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Tuesday, 13 January, 2026
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ईरान के विद्रोह ने क्यों बेनकाब की लिबरल राजनीति की उलझन

ईरान में हो रहे विद्रोह इतने बड़े हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, लेकिन यह सवाल ज़रूर उठता है: इसमें इतना समय क्यों लगा?

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इज़राइल के कई समर्थक, खासकर भारत में मुख्य रूप से मुस्लिम-विरोधी पूर्वाग्रह से प्रेरित हैं. उन्हें मध्य पूर्व के संघर्ष के बारे में लगभग कुछ भी नहीं पता और अगर पता भी हो, तो शायद उससे कोई खास फर्क न पड़े. इस्लाम को लेकर उनकी कट्टरता ऐसी है कि जो भी मुसलमानों से लड़ता है, वही उनका पसंदीदा बन जाता है.

यही वजह बताती है कि क्यों भारत में फिलिस्तीन के समर्थन के वर्षों बाद, पिछले एक दशक में लोग ज़्यादा इज़राइल समर्थक हो गए हैं. यह संयोग नहीं हो सकता कि इज़राइल के समर्थन में बढ़ोतरी, हिंदुत्व जैसी राजनीति के समर्थन के बढ़ने के साथ-साथ हुई है.

लेकिन पिछले एक साल में मैंने खुद से यह सवाल पूछना शुरू किया है कि क्या ऐसा ही बदलाव वैश्विक स्तर पर उदारवादियों (और भारत के संदर्भ में, धर्मनिरपेक्ष उदारवादियों) में भी हुआ है? क्या हम अब ऐसी स्थिति में हैं कि मध्य पूर्व में मुसलमानों को हमेशा पीड़ित के रूप में देखते-देखते, हम ऐसी हिंसक घटनाओं की निंदा करने से भी बच रहे हैं, जो बिल्कुल अस्वीकार्य हैं?

हमास के लिए उदारवादियों का प्रेम

मुझे ग़ाज़ा में आम नागरिकों के साथ इज़राइल ने जो किया है, उसका बचाव करना असंभव लगता है; तबाही, बमबारी, मौतें, ज़बरन भूखमरी—सब भयावह हैं.

लेकिन क्या कोई दो साल पहले 7 अक्टूबर को हमास ने जो किया, उसका बचाव कर सकता है? उस आतंकी हमले को समझने के लिए कल्पना कीजिए कि ऐसा ही कुछ पहलगाम में हुआ होता. मान लीजिए आतंकियों ने महिलाओं के साथ बलात्कार किया होता, वीडियो बनाकर सार्वजनिक किए होते. मान लीजिए उन्होंने महिलाओं, बच्चों और नवजातों को बंधक बनाकर सीमा पार ले जाकर अंधेरी सुरंगों में रखा होता, ताकि जेल से आतंकियों को छुड़वाने के लिए सौदेबाज़ी कर सकें. मान लीजिए 800 से ज़्यादा आम नागरिक मारे गए होते, जिनमें से कई म्यूज़िक फेस्टिवल देख रहे होते.

तब हमें कैसा लगता?

मुझे भारत पर इतना भरोसा है कि हम इज़राइल की तरह जवाबी कार्रवाई नहीं करते, लेकिन मुझे लगता है कि हम दुनिया से यह उम्मीद ज़रूर करते कि वह इसे मानवता के खिलाफ अपराध माने.

और फिर भी, कई उदारवादी सिर्फ औपचारिक शब्दों से आगे बढ़कर निंदा करने को तैयार नहीं हैं. हमास आज भी उस नरसंहार पर गर्व करता है, लेकिन अजीब बात यह है कि कुछ उदारवादी उसकी निंदा करने से इनकार करते हैं और हत्यारी आतंकवाद और सामूहिक बलात्कार को आज़ादी की लड़ाई का जायज़ हिस्सा मान लेते हैं. इज़राइल की प्रतिक्रिया जितनी भी भयानक और अंधाधुंध हिंसक रही हो, अगर हमास 7 अक्टूबर को पकड़े गए बंधकों को छोड़ने की पेशकश कर देता, तो शायद बमबारी रुक जाती. मैंने इज़राइल के खिलाफ बमबारी रोकने की मांग करते हुए अनगिनत प्रदर्शन देखे, लेकिन बहुत कम ऐसे देखे, जो हमास से निर्दोष बंधकों को रिहा करने की मांग कर रहे हों.

हमास के लिए यह तर्क अब भी चलता आ रहा है. अभी एक हफ्ता पहले ही न्यूयॉर्क सिटी में हमास समर्थक प्रदर्शन हुए. आखिरकार नए मेयर, ज़ोहरान ममदानी—जो किसी भी तरह से कट्टर ज़ायनिस्ट नहीं हैं, उनको सामने आकर इन प्रदर्शनों का विरोध करना पड़ा और हमास को आतंकवादी संगठन बताना पड़ा.

रुख बदल रहा है

पिछले महीने ईरान में घटनाओं को देखकर मुझे एक बार फिर उदारवादी पक्षपात की याद आई. मुसलमान-विरोधी हुए बिना भी यह समझा जा सकता है कि ईरान की सरकार एक अंधे मध्ययुगीन दौर की वापसी है, जहां आदिम धार्मिक कट्टरपंथी समाज चलाते हैं और महिलाओं को इंसान से कम समझा जाता है. इस सरकार के खिलाफ कोई भी विरोध, निश्चित रूप से 21वीं सदी की ओर बढ़ने की पुकार के रूप में स्वागत योग्य है.

लेकिन जैसे-जैसे पिछले दिसंबर में विरोध तेज़ हुआ, मुख्यधारा के मीडिया—खासतौर पर पश्चिम में, ने इसे कमतर दिखाया. जो थोड़ी-बहुत जानकारी मिली, वह सोशल मीडिया से मिली. अब वह भी मुश्किल हो गई है क्योंकि सरकार ने इंटरनेट पर पाबंदियां लगा दी हैं. जब तक वैश्विक मीडिया ने ध्यान दिया, तब तक विरोध छोटे शहरों तक फैल चुका था और सरकार ने बेहद क्रूर कार्रवाई शुरू कर दी थी.

संकेत मिल रहे थे कि जो हो रहा था, वह अभूतपूर्व था. ईरान के सर्वोच्च कट्टरपंथी, सत्ता में बैठे अयातुल्ला के खिलाफ विरोध और अवज्ञा के इशारों वाली तस्वीरों ने इंटरनेट लगभग तोड़ दिया.

फिर भी मीडिया की प्रतिक्रिया ठंडी रही. लेखिका जे.के. रोलिंग ने ट्वीट किया, “अगर आप मानवाधिकारों के समर्थन का दावा करते हैं, लेकिन ईरान में अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे लोगों के साथ एकजुटता नहीं दिखा सकते, तो आपने खुद को उजागर कर दिया है. जब तक दमन और क्रूरता आपके दुश्मनों के दुश्मनों द्वारा की जा रही है, तब तक आपको परवाह नहीं.”

अब हालात बदलते दिख रहे हैं.

ईरान में विद्रोह इतने बड़े हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. लेकिन सवाल यह है: इसमें इतना समय क्यों लगा?

मुझे लगता है कि हम उदारवादी दुनिया को अच्छे और बुरे में, पीड़ित और हमलावर में बांटने के जाल में फंस गए हैं. अगर इतिहास हमें कुछ सिखाता है, तो वह यह कि अच्छे लोग और बुरे लोग नहीं होते; अच्छे सिद्धांत और बुरे सिद्धांत होते हैं.

दुर्भाग्य से, हम यह भूल गए हैं. और यही आज की हमारी नैतिक उलझन की वजह है.

(वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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