कोटपूतली: राजस्थान के जोधपुरा गांव में पत्थर क्रशर कभी नहीं रुकते. उनकी धातु जैसी तेज़ आवाज़ हवा में गूंजती रहती है और घरों, पेड़ों, यहां तक कि लोगों के बालों पर भी सफेद बारीक धूल जम जाती है. उसी धूल से लदे एक बरगद के पेड़ के नीचे गांव वाले विरोध के लिए जमा होते हैं. उनकी लड़ाई याचिकाओं पर साइन करने, इंस्टाग्राम रील डालने या गुरुग्राम के कैफे में बैठकर नागरिक आंदोलन खड़ा करने जैसी नहीं थी. उनका विरोध उनके घरों को लेकर था. और वे यहां कैलाश मीणा की बात सुनने आए थे, जिन्हें वे अरावली का रखवाला कहते हैं.
वे उनसे कहते हैं, “यह हमारा गांव है. हमारी ज़मीन. हमारी अरावली…हम आखिरी दम तक लड़ेंगे.”
इस दौरान हवा में मुट्ठियां उठती हैं. आवाज़ें गूंजती हैं.
तीन दशक से ज़्यादा समय से, 60 साल के मीणा – जो शांत स्वभाव के हैं और एक पुरानी काली महिंद्रा बोलेरो चलाते हैं – अरावली में अवैध खनन के खिलाफ लड़ रहे हैं. 650 किलोमीटर लंबी यह पहाड़ी श्रृंखला गुजरात से राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली तक फैली है. जब दो साल पहले कोटपूतली के जोधपुरा में पत्थर क्रशर आए, तो गांव वालों को ठीक-ठीक पता था कि किसे फोन करना है.
स्थानीय निवासी नीरज ने कहा, “दिल्ली का एक्यूआई 500 के पार चला गया है. लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और मीडिया उनकी कवरेज करता है.”
उन्होंने अपने घर की ज़मीन पर उंगली फेरते हुए चूने जैसी जमी परत दिखाई, “हमारे बारे में सोचिए—हमारे गांवों में एक्यूआई 1000 से भी ऊपर चला गया होगा और कोई सुनने वाला तक नहीं है.”
अब, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 100 मीटर का मानक अपनाने के दो हफ्ते बाद, आज एक विशेष अवकाश पीठ अरावली की परिभाषा से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई करेगी, लेकिन मीणा कहते हैं कि उनकी लड़ाई सिर्फ अरावली की परिभाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी तरह से अवैध खनन खत्म करने की है.
उन्होंने कहा, “मैं चाहता हूं कि सुप्रीम कोर्ट अरावली की अपनी परिभाषा वापस ले और पहाड़ियों की रक्षा के लिए अवैध खनन पर पूरी तरह से रोक लगाए. अरावली पहले ही बहुत नुकसान झेल चुकी है.”

अकस्मात एक्टिविस्ट
मीणा नए जमाने के टेक-सेवी पर्यावरण एक्टिविस्ट जैसे नहीं हैं – न व्हाट्सएप ग्रुप, न क्राउडफंडिंग कैंपेन. उनका एक्टिविज़्म डीज़ल, धैर्य और लगातार कोशिशों पर चलता है: गांव की बैठकों में जाना, कलेक्टरों को हाथ से लिखे पत्र भेजना, जिला कार्यालयों का दौरा करना और राजस्थान के गांवों की गड्ढेदार, धूल भरी गलियों में अपनी मजबूत SUV चलाते हुए बार-बार कोर्ट जाना.
मीणा के लिए एक्टिविस्ट बनना कभी योजना का हिस्सा नहीं था. वे एक साधारण आदमी थे, अपने खेतों में बकरियां चराते थे. उन्होंने कहा, “मैंने अपने घर को बचाने की लड़ाई शुरू की. अचानक, मैं एक्टिविस्ट बन गया.”
उनकी पत्नी कौशल्या, उनकी सबसे बड़ी समर्थक और मुख्य वित्तपोषक थीं, घर के खर्च में से बचत करके उनके एक्टिविज़्म का खर्च उठाती थीं.
अरावली की पहाड़ियों के पास के गांव वालों के लिए, वे सिर्फ एक्टिविस्ट नहीं हैं. मीणा धैर्यपूर्वक गांव वालों को जिला कलेक्टर, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और मंत्रियों को पत्र लिखने की जानकारी देते हैं, उनके मुद्दों को विस्तार से बताते हैं. वे उनके हीरो, मार्गदर्शक और मेंटर हैं.
उनकी लड़ाई फिर से ज़रूरी हो गई है. हाल के हफ्तों में, हरियाणा और राजस्थान में विरोध प्रदर्शन हुए, जब सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति की सिफारिश को स्वीकार किया, जिसमें अरावली की सख्त भूवैज्ञानिक परिभाषा लागू की गई, सिर्फ 100 मीटर से ऊंची और 500 मीटर के भीतर वाली पहाड़ियों को रेंज का हिस्सा माना गया.
हालांकि, पर्यावरण मंत्रालय ने जल्दी ही नए खनन पट्टों पर प्रतिबंध दोहराया, मीणा फिर भी संदेह में हैं.
उन्होंने कहा, “मैंने 30 साल में कई नोटिस और आदेश देखे हैं. ये आदेश एक हफ्ते के लिए लागू होते हैं, फिर हम फिर से शुरू से. गांव वाले परेशान होते हैं.” उन्होंने आगे कहा, “मैंने अब कुछ भी मानने से पहले सोचने की आदत डाल ली है.”
पर्यावरण वकील रित्विक दत्ता बताते हैं कि अदालतें खनन मामलों में कैसे काम करती हैं. उनके अनुसार, अदालतें अक्सर आदेश दे देती हैं, लेकिन लागू होने पर ध्यान नहीं देतीं.
दत्ता ने कहा, “चाहे वह एनजीटी हो या अन्य अधिकारी, प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है. फॉलो-अप की कमी है. आदेश देना अच्छा है, लेकिन इसे अंत तक ले जाना ज़रूरी है. कहने का कोई फायदा नहीं कि अवैध खनन पर रोक है – हमें पहले से पता है. ज़रूरी है कि नियमित निगरानी हो.”

टूटी दीवारें, शांत धमकियां
सीकर के प्रेमपुरा गांव में, नीरज, 30 के दशक में, छह महीने पहले मीणा के साथ जुड़े, जब पास के क्रशरों से धमाके उनके घर की दीवारों और छत में दरारें डालने लगे.
नीरज ने टूटी चारदीवारी की ओर इशारा करते हुए कहा, “ये धमाके घंटेभर चलने वाले भूकंप जैसा महसूस होते हैं. पूरा घर हिलने लगता है.”
लगभग हर घरवाले वही कहानी कहते हैं – घरों को नुकसान, धूल भरी हवा और पत्थरों से भरे ट्रकों की कतारें, जिनमें से कई के नंबर प्लेट तक नहीं.
नीरज ने कहा, “मीणा जी पहले हमारे गांव आ चुके थे. तब हमारा इलाका ज्यादा प्रभावित नहीं था, लेकिन पिछले साल सब कुछ बहुत बदल गया.”
निवासियों ने पिछले छह महीनों में कई विरोध प्रदर्शन किए हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ खनन कंपनी के प्रतिनिधियों की धमकियां और डर का सामना करना पड़ा, वे बताते हैं.
एक अन्य निवासी सालेह कुमार ने कहा, “जब भी हम उनसे बात करते हैं, वे धमकाते हैं. फिर अगले दिन पुलिस आती है, हमें बस में बैठाकर चेतावनी देती है कि हमारे खिलाफ मामला दर्ज होगा.”
अब, हर रात जब धमाके लगातार होते हैं, परिवार एक अस्थायी तंबू में शरण लेते हैं, जो किसी घर के बड़े आंगन में लगाया गया है, डर के चलते कि उनकी छत उन पर गिर सकती है.

वादे जो बने ज़हर
सिस्टम पर भरोसा बहुत कम हो गया है. जब 2007 में जोधपुरा में एक सीमेंट प्लांट शुरू किया गया, गांव वालों से नौकरी और विकास का वादा किया गया. कई लोगों ने मीणा की चेतावनी को अनदेखा किया, लेकिन हकीकत जल्दी और कड़ी तरीके से सामने आई. आज वे बहुत प्रदूषित हवा, बीमारियों और बेरोज़गारी की शिकायत करते हैं. नेशनल एलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट्स और पीयूसीएल की संयुक्त रिपोर्ट में उनका जीवन “घुटन भरा” बताया गया, क्योंकि खनन ने निवासियों से उनका सबसे बुनियादी मानव अधिकार छीन लिया – सांस लेने का अधिकार.
रिपोर्ट में लिखा है, “गांव का खनन गतिविधियों और सीमेंट प्लांट के पास होना उन्हें कष्ट में डाल रहा है…जो हवा वे सांस लेते हैं वह प्रदूषण से भरी है और उन्हें सबसे बुनियादी मानव अधिकार से वंचित कर रही है.”
मीणा अब इस गुस्से को एक स्थायी आंदोलन में बदलना चाहते हैं. अपने साधारण घर से नीम का थाना – पेड़ों से बंधी बकरियां, आंगन में खेलते बच्चे – वे जिलों के गांव प्रतिनिधियों को फोन करते हैं. उनका तरीका सीधा है, लगभग सेल्सपर्सन जैसा: “क्या आप अपने इलाके में खनन के कारण परेशान हैं? यह सिर्फ आपके भविष्य या गांव का सवाल नहीं है, बल्कि हमारे देश का भी है. हमारे साथ जुड़िए!”
इस कोशिश का नाम है: अरावली विरासत जन अभियान. नए विरोध प्रदर्शन की लंबी चर्चाओं के बाद एक योजना बनी: हर प्रभावित गांव तक पहुंचना और बढ़ते गुस्से को राजस्थान की एक साझा आवाज़ में बदलना.
मीणा ने कहा, “ये विरोध लंबे समय से खनन के कारण गुस्से का नतीजा हैं. हम बस इसे सही दिशा में ले जाना चाहते हैं, ताकि इसका गलत इस्तेमाल न हो.”
इस एक्टिविज़्म ने युवाओं की नई पीढ़ी को जोड़ा और सालों में पहली बार, मीणा की लड़ाई अब अकेली नहीं लगती.
25 दिसंबर को, खनन के खिलाफ युवा प्रदर्शनकारी जयपुर में इकट्ठे हुए और चिल्लाए: “ज़ेन ज़ी एकता जिंदाबाद.”
अब उन्हें युवाओं और उनके विरोधों की नियमित अपडेट्स मिलती हैं. मीणा से बात करते वक्त उनके फोन पर एक युवा लड़की का मैसेज आया. उनके आंखों में चमक आ गई.
लड़की ने मीणा को भेजे मैसेज में लिखा, “हमने भगवान को कभी नहीं देखा, अगर एंजल्स होते, तो वे आप जैसे होते – अरावली के देवता, उन्हें बचाने के लिए लड़ते हुए.”

धूल और डर में लिखी कहानी
मीणा की लड़ाई 1997 में शुरू हुई, जब उनके गांव बरवाला में एक स्टोन क्रशर आया.
धूल ने फसलें नष्ट कर दीं, पशु चारे गायब हो गए और गांव वाले एक बीमारी से बीमार होने लगे, जिसके बारे में उन्होंने कभी नहीं सुना – सिलिकोसिस, जो सिलिका धूल के लंबे समय तक संपर्क में रहने से होती है और फेफड़ों में गंभीर संक्रमण पैदा करती है.
उन्होंने याद किया, “मेरे पिता हमारी बकरियों को वहां चराने ले जाते थे, लेकिन वहां चारा नहीं था और किसानों की फसलें नष्ट हो गईं.”
अधिकारियों को लिखे पत्रों का कोई फायदा नहीं हुआ. इसलिए मीणा ने मार्च शुरू किया – सच में – गांव से गांव तक पैम्पलेट लेकर अवैध खनन के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए.
धीरे-धीरे गांव के लोग उनके जन जागरूकता मार्च में जुड़ने लगे.
उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया, “मार्च सफल रहा, जहां भी मैं गया, लोगों ने स्वागत किया. उन्होंने ध्यान रखा कि मुझे खाना मिले.”
लेकिन यह यात्रा आसान नहीं थी. 2005 में, नीम का थाना में सैकड़ों क्रशरों के आरटीआई दस्तावेज़ लेकर, उन्होंने पहली बार राजस्थान हाई कोर्ट का रुख किया.
मीणा ने कहा, “मैं प्रशासन से निराश था और कोर्ट पर भरोसा था.” उन्होंने कहा, “लेकिन 2010 तक मैंने अपने मामले के लिए लड़ाई जारी रखी.”
फरवरी 2010 में, कोर्ट ने उनका पक्ष लिया. मीणा ने आदेश की 200 प्रतियां छापी और गांवों व खनन कंपनियों में बांटी. फिर भी, उनका कहना है कि आदेश का असर ज़मीन तक नहीं पहुंचा.
उन्होंने कहा, “खनन रुका नहीं. यह सिर्फ 500 मीटर से 700 मीटर चला गया.”
इसके बाद वर्षों तक धमकियां, डर और अपमान जारी रहे.
2011 में, मीणा को गिरफ्तार किया गया और गांव में नग्न होकर घुमाया गया, ताकि दूसरों को डराया जा सके. उनके बड़े भाई को झटका लगा और कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई. मीणा ने भीगी आंखों से कहा, “मेरे खिलाफ 24 मामले दर्ज थे. आठ बार माफियाओं ने हमला किया, लेकिन यह…यह बहुत ज्यादा था.”
उनकी पत्नी और बेटे ने उन्हें गांव छोड़ने की सलाह दी क्योंकि अपमान “असहनीय” था.
फिर भी, वे लड़ाई के लिए रुके.

2013 में, उन्होंने भोपाल के नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से दूसरी बंदी का आदेश लिया, लेकिन लागू करना मुश्किल रहा और उल्लंघन जारी रहे. 2018 की CAG रिपोर्ट ने पुष्टि की कि सुप्रीम कोर्ट के खनन आदेश नियमित रूप से तोड़े गए और पांच साल में राजस्थान के पांच जिलों में लगभग 99 लाख मीट्रिक टन अवैध खनन हुआ.
मीणा पीछे नहीं हटे. उन्होंने खनन स्थलों का दौरा जारी रखा और सबूत इकट्ठा किए – फोटो, जीपीएस कोऑर्डिनेट और विभागों को पत्र. उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी विरोध किया. कुछ नहीं बदला. सिलिकोसिस बीमारी उनके गांव में लगातार मौतें ला रही थी.
उन्होंने कहा, “2025 में कम से कम 1500-200 ट्रक पत्थर लेकर यहां से गुज़़रे. अब आप आसानी से खनन की सीमा का अंदाज़ा लगा सकते हैं.”
जब राजस्थान सरकार ने 2019 में पीड़ित परिवारों के लिए 3 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति की घोषणा की, तो मीणा हंसे.
उन्होंने कहा, “कितना हास्यास्पद है यह? सरकार खनन रोककर लोगों को बचाने में कुछ नहीं करती. अधिकांश सिलिकोसिस पीड़ित खनन क्षेत्रों से आते हैं. मृतकों की कीमत है, लेकिन ज़िंदा लोगों की कोई कीमत नहीं.”

सिस्टम पर भरोसा हिला
ज़िला दफ्तरों से लेकर कोर्ट तक, मीणा की अरावली बचाने की लड़ाई में उम्मीद और निराशा दोनों देखने को मिली हैं, लेकिन एक घटना अब भी अहम मोड़ के रूप में याद है – जिसने, उनके अनुसार, सिस्टम पर उनका भरोसा हमेशा के लिए हिला दिया.
2015 में, जब मीणा जयपुर में एक सार्वजनिक बैठक में थे, तो खबर आई कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के भोपाल बेंच के एक जज ने नीम का थाना में अचानक निरीक्षण किया.
जब तक मीणा जल्दी से वापस पहुंचे, जज जा चुके थे. कुछ दिन बाद, स्थानीय रिपोर्टों में जज का कहना आया कि इस इलाके में सब “ठीक” है और कोई खनन गतिविधि नहीं हो रही.
मीणा ने कहा, “मैं सदमें में था और टूट गया. मेरी अदालतों और न्याय प्रणाली में विश्वास हिल गया.”
इसके बाद की घटनाओं ने उस धोखे की भावना को और गहरा किया. जब मीणा ने जज द्वारा निरीक्षण किए गए गांवों का दौरा किया, तो निवासियों ने बताया कि जज के आने से पहले खनन मालिकों के साथ बैठक हुई थी. खानों के पास की सड़कें धो दी गई थीं और आसपास का इलाका अस्थायी रूप से हरा-भरा दिखाया गया था.
मीणा ने कहा, “जज के जाने के अगले ही दिन, खनन फिर से शुरू हो गया. सड़कें फिर से भारी ट्रकों से भरी हुई थीं. यहां तक कि कोर्ट भी उन्हें नहीं रोक सकी.”

लड़ाई जारी है
पिछले साल, मीणा ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का रुख किया, इस बार सोटा नदी को लेकर. कभी गांवों के लिए स्थायी जल स्रोत रही यह नदी सूख गई थी, खानों और आसपास की पहाड़ियों को समतल किए जाने के कारण.
अपने याचिका में, मीणा ने कहा कि अवैध खनन ने नदी का मार्ग बदल दिया और उसका कैचमेंट नष्ट कर दिया. ट्रिब्यूनल ने जांच का आदेश दिया. कुछ हफ्तों बाद, राजस्थान अधिकारियों को नदी और उसके इकोसिस्टम को बहाल करने का निर्देश दिया.
लेकिन जीत के बावजूद, घर के पास ही एक चेतावनी मिली. गांव वालों ने मीणा को कहा, “आप बहुत ताकतवर लोगों से लड़ रहे हैं – मत लड़ो”.
सालों में, मीणा के घर पर कई बार छापे पड़े.
उन्होंने कहा, “मुझे आतंकवादी की तरह ट्रीट किया गया. मेरी पत्नी पुलिस से कहती थी कि कम से कम मुझे खाना खाने दो.”
मीणा का दावा है कि उनके एक दोस्त की हत्या भी कर दी गई है.
उन्होंने बताया, “मेरे एक दोस्त, प्रदीप शर्मा, जो मेरी लड़ाई में शामिल हुआ, उसे माफिया ने मार डाला.”

नुकसान और उम्मीद की झलक
सभी मुश्किलों के बीच, उनकी पत्नी घर संभाले रखती थीं – खेती, बकरियों की देखभाल और उनके यात्रा खर्च का प्रबंधन. चार महीने पहले, जब वह गंभीर रूप से बीमार हुईं, मीणा ने यात्रा रोक दी, लेकिन उन्होंने ज़ोर दिया कि मीणा लड़ाई जारी रखें.
मीणा ने याद किया, “उन्होंने (पत्नी) कहा कि यह बड़ी लड़ाई है.”
मीणा एक बैठक में गए, लौटकर उन्हें तस्वीरें दिखाई. चार दिन बाद उनकी पत्नी का निधन हो गया.
उन्होंने कहा, “मुझे तब तक पता ही नहीं था कि वह गंभीर रूप से बीमार हैं, जब डॉक्टर ने बताया कि उन्हें ब्लड इन्फेक्शन है.”
अरावली में अवैध खनन के खिलाफ विरोध बढ़ते जा रहे हैं, सोशल मीडिया पोस्ट्स से भरा पड़ा है, जिसमें पुराने पर्वतों की रक्षा की मांग की जा रही है.
लेकिन वकील ऋत्विक दत्ता का मानना है कि ऐसी ऑनलाइन मुहिमें अल्पकालिक होती हैं, जबकि ज़मीनी आंदोलन का स्थायी प्रभाव होता है.
उन्होंने कहा, “मीणा समुदाय के लिए यह उनके जीवनयापन की रक्षा का सवाल है. यह कोई लक्जरी नहीं है – यह जीवन और मृत्यु का सवाल है. ये गांधीवादी विरोध के तरीके हैं जो सालों, तक दशकों तक चलते हैं. सोशल मीडिया की उम्र बहुत कम है.”
अब, जैसे ही उनका फोन फिर बजता है – एक और गांव, एक और शिकायत – मीणा अपनी भरोसेमंद बोलेरो में बैठते हैं, जिसकी खिड़कियां पॉलीथीन से ठीक की गई हैं. यह उनकी लड़ाई में मदद के लिए 19 साल पहले उनके दोस्तों ने गिफ्ट की थी.
फोन डैशबोर्ड पर लगातार बज रहा है.
उन्होंने कार स्टार्ट की और कहा, “अब भी उम्मीद है, शायद इस बार खनन रुके. शायद इस बार हम ताज़ा हवा सांस में ले सकें.”
(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: अरावली ज़ोनिंग योजना को ताकतवर लोग आसानी से मोड़ सकते हैं, सरकार को डेटा पब्लिक करना चाहिए
