिक हकीकतों से तय होगा. इसलिए, ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ से मिलने वाले सबकों को समझना और उनसे सीख लेना भारत की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने के लिए ज़रूरी है.
खुफिया मामलों में बढ़त: 21वीं सदी के युद्ध की बुनियाद
‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ का सबसे अहम पहलू न तो एयर पावर था और न ही स्पेशल फोर्स, बल्कि वह खुफिया तैयारी थी जिसने मैदान में पक्के नतीजे दिए. ऑपरेशन से पहले, अगस्त 2025 से ही ह्यूमन सोर्स, इलेक्ट्रोनिक, साइबर, अंतरिक्ष और जियो-स्पेशियल जैसे सेक्टर से खुफिया जानकारियां जुटाई जा रही थीं. खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के लिए आरक्यू-170 सेंटिनेल स्टील्थ ड्रोन और युद्ध में मदद करने वाले विशेष पोत ‘एमवी ओशन ट्रेडर’ जैसे साधनों का इस्तेमाल किया गया. साथ ही, उन सभी फौजी ठिकानों और इकाइयों की पहचान और मैपिंग की गई, जो स्पेशल फोर्स के मिशन के लिए खतरा बन सकते थे.
भारत के लिए यह एक कड़वी सच्चाई दिखाता है कि खुफिया मामलों में बढ़त के बिना कोई भी सटीक ऑपरेशन संभव नहीं है. भारत का खुफिया तंत्र अभी भी बिखरा हुआ है. सेना की खुफिया इकाइयां, राष्ट्रीय एजेंसियां और तकनीकी माध्यम एक साथ मिलकर काम करने के बजाय अक्सर अलग-अलग, समानांतर काम करती हैं. दुश्मन देशों के भीतर जासूसों की पैठ और तकनीकी पहुंच भी अभी उस स्तर की नहीं है जिसकी ज़रूरत है. अगर ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ जैसा मॉडल या ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ के दौरान इजरायल द्वारा अपनाया गया तरीका अपनाया जाता, तो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान के भीतर करीब 100 छोटे आतंकियों को मारने (जैसा दावा किया गया) और ऐसे आतंकी ठिकानों को नष्ट करने के बजाय, जिन्हें कम समय में फिर खड़ा किया जा सकता है, आतंकवादी सरगनाओं को सटीक हमलों से पंगु बनाया जा सकता था.
क्षमता निर्माण में कुछ बातों को प्राथमिकता देनी होगी—लगातार खुफिया निगरानी; सीमा पार, समुद्री और अंतरिक्ष क्षेत्रों में नज़र और टोही; तकनीकी खुफिया के साथ जासूसों की गहरी पैठ; एआई की मदद से तालमेल और अनुमान का विश्लेषण; खुफिया एजेंसियों और हमला करने वाली इकाइयों के बीच सीधा संपर्क; और एजेंटों या प्रॉक्सी के जरिए दुश्मन के इलाके में ड्रोन का इस्तेमाल. इन उपायों के बिना, सबसे आधुनिक हथियार और प्लेटफॉर्म भी पूरी तरह असरदार नहीं हो सकते.
लगातार खुफिया तैयारी होने से राजनीतिक और सैन्य फैसले तेज़ी से लिए जा सकते हैं और आपात योजनाएं तुरंत लागू की जा सकती हैं. अगर ऐसी तैयारी होती, तो ऑपरेशन सिंदूर पहलगाम प्रकरण के 15 दिन बाद नहीं, बल्कि 24 से 48 घंटे के भीतर शुरू किया जा सकता था. इसी तरह की तैयारी की कमी के कारण ही अप्रैल-मई 2020 में चीन हमें रणनीतिक रूप से चकमा देने में सफल रहा. यह राजनीतिक और सैन्य स्तर पर एक अक्षम्य चूक थी.
इरादों और ऑपरेशन में तालमेल ज़रूरी
‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ यह सिखाता है कि कार्रवाई में केवल तालमेल नहीं, बल्कि गहरा जुड़ाव कैसे होना चाहिए. आकाश, ज़मीन, समुद्र, साइबर, अंतरिक्ष और स्पेशल फोर्स—इन सभी क्षेत्रों में ऑपरेशन की योजना और उसका क्रियान्वयन अमेरिकी सदर्न थिएटर कमांड ने एक ही कमांड ढांचे के तहत किया. वेनेजुएला में छापे के दौरान, 20 ठिकानों और एक विमानवाहक पोत से अमेरिकी वायुसेना और नौसेना के 150 विमानों और ड्रोनों के ऑपरेशन को ज़मीनी टीमों के स्पेशल ऑपरेशन से जोड़ा गया, जिन्होंने सटीक हमले किए. अमेरिकी नौसेना के जहाजों के बेड़े ने हवाई अभियानों और स्पेशल फोर्स के लिए लॉन्चपैड का काम किया. यह सब वेनेजुएला के आसमान में सिर्फ दो घंटे और 28 मिनट के भीतर पूरा कर लिया गया.
भारत पिछले कई दशकों से तीनों सेनाओं के एकीकरण की बात करता रहा है. एकीकृत थिएटर कमांड बनाने का राजनीतिक फैसला भी छह साल पहले हो चुका है, लेकिन इस दिशा में अब तक बहुत सीमित प्रगति ही हुई है. पूरी ताकत और अधिकार वाले थिएटर कमांड न होने से योजना और अमल दोनों पर संरचनात्मक बाधाएं बनी रहती हैं. सेना-आधारित सोच, दोहराए गए संसाधन और फैसले लेने की लंबी प्रक्रिया जवाबी कार्रवाई को धीमा कर देती है और युद्ध क्षमता को कमज़ोर करती है. सेनाओं के प्रमुख भी युद्ध के ऑपरेशनल चरण में सीधे कमांड और कंट्रोल नहीं कर पाते. पूरी जिम्मेदारी के साथ कहा जा सकता है कि हमारी मौजूदा व्यवस्था ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ जैसा कोई ऑपरेशन करने में सक्षम नहीं है.
इसलिए ज़रूरी है कि क्षमता विकास को एकीकृत थिएटर स्तर की योजना, संयुक्त कमांड-एंड-कंट्रोल व्यवस्था, तीनों सेनाओं की साझा कार्रवाई और संयुक्त प्रशिक्षण से जोड़ा जाए और इसे अपवाद नहीं बल्कि सामान्य प्रक्रिया बनाया जाए. आधुनिक युद्ध केवल बड़े पैमाने पर नहीं, बल्कि तेज़ी और एकीकरण पर जीत हासिल करते हैं.
आकाश, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और साइबर क्षेत्र में बढ़त
‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ से मिलने वाला एक बड़ा सबक इलेक्ट्रोनिक और साइबर युद्ध के प्रभावी इस्तेमाल से जुड़ा है. बताया जाता है कि बिजली ग्रिड पर साइबर हमला कर पूरे देश में ‘ब्लैकआउट’ कर दिया गया. ज़मीनी सेना के पहुंचने से पहले ही इलेक्ट्रोनिक और साइबर ऑपरेशनों के ज़रिए सैन्य और नागरिक, दोनों तरह की कमांड और कंट्रोल व्यवस्था को पूरी तरह कमज़ोर कर दिया गया. विमानों और ड्रोनों से किए गए इलेक्ट्रोनिक हमलों ने वेनेजुएला के रडार सिस्टम और हवाई सुरक्षा से जुड़े हथियार प्लेटफॉर्मों के कंट्रोल और गाइडेंस सिस्टम को बेकार कर दिया. इसके बाद, पहले से नाकाम किए जा चुके हवाई सुरक्षा सिस्टम को विमानों से दागे गए सटीक, प्रिसीजन-गाइडेड हथियारों से निशाना बनाया गया. यह भी कयास लगाए गए हैं कि इस ऑपरेशन में रहस्यमय सोनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ.
यहां यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि इस ऑपरेशन के दौरान रूसी एयर डिफेंस सिस्टम (S-300 और Buk-M2E) किसी भी विमान, ड्रोन या हेलिकॉप्टर को रोकने में नाकाम रहे. इन्हें या तो आकाशीय प्लेटफॉर्मों से किए गए इलेक्ट्रोनिक युद्ध के जरिए निष्क्रिय कर दिया गया या सीधे हमलों में नष्ट कर दिया गया. यहां तक कि बहुचर्चित एंटी-स्टील्थ चीनी रडार जेवाई-27 भी असरदार साबित नहीं हुआ. अमेरिकी फिफ्थ जेनरेशन विमानों की स्टील्थ क्षमता और उनके सतह डिजाइन ने रडार की पहचान क्षमता को करीब 10 फीसदी या 20–30 किलोमीटर तक घटा दिया, जिससे ये सिस्टम आसानी से निशाना बन गए.
इसलिए भारत को अपने एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की तुलना आधुनिक स्टील्थ क्षमताओं से लैस फिफ्थ जेनरेशन के चीनी विमान जे-35 से करनी चाहिए, जिन्हें पाकिस्तान 2026 में हासिल कर सकता है. भारत को भी फिफ्थ जेनरेशन विमानों की स्टील्थ क्षमता का लाभ उठाने के लिए कम से कम तीन स्क्वाड्रन हासिल करने पर विचार करना चाहिए. खासकर पाकिस्तान को देखते हुए, ये सभी सबक भारत के लिए सीधे तौर पर अहम हैं. भविष्य में किसी भी संकट में समय का दबाव ज्यादा होगा और हालात तेज़ी से बिगड़ सकते हैं. जो पक्ष आकाश, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और साइबर क्षेत्र में बढ़त हासिल करेगा, वही युद्ध की दिशा तय करेगा.
क्षमता विकास में कुछ बातों को सबसे ऊपर रखना होगा—दुश्मन की एयर डिफेंस क्षमताओं को दबाव में डालकर नष्ट करना; तीनों सेनाओं में एकीकृत इलेक्ट्रोनिक युद्ध यूनिट बनाना; मजबूत नेटवर्क और प्रभावी इलेक्ट्रोनिक व साइबर युद्ध उपाय; अंतरिक्ष आधारित खुफिया, निगरानी, टोही और संचार व्यवस्था को मजबूत करना; और गहरी मार करने वाली साइबर युद्ध क्षमताओं को डेवलप करना.
जब हवाई ताकत को साइबर और इलेक्ट्रोनिक युद्ध से जोड़ा जाता है, तो वह केवल तबाही का जरिया नहीं रहती, बल्कि रणनीतिक संकेत देने और युद्ध की गति को नियंत्रित करने का भी साधन बन जाती है.
सटीक निशानेबाजी पर जोर
‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ यह साफ करता है कि आधुनिक युद्ध में सेना की भारी संख्या से ज्यादा अहम सटीक निशानेबाजी है. इस ऑपरेशन में बड़ी संख्या में सैनिक तैनात करने की बजाय, ट्रेनिंग ली हुई छोटी यूनिट्स और सटीक मार करने वाले हथियारों पर भरोसा किया गया.
भारत की सैन्य तैनाती आज भी दिखाती है कि संख्या, प्लेटफॉर्म और ज़मीनी नियंत्रण को ज़रूरत से ज्यादा अहमियत दी जा रही है. भौगोलिक और पैमाने से जुड़ी कुछ मजबूरियां ज़रूर हैं, लेकिन क्षमता विकास में सटीक मार करने वाले स्टैंड-ऑफ हथियारों, मानव रहित हवाई प्रणालियों, नेटवर्क से जुड़े स्पेशल फोर्स ऑपरेशन, खुफिया तंत्र से जुड़ी लंबी दूरी की मारक क्षमता, निगरानी और टोही व्यवस्था को प्राथमिकता देनी होगी.
सटीक निशानेबाजी से न सिर्फ दुश्मन में डर पैदा होता है, बल्कि अनावश्यक नुकसान, राजनीतिक जोखिम और अतिरिक्त सैन्य तैनाती से भी बचा जा सकता है.
निर्णय प्रक्रिया और राजनीति–सेना जुड़ाव
‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ का एक बेहद अहम लेकिन कम चर्चा में आया पहलू राजनीतिक और सैन्य निर्णय प्रक्रियाओं के बीच मजबूत तालमेल है. खुफिया जानकारी जुटाने, योजना बनाने, अधिकार बांटने और ऑपरेशन को अंजाम देने—ये सभी काम बेहद नियंत्रित और सुव्यवस्थित तरीके से किए गए. अगस्त 2025 से ही खुफिया जानकारी इकट्ठा करना और सेना की अहम स्थानों पर तैनाती शुरू हो गई थी. सेना को अंतिम आदेश राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रात 10.46 बजे (ईएसटी) दिए. पहले से तय सुरक्षित रास्तों से 150 विमानों के आगे बढ़ने के बाद, अमेरिकी सेना की डेल्टा फोर्स यूनिट ने रात 01.00 बजे लक्ष्य पर हमला किया. आधे घंटे के भीतर मादुरो को पकड़ लिया गया और 150 मिनट के अंदर सभी दल समुद्र के ऊपर उड़ान भरते हुए लौट रहे थे. मादुरो सुबह 04.29 बजे यूएसएस आइवो जिमा पर उतरे.
भारत की सिविल–मिलिटरी निर्णय प्रक्रिया आमतौर पर काफी सतर्क और चरणबद्ध होती है. यह लोकतांत्रिक जवाबदेही तो सुनिश्चित करती है, लेकिन क्षमता विकास में देरी और टकराव को कम करने पर अब ज्यादा ध्यान देना होगा. इसके लिए पहले से मंजूर आकस्मिक योजनाएं, तैयार संयुक्त टास्क फोर्स और राजनीतिक व सैन्य नेतृत्व के बीच मजबूत और त्वरित संवाद ज़रूरी हैं. आज के युद्ध में फैसले की तेज़ी खुद एक बड़ी क्षमता बन चुकी है.
स्पेशल फोर्स
भारत में स्पेशल फोर्स का इस्तेमाल ज्यादातर सामरिक या सामान्य थल सेना के कठिन मिशनों में किया गया है. अब वक्त आ गया है कि उन्हें मुख्य रूप से रणनीतिक मिशनों के लिए तैयार और इस्तेमाल किया जाए. इसके लिए स्पेशल फोर्स डिवीजन को एक अलग स्पेशल फोर्स कमांड में बदलने की ज़रूरत होगी. तीनों सेनाएं जटिल सामरिक अभियानों के लिए स्पेशल फोर्स तैयार कर सकती हैं और उन्हें बनाए रख सकती हैं.
कल्पना कीजिए, अगर ऑपरेशन सिंदूर-2 में बड़े आतंकी सरगनाओं को पकड़ लिया जाता या मार गिराया जाता, तो उसका कितना गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ता.
प्रचार का मुद्दा
अमेरिका के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व ने ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ के कुछ ही घंटों बाद उसके विवरण सार्वजनिक कर दिए. बाकी जानकारियां खोजी पत्रकारों के जरिए सामने आ गईं. यहां तक कि भारतीय मीडिया ने भी ऑपरेशन सिंदूर से ज्यादा कवरेज ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ को दी. जब विश्वसनीय जानकारियां खुले तौर पर उपलब्ध होती हैं, तो दुनिया अमेरिका की सैन्य ताकत को स्वीकार करती है.
भारत के लिए यह एक अहम सबक है. ऑपरेशन सिंदूर की बड़ी रणनीतिक सफलता के बावजूद, शुरुआती चरणों में पिछड़ने और कथित आरोपों के चलते भारत इसे ठीक से प्रचारित नहीं कर पाया—जबकि ऐसा न करने की कोई ठोस वजह नहीं थी. पाकिस्तान ने प्रचार की बाजी जीत ली और शुरुआती बढ़त का फायदा उठाकर अपनी रणनीतिक हार पर परदा डाल दिया.
निष्कर्ष
‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ यह साबित करता है कि जब खुफिया तंत्र, आकाश, इलेक्ट्रोनिक और साइबर क्षेत्र में बढ़त, मजबूत जुड़ाव और सटीक निशानेबाजी को स्पष्ट राजनीतिक निर्देश का साथ मिलता है, तो एक आधुनिक और एकीकृत सेना क्या हासिल कर सकती है.
भारत के लिए इसका महत्व इस ऑपरेशन के मकसद में नहीं, बल्कि उस क्षमता निर्माण की व्यवस्था में है, जिसने इस मकसद को हासिल करना संभव बनाया.
लेफ्टिनेंट जनरल एच. एस. पनाग (सेवानिवृत्त), पीवीएसएम, एवीएसएम, ने 40 साल तक भारतीय सेना में सेवा की. वे उत्तरी कमान और केंद्रीय कमान के कमांडर रहे. रिटायरमेंट के बाद, उन्होंने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण में सदस्य के रूप में काम किया. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.
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