नई दिल्ली: भोपाल साहित्य उत्सव को लेकर हुए विवाद ने मोहन यादव के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश सरकार और संघ परिवार के बीच मतभेद उजागर कर दिए हैं. यह दोनों के बीच हाल के कई टकरावों में से एक है. दिप्रिंट को इस बारे में जानकारी मिली है.
भोपाल साहित्य उत्सव को मुगल बादशाह बाबर पर आई एक नई किताब पर तय चर्चा रद्द करनी पड़ी, जब पुलिस ने संभावित विरोध प्रदर्शनों की चेतावनी दी. लेखक ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े अखबार ‘स्वदेश’ में छपे एक लेख को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया. लेखक का कहना था कि उस लेख में झूठी और मानहानिकारक रिपोर्ट छापी गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि वह मुगल बादशाह बाबर का महिमामंडन करना चाहते हैं.
विवाद सामने आने के बाद ‘स्वदेश’ ने भी अपनी सफाई दी.
उसने कहा, “हर साल वे मीडिया का ध्यान खींचने के लिए किसी विवादित विषय को शामिल करने की कोशिश करते हैं. पिछले साल समलैंगिकता और LGBTQ+ विमर्श के नाम पर विषयों पर चर्चा कर विवाद खड़ा किया गया था. इस साल लेखक आभास की किताब पर चर्चा के लिए एक सत्र रखा गया था, जो बाबर पर केंद्रित था.”
अखबार ने आगे कहा कि पूरे कार्यक्रम से असहमति सिर्फ इस बात पर थी कि जब पूरा देश राम मंदिर निर्माण की भावना में एकजुट है, तब किसी भी रूप में बाबर के नाम को दोबारा उठाने की ज़रूरत नहीं है.
लेख में कहा गया कि उसने न तो लेखक को दोषी ठहराया है, न ही किताब की सामग्री पर कोई आपत्ति जताई है और न ही इनके खिलाफ विरोध जताया है.
‘स्वदेश’ ने आगे कहा कि उनका विरोध उस वित्तीय समर्थन को लेकर था, जो उत्सव को राज्य और केंद्र सरकार से मिला और इस बात को लेकर था कि यह वर्षों से एक “वामपंथी नैरेटिव” को बढ़ावा दे रहा है.
दिप्रिंट से बात करने वाले कई आरएसएस पदाधिकारियों ने माना कि मध्य प्रदेश में बीजेपी सरकार के खिलाफ उनकी नाराज़गी इस बात को लेकर है कि राज्य में अफसरशाही किस तरह काम चला रही है.
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट से कहा, “स्वदेश में छपे लेख की वजह से बाबर पर प्रस्तावित चर्चा रद्द हुई, लेकिन इससे यह भी सामने आता है कि राज्य में जो कुछ हो रहा है, उस पर सरकार मूक दर्शक बनी हुई है. इसकी जड़ में भ्रष्टाचार है और इसमें नौकरशाह शामिल हैं. पिछले दो साल में और भी कई मुद्दे सामने आए हैं, जिनकी वजह से ऐसे दखल हुए. उत्सव पर भी काफी सवाल उठ रहे थे, लेकिन अफ़सरशाही चुप रही.”
दिसंबर 2023 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले मोहन यादव आरएसएस की ही उपज हैं, क्योंकि उन्होंने 1984 में संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी, लेकिन इससे संघ परिवार को उनकी सरकार के फैसलों की आलोचना करने से नहीं रोका.
सितंबर की एक और घटना में तनाव तब सामने आया, जब यादव की ‘आध्यात्मिक नगरी’ बनाने की ड्रीम परियोजना का विरोध हुआ. यह परियोजना उज्जैन में थी, जो मालवा क्षेत्र में आता है और जिसे पार्टी की वैचारिक स्रोतभूमि माना जाता है. इस परियोजना का विरोध आरएसएस से जुड़े संगठन भारतीय किसान संघ (बीकेएस) ने किया.
सितंबर में दिप्रिंट ने रिपोर्ट की थी कि बीकेएस ने 2028 के सिंहस्थ—जो हर 12 साल में उज्जैन, हरिद्वार, प्रयागराज और नासिक में लगने वाले कुंभ मेलों में से एक है—से पहले एक पक्की आध्यात्मिक नगरी बनाने के लिए (संशोधित भूमि पूलिंग नीति के तहत) 2,400 हेक्टेयर ज़मीन अधिग्रहण का विरोध किया था.
बीकेएस ने सरकार पर आरोप लगाया था कि वह भूमि पूलिंग नीति के ज़रिये किसानों की ज़मीन “हड़पने” की कोशिश कर रही है ताकि स्थायी ढांचे बनाए जा सकें. संगठन का कहना था कि यह नामंज़ूर है क्योंकि उज्जैन सदियों से बिना स्थायी निर्माण के ज़मीन अधिग्रहण के कुंभ का आयोजन करता रहा है.
पार्टी के एक अन्य पदाधिकारी ने कहा, “यह मामला केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तक भी पहुंचा था. संगठन ने शिकायत की थी. इस मामले में भी मुख्यमंत्री नए हैं और अफसरशाही उन्हें गलत दिशा में ले जा रही है.”
स्थिति तब और बिगड़ी, जब मुख्यमंत्री को पार्टी के भीतर से भी आलोचना झेलनी पड़ी. बीकेएस के तीव्र विरोध और संघ के समर्थन के चलते भूमि पूलिंग योजना वापस लेनी पड़ी. बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “उन्होंने सड़कों पर उतरने की धमकी दी थी और पार्टी के भीतर भी कुछ विधायकों ने इस कदम की आलोचना की थी. मुख्यमंत्री के पास योजना वापस लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.”
इंदौर में पानी दूषित होने के मामले को “बेअसर” तरीके से संभाले जाने पर भी आरएसएस को “स्थिति संभालने” के लिए आगे आना पड़ा.
बीजेपी नेता ने कहा, “स्थिति हाथ से निकल गई थी और कई पार्टी नेताओं ने आरएसएस को बताया कि सरकार के खराब प्रबंधन के कारण सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंच रहा है, इसलिए आरएसएस को दखल देना पड़ा.”
नेता ने कहा कि इंदौर के प्रभारी होने के बावजूद मुख्यमंत्री के पास लोगों की शिकायतें सुनने और हल करने की कोई व्यवस्था नहीं थी. उन्होंने कहा, “नौकरशाहों को यह बताने की ज़रूरत है कि वे व्यवस्था को लागू करने के लिए हैं, न कि उसे अपने हाथ में लेने के लिए.”
इंदौर ज़िले के कलेक्टर का इस मुद्दे पर संघ कार्यालय में हुई बैठक में शामिल होना भी एक विवाद बन गया था.
संघ से जुड़े कई संगठन इस बात से भी नाखुश हैं कि किसानों और आदिवासियों से जुड़े नीतिगत फैसले पर्याप्त सलाह-मशविरा किए बिना लिए जा रहे हैं.
अगस्त में आरएसएस से जुड़े संगठन वनवासी कल्याण समिति ने सरकार को सुझाव दिया था कि वह खराब हो चुके जंगलों की बहाली की नीति की समीक्षा करे और स्थानीय आदिवासियों की आजीविका बढ़ाने पर ध्यान दे. 3.7 मिलियन हेक्टेयर खराब जंगलों की बहाली के लिए निजी निवेश की अनुमति देने वाली सरकार की मसौदा नीति पर बीकेएस ने विरोध जताया था.
बीजेपी के भीतर कई लोग यह मानते हैं कि सरकार को समय रहते अपनी कार्यशैली दुरुस्त करनी चाहिए, इससे पहले कि ये मुद्दे चर्चा का विषय बनें और विपक्ष इन्हें उठाए.
प्रदेश के एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा, “सरकार के भीतर भी कई मंत्रियों ने साझा किया है कि उनके पास कोई काम करवाने की ताकत नहीं है. सब कुछ मुख्यमंत्री और नौकरशाह चला रहे हैं. इंदौर की घटना इसका ताज़ा उदाहरण है. अगर हमने अपने तौर-तरीके नहीं सुधारे, तो हालात बेकाबू हो सकते हैं.”
एक अन्य बीजेपी नेता ने बताया कि मध्य प्रदेश सरकार ने भोपाल में बुज़ुर्ग नागरिकों के लिए सशुल्क आधार पर प्रीमियम सुविधाएं देने वाले एक लक्ज़री वृद्धाश्रम के प्रबंधन का ठेका आरएसएस से जुड़े संगठन सेवा भारती को दिया था, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया.
तीसरे बीजेपी नेता ने कहा कि सामाजिक कल्याण विभाग और सेवा भारती के बीच मतभेदों की वजह से लॉन्च में देरी हुई. सूत्रों के मुताबिक, संगठन ने इस मुद्दे को शीर्ष नेतृत्व के सामने रखा, जिसके बाद प्रक्रिया दोबारा शुरू की गई और नया टेंडर निकाला गया व दिया गया.
सेवा भारती के पदाधिकारी ने कहा, “हमने सभी नियम और प्रक्रियाओं का पालन किया था और तीन बार हमारा नाम क्लियर हुआ था. बाद में सरकार ने टेंडर प्रक्रिया रद्द करने का फैसला कर लिया. हमें नहीं पता ऐसा क्यों किया गया.” उन्होंने बताया कि वृद्धाश्रम अब चालू है.
पदाधिकारी ने आगे कहा, “हमने यह मुद्दा इसलिए उठाया क्योंकि हमने सभी नियम पूरे किए थे और कुछ स्टाफ भी तैनात कर दिया था. बाद में नया टेंडर निकाला गया और सभी नियम पूरे होने के कारण सेवा भारती को ही इसे चलाने का ठेका दिया गया.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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