ऑस्ट्रेलिया के बोंडी बीच पर हुए हालिया हमले से यहूदी समुदाय के भीतर डर और बढ़ेगा और यह भावना और मजबूत होगी कि यहूदी-विरोधी भावना बढ़ रही है. हनुक्का त्योहार के दौरान हुई इस सामूहिक गोलीबारी में 15 लोगों की मौत हो गई और 40 से ज्यादा लोग घायल हुए. इस घटना ने उस देश में सामूहिक सुरक्षा की भावना को तोड़ दिया, जो अपनी सुरक्षा और सामाजिक एकता पर गर्व करता है. ऑस्ट्रेलिया के सख्त बंदूक कानूनों को अक्सर एक मॉडल के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन यह त्रासदी दिखाती है कि सिर्फ कानून ही समाज को कट्टर नफरत के खतरे से नहीं बचा सकते.
जहां दुनिया के हर कोने से इस हमले की निंदा हुई, वहीं एक बात खास तौर पर सामने आई. सिडनी के मुस्लिम समुदाय ने बोंडी हमले के आरोपी के लिए अंतिम संस्कार की रस्में करने से इनकार कर दिया. समुदाय की एक सम्मानित आवाज़ डॉ. जमाल रिफी ने साफ कहा, “जो उन्होंने किया है, उसे हममें से कोई भी सही नहीं मानता. निर्दोष नागरिकों की हत्या निंदनीय है—हमारा धर्मग्रंथ सिखाता है कि एक निर्दोष की हत्या पूरी मानवता की हत्या के बराबर है.”
इसके बावजूद, सामूहिक सदमे और गुस्से के माहौल में सोशल मीडिया पर नफरत फैलती रही. यह नफरत अपराध या हमलावरों के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ दिखाई दी. यहूदी धार्मिक सभा पर हमला, उस आतंकवाद का एक और उदाहरण है जो आस्था, स्मृति और पहचान को निशाना बनाकर डर फैलाता है और साथ ही सह-अस्तित्व की भावना को मिटाने की कोशिश करता है. ऐसे कृत्यों को बिना किसी हिचक के खारिज किया जाना चाहिए, क्योंकि ये समाज को धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर तोड़ने की सोची-समझी कोशिशें हैं, लेकिन अगर हम किसी दूसरी समुदाय के खिलाफ नफरत से जवाब देकर इस दरार को और चौड़ा करते हैं, तो हम आतंक को पनाह दे रहे हैं.
बोंडी हमले को और भी खतरनाक बनाती है वह रिपोर्ट, जिसमें कहा गया है कि संदिग्धों में से एक ने खुले तौर पर इस्लामिक स्टेट का समर्थन किया था. इस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. नफरत के दुष्चक्र में न पड़ना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि वैचारिक आतंकवादी समूह यही चाहते हैं, लेकिन उतना ही ज़रूरी यह समझना भी है कि हम किससे मुकाबला कर रहे हैं और यह समस्या पैदा ही क्यों हुई है.
इस्लामिक स्टेट की मूल सोच इस्लाम के खिलाफ है
ISIS सिर्फ गुस्से या समाज से कटे होने की वजह से नहीं बनता. इसकी जड़ एक खास सोच में है. यह सलफी विचारधारा से जुड़ा है, जो इस्लाम की एक सख्त धारा है और शुरुआती मुसलमानों के तरीकों को अपनाने की बात करती है, लेकिन ISIS आम सलफी सोच जैसा नहीं है. ISIS एक बेहद चरम, तकफीरी सोच वाला और तानाशाही समूह है. तकफीर का मतलब है—दूसरे मुसलमानों को काफिर बताकर उनकी हत्या को सही ठहराना. यह संगठन पूरी तरह आज्ञाकारिता और नियंत्रण चाहता है. इस प्रक्रिया में यह इस्लाम की नैतिकता और आध्यात्मिक भावना को खत्म कर देता है और उसकी जगह एक खोखली सोच रख देता है, जिसका इस्तेमाल लगातार हिंसा को सही ठहराने के लिए किया जाता है. इसका मकसद न न्याय है, न सुधार और न ही सच्ची आस्था—बल्कि डर के ज़रिए पूरा नियंत्रण पाना है. अगर हम इस बिगड़ी हुई सोच को साफ नाम नहीं देंगे, तो हम अंधी नफरत और खतरनाक इनकार—दोनों को जगह देंगे और ये दोनों ही न समाज की रक्षा करते हैं और न उन समुदायों की, जिन्हें ये समूह आखिर में तबाह कर देते हैं.
जिहादी सोच के केंद्र में एक खतरनाक बदलाव है. इसमें कहा जाता है कि हिंसक जिहाद हर मुसलमान की व्यक्तिगत जिम्मेदारी—फर्ज़-ए-ऐन—है, जबकि असल में जिहाद सख्त शर्तों, नैतिक नियमों और सामूहिक फैसलों से जुड़ा होता है. ISIS इस गलत सोच को सबसे चरम स्तर तक ले जाता है. यह सिर्फ हिंसा की बात नहीं करता, बल्कि धर्म को ही हथियार बना देता है. अपने बेहद सीमित नज़रिये से बाहर लगभग हर किसी को यह मुरतद्द यानी धर्म से बाहर घोषित कर देता है. इससे असहमति भी मौत की सज़ा के लायक अपराध बन जाती है. इस्लाम की सैकड़ों साल पुरानी विद्वता, बहस, संयम और नैतिकता को यह पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देता है. इसी वजह से कई गंभीर इस्लामी विद्वान ISIS को “अत्यंत रूढ़िवादी” नहीं, बल्कि चरमपंथी और विधर्मी मानते हैं. यह आस्था को बेहद सरल और खतरनाक तरीके से घटाकर पेश करता है जिसमें न गहराई बचती है और न इंसानियत.
ISIS को चलाने वाली असली ताकत है तकफीर—यानी दूसरों को इस्लाम से बाहर बताना. इसी सोच के ज़रिए ISIS शिया मुसलमानों, सूफियों, ज़्यादातर सुन्नियों, धर्मनिरपेक्ष मुसलमानों, राजनीतिक नेताओं, धार्मिक विद्वानों और यहां तक कि दूसरे उग्रवादी संगठनों को भी काफिर या मुरतद्द घोषित कर देता है. एक बार किसी को गैर-इस्लामी कहा गया, तो उसकी जान की कोई कीमत नहीं रह जाती. सामूहिक हत्याएं, लोगों को गुलाम बनाना और पूरे समुदायों को खत्म करना, सब कुछ इसी एक सोच से सही ठहरा दिया जाता है.
यह एक कड़वी सच्चाई है, जिससे कई लोग बचते हैं: ISIS की असली लड़ाई पश्चिम के खिलाफ नहीं है. इसके सबसे बड़े शिकार हमेशा वे मुसलमान रहे हैं, जो इसकी सत्ता और सोच को मानने से इनकार करते हैं. यही बात इसे पहले के उग्रवादी संगठनों से अलग और कहीं ज्यादा खतरनाक बनाती है. यह इस्लाम की रक्षा के लिए नहीं लड़ रहा—यह अपने अलावा इस्लाम के हर रूप को मिटाना चाहता है.
जैसा कि ओलिवियर रॉय कहते हैं, ISIS धीरे-धीरे राजनीतिक बदलाव नहीं चाहता, बल्कि तबाही के ज़रिए “शुद्धता” हासिल करना चाहता है. ISIS कयामत से जुड़ी सोच में गहरा विश्वास रखता है. उसका मानना है कि दुनिया अपने आखिरी दौर में पहुंच चुकी है, अंत का समय शुरू हो गया है और आस्थावान और गैर-आस्थावान के बीच आखिरी लड़ाई अब पास है. यह समूह आधुनिक दुनिया की सोच को ही नकार देता है. यह लोकतंत्र को ग़लत मानता है, देशों की सीमाओं को नहीं मानता और नागरिकता या संविधान को गलत और भ्रष्ट व्यवस्था कहता है. इसकी जगह ISIS एक खुद बनाए गए खलीफा के आदेशों को पूरी तरह मानने की मांग करता है, जहां धर्म, कानून, हिंसा और शासन—सब मिलकर एक सख्त और तानाशाही ताकत बन जाते हैं. महिलाओं पर सख्त नियंत्रण भी ISIS की सोच का अहम हिस्सा है. महिलाओं के शरीर, आने-जाने, पढ़ाई और मां बनने तक पर कड़े नियम लगाए जाते हैं. मर्दानगी को हिंसा, शहादत और पूरी तरह नियंत्रण से जोड़ा जाता है.
और यही बात मुझे सबसे ज़्यादा परेशान करती है. ऐसे आतंकी हमले करने वाले लोग हमेशा सबसे गरीब या सबसे मजबूर नहीं होते. उनमें से कई पढ़े-लिखे होते हैं, साफ बोलते हैं और जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं. वे समाज की एक ऐसी तस्वीर पर पूरा भरोसा रखते हैं, जिसे वे पूरी तरह शुद्ध और सही मानते हैं—एक काल्पनिक खिलाफत, जिसे वे अल्लाह के कानून से चलने वाला कहते हैं. उन्हें पता होता है कि इससे दुख होगा, कि वे खुद भी घायल हो सकते हैं या मारे जा सकते हैं. फिर भी वे ये भयानक काम अपनी मर्ज़ी से करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि हिंसा उस चीज़ को जल्दी ला देगी, जिसे वे तय मानते हैं. उनके लिए आतंक एक तरीका है और मौत योजना का हिस्सा है.
इससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि बोंडी बीच हमले में आतंक के संदिग्धों में से एक भारतीय मूल का बताया गया है. यह सोचकर डर लगता है कि अगर हमारे अपने समाज का कोई व्यक्ति इतनी चरम सोच का शिकार हो सकता है, तो ऐसी सोच हमारे देश तक लौटने से कौन रोकेगा? यह साफ याद दिलाता है कि कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई सिर्फ सरकारों पर नहीं छोड़ी जा सकती. मुस्लिम समुदाय को खुद आगे आकर यह काम करना होगा कि चरमपंथ की सोच जड़ न पकड़ पाए.
(आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
यह भी पढ़ें: भारतीय मुसलमान अरशद मदनी की दोहराई हुई बेबसी से बेहतर के हकदार हैं
