पौड़ी/रामनगर/नई दिल्ली: 40 साल की लक्ष्मी देवी के लिए उत्तराखंड के जिवई गांव में उनके एक कमरे के घर का ड्रेसिंग कॉर्नर उनका सुरक्षित स्थान था. यह कोई खास सजा-धजा नहीं था, सिर्फ 12 इंच का शीशा और मेकअप व गहनों के लिए एक प्लास्टिक स्टैंड, लेकिन जब भी वह उसके सामने खड़ी होती थीं, खुद को सुंदर और आत्मविश्वास से भरा महसूस करती थीं. अब वह उससे जानबूझकर दूरी बना लेती हैं.
लक्ष्मी उन दर्जनों महिलाओं में से एक हैं, जो हाल के वर्षों में उत्तराखंड में जानवरों के हमलों का शिकार हुई हैं. राज्य वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले पांच सालों में भालू, बाघ और तेंदुओं के हमले खतरनाक तेज़ी से बढ़े हैं और परिवार व जंगल के बीच मुख्य कड़ी होने की वजह से महिलाएं इस संकट के केंद्र में हैं.
17 नवंबर को लक्ष्मी अपनी रोज़ की तरह अपनी देवरानी और सास के साथ गायों के लिए चारा लाने जंगल गई थीं.
घास काटते समय उन पर एक भालू ने हमला कर दिया. लक्ष्मी को आखिरी जो याद है, वह एक विशालकाय आकृति है जो उन पर टूट पड़ी. कुछ ही सेकंड में वह दर्द से तड़पने लगीं, उनके चेहरे और सिर से खून बहने लगा.
उनकी चीखें शांत गांव में गूंज उठीं और उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई.
लक्ष्मी ने कहा, “उस दिन के बाद से मुझे आज भी डरावने सपने आते हैं. मैं पसीने में भीगकर उठ जाती हूं. दिन में यादें भूलने के लिए मज़ाक करने की कोशिश करती हूं, लेकिन मुझे पता है कि मेरी ज़िंदगी अब कभी पहले जैसी नहीं होगी.” अब उनके माथे पर टांकों की एक लंबी लाइन है, जहां कभी उनकी बिंदी होती थी.
उनकी काजल लगी आंखें अब आंशिक रूप से खराब हो चुकी हैं.

उत्तराखंड वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में राज्य में करीब 71 भालू हमले हुए, जिनमें कम से कम छह लोगों की मौत हुई. बाघ के हमलों में 12 लोगों की जान गई और राज्य के अनुमान के अनुसार, इनमें से करीब 80 प्रतिशत पीड़ित महिलाएं हैं.
पर्यावरणविदों और वन अधिकारियों का कहना है कि इन हमलों के बढ़ने की मुख्य वजह जंगलों का सिकुड़ना, सर्दियों का ज्यादा गर्म होना और जानवरों के शीतनिद्रा व आवाजाही के पैटर्न में असामान्य बदलाव हैं. नतीजतन, जो महिलाएं रोज पानी, जलावन और अपने पशुओं के लिए चारा लाने जंगल जाती हैं, वही इन हमलों का शिकार बन रही हैं.
उत्तराखंड वन विभाग में प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) आर.के. मिश्रा ने कहा, “हम आम तौर पर जलवायु परिवर्तन के असर को तापमान और बारिश के आंकड़ों से मापने की कोशिश करते हैं, लेकिन जानवरों के ये हमले भी उसी के दुष्परिणाम हैं. स्थानीय लोग इसकी कीमत चुका रहे हैं और आने वाले वर्षों में हालात और भी खराब होने की संभावना है.”
ज़िंदगी बदल गई
पौड़ी के बनेघ गांव में शंकरी देवी अपना पूरा दिन घर के बाहर बिछी एक पतली चटाई पर फर्श पर बैठकर बिताती हैं. एक समय था जब वह घर के काम निपटाती थीं, अपनी बकरियों की देखभाल करती थीं और आसपास की सहेलियों से मिलती-जुलती थीं.
लेकिन अब उनके दिन खामोशी में गुज़रते हैं. वह दूर जंगल की ओर देखती रहती हैं, जहां उन्हें बुरी तरह नोच डाला गया था. 23 नवंबर को शंकरी जो रोज़ की तरह चारा लाने जंगल गई थीं, उन पर पीछे से एक भालू ने हमला कर दिया.

उन्हें बताया गया कि वह ज़िंदा बच गईं, यही बड़ी बात है, लेकिन अब उनके दाहिने पैर में गंभीर चोटें हैं — पिंडली, जांघ और निजी अंगों तक. वह किसी तरह घिसटते हुए जंगल की सीमा तक पहुंचीं. उनकी सलवार खून से भीगी हुई थी. मदद के लिए चीखती रहीं और फिर बेहोश हो गईं.
शंकरी ने धीमी आवाज़ में कहा, “मेरे करीब 80 टांके हैं. हर हरकत में दर्द होता है, लेकिन कम से कम मैं ज़िंदा हूं.”
लेकिन इस हमले का असर सिर्फ शारीरिक घावों तक सीमित नहीं है.
शंकरी की पड़ोसी शांति देवी ने कहा, “अब वह बहुत कम बोलती हैं. खड़े होने, बैठने, लेटने और यहां तक कि शौचालय जाने में भी उन्हें सहारे की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन उनकी खामोशी सबसे ज्यादा डराने वाली है.”
फिर भी शांति देवी ने अपनी दोस्त का साथ छोड़ने का फैसला नहीं किया है. हादसे के बाद से वह मोहल्ले की दूसरी महिलाओं के साथ हर दिन सुबह 11 बजे शंकरी के घर आती हैं, ताकि उनका मन बहला सकें. ज़्यादातर समय शंकरी चुप रहती हैं, लेकिन कभी-कभी मुस्कुरा देती हैं.
महिलाएं इसे अपनी जीत मानती हैं.
लेकिन पास के रामनगर के रिंगोरा में 51 साल की तुलसी देवी इतनी खुशकिस्मत नहीं थीं.
नवंबर 2024 में वह घर से करीब एक किलोमीटर दूर पानी भरने गई थीं, तभी एक बाघ ने उन पर हमला कर दिया. बाघ ने पहले उनकी गर्दन पर हमला किया और फिर उन्हें घसीटकर जंगल में ले गया, जहां अगले दिन उनका आधा खाया हुआ शव मिला.

तुलसी की 17 साल की पोती तनुजा कड़कौटी जब भी उस मनहूस शाम की कहानी सुनाती है, तो कांप उठती है. जब उसने अपनी मां को खोया था, तब वह सिर्फ तीन साल की थी और उसकी परवरिश उसकी दादी ने की थी. तुलसी उनके भाई-बहनों और चचेरे-बहनों के लिए परिवार की मुखिया और सहारा थीं.

अब तनुजा खुद को अनाथ जैसा महसूस करती हैं.
तनुजा ने कहा, “दादी ने हम सबको मां की तरह पाला. किसी ने नहीं सोचा था कि वे उस दिन जंगल जाएंगी और फिर कभी लौटकर नहीं आएंगी.” यह कहते हुए उसने अपनी दादी की एक फ्रेम की हुई तस्वीर कसकर पकड़ रखी थी.
बढ़ते हमले
दिसंबर में पौड़ी गढ़वाल जिले की ऊंची पहाड़ियों में बसे बिरोंखाल जाने वाली सड़कें आमतौर पर सुबह की ओस से गीली होती हैं. हवा में कोहरा छाया रहता है और ठंड से बचने के लिए लोग ऊनी कपड़ों की कई परतों में लिपटे रहते हैं.
लेकिन ये खूबसूरत नज़ारे, जो उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान थे, अब बीते दिनों की बात हो गए हैं. सड़कें तेज़ धूप से चमक रही हैं, तापमान सामान्य से ज्यादा है और लोग गर्मी से परेशान होकर गर्मियों जैसे कपड़ों में बाहर निकल रहे हैं.
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में भालू हमलों के प्रमुख इलाकों में शामिल बिरोंखाल में दिसंबर के पहले पखवाड़े में अधिकतम तापमान 22 डिग्री सेल्सियस से 18 डिग्री सेल्सियस के बीच रहा, जो मौसम के सामान्य तापमान से कम से कम 3–4 डिग्री ज्यादा है.
मामला सिर्फ तापमान का नहीं है. राज्य में बारिश के पैटर्न में भी गड़बड़ी देखी जा रही है.
उत्तराखंड मौसम विज्ञान केंद्र (यूएमसी) के मुताबिक, नवंबर 2024 में राज्य में सिर्फ 0.1 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो महीने के औसत से करीब 98 प्रतिशत कम है.
यूएमसी के निदेशक सी.एस. तोमर ने कहा, “इस सर्दी अब तक न बारिश हुई और न बर्फबारी, इसी वजह से तापमान अचानक बहुत बढ़ गया.”
मौसम वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का कहना है कि इस तरह के लगातार चरम मौसम के आंकड़ों के दूरगामी असर होते हैं.

उदाहरण के लिए भारतीय हिमालयी भालू, जो उत्तराखंड के जंगलों में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं, आमतौर पर अक्टूबर के आसपास सर्दियों की नींद (हाइबरनेशन) में चले जाते हैं, जब तापमान गिरने लगता है, लेकिन अब बढ़ते तापमान के कारण इन जानवरों का हाइबरनेशन का समय काफी कम हो गया है.
नतीजतन, वे ज्यादा आक्रामक हो रहे हैं, जंगलों में घूमते रहते हैं और भोजन की तलाश में अक्सर इंसानी बस्तियों में घुस आते हैं.
पूर्व भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी मोहन परगैंन ने कहा कि भालुओं के लिए कचरे की आसान उपलब्धता, बिना देखरेख वाले फलों के बाग और मक्का व बाजरा जैसी फसलें आसान लालच बन जाती हैं. इससे हमले और ज्यादा खौफनाक हो जाते हैं.
परगैंन ने कहा, “इन इलाकों में ज्यादातर पुरुष काम के लिए बाहर चले जाते हैं. ऐसे में घर संभालने वाली महिलाएं पास के जंगलों से घास या लकड़ी लाते समय इन हमलों का शिकार बन जाती हैं.”
एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने ऐसे हमलों को रोकने के लिए मजबूत और ग्राउंड पर लागू होने वाली रणनीतियों की ज़रूरत पर जोर दिया.
उन्होंने लिखा, “पहाड़ी राज्यों, खासकर उत्तराखंड की महिलाएं, जिन्होंने जंगल और वन्यजीव संरक्षण में अहम भूमिका निभाई है, अब इंसान-वन्यजीव संघर्ष के बढ़ते संकट का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगत रही हैं, खास तौर पर बढ़ते भालू हमलों की वजह से.”
उन्होंने यह भी कहा कि पिछले दो सालों में राज्य में ऐसे हमलों में करीब 140 लोग घायल हुए हैं.
बाघ के हमलों के मामले में हालात और भी जटिल हो जाते हैं. भालू के हमलों के उलट, बाघ के हमले में पीड़ित के बचने की संभावना बहुत कम होती है.
रामनगर वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि कॉर्बेट नेशनल पार्क में बाघों की बढ़ती संख्या इन हमलों की एक बड़ी वजह है.

2022 की आखिरी बाघ गणना के मुताबिक, नैनीताल, अल्मोड़ा और पौड़ी जिलों में फैले इस पार्क में 266 बाघ हैं. यह संख्या 2017 में 215 थी. पार्क की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, भारत के 50 टाइगर रिजर्व में यहां बाघों का घनत्व सबसे ज्यादा है — प्रति 100 वर्ग किलोमीटर में 14 बाघ.
लेकिन जैसे-जैसे बाघों की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे हमले भी बढ़ रहे हैं.
रामनगर वन विभाग के एक अधिकारी ने कहा, “जब बाघों की संख्या बढ़ती है, तो इलाके को लेकर टकराव और शिकार की कमी की समस्या पैदा होती है. गांव के लोग रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए जंगल जाते हैं, लेकिन बाघ उन्हें शिकार समझकर हमला कर देते हैं.”
वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल सिर्फ रामनगर डिवीजन में बाघ के हमलों में तीन लोगों की मौत हुई. ये मामले रिंगोरा, क्यारी और ओखलढुंगा से सामने आए — ये सभी घनी आबादी वाले गांव हैं. 2023 और 2022 में बाघ के हमलों में पांच-पांच लोगों की जान गई थी, जबकि 2021 में चार लोगों की मौत हुई थी.
जंगल पर निर्भरता
पिछले साल जब तुलसी देवी का शव जंगल से मिला, तो गुस्साए परिवार वालों और गांव के लोगों ने गांव की ओर जाने वाली सड़कों को जाम कर दिया. उन्होंने मांग की कि वन विभाग और राज्य सरकार गांवों में पानी और बिजली जैसी सुविधाएं दें, ताकि स्थानीय महिलाओं को जंगल पर निर्भर न रहना पड़े.
प्रदर्शन कर रहे लोगों को शांत करने के लिए वन विभाग ने गांव के पास ही एक पानी की टंकी लगवाई, ताकि महिलाओं को पानी लाने के लिए अब गहरे जंगल में न जाना पड़े.
जून 2025 से वन विभाग गांव वालों के साथ हर तीन महीने में बैठकें भी कर रहा है, ताकि बाघों के हॉटस्पॉट के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके और उन्हें जंगल से दूर रखने के तरीकों पर चर्चा हो सके.

हाल के हमलों से लोगों में डर ज़रूर बैठ गया है, लेकिन उनके पास जंगल जाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं. खाना पकाने के लिए लकड़ी और सर्दियों में घर गर्म रखने के लिए आग इन्हीं पर निर्भर है. मवेशियों को चराने के लिए भी उन्हें जंगल ले जाना पड़ता है.
ग्रामीणों की चिंता सामने आने के बाद वन विभाग ने बीच का रास्ता अपनाने पर सहमति जताई. जनवरी 2025 में पूरी तरह जंगल में प्रवेश पर रोक लगाने के सुझाव के बजाय, जून में विभाग ने फैसला किया कि लोग सीमित गेटों से, वह भी सिर्फ बड़े समूहों में, जंगल में जा सकेंगे.
38 साल की तुलसी देवी की पड़ोसी उर्मिला रावत ने कहा, “यह कोई समाधान नहीं है. आप बड़े-बड़े रिसॉर्ट बनने देते हैं और उनके सैलानियों को बिना रोक-टोक जंगल में रहने देते हैं, लेकिन गरीबों पर पाबंदी लगाते हैं.”

दूसरे गांव वाले भी इससे सहमत हैं.
कई लोगों का मानना है कि इलाके में बढ़ते पर्यटन की वजह से बाघ पर्यटक इलाकों से दूर होकर रिहायशी कॉलोनियों के पास आ रहे हैं.
वन विभाग द्वारा रखे गए कॉर्बेट नेशनल पार्क के अनुमान के मुताबिक, हर साल पार्क में 3 से 3.50 लाख पर्यटक आते हैं.
क्यारी के रिटायर्ड स्कूल टीचर एस.के. नेगी ने कहा, “यह एक शांत कस्बा था, जब तक पर्यटकों की भीड़ नहीं आई. वन विभाग, रिसॉर्ट मालिकों और जिप्सी ऑपरेटरों ने इसे एक कारोबार बना दिया है.”
उन्होंने कहा, “वे कहते रह सकते हैं कि जानवरों की संख्या बढ़ गई है, या वे ज्यादा आक्रामक हो गए हैं, या गांव वाले जंगल में जा रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि उनकी लालच ने यह हालात पैदा किए हैं.”
नई शुरुआत
दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में लक्ष्मी देवी अपनी पहचान वापस पाने की लड़ाई लड़ रही हैं. 18 नवंबर को उनकी यहां तीसरी सर्जरी हुई. इससे पहले उनके चेहरे के पुनर्निर्माण और आंखों की रोशनी वापस लाने की सर्जरी भी हो चुकी है.
ताज़ा सर्जरी उनके चेहरे को जितना हो सके, पहले जैसा बनाने की कोशिश है.
जब उन पर हमला हुआ था, तब उनके गांव के पास के डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी. उन्होंने कहा था कि लक्ष्मी की रोशनी पूरी तरह चली गई है और चेहरे, सिर व शरीर पर जख्म इतने गहरे हैं कि वह ज़िंदगी भर किसी पर निर्भर रहेंगी.

आज भी वह हमले वाले दिन के डरावने सपनों से घबराकर पसीने में भीगी उठ जाती हैं. भालू की लाल आंखें, जो भूख से उन्हें घूर रही थीं और उसके नुकीले पंजे, जो उनके चेहरे को चीर रहे थे — ये सब यादें फिर सामने आ जाती हैं.
लेकिन वह हार मानने को तैयार नहीं हैं. परिवार के साथ होने से वह आगे का सफर तय करने के लिए तैयार हैं, चाहे इलाज और दवाइयों का खर्च कितना ही ज्यादा क्यों न हो.
उनके पति, दो बच्चे और देवर ने दक्षिण दिल्ली के किशनगढ़ में एक घर किराए पर लिया है, जहां वे इलाज पूरा होने तक रह रहे हैं.
लक्ष्मी के देवर जयपाल सिंह नेगी ने कहा, “हम अपनी पूरी क्षमता से उनकी ज़िंदगी दोबारा पटरी पर लाने में मदद करेंगे.”
लक्ष्मी मानती हैं कि उन्हें अभी लंबा रास्ता तय करना है. आईने में देखने की हिम्मत जुटाने में भले ही वक्त लगे, लेकिन उन्होंने बिंदी लगानी शुरू कर दी है — भले ही वह उनकी जख्मी और टांकों से भरी हुई पेशानी पर ही क्यों न हो.
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