नई दिल्ली: नीली–सुनहरी चमकती लाइट्स के बीच, हवा में लहराती—कलाई जिन पर कंसर्ट बैंड और हथेलियों में चमकते मोबाइल फोन, काले जैकेट, लॉन्ग बूट्स और फटी हुई जींस पहने लड़के-लड़कियां इधर-उधर घूम रहे थे. इसी बीच 20 साल के पार्थ गोएला ढोल और सिंथ की धुन पर पूरे जोश में नाच रहे थे, लेकिन वह ‘लाल परी’ या ‘बिजुरिया’ जैसे गाने नहीं गा रहे थे, बल्कि वह गुनगा रहा थे—“राधा मेरी चंदा चकोर है बिहारी.”
21 दिसंबर की ठंडी रात में इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स पूरे तीन घंटे के लिए एक अलग ही तरह के रेव में बदल गया—बिना बॉलीवुड, बिना ईडीएम. सिंगर गणेश, शिव, राम और कृष्ण के नाम के हाई-एनर्जी भजन गा रहे थे. यह इवेंट था—“दिल्ली का सबसे बड़ा भजन क्लबिंग इवेंट.” मतलब, सत्संग 2.0, जहां नाइटक्लब वाली एनर्जी थी और साथ में मम्मी-पापा की पूरी रज़ामंदी भी.
पार्थ गोएला मुस्कुराते हुए अपनी मां के साथ सेल्फी ले रहे थे. उन्होंने कहा, “भजन क्लबिंग का मतलब है ‘डीजे प्लीज़’ से निकलकर ‘जय श्रीराम’ और ‘हरे कृष्णा’ कहना.”
यह इवेंट सनातन जर्नी ने ऑर्गनाइज़ किया था—एक ऐसा प्लेटफॉर्म, जो नई पीढ़ी के लिए सनातन धर्म को नए अंदाज़ में पेश करता है.
भजन क्लबिंग, भजन जैमिंग और भजन कॉन्सर्ट्स अब शहरी ज़ेन-ज़ी के लिए नया वीकेंड प्लान बनते जा रहे हैं. वे युवा हैं, धार्मिक हैं और मस्ती भी करना चाहते हैं—बस अपने मम्मी-पापा वाले तरीके से नहीं. उनके लिए कुंभ अब यूथ हॉटस्पॉट है, मथुरा-वृंदावन की रील्स एक अलग ही इंस्टाग्राम जॉनर हैं और ज्योतिष सेल्फ-हेल्प का काम भी करता है. धार्मिक और आध्यात्मिक बाज़ार 2024 में 65 अरब डॉलर (करीब 5.6 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच चुका है और 2033 तक इसमें 7.6 फीसदी की रफ्तार से बढ़त का अनुमान है और अब भजन क्लबिंग भी अपनी पूरी ताल पकड़ चुका है.

इस ट्रेंड के आसपास अब पूरा का पूरा सर्किट तैयार हो रहा है. सनातन जर्नी से लेकर जैम बैंड डुओ बैकस्टेज सिब्लिंग्स तक, जो जनवरी में मल्टी-सिटी टूर लॉन्च करने जा रहे हैं. सुमिरन सत्संग, कृष्ण संसार जैसे ग्रुप्स और इंडियाज़ गॉट टैलेंट के रनर-अप सुरेश प्रजापत जैसे इंडिविजुअल परफॉर्मर भी अब भजन सेशंस ऑर्गनाइज़ कर रहे हैं.
ये भक्ति-डांस वाले इवेंट्स अब सिर्फ मुंबई, दिल्ली और कोलकाता की वीकेंड नाइट्स तक सीमित नहीं रहे. वे चंडीगढ़, सूरत, वृंदावन, जयपुर और इंदौर तक पहुंच चुके हैं. एक वायरल वीडियो के कैप्शन में लिखा कैप्शन “कैसी होगी क्लबिंग या पार्टी? जब सुकून ऐसा सुनाई दे.”
वीडियो में युवा ताली बजाते, भजन गाते और मोबाइल की लाइट्स लहराते दिखते हैं.
इस ट्रेंड को पहली बड़ी रफ्तार तब मिली, जब बैकस्टेज सिब्लिंग्स की प्राची और राघव अग्रवाल का एक वीडियो वायरल हुआ. वीडियो में वे युवा खुशी-खुशी झूमते, ताली बजाते और साथ में भजन गाते नज़र आए और अब छोटे-छोटे गैदरिंग्स, बड़ेटिकट वाले इवेंट्स में बदल रहे हैं—जैसे इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का वो कॉन्सर्ट, जहां हज़ारों की भीड़ उमड़ पड़ी. हर टिकट 899 रुपये का था.
सनातन जर्नी के फाउंडर 25 साल के निकुंज गुप्ता ने कहा, “भजन क्लबिंग परंपरा को नकारना नहीं है, बल्कि उसका अपग्रेड वर्ज़न है. यह ज़ेन ज़ी स्टाइल में स्पिरिचुएलिटी से जुड़ने का एक नया और आसान तरीका है.”
सनातन जर्नी वेरिफाइड वैदिक पंडित, ऑनलाइन पूजा और कल्चरल एक्सपीरियंस भी ऑफर करता है.

‘सूफी नाइट्स को टक्कर’
जैसे ही 21 साल की आन्या गुप्ता अपनी दो दोस्तों के साथ—और तीनों की मां साथ में—स्टेडियम में पहुंचे, वे सीधा फेस-पेंटिंग स्टॉल की तरफ बढ़ गईं. पहले तिलक, फिर ग्लिटर. माथे पर टीका और गाल पर चमक—अब रात शुरू हो सकती थी.
शाम 5 बजे से रात 8 बजे तक, दो परफॉर्मर और एक बैंड करीब 5,000 लोगों की भीड़ को “राम राम जय सीता राम” और “शंकर शंकर” की लहरों पर बहाते रहे. कुछ भजन ऐसे थे, जिन पर वे आंखें बंद कर हल्के-हल्के झूमने लगे. तो कुछ गानों में वे उछलते, तालियां बजाते और पूरे जोश से साथ गाते दिखे.

लेकिन ये इवेंट सिर्फ भजन, भक्ति और डांस तक सीमित नहीं था. यहां खाने के स्टॉल थे, कृष्ण और शिव के सॉफ्ट टॉयज़ थे, स्टोल्स थे, प्रसाद था और वृंदावन-मथुरा से आए गिफ्ट हैम्पर्स भी थे.
आन्या को हमेशा मंदिर में बैठे-बैठे पंडित जी का लंबा पाठ सुनना थोड़ा मुश्किल लगता था, लेकिन वे मानती हैं कि जब एक जोशीली भीड़ “राम राम” या “जय श्री कृष्ण” के नारे लगाती है, तो वह उनके अंदर कुछ खुश-सा जगा देता है.

वे खाने के काउंटरों के बीच घूम रही थीं, जहां गोलगप्पे, आलू टिक्की, छोले भटूरे और पाव भाजी जैसे वेजिटेरियन ट्रीट्स सजे थे. उन्होंने कहा, “कोई प्रेशर नहीं होता. बस सबके साथ मंत्र जपो, नाचो और एंजॉय करो…अपने आप खुशी महसूस होती है.”
यह सब सनातन जर्नी के एक बड़े मिशन का हिस्सा है.
निकुंज गुप्ता, जिन्होंने आर्ट्स यूनिवर्सिटी बॉर्नमाउथ से एक्टिंग की पढ़ाई की है, बताते हैं, “हम सनातन धर्म, उसकी कहानियों, परंपराओं और मूल्यों को मॉडर्न नज़रिए से आसान बना रहे हैं, ताकि नई और आने वाली पीढ़ियां इससे दूर न भागें, बल्कि इसे समझें और एंजॉय करें.”
उनके लिए भजन नाइट्स सीधे-सीधे सूफी नाइट्स का जवाब हैं.

निकुंज गुप्ता ने सवाल किया, “अगर सूफी नाइट्स किसी खास धर्म या संस्कृति से जुड़ी हो सकती हैं, तो सनातन धर्म और उसके मानने वालों के लिए भजन नाइट्स क्यों नहीं?”
उन्होंने आगे कहा, “भजन क्लबिंग, सूफी नाइट्स के लिए एक मुकाबला बनेगा.”
सफेद शेरवानी पहने वे बैंड की तरफ मुड़े, हाथ उठाए और उनके साथ दोहराने लगे—“शिव कैलाशों के वासी, धौलीधारों के राजा, शंकर संकट हरना.”
तेज़ म्यूज़िक, बैंड और भजनों का यह फ्यूज़न शुरू हुआ था दोस्तों और ज़ेन-ज़ी ग्रुप्स की छोटी-सी म्यूज़िकल बैठकों से. बांसुरी और ढोलक जैसे बेसिक इंस्ट्रूमेंट्स के साथ भजन गाना तो कीर्तन और जागरण का हिस्सा हमेशा से रहा है. फर्क बस इतना है कि अब बीट्स जुड़ गई हैं, इंस्ट्रूमेंट्स बढ़ गए हैं और इन रातों में एक मॉडर्न म्यूज़िकल एनर्जी आ गई है.
पार्थ गोएला फूलों की बारिश के बीच मुस्कुराते हुए बोले—“ये तो पूरा फेस्टिवल जैसा है. भगवान भी खुश और हम भी खुश.”
बाकियों की तरह उनकी मां ने भी उसे इस इवेंट में आने के लिए मनाया था.

‘परफॉर्मेटिव’ भक्ति
करीब 20 दिन पहले 62 साल की रसना नंदा की नज़र इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट पर पड़ी, जिसमें लिखा था—“दिल्ली का सबसे बड़ा भजन क्लबिंग इवेंट.” उन्होंने बिना देर किए अपने और अपनी दो दोस्तों के लिए टिकट बुक कर लिए.
भजन ‘श्यामा आन बसो वृंदावन में, मेरी उमर बीत गई गोकुल में’ पर पूरा 360-डिग्री घूमने के बाद रसना नंदा बोलीं—“भजन क्लबिंग ऐसी स्पिरिचुएलिटी है, जिसमें कोई झिझक नहीं. यहां भगवान से जुड़ने का सबसे खुशहाल तरीका मिलता है.”
साड़ी पहने, माथे पर तिलक लगाए और हाथ में स्टॉल से खरीदी गई गंगाजल की बोतल थामे रसना नंदा अपनी दोस्तों के साथ थोड़ी देर के लिए बैठ गईं. वे धीमी रफ्तार वाले भजन पर साथ-साथ गुनगुनाने लगीं—“श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में.”

रसना नंदा का कहना है कि यह एक्सपीरियंस उन जागरणों से कहीं बेहतर था, जहां पूरी रात कड़े नियमों के साथ बैठना पड़ता है. उनके लिए यह क्लब्स से भी बेहतर है, जहां शराब और स्मोकिंग उन्हें असहज कर देती है. उनकी नज़र में, यह संस्कारी भी है और मॉडर्न भी—पीढ़ियों को जोड़ने वाला एक खूबसूरत ब्रिज.
उन्होंने कहा, “नई पीढ़ी को किसी जागरण या कीर्तन में शामिल होने के लिए मनाना लगभग नामुमकिन है, लेकिन यह कॉन्सेप्ट दोनों पीढ़ियों को साथ नाचने और भक्ति को महसूस करने का मौका देता है.”
भक्ति और पार्टी का यह मेल हर किसी को सहज नहीं लगता.
सामाजिक टिप्पणीकार और ब्रांड कंसल्टेंट संतोष देसाई मानते हैं कि यह एक तरह की परफॉर्मेंस बनती जा रही है.
उन्होंने कहा, “धर्म अब परफॉर्मेटिव होता जा रहा है और यह उसका एक उदाहरण है. क्लबिंग और भजन दो बिल्कुल उलट कॉन्सेप्ट हैं, जो शायद लंबे वक्त तक साथ न टिक पाएं.”

वह इसकी तुलना कुंभ मेले से करते हैं, जहां कई लोग भक्ति से ज़्यादा मेले के मज़े के लिए पहुंचते हैं. संतोष देसाई के मुताबिक, यहां आध्यात्मिकता से ज़्यादा ग्रुप आइडेंटिटी दिखाने की बात है.
उन्होंने आगे कहा, “नई पीढ़ी में यह ट्रेंड है कि वे दुनिया को दिखाएं कि वे किस धर्म से जुड़े हैं या उससे कितनी गहराई से कनेक्टेड हैं.”
इसी बीच जेनरेशन अल्फा भी डांस फ्लोर पर उतर चुकी है.
छह साल की नैना शर्मा ‘बरसाने की छोरी राधा गोरी गोरी’ के बोलों पर हाथों से मुद्राएं बनाती हैं. उनके माता-पिता, जय किशन और नंदिनी शर्मा, उसे प्यार से मुस्कुराकर देख रहे हैं.
34-साल के जय किशन शर्मा ने कहा, “अपने बच्चों को हमारे धर्म और सनातन धर्म से जोड़ने का इससे बेहतर तरीका हो ही नहीं सकता.”
उन्होंने कहा, “यहां धर्म बच्चों के लिए बोझ नहीं रह जाता, बल्कि खुशियों से भरा और आज़ाद हो जाता है.”
(इस फीचर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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